भारत के संविधान से क्यों विलुप्त हुए गांव?

वास्तव में लोकतंत्र आधारित शासन व्यवस्था में यह बहस अब स्थापित हो चुकी है कि सत्ता का केन्द्रीयकरण, सत्ता को निरंकुश बना देता है. एक समय ऐसा आता है, जब बहुमत निरंकुश सत्ता का सबसे धारदार हथियार बन जाती है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 21, 2020, 12:53 PM IST
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भारत के संविधान से क्यों विलुप्त हुए गांव?
स्वतंत्र भारत के विकास की दारुण कथा में सबसे निरीह पात्र हैं इसके गाँव और पंचायत व्यवस्था. जिन्हें ढोल बना दिया गया है.
स्वतंत्र भारत के विकास की दारुण कथा में सबसे निरीह पात्र हैं इसके गाँव और पंचायत व्यवस्था. जिन्हें ढोल बना दिया गया है. जिसे सभी राजनीतिक विचारधाराएँ अपनी अपनी तरह से बजाती है. जब भारत का संविधान बन रहा था, तब ज्वलंत बहस यह थी कि भारत की शासन व्यवस्था विकेंद्रीकृत होगी या फिर केंद्रीयकृत. संविधान सभा के कुछ सदस्य विकेंद्रीकरण के गांधी विचार के पक्षधर थे कि गाँव के स्तर पर चुनाव हो और इसके बाद हर स्तर पर वहीँ से प्रतिनिधित्व लेकर तालुका, राज्य, राष्ट्र की व्यवस्था बने, किन्तु डा. बी. आर. अम्बेडकर इसके खिलाफ थे. उनके द्वारा प्रस्तुत किये गए लगभग 44650 शब्दों से बने मसौदे में गाँव और पंचायत शब्द का उल्लेख नहीं था, जबकि महात्मा गांधी ने माना था कि चुनाव के माध्यम से जनप्रतिनिधियों का चुनाव केवल गाँव-पंचायत के स्तर पर ही होना चाहिए और उनमें से प्रतिनिधियों को चुनकर तालुका, जिला, राज्य और राष्ट्र की व्यवस्था/सरकार का गठन होना चाहिए.

संविधान लागू होने के 43 साल बाद संविधान संशोधन करके पंचायती राज और नगरीय निकाय व्यवस्था को लागू करने की व्यवस्था की गयी. डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान सभा में संविधान का प्रारूप पेश करते हुए कहा था कि 'मुझे हर्ष है कि मसौदा समिति ने गावों को कोई स्थान नहीं दिया है. ये गांव कूपमंडूकता के गड्ढे और साम्प्रदायिकता के अड्डे हैं' इस पर महावीर त्यागी ने बहस की और कहा कि 'दासत्व के इन्हीं गड्ढों में स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में दमन-चक्र चल रहा था. जब चिमूर में दासत्व के इन गड्ढों में उत्पीड़न हो रहा था और अग्नि प्रज्वलित हो रही थी, तो स्वतंत्रता के ये सपूत अंग्रेजों की पीठ की मालिश कर रहे थे.' यानी श्री त्यागी के मुताबिक़ भारत का ग्रामीण समाज उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष कर रहा था.

डॉ. अम्बेडकर की दृढ़ सोच थी कि भारत में केवल राज और राज्य व्यवस्थाओं ने ही लोगों का शोषण नहीं किया है, बल्कि समाज के भीतर ही शोषण की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था बना दी गई है. अतः छुआछूत और शोषण को मिटाने के लिए पूरी व्यवस्था को ही तोड़ना होगा और नयी व्यवस्था बनानी होगी. स्वाभाविक है कि इस विचार को राजनीतिक-सामाजिक सहमति नहीं मिली. संविधान के उनके शुरूआती प्रारूप में ग्रामीण और पंचायत व्यवस्था के लिए कोई प्रावधान नहीं थे. उनके द्वारा प्रस्तुत किये गए मसौदे पर बहस के दौरान संविधान सभा में बहुत पुरजोर तरीके से गांव पंचायत की व्यवस्था को शामिल किये जाने की मांग की गई. जिन्हें बाद के मसौदे में संशोधन के साथ शामिल किया गया. बहरहाल उन्होंने पंचायत आधारित शासन व्यवस्था की मांग को सिरे से खारिज कर दिया था.

महात्मा गांधी लगातार यह वकालत करते रहे कि भारत की पारम्परिक व्यवस्था में छुआछूत, जाति, वर्ण व्यवस्था सरीखी बुराइयों को मिटाए बिना पंचायत व्यवस्था कारगर न होगी. जबकि डॉ. अम्बेडकर का दृढ़ विश्वास था कि भारत से जाति व्यवस्था को मिटाने के लिए गांवों को ही मिटाना होगा. संविधान के मसौदे में ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए कोई प्रावधान नहीं थे और यह संविधान दस्तावेज भारत में केन्द्रीयकरण की वकालत करता था.
डा. अम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा कि, 'इस मसविदे के विरुद्ध दूसरी आलोचना यह की गयी कि इसमें कहीं भी प्राचीन राजनीति को कोई स्थान नहीं दिया गया है. यह कहा जाता है कि इस नवीन विधान का निर्माण प्राचीन हिन्दू राज्य परंपरा के आधार पर होना चाहिए था और इसमें पाश्चात्य सिद्धांतों का समावेश न कर, ग्राम और जिला पंचायतों की भित्ति पर इसे खड़ा होना चाहिए था. कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनकी विचारधारा बहुत आगे -अति की और- चली गयी है. वे कोई केन्द्रीय या प्रांतीय शासन नहीं चाहते. वे चाहते हैं कि भारत में केवल ग्राम सरकारें हो, जो लोग इन ग्रामों पर गर्व करते हैं, वे इस बात का विचार नहीं करते कि आखिर देश के भाग्य निर्माण में तथा उसके कार्यकलापों में इन ग्रामों ने कितना कम हाथ बंटाया है और क्यों?' उन्होंने मेटकाफ़ के वाक्यों का उल्लेख किया कि 'कितने ही राजवंश आये और गए, कितनी की क्रांतियां हुईं, हिन्दू, पठान, मुग़ल, मराठा, सिख, अँगरेज़-सभी बारी-बारी से देश के मालिक बने, किन्तु यहां की ग्राम पंचायतें सदा ज्यों-की-त्यों बनी रहीं. जब-जब युद्ध हुए, संकट आये, इन्होनें अपने को हथियार बंद किया, अपनी किले बंदी की. विरोधी सेना जब इनके प्रदेश पहुंची तो इन्होने अपने मवेशियों को चाहर-दीवारी में इकठ्ठा कर दिया और शत्रु को बिना रोके बढ़ जाने दिया.'

महात्मा गांधी ने इन्हीं बातों को भारत की ताकत माना था और कहा था कि भारत ने अपने लाभ के लिए कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया और जो भी यहां आया, उसे अपना लिया; किन्तु डॉ. अम्बेडकर ने इसे भारत की सबसे बड़ी कमजोरी निरुपित किया. डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि 'हमारी ग्राम पंचायतों ने देश के इतिहास में यही ज्वलंत काम (जिसका मेटकाफ ने उल्लेख किया) किया है. इसे जानते हुए हमें उनके लिए आखिर क्या गर्व हो सकता है? यह बात सच हो सकती है कि भयंकर उथल-पुथल के होते हुए भी ये जीवित रह गयीं, किन्तु केवल जीवित रहने का क्या मूल्य? प्रश्न तो यह है कि किस स्तर पर ये जीवित रहीं? मेरा मत है कि ये ग्राम पंचायतें ही भारत की बर्बादी का कारण रहीं हैं. इसलिए मुझे आश्चर्य होता है कि जो लोग प्रांतीयता की, सांप्रदायिकता की निंदा करते हैं, वही ग्रामों की इतनी प्रशंसा कर रहे हैं. हमारे ग्राम हैं क्या? ये कूप मंडूकता के परनाले हैं, अज्ञान, संकीर्णता एवं सांप्रदायिकता की काली कोठरियां हैं. मुझे तो प्रसन्नता है कि विधान के मसविदे में ग्राम को अलग फेंक दिया गया है और व्यक्ति को राष्ट्र का अंग माना गया है.'

प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना ने कहा कि 'डॉ. अम्बेडकर से यह सुनकर मुझे दुःख हुआ कि वे उस प्रणाली से घृणा करते हैं, जिसमें ग्रामों की इच्छा सर्वोपरि मानी जाती है.' एच.वी. कामत ने अपने वक्तव्य में कहा कि 'मैं एक बात में डॉ. अम्बेडकर का विरोध करता हूं. उन्होंने गांवों का उल्लेख स्थानीयता की गन्दी नालियों तथा अज्ञानता, विचार, संकीर्णता और साम्प्रदायिकता की कंदराओं के रूप में किया; कल का उनका (डॉ. अम्बेडकर का) ढंग एक प्रतिभाशाली नगर निवासी के समान था और यदि ग्राम निवासियों की ओर हमारा रुख यही रहा, तो मैं केवल यही कह सकता हूं कि ईश्वर हमारी रक्षा करें. हमारे गांवों के प्रति डॉ. अम्बेडकर के इस प्रकार के, यदि घृणापूर्ण नहीं तो अनिच्छापूर्ण भाषण को सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ.'इस विषय पर दामोदर स्वरुप सेठ ने 5 नवम्बर 1948 को सभा में कहा कि 'मैं पूछना चाहता हूं कि इस बड़े संविधान के ढाँचे में, आज जो हमारे सामने है, उसमें कहीं भी गांव का कोई जिक्र है और कहीं उसकी कोई तस्वीर है? नहीं, कहीं नहीं. किसी आज़ाद मुल्क के संविधान का आधार होना चाहिए – स्थानीय शासन व्यवस्था; हमें इस कान्स्टीट्यूशन में लोकल सेल्फ गवर्नमेंट के बारे में कहीं कोई बात नहीं दिखाई देती. यह सारा कान्स्टीट्यूशन अन्दर और नीचे से खड़ा करने के बजाये ऊपर से और बाहर से खड़ा किया जा रहा है और ऐसा कोई स्ट्रक्चर जो बाहर से और ऊपर से खड़ा किया जाए और जिसमें यूनिटों का कोई आधार और उनकी आवाज़ न हो, जिसमें हिंदुस्तान के हज़ारों और लाखों गांव का कोई भी जिक्र नहीं है, आप इस कान्स्टीट्यूशन को इस मुल्क को दे सकते हैं; मगर इसको ज्यादा दिनों तक आप अच्छी तरह से चला सकेंगे, इसमें मुझे शक है.'

वास्तव में लोकतंत्र आधारित शासन व्यवस्था में यह बहस अब स्थापित हो चुकी है कि सत्ता का केन्द्रीयकरण, सत्ता को निरंकुश बना देता है. एक समय ऐसा आता है, जब बहुमत निरंकुश सत्ता का सबसे धारदार हथियार बन जाती है. यदि समाज को साम्प्रदायिकता और पूंजीवाद के दाम्पत्य के बारे में शिक्षित नहीं किया जाए, तो सत्ता-सरकार इनका उपयोग करके आज़ाद मुल्क के नागरिकों को गुलाम बना कर रखती है. दामोदर स्वरुप सेठ ने उस वक्त यह समझा दिया था कि 'बेहतर होता कि हम स्वायत्त गणतंत्रों को आपस में मिलकर एक यूनियन के रूप में हिन्दुस्तान को बड़ा गणतंत्र बनाते. इस तरह के स्वायत्त गणतंत्र होने से न तो भाषाई प्रांतीयता का सवाल उठता और न साम्प्रदायिक बहुमत और अल्पमत का सवाल उठता, और न पिछड़े वर्ग का सवाल उठता है. इस संघ में जो-जो स्वायत्त इकाईयां होतीं, वह अपनी-अपनी संस्कृति के मुताबिक जिस संघ के साथ चाहते, उसके साथ अपना नाता जोड़ सकते थे.

इस तरह से जो यूनियन हमारे मुल्क में बनती, वह वाकई ऐसी यूनियन बनती, जिसमें हमें केन्द्रीयकरण पर इतना जोर देने की जरूरत नहीं होती, जितना हमारे काबिल डॉ. अम्बेडकर साहब ने दिया है. लेकिन हम भूल जाते हैं कि महात्मा गांधी ने इस बात पर जोर दिया कि 'सत्ता का ज्यादा केन्द्रीयकरण करना' उस सत्ता को अधिनायकवादी बना देता है और वह सत्ता फासिज्म के आदर्श पर जाती है. उस फासिज्म और अधिनायकवाद को रोकने का एक ही तरीका है और वह यह है कि ज्यादा से ज्यादा हम सत्ता का विकेंद्रीकरण करें. क़ानून के जरिये सत्ता को केंद्रीयकृत करने का कुदरती नतीजा यह होगा कि हमारे मुल्क में, जो अब तक फासिज्म का बराबर विरोध करता रहा है, और आज भी जिस फासिज्म के विरोध की हम जोर से दुहाई देते हैं, वह धीरे-धीरे फासिज्म की तरफ चला जाएगा.'
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: September 21, 2020, 12:53 PM IST
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