कोरोना संक्रमणकाल और लैंगिक भेदभाव

क्या बिना समानुभूति और करुणा के हम किसी महामारी से निपट सकते हैं? निश्चित रूप से नहीं निपट सकते हैं,...

Source: News18Hindi Last updated on: April 30, 2020, 4:19 PM IST
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कोरोना संक्रमणकाल और लैंगिक भेदभाव
क्या बिना समानुभूति और करुणा के हम किसी महामारी से निपट सकते हैं? निश्चित रूप से नहीं निपट सकते हैं,...
क्या बिना समानुभूति और करुणा के हम किसी महामारी से निपट सकते हैं? निश्चित रूप से नहीं निपट सकते हैं, किन्तु हम ऐसे ही निपटने की कोशिश भी कर रहे हैं. कोरोना-कोविड19 के संक्रमण काल ने यह सिखाया है कि संक्रमण की पहचान और उपचार जरूरी है, किन्तु यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि यह काम लैंगिक संवेदनशीलता के साथ किया जा रहा है या नहीं? कोरोना-कोविड19 के संक्रमण काल ने लैंगिक भेदभाव को एक नया ही आयाम देना शुरू कर दिया है. सबसे ज्यादा असर आजीविका के छिनने के कारण पड़ेगा. एक तरफ तो लाखों मजदूर पलायन से वापस लौट रहे हैं. जिसके कारण ग्राम और छोटे नगरों की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा, तो वहीँ दूसरी और पलायन से लौट कर आने के बाद परिवार के भीतर के शक्ति संबंधों में गहरा बदलाव होना शुरू हो गया है. कोरोना-कोविड19 के प्रकोप से उत्पन्न हुए आघात से निपटने के लिए अभी हमारी कोई तैयारी नहीं दिखाई देती है. यदि बेरोज़गारी को नियंत्रित नहीं किया गया तो घरेलू हिंसा के मामले बहुत ज्यादा बढ़ सकते हैं.

एक शाम भारत के प्रधानमन्त्री घोषणा करते हैं कि कल से 21 दिन के लिए देश में तालाबंदी होगी. यह एक जरूरी कदम था. इसके बाद वित्तमंत्री घोषणा करती हैं कि हर जन-धन खाते में सरकार की तरफ से 500 रूपए की सहायता भेजी जा रही है और स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों के खाते में भी 500 रुपये डाले जायेंगे. फिर राशन से सम्बंधित घोषणाएं होती हैं. कुल मिलाकर भारत के सबसे वंचित तबकों के लोगों को प्रतिव्यक्ति 200 रूपए (यदि दो लोगों के खाते में 500-500 रुपये आये और परिवार में 5 सदस्य हुए) और 5 किलो राशन की सहायता प्राप्त हुई. लेकिन तालाबंदी ने कमाई के बाकी के सारे रास्ते बंद भी कर दिए. भारत के शहरों में लाखों महिलायें घरों में सफाई-भोजन-बच्चों की देखरेख का काम करती हैं, साथ ही फुटकर काम में भी उनकी बड़ी भूमिका है. उनके काम पर संकट खड़ा हो गया क्योंकि यह नहीं पता है कि कोरोना से उबरने के बाद भी वे कब काम पा सकेंगी? प्रधानमन्त्री ने आह्वान किया कि कम्पनियाँ या कोई भी नियोक्ता किसी भी कामगार को काम से न निकाले और तालाबंदी के दौरान वेतन भी दे, लेकिन आंकलन बनाते हैं कि असंगठित क्षेत्र के 75 प्रतिशत मामलों में ऐसा नहीं हुआ. भोपाल में बड़े-बड़े घर बनवाने वाले बिल्डरों ने मजदूरों को पहले दिन 200 रुपये की सहायता दी, और फिर अगले 20 दिन तक अदृश्य रहे. इस दौरान सब्जी बेंचने वाले, वाहन चलाने वाले, दुकानों-होटलों पर सहायक के रूप में काम करने वाले संकट में आ गए हैं. यह संकट बहुत गहरा है क्योंकि भविष्य अनिश्चित है.

महिला कामगारों को इसका गहरा आघात लगा है क्योंकि उनका केवल रोज़गार ही नहीं जाएगा, बल्कि खुद को आर्थिक रूप से सशक्त बना कर वे जिस आज़ादी को हासिल करने की कोशिश कर रही थीं, वह कोशिश उनकी अपनी कमाई न होने से कमज़ोर पड़ जायेगी. संक्रमण काल घोषित होते ही जब लाखों मजदूरों ने अपने घर वापस लौटना शुरू किया, तब उनमें महिलाओं की भी बड़ी संख्या थी, पर वे अपने पैरों में पड़े छालों का दर्द महसूस नहीं कर पा रहीं थीं, क्योंकि उन्हें आने वाले कल से ज्यादा डर लगा रहा था.

जो दबाव, अनिश्चितता और भय पैदा हुआ है, उसे लॉकडाउन के दौरान और उसके बाद कम करने के लिए बहुत सघन प्रयास किये जाने की जरूरत होगी. हमें सजगता से देखना होगा कि तालाबंदी का महिलाओं और किशोरियों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ेगा. कोरोना-कोविड19 पश्चात स्थितियों में भी लैंगिक संबंधों में असंतुलन बढ़ने की आशंकाएं हैं.
भारत के शहरीकरण ने भी लैंगिक संतुलन को प्रभावित किया है. बड़े महानगरों में महिलायें-पुरुष सीमित क्षेत्रफल वाले आवासों में जीवन जीते हैं. वहां चूंकि अलग-अलग समय में लोग काम/रोज़गार के लिए बाहर आते जाते रहे हैं, इसलिए समय के प्रबंधन से लैंगिक रिश्तों का प्रबंधन जुड़ जाता है. किन्तु वर्तमान स्थितियों में 10 परिजनों को 20 वर्गफुट के घर में हमेशा एक साथ रहना पड़ रहा है. चूंकि कारखाने, यातायात, व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद हैं, इसलिए जीवन चार-दीवारी के बीच में ही सीमित हो गया है.
अन्य शहरों की मलिन बस्तियों में भी लगभग ऐसे ही हालात हैं. भारत वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 6.5 करोड़ लोग मलिन बस्तियों में रह रहे थे और बढ़ते पलायन के कारण वर्ष 2017 में इनके 10.04 करोड़ होने का अनुमान लगाया गया था. स्थान की कमी के कारण लड़कों और पुरुषों के द्वारा लड़कियों और महिलाओं के स्थान का अतिक्रमण कर लिया जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पुरुष के द्वारा ही निर्णय लिए जाते हैं. जब स्थान का अतिक्रमण होता है तो महिलाओं और लड़कियों के शारीरिक और मासिक स्वस्थ्य पर बहुत गहरा असर पड़ता है. कोरोना ने महिलाओं-लड़कियों की निजता को छीन लिया है. माहवारी स्वच्छता और शौचालय तक पहुँच न होने के कारण कैंसर और स्थाई बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है. ऐसे में तालाबंदी ने इस समस्या को और गंभीर बनाया है.

शराब के लत वालो के लिए शराबबंदी का मतलब क्या है; वहीँ दूसरी ओर अब घर में पुरुषों की लगातार मौजूदगी है, छोटे से घर में बहुत सारे लोगों का मौजूद होना; वास्तव में घरों और छोटी बसाहटों में रहवासी व्यवस्था ही ऐसी है, जहाँ सामाजिक (कायदे में शारीरिक) फासला बनाए रखना लगभग नामुमकिन है. ऐसे में यह सोचा जाना जरूरी है कि हम खुले, हवादार और सुरक्षित आश्रय स्थल कैसे बना सकते हैं? क्या हमारी नीति में ये पहलू शामिल होंगे? जब गतिशीलता जीवन का महत्वपूर्ण सूत्र हो और यही गतिशीलता पुरुष से छीन ली जाए, तब वह अनियंत्रित तो हो ही जाता है. इससे स्त्रियों का तनाव बढ़ा भी है. यह भी संभव है कि कई परिवारों में स्त्री-पुरुषों को शायद संवाद का ज्यादा अवसर भी मिला हो.घरों के भीतर सामाजिक-लैंगिक समीकरण और व्यवस्थाओं में उथल-पुथल हो रही है, असंगठित क्षेत्र के कामगार, महिला किसान और छोटे-फुटकर व्यापारी आजीविका छिन जाने, बाज़ार में गिरावट के कारण खतरे में हैं. यदि व्यापार और रोज़गार नहीं होगा तो खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? ये सवाल अब निम्न माध्यम वर्ग और आर्थिक रूप से कमज़ोर तबकों के मन में अवसाद के रूप में स्थापित हो रहा है. आर्थिक संकट समाज को मानसिक अस्वस्थता की तरफ ले जा रहा है. कोरोना के स्वभाव और तालाबंदी की जरूरी नीति ने महिलाओं पर गहरा असर डाला है; यह असर हैं उनकी गतिशीलता, आवागमन की स्वतंत्रता को सीमित करना.

महिलाओं की स्वतंत्रता उतनी ही सीमित नहीं हुई है, जितनी पुरुषों की हुई है. आने वाले समय में यह आशंका है कि महिलाओं की समाज में तय भूमिका के कारण उन्हें लम्बे समय तक तालाबंदी का सामना करना पड़े. इससे घर के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भूमिका भी सीमित होगी. रोज़गार के अवसर कम होने से महिलाओं को पुरुषों की तुलना में ज्यादा अवसर खोने पड़ सकते हैं. और जब महिलाओं का आय में योगदान नहीं होगा, तो उनकी स्थिति कमज़ोर होगी ही. अतः आज कोरोना-कोविड से निपटने के लिए जो कदम उठाये जा रहे हैं, उनमें महिलाओं की आर्थिक भूमिका को केंद्र में रखा जाना जरूरी है. यदि आर्थिक स्थिति या मंदी को संभालने के लिए जेंडर संवेदनशील कदम नहीं उठाये जाए हैं तो ज्यादातर संभावना यही है कि इससे आर्थिक और लैंगिक असमानता बढ़ेगी.

कोरोना-कोविड19 से निपटने और संक्रमण को रोकने के लिए किये जा रहे प्रयासों में स्थानीय स्तर से लेकर, राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर सशक्त समूह, कार्यबल और समितियां बनायी गयी हैं. किन्तु व्यापक रूप से देखने पर यह पता चलता है कि महिलाओं को इस चुनौती से निपटने के लिए की जा रही कोशिशों में नेतृत्व के लगभग नगण्य अवसर प्रदान किये गए हैं. जब नीति और कार्यक्रम बनाने या महिलाओं और अन्य लैंगिक समूहों को शामिल नहीं किया जाता है तब केवल और केवल लैंगिक रूप से असंवेदनशील नीतियां ही बनती हैं.

तालाबंदी के उपायों के दौरान सबकी आवाजाही पर पूर्ण नियंत्रण हो गया है, लेकिन इस नियंत्रण का सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं पर पडा है. हमें यह समझना होगा कि तालाबंदी से घर से बाहर की गतिविधियों पर तो रोक लगी है, किन्तु घर के भीतर की गतिविधियाँ जारी हैं. इन कामों को करने की जिम्मेदारी महिलाओं के ही खाते में रही हैं. आप पायेंगे, कुछ लोग “बदलाव के लिए” बर्तन मांजते हुए फोटो खिंचवा रहे हैं. इससे क्या साबित होता है? इससे यही तो साबित होता है कि महिलाओं के काम भिन्न हैं और पुरुष उन कामों को “किन्हीं ख़ास परिस्थितियों” में या “मजबूरी” में करते हैं. इस पहलू पर (कि तालाबंदी का महिलाओं पर क्या असर पडा है?) जबकि आंकड़ों का अभाव हो, इस विषय पर निगरानी रखने के कोई व्यवस्थित तंत्र भी दिखाई नहीं दे रहे हैं. अगर आज अध्ययन नहीं किये जाते हैं, तो आने वाले दिनों में यह पता नहीं चल पायेगा कि तालाबंदी या कोविड19 के संक्रमण काल के दौरान हो रहे प्रबंधों का महिलाओं पर क्या असर पड़ रहा था?

यह एक बड़ी जरूरत है कि कोविड19 के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का परिवार के भीतर की स्थितियों, पलायन से वापस आने वाले और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, आश्रय विहीन, संगठित क्षेत्र के कामगारों, स्वास्थ्य-पोषण की सेवाएँ प्रदान करने वाले कर्मचारियों (जिनमें अधिसंख्य महिलायें हैं) से और उनके बारे में लैंगिक वर्गीकरण पर आधारित आंकड़े जुटाने की जरूरत है. ताकि इसके आधार पर जरूरी विश्लेषण करके सही और लैंगिक रूप से संवेदनशील कार्यक्रम बनाए जा सकें. नीति बनाने वाले समूह, स्थानीय निकाय, महिला अधिकार संगठन, शोधकर्ता और युवा राजनीतिक-सामाजिक नेतृत्व इन अध्ययनों का उपयोग कर पायें.

इस संक्रमण काल में इंटरनेट का उपयोग बहुत ज्यादा बढ़ गया है. दैनिक जरूरतों से लेकर छोटे बच्चों की शिक्षा तक तकनीक को तवज्जो दी जा रही है. बहुत संभव है कि कोरोना-कोविड19 के बाद इंटरनेट के सामान्य उपयोग में भी वृद्धि हो. ऐसी स्थिति में यह देखना जरूरी होगा कि डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल में अब तक व्याप्त रही असमानता कैसे कम की जायेगी? इसके साथ ही महिलाओं के साथ इंटरनेट की सामग्री के माध्यम से भेदभाव, दुर्व्यवहार या यौन शोषण में वृद्धि न हो; यह कैसे सुनिश्चित किया जाएगा?
बीमार परिजनों या स्वास्थ्य केन्द्रों में दाखिल मरीजों की देखरेख की मुख्य जिम्मेदारी भी महिलाओं की ही होती है. ऐसे में बीमार व्यक्तियों की देखरेख करते समय महिलाओं को कोरोना वायरस से संक्रमित होने की ज्यादा आशंका होती है. 6 अप्रैल 2020 को स्वास्थ्य मंत्रालय के द्वारा बताया गया था कि भारत में कोरोना से संक्रमित पाए गए व्यक्तियों में 76 प्रतिशत पुरुष हैं. इसी तरह पाकिस्तान में 72 प्रतिशत पुरुष हैं. लेकिन ग्रीस में कुल संक्रमित लोगों में 45 प्रतिशत महिलायें, दक्षिण कोरिया में 60 प्रतिशत महिलायें और जर्मनी में 50 प्रतिशत महिलायें हैं. इसका कारण यह माना जा रह है कि चूंकि भारत और पाकिस्तान में परीक्षण ही कम हो रहे हैं, इसलिए महिलाओं के संक्रमित होने के कम प्रकरण सामने आये हैं. यदि जांचें आगे बढेंगी, तब वास्तविक स्थिति का पता चलेगा.

भारत में 28 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, सहायिकाओं और लगभग 10.50 लाख आशा कार्यकर्ताओं की ताकत है, जो समुदाय के सबसे करीब रहती हैं और कोरोना संक्रमण काल में सबसे अहम् भूमिका निभा रही हैं. आपातकालीन स्थिति से उबर आने के बाद उनकी भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी रहेगी. यह देखना होगा कि इन 40 लाख स्वास्थ्य-पोषण सेवा प्रदाताओं की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाए. कोरोना-कोविड के वर्तमान अनुभव बता रहे हैं कि भारत डाक्टरों और स्वास्थ्यकर्मिंयों की ही सुरक्षा करने में नाकाम हो रहा है. यह बहुत जोखिम भरी स्थिति भी है. इन सेवा प्रदाताओं को सुरक्षित आवास, स्वास्थ्य बीमा, इनकी नियमित जांच, निजी सुरक्षा उपकरण और विशेष भत्ता प्रदान किये जाने की व्यवस्था की जाए.

यही वह वक्त है, जब हमें आंगनवाड़ी केन्द्रों, स्कूलों और उप स्वास्थ्य-प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की अधोसंरचना के ढाँचे पर भी नए सिरे से विचार करना होगा. एक तरफ तो सभी बच्चों को आंगनवाड़ी और स्कूल में लाने का लक्ष्य होगा, तो वहीँ दूसरी और यह भी देखना होगा कि वहां स्वच्छता, शारीरिक फासला, हवा और उजाला रहे. अगर ऐसा नहीं होगा, तो संक्रमण का ख़तरा बढ़ता जाएगा. स्कूलों और आंगनवाडी केन्द्रों में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों, अलमारियों, खिलौनों, शिक्षण सामग्री आदि की स्वच्छता के व्यवस्था के बारे में भी नीतिगत पहल करना होगी. अगर सुनियोजित पहल नहीं की गयी तो महिला सेवा-प्रदाताओं और बच्चों पर सबसे पहला संकट आएगा.

भारत में हर साल लगभग 2.50 करोड़ प्रसव होते हैं. यानी हर रोज़ लगभग 68 हज़ार प्रसव होते हैं, बच्चे जन्म लेते हैं. कोरोना संक्रमण के कारण भारत के पूरे स्वास्थ्य तंत्र, स्वास्थ्य संस्थाओं, मीडिया, यानी सबका ध्यान केवल कोरोना-कोविड पर केन्द्रित हो गया है. एक मायने में गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व जांच, उनकी देखरेख, संवाद लगभग बंद ही हो गया है. इसी तरह नवजात शिशुओं को भी बेहतर देखरेख नहीं मिल पा रही है. अभी इन पर ध्यान नहीं है, इसलिए आशंका है कि इनकी स्वास्थ्य की स्थिति कमज़ोर हो रही है और नवजात शिशु मृत्यु की दर बढ रही है. वास्तव में पूरा स्वास्थ्य तंत्र इस वक्त कोरोना से जूझने में जुट गया है, ऐसे में सुरक्षित प्रसव और नवजात शिशु की देखभाल की स्थिति चिंताजनक मानी जा सकती है.

इस परिस्थिति ने हमें यह जता दिया है कि हमारी लोक-स्वास्थ्य व्यवस्था बहुत कमज़ोर है. हमारे स्वास्थ्यकर्मी बिना सुरक्षा उपकरणों के काम करते हैं. अस्पतालों और स्वास्थ्य केन्द्रों में स्वच्छता और इन्हें विषाणुमुक्त किये जाने की व्यवस्थाएं नहीं हैं, लैंगिक समानता और संवेदना पर सरकार और समाज का कोई प्रशिक्षण नहीं है. इसके कारण महामारी के काल में माहवारी स्वास्थ्य या प्रसव या नवजात शिशु स्वस्थ्य से जुड़े पहलुओं को पीछे धकेल दिया गया. यह भी बहुत साफ़ दिखाई देता है कि इस तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी चुनौती से निपटने के लिए पुलिस प्रशासन को सामने लाया जाता है, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और समुदाय के बीच हिंसक टकराव होते हैं क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था और पुलिस, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा के तंत्र में न तो आपसी विश्वास है, न ही कौशल. यही कारण है महामारी होने के बावजूद आम लोग बीमारी के लक्षणों को छिपा रहे हैं.

भारत के ज्यादातर राज्यों में (तमिलनाडु, केरल, उत्तर-पूर्वी राज्यों को छोड़ कर) स्थानीय निकायों की भी कोई तैयारी नहीं रही. एक तरफ तो भारत सरकार और नीति आयोग राज्य सरकारों को पत्र लिख कर ताकीद कर रहे थे, कि सामाजिक संस्थाओं को इस सघर्ष के काम में जोड़ें, किन्तु राज्य सरकारें और जिला प्रशासन ने सामंजस्य बिठाने की लगभग कोई मंशा जाहिर नहीं की. यूँ तो लाखों महिला स्वयं सहायता समूह हैं, उन्हें भी माकूल भूमिका (सिवाये कहीं-कहीं मास्क या सेनिटाईजर बनाने के) नहीं दी गयी. कोरोना से निपटने की प्रक्रिया में व्यवस्था का मर्दपना बहुत साफ़ तरीके से दिखाई, जहाँ बड़े नेता अकेले कोरोना का सामना करने का प्रदर्शन कर रहे थे या फिर अपने प्रियजन के अन्तिम संस्कार में न जाकर प्रतिबद्धता जाहिर कर रहे थे. सीख यह है कि हमारे स्वास्थ्य-गैर सरकारी या अन्य समूह महामारी प्रबंधन में अकुशल साबित हुए. अब हमें अपने आप को कौशल सम्पन्न करने की दिशा में आगे बढ़ना चहिये. हमें यह बात मुख्य रूप से ध्यान रखना होगी कि महामारी से जूझने की आपातकालीन रणनीति को हम लैगिक रूप से कैसे संवेदनशील बनाते हैं?
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: April 30, 2020, 4:19 PM IST
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