क्या हमारी व्यवस्था में करुणा और समानुभूति नहीं हो सकती है?

पिछले लगभग 45 दिनों में हमें अपने समाज का एक मानवीय चेहरा दिखाई दिया है. इन 45 दिनों में भोपाल, बेंगलुरु, लखनऊ, हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई, पुणे जैसे कई छोटे बड़े शहरों में कुछ समूहों का अंकुरण हुआ और कुछ ही दिनों में ये अंकुर समानुभूति के विशाल वृक्ष बन गए.

Source: News18Hindi Last updated on: May 13, 2021, 1:49 PM IST
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क्या हमारी व्यवस्था में करुणा और समानुभूति नहीं हो सकती है?
पूरी दुनिया इस समय कोरोना महामारी के प्रकोप में झुलस रही है.
आज इस प्रश्न पर विचार करना अपरिहार्य हो गया है. करुणा और समानुभूति को केवल सन्यासियों या आध्यात्म का विषय मानने की परम्परा को अब तोड़ना होगा. इस वक्त, जबकि दुनिया एक महामारी के प्रकोप में झुलस रही है. जबकि महामारी का फैलाव नित नए रूप ले रहा है, जबकि वायरस मायावी रणनीति से आक्रमण कर रहा है, उस वक्त मानव समाज की एक सबसे अहम् अपेक्षा है कि उसकी सरकार समानुभूति और करुणा के साथ व्यवहार करे. बर्बरता तो कोरोना वायरस दिखा ही रहा है.

पिछले लगभग 45 दिनों में हमें अपने समाज का एक मानवीय चेहरा दिखाई दिया है. इन 45 दिनों में भोपाल, बेंगलुरु, लखनऊ, हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई, पुणे जैसे कई छोटे बड़े शहरों में कुछ समूहों का अंकुरण हुआ और कुछ ही दिनों में ये अंकुर समानुभूति के विशाल वृक्ष बन गए. ये समूह कोविड महामारी के समय सोशल मीडिया और मोबाइल फोन के जरिये सूचना दे रहे हैं, सूचना ले रहे हैं और इसके बीच बहुत सारी कोशिशें कर रहे हैं. मध्यप्रदेश में शशांक गर्ग, जो कि एक पुलिस अधिकारी हैं, ने इंडिया कोविड हेल्प ग्रुप बनाया. आज इसमें 17 हज़ार लोग सदस्य के रूप जुड़े हुए हैं. इन 17 हज़ार से कहीं ज्यादा इस समूह का उपयोग कर रहे हैं. शशांक गर्ग समेत संभवतः 20 लोग लगातार केवल यही कोशिश कर रहे हैं कि जिसे जो इलाज़ चाहिए, वह किसी तरह हासिल हो जाए.

प्रतिघंटे इसमें लगभग 600 पोस्ट आती हैं. कोई लिखता है – ये इंजेक्शन तत्काल चाहिये, मरीज़ वेंटिलेटर पर है. कोई दूसरा व्यक्ति उसका अगले कुछ मिनिटों में पूछता है कि इनसे संपर्क कीजिये, मदद हो जाएगी. तीसरा व्यक्ति भी कोई रास्ता सुझाता है. इस तरह कड़ियां जुड़ती जाती हैं. इस पहले, दूसरे, तीसरे व्यक्ति में कोई सीधा रिश्ता नहीं है, लेकिन जो रिश्ता है, वह मानवता का है. हम जानते हैं कि ऐसी कई कोशिशों के बाद एक व्यक्ति लिखता है कि जिनके लिए इंजेक्शन लिया था, उनकी मृत्यु हो गई है. बहुत सारे लोग दुखी हो जाते हैं. वे सचमुच में दुखी होते हैं.

समानुभूति कोई तपस्या का परिणाम नहीं, एक मानवीय मूल्य है, यह बात भोपाल के एक युवा वरुण नामदेव सिद्ध करते हैं. वरुण साइकिल चलाने के शौकीन हैं. खुद को धुमक्कड़, भुक्कड़ और बंजारा कहते हैं. कई शहरों को उन्होंने साइकिल से ही नापा है. उनके एक दोस्त को संक्रमण ने जकड़ा. दोस्त के परिजनों ने दवाइयां और दैनिक सामान लाने में वरुण से मदद मांगी. वरुण ने सामान पहुंचा दिया. लेकिन एक प्रश्न खड़ा हुआ कि ऐसे तो शहर में कई परिवार होंगे, जिनमें बीमार व्यक्ति होंगे, बुज़ुर्ग होंगे और वे सामान नहीं ला पा रहे होंगे. बस वरुण ने यही काम शुरू कर दिया. सोशल मीडिया पर घोषणा कर दी कि वे साइकिल से ही सामान पहुंचाएंगे. एक व्यक्ति ने पहल की और उसके साथ 17 लोग जुड़ गए. हर दिन 20 से 30 परिवारों को वे साइकिल से ही सामान पहुंचा रहे हैं.
अभी की स्थिति में भारत में ऐसे लगभग 1700 समूह सक्रिय हैं, जो अपनी अपनी भूमिका निभा रहे हैं. कई समूह तो एक-एक दिन में 15 हज़ार फोन काल ले रहे हैं और जरूरत के मुताबिक़ कोरोना के आक्रमण को कमज़ोर करने की कोशिश कर रहे हैं. सच ही तो है, क्या महामारी से जंग केवल अस्पताल और दवाइयों से ही जीती जा सकेगी? नहीं, यह संभव नहीं है. इस वक्त भारतीय समाज साम्प्रदायिक राजनीति द्वारा खड़ी की गई दीवारों में छेद करके महामारी के सामने आ खड़ा हुआ है. जिस तरह से लोग एक दूसरे की मदद कर रहे हैं, उससे यह उम्मीद जागती है कि समाज अभी मिटा नहीं है. कुछ मामलों को छोड़ दें तो आज किसी की बात सुनते या किसी की बात करते समय, लोग हिन्दू-मुसलमान का वर्गीकरण नहीं कर रहे हैं.

सच में विद्वेष की राजनीति की लगाई हुई आग को समानुभूति और करुणा के इस अभियान के निर्मल जल से बुझाया जा सकता है. इस दौर का यह सबक तो मौजूदा पीढ़ी को गांठ बांध ही लेना चाहिए कि मानव का अस्तित्व जाति, मज़हबी या धार्मिक आक्रामकताओं या श्रेष्ठता की जंग से नहीं बचेगा. किसी भी व्यक्ति का जीवन तभी सुरक्षित हो सकता है, जब मानवीय मूल्यों की श्रेष्ठता स्थापित हो.


भारत का समाज तो करुणा को महसूस कर पा रहा है, किन्तु क्या भारत की राज्य व्यवस्था में हम कहीं करुणा और समानुभूति के तत्व को देख पा रहे हैं? महामारी के इस काल में यह परीक्षा भी हो रही है और उसके परिणाम भी जारी हो रहे हैं कि हम भारत की राज्य व्यवस्था में करुणा और समानुभूति के मूल्य स्थापित नहीं कर पाए हैं. ये कैसे स्थापित होते, जब नागरिकों ने ही इसे अपना लक्ष्य नहीं माना. वस्तुतः भारतीय समाज ने यह जाना ही नहीं कि शासन करना सरकार की जिम्मेदारी है, उसका अधिनायकवादी निरंकुश अधिकार नहीं है.भारत के संविधान का मूल भाव यही है कि न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका भारतीय नागरिकों के मनोभावों, उनके दुखों, उनकी पीढ़ाओं, उनकी आशाओं को महसूस करेगी और उस अहसास के आधार पर शासन करने की जिम्मेदारी निभाएगी. राजसत्ता के अपने निजी विशेषधिकार उतने ही होंगे, जितने नैतिक शासन करने के लिए आवश्यक माने जाएंगे, लेकिन भारत के सरकारें मानवीय मूल्यों के साथ शासन करने की धर्म, मर्म और कौशल सीख ही नहीं पाई. आज के ऐसे माहौल में, जबकि भारतीय इतिहास में सबसे ज्यादा अकाल मौतें होने की घटना निर्मित हो रही है, तब भी सरकारें पूंजीवादी और राजसत्ता के अहंकार को ही केंद्र में रखकर शासन कर रही हैं.

जिस वक्त बहुसंख्य लोग उपचार और औषधियों के लिए बदहवास एक कोने से दूसरे कोने की तरफ भाग रहे हैं. जिस वक्त वे सोशल मीडिया पर गुहार लगा कर मदद जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, जिस वक्त वे यह बता रहे हैं कि उनकी मां अस्पताल में भर्ती है, किन्तु आक्सीजन खत्‍म हो गई है, कोई आक्सीजन की व्यवस्था की मदद करे; तो ऐसी आवाजें भारत की सरकारों को राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा लगती हैं और ऐसी पुकारों को बंद करने के लिए दमन का रास्ता अख्तियार कर लिया जाता है. जब एक पुत्र मां के लिए आक्सीजन की गुहार लगा रहा होता है, तब क्या उसके मन में राष्ट्रद्रोह की भावना रही होगी? आप ही सोचिये?

आज एक इंजेक्शन, जिसका नाम रेमडिसिविर है, इसके भारत में पेटेंट के लिए गिलीड्स नामक कंपनी ने वर्ष 2015 में इस दवा के पेटेंट के लिए आवेदन किया, जिसे कोरोना महामारी शुरू होने के बाद भी 18 फ़रवरी 2020 को भारत सरकार ने स्वीकार किया. इससे रेमडिसिविर की अनुपलब्धता और ऊंची कीमतों का संकट खड़ा हो गया. उपलब्धता के अभाव में एक तरफ तो 250 रुपये की लागत वाला इंजेक्शन 1 लाख रुपये में बेंचा जा रहा है, तो वहीं दूसरी ओर नकली इंजेक्शन मरीजों को देने के मामले सामने आ गए. अब इससे मौतें भी होने लगी हैं. महामारी के वक्त रेमडिसिविर के मुनाफे के हितों के संरक्षण के बजाये क्या राज्य व्यवस्था को मानवीय हितों को प्राथमिकता नहीं देना चाहिए थी?

इस वक्त भारत में 1.91 लाख उपस्वास्थ्य केंद्र होने चाहिए, लेकिन 1.55 लाख ही उपलब्ध हैं, यानी 46 हज़ार केन्द्रों की कमी है. देश को 31.4 हज़ार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चाहिए, लेकिन 24.9 हज़ार ही उपलब्ध हैं, यानी 6.5 हज़ार पीएचसी की कमी है. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र होने चाहिए 7820 लेकिन उपलब्ध हैं 5183 यानी 2637 सीएचसी की कमी है. जब अस्पतालों का सवाल आता है तो सरकार के पास संसाधन सीमित होने का प्रचार किया जाता है, किन्तु आत्ममुग्ध नेतृत्व के प्रचार के लिए 6 हज़ार करोड़ रुपये और नए सचिवालय, संसद के नए भवन के लिए 20 हज़ार करोड़ रुपये उस वक्त खर्च किए जा रहे होते हैं, जबकि भारत कोरोना महामारी के तूफ़ान के ठीक बीच में फंसा होता है.


महामारी की विकरालता को देखते हुए द लेंसेट शोध पत्रिका ने सितम्बर 2021 तक 10 लाख लोगों की मृत्यु का आंकलन सामने रख दिया है; ऐसे में यदि भारतीय शासन व्यवस्था में करुणा और समानुभूति का अहसास होता, तो निश्चित रूप से इस तरह की विलासी परियोजना को नकार दिया जाता.देश में तालाबंदी है, करुणा से सरकारों को यह अहसास हो सकता था कि तीन चौथाई आबादी के लिए कई हफ़्तों तक महामारी से सुरक्षा के लिए घर में रहना बहुत पीड़ादायक विकल्प है क्योंकि उनके बच्चे, मां-बाप भूखे हैं. उनके लिए बीमारी के साथ भरपेट भोजन और कुछ मीठी बातों की आपूर्ति जीवन को सचमुच सुरक्षित कर सकती थी. सरकार से मिलने वाले 166 ग्राम गेहूं-चावल से वे थोड़े तो ज़िंदा रह जायेंगे लेकिन क्या अपनी व्यवस्था की प्यार कर पाएंगे?

हो सकता है कि इस वक्त जब हर किसी को अपना जीवन संकट में नज़र आ रहा है, तब वह अपनी व्यवस्था से नाराज़ होगा, कुछ अप्रिय वचन कहेगा. इसका मतलब यह तो नहीं कि वह देशद्रोही हो गया. जब सरकारों के चरित्र से करुणा का भाव मिट जाता है, तब वे आलोचना और नागरिकों के सवालों को सहन नहीं कर पाती हैं और सरकार ही जनता के ही खिलाफ हो जाती हैं. बहुत छोटी सी बात है. कोई भी फल या वस्तु आकार या वज़न में कितनी ही भारी हो, उसका आवरण कितना ही कठोर हो, यदि वह भीतर से छूछा (खोखला) हो तो पानी भी उसे सतह पर ही रखता है, तल तक नहीं जाने देता है. गहराई तक जाना हो तो भीतर से ठोस यानी मानवीय मूल्यों से भरा होना जरूरी होता है. हमारी सरकारें बल और कठोरता से समाज पर शासन करना चाहती हैं, इसलिए उनकी पहुँच सतह तक ही रहती हैं, नागरिकों के ह्रदय में सरकारों के लिए सम्मान नहीं होता, भय होता. हमें नागरिक के रूप में अब अपनी चेतना को जागृत करना चाहिए ताकि अब हम अपनी सरकारों को करुणा और समानुभूति के साथ शासन करना सिखा सकें.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: May 13, 2021, 1:49 PM IST
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