संविधान की विकास गाथा: भारत में वास्तविक आर्थिक क्रान्ति की रूपरेखा

प्रो. शाह का तर्क बहुत स्पष्ट था कि खान और खनिज ऐसी संपत्ति है जो घटती और नष्ट होती रही है. इसका संरक्षण होना चाहिए. इनके मामले में मितव्ययी होना चाहिए. दुर्भाग्य से इनकी रक्षा करने के स्थान पर इन्हें विशेषाधिकार और मुनाफ़ा कमाने के इच्छुक व्यक्तियों और निजी गैर-सरकारी एकाधिकारियों को सौंप दिया गया है. यह कोई नहीं सोचता कि जब यह खानें समाप्त हो जाएंगी, तब क्या होगा?

Source: News18Hindi Last updated on: September 28, 2020, 10:32 AM IST
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संविधान की विकास गाथा: भारत में वास्तविक आर्थिक क्रान्ति की रूपरेखा
प्रो. केटी. शाह ने लन्दन स्कूल आफ इकोनामिक्स से स्नातक किया था. फिर वे मैसूर विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर बन गए थे.
भारत की संविधान सभा के एक सदस्य का नाम था प्रो. केटी शाह. प्रो. केटी शाह ने लन्दन स्कूल आफ इकोनामिक्स से स्नातक किया था. फिर वे मैसूर विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर बन गए थे. फिर वर्ष 1938 में वे राष्ट्रीय योजना आयोग के महासचिव बने. इस आयोग का मकसद भारत में बेरोजगारी, रक्षा, गरीबी, अर्थतंत्र और औद्योगिकीकरण के विषयों के समाधान के लिए नीतियां बनाना था. वे संविधान सभा के लिए बिहार प्रांत से चुने गए थे. उन्होंने सिक्सटी इयर्स आफ इंडियन फायनेंस, एनशियेंट फाउन्डेशन्स आफ इकोनामिक्स इन इंडिया. फेडरल स्ट्रक्चर एंड प्रिंसिपल्स आफ प्लानिंग सरीखी किताबें लिखीं. बाद में राष्ट्रपति पद के चुनाव में उन्होंने डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद को चुनौती भी दी. मैं जिस विषय पर यह लेख लिख रहा हूँ, उसके सन्दर्भ में प्रो. केटी शाह का यह परिचय देना बहुत जरूरी हो जाता है, ताकि पढ़ने वाले भारत के मूल विषयों को दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर समझ सकें. उन्होंने सभा में कहा था कि आधुनिक काल नरभक्षी, रक्त शोषक है. ऐसा शोषक जिसको उच्च सम्मान मिलता है, जिसे प्रायः उपाधियांं दी जाती हैं, जो इस परिषद् में पूर्णतः प्रतिरूपित है और इसी कारण वह आपको अपनी इच्छा पर चला सकता है. वह अपनी सुरक्षा और एकाधिकार के लिए व्यवस्थाएं बनाना चाहता है. यह देश और जन साधारण के लिए अहितकर होगा.

आज़ाद भारत ने अपनी व्यवस्था के स्वरुप और चरित्र का निर्धारण एक विस्तृत संविधान लिख कर किया था. यह एक अद्भुत दस्तावेज है, किन्तु इस दस्तावेज में कुछ संशोधन की जरूरत लगने लगी है. भारत के संविधान के भाग-4 यानी राज्य की नीति निदेशक तत्वों के तहत अनुच्छेद 39(ख) में उल्लेख है कि राज्य अपनी नीति का, विशिष्टतया, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो, जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो और (ग) आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन-साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेन्द्रण न हो; वस्तुतः स्वतंत्र भारत के इतिहास और अनुभवों से यह साबित हुआ है कि राज्य ने प्राकृतिक संसाधनों और उत्पादन का नियमन ईमानदारी और जवाबदेहिता के साथ नहीं किया और ऐसी नीतियां अपनाएंं जिनसे आज देश की 77% संपदा पर 10% परिवारों का नियंत्रण हो गया है. भारत की सबसे बड़ी कम्पनी का मुख्य कार्यकारी केवल एक साल में जितनी आय अर्जित करता है, न्यूनतम मजदूरी के आधार पर उतनी आय अर्जित करने में एक श्रमिक को 941 साल लगेंगे. एक अच्छा संविधान बनाने वाले देश में इस तरह की आर्थिक व्यवस्था होने के क्या मायने हैं? यही कारण है कि अब भारत को आर्थिक क्रान्ति की नई परिभाषा और रूपरेखा गढ़ने की जरूरत है.

प्रो. केटी शाह ने इस बिंदु पर बहस करते हुए 22 नवम्बर 1948 को कहा था कि मेरा प्रस्ताव है कि इस अनुच्छेद में बात इस तरह रखी जाए – 'कि देश के प्राकृतिक साधनों का, जो कि खानों, खनिज संपत्ति, वनों, नदियों तथा बहते हुए जलों के रूप में एवं देश के तट के साथ-साथ सागर के रूप में है, स्वामित्व, नियंत्रण तथा प्रबंध सामूहिक रूप में देश में निहित होगा तथा देश के अधीन होगा और समुदाय-समाज के हित में राज्य ही उनका विकास करेगा और उन्हें उत्पादन-कार्य में लगाएगा; जो कि (अर्थात राज्य) केन्द्रीय एवं प्रांतीय सरकारों अथवा स्थानीय शासक प्राधिकारी अथवा कानूनी निगम (कारपोरेशन) द्वारा प्रतिरूपित होगा, जैसे भी संसद के क़ानून द्वारा व्यवस्था की जाए'; उन्होंने कहा कि अभी जिस रूप में यह अनुच्छेद रखा गया गया है, उसका कुछ भी अर्थ निकला जा सकता है. जिस तरह की परम्पराएं इस देश में रही हैं, इस परिषद् में निहित हितों के प्रति जैसी अनुसक्ति है, उससे मुझे भय है कि इस खंड के ऐसे ही बने रहने देने से देश के समुचित विकास अथवा सामाजिक न्याय को स्थापित करने और देश की संपत्ति के न्यायोचित पुनःवितरण की आशाएं शून्य स्वप्न बन कर रह जायेंगी'.

प्रो. शाह का तर्क बहुत स्पष्ट था कि खान और खनिज ऐसी संपत्ति है जो घटती और नष्ट होती रही है. इसका संरक्षण होना चाहिए, इनके मामले में मितव्ययी होना चाहिए, किन्तु दुर्भाग्य से इनकी रक्षा करने के स्थान पर इन्हें विशेषाधिकार और मुनाफ़ा कमाने के इच्छुक व्यक्तियों और निजी गैर-सरकारी एकाधिकारियों को सौंप दिया गया है. यह कोई नहीं सोचता कि जब यह खानें समाप्त हो जाएंगी या जब युगों की संचित संपत्ति का अवसान हो जाएगा, तब क्या होगा? उनका कहना था कि इन संसाधनों पर हमारी आकांक्षाएं, आशाएं और औद्योगिकीकरण के सपने निर्भर हैं और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश की सुरक्षा और प्रतिरक्षा निर्भर है. अगर हमने देश की खनिज संपत्ति को गैर-सरकारी निकायों के हाथों में सौंपा तो यह जनता और भावी संतान के प्रति अत्याचार होगा.
डाॅ. अम्बेडकर ने मसौदा समिति का प्रमुख के रूप में प्रो. शाह के संशोधनों को अस्वीकार कर दिया. उन्होंने कहा कि 'मैं प्रो. शाह के संशोधनों पर विचार करता यदि वे सिद्ध कर देते कि वे जो संशोधन प्रस्तुत कर रहे हैं, वह विद्ममान भाषा में अंतर्गत होना सम्बह्व नहीं है. इसमें वे बातें सम्मिलित हैं, जो प्रो. शाह ने रखी हैं.'

प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना ने सभा में कहा कि दुनिया भर के अनुभवों से सीख लेते हुए आज हमें कम से कम यह बात रख देना चाहिए कि देश के मूल उद्योगों पर राज्य का स्वामित्व होगा. इसी तरह हम देख रहे हैं कि अमेरिका की 54% संपत्ति 60 परिवारों के पास है और इनके 12 संचालक अमेरिका के मंत्रिमंडल के मंत्रियों से भी अधिक शक्तिशाली हैं. इससे हमें शिक्षा लेना चाहिए. हमें यह व्यवस्था बनाना चाहिए कि भारत में एकाधिकारों को नहीं रहने दिया जाएगा.

यदुवंश सहाय ने सवाल किया कि यह महान परिषद् साफ़ तौर पर और साहस के साथ यह अनुच्छेद क्यों नहीं शामिल करती कि देश के उत्पादन-साधन तथा प्राकृतिक अथवा भौतिक साधन समाज की तथा इसके द्वारा राज्य की संपत्ति होंगे. सहाय ने बहुत संतुलित तरीके से संविधान की मूल भावना (कि भारत के राज्य को भारत की जनता से शक्ति और अधिकार मिलते हैं) के मुताबिक़ ही यह सुझाव दिया था, जिसमें स्पष्ट था कि संसाधनों का स्वामित्व 'राज्य' के पास नहीं बल्कि 'समाज' के पास होगा. वे जानते थे कि यदि राज्य को निरंकुश स्वामित्व दिया गया तो वह भ्रष्ट आचरण करके गलत नीति बना सकता है.महबूब अली बेग साहब बहादुर ने इस नज़रिए को किसी एक विशेष राजनैतिक विचारधारा का करार दिया और कहा कि संविधान में किसी भी राजनैतिक विचारधारा के सिद्धांतों का समावेश नहीं होना चाहिए. इस पर यदुवंश सहाय ने कहा कि 'संविधान निर्माण राजनीतिक दलों का ही काम है. मैं कांग्रेस से सम्बद्ध हूँ और कांग्रेस ने लोगों से वायदा किया है कि जहाँ तक राज्य के उत्पादन साधनों तथा प्राकृतिक साधनों का सम्बन्ध है, वे कुछ थोड़े से इष्ट लोगों के हाथों में नहीं छोड़े जाएंगे. मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि पूंजीपति या देश के बड़े धनि लोगों को खानों तथा खनिज पदार्थों के प्रबंध के अवसर ही न मिल सकें; क्या हम बस यह सिद्धांत नहीं रख सकते कि उत्पादन साधन और प्राकृतिक साधन राज्य अथवा समुदाय के स्वामित्व में होने चाहिए. हमें दुःख है कि पूंजीपतियों ने यह आडम्बर खडा कर दिया है कि यदि आप ऐसी बातें करेंगे तो हम उत्पादन बंद कर देंगे. इससे हमें डरना नहीं चाहिये क्योंकि आजकल उत्पादन समाज के कल्याण के लिए नहीं होता'. सीके दूसरी तरफ ए. नागप्पा मानते थे कि जब तक यह खंड है, भारत में पूंजीवाद के फलने फूलने की संभावना नहीं है. बस निवेदन यह है कि इस बात का ध्यान रखें कि इसका प्रत्येक शब्द कार्यान्वित किया जाए. सदइच्छाओं से या आडम्बरमय शब्दों के रखने से कोई लाभ नहीं है'.

प्रो. शाह चाहते थे कि प्राकृतिक संसाधनों का स्वामित्व, सीधा नियंत्रण, प्रबंध और विकास अंत में राज्य के हाथ में हो या राज्य के अभिकर्ता, राज्य के प्रतिनिधि या राज्य द्वारा बनाए हुए निकायों जैसे प्रान्तों, नगर-मंडलों या कानूनी संस्थाओं के हाथ में हो. संविधान लागू होने के बाद भारतीय राज्य और राजनीतिक व्यवस्था में इस विषय पर सजगता और चेतना थी; इसीलिए लौह-इस्पात, एल्युमीनियम, गैस, कोयला खनन आदि का नियंत्रण सरकार के हाथ में रहा; लेकिन चूंकि नीति निदेशक तत्वों में ऐसा करना बाध्यता नहीं है, इसलिए 1990 के दशक से अपनाई गयी निजीकरण की नीतियों के माध्यम से सरकार ने सभी संसाधनों और इनसे सम्बंधित निकायों आ पूर्ण निजीकरण शुरू कर दिया. एक मायने में भारत में पूंजीवादी नीतियों का वर्चस्व हो गया. परिणामस्वरूप तीस सालों में में देश की आधी संपत्ति 100 घरानों के हाथ में आ गई. आज हम उस मुकाम पर पहुंंच गए हैं, जहाँ नदियों, पहाड़ों, भूमिगत संसाधनों का खूब शोषण करने (लूट) में राज्य जुट गया है. चूंकि आर्थिक नीतियों को पर्यावरण और आर्थिक न्याय के नज़रिए से जनपक्षीय बनाना राज्य की संवैधानिक बाध्यता (सिवाए उद्देशिका में दर्ज सुन्दर शब्दों के) नहीं है और ऐसी नीतियों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है, इसलिए हम नियंत्रण भारतीय राष्ट्र की अस्मिता और आर्थिक न्याय का ह्रास होते देख रहे हैं. भारत में यदि आर्थिक क्रान्ति की संभावना तलाशना है, तो यह संभावना नीति निदेशक तत्वों को बाध्यकारी बनाने के संघर्ष में खोजी जाना चाहिए. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: September 28, 2020, 10:32 AM IST
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