कोविड19: स्वास्थ्य के मामले में चूक कहां हुई?

Coronavirus Crisis: जिस समय कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर आई है, वही वायरल बुखार का भी वक्त है. जिसमें लोगों को सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत पड़ती है. हम देख रहे हैं कि हमारा समाज स्वास्थ्य व्यवस्था में अपना विश्वास इस हद तक खो चुका है, कि वह किसी अस्पताल तक जाना ही नहीं चाहता है. उसे यह विश्वास हो गया है कि उसके साथ वहां दुर्व्यवहार होगा. वहां न तो जांच होगी, न उसके उचित सलाह ही मिल पाएगी!

Source: News18Hindi Last updated on: May 4, 2021, 3:33 PM IST
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कोविड19: स्वास्थ्य के मामले में चूक कहां हुई?
सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के स्तर पर 20732 विशेषज्ञों (बच्चों, स्त्रियों के स्वास्थ्य के विशेषज्ञ और निश्चेतना विशेषज्ञ) के पद स्वीकृत थे, जिनमें से केवल 4957 पद ही भरे हुए थे और 15775 पद खाली थे. (File pic)
कोविड 19 महामारी के काल ने यह साबित कर दिया है कि भारत ने लोक स्वास्थ्य को जन कल्याणकारी अधिकार के बजाये बाज़ार केन्द्रित सेवा के रूप में महत्व प्रदान किया, जिससे हम भारतीय समाज को उनके स्थान पर ही जीवनदायी सेवाएँ प्रदान करने में असफल साबित हुए हैं. भारतीय राजनीति ने सबसे बड़ा अपराध यह किया है कि उसने समाज के लिए सबसे जरूरी मुद्दों को राजनैतिक प्रक्रियाओं से बेदखल कर दिया और हिंसा, साम्प्रदायिकता, वैमनस्यता, जातिवादी बहस को राजनीति के केंद्र में ला दिया. आज जब सचमुच मानव पर अस्तित्व का संकट आ खडा हुआ है, तब 70 सालों की साम्प्रदायिकता, भेदभाव, पूंजीवाद और हिंसा की राजनीति संकट से बचा पाने में कोई भूमिका नहीं निभा पा रही है. सबसे दुखद तो यह है कि भारत की सरकारें खुद ही यह एहसास कराती रही हैं कि वे भारतीय लोक स्वास्थ्य मानकों (इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टेंडर्ड) का पालन नहीं करेंगी. इसके बजाये केंद्रीयकृत और निजी स्वास्थ्य व्यवस्था को प्राथमिकता दी गयी. भारतीय अदालतें भी स्वास्थ्य को मूलभूत अधिकार की तुलना में एक नीतिगत विषय ही मानती हैं और सरकार की बाजारीकरण की नीति को फैलने देती हैं.

यह एक विडंबना ही है कि भारत जैसे जनकल्याणकारी देश ने लोक स्वास्थ्य को एक गैर-जरूरी नीति माना. ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी (मार्च 2020) के मुताबिक़ भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के स्तर पर 35890 चिकित्सकों के पद स्वीकृत थे, किन्तु इनमें से 28516 पद ही भरे हुए थे और 8638 पद खाली थे. सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के स्तर पर 20732 विशेषज्ञों (बच्चों, स्त्रियों के स्वास्थ्य के विशेषज्ञ और निश्चेतना विशेषज्ञ) के पद स्वीकृत थे, जिनमें से केवल 4957 पद ही भरे हुए थे और 15775 पद खाली थे.

प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के स्तर पर नर्सिंग मानव संसाधन के 81684 पद स्वीकृत थे, जिनमें से 71847 पद ही भरे हुए थे और लगभग 10 हज़ार पद खाली थे. भारत सरकार द्वारा तय मानकों के मुताबिक़ सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में 4 विशेषज्ञ डाक्टर पदस्थ होना चाहिए, किन्तु वास्तविकता यह है कि 31 मार्च 2020 की स्थिति में 5183 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में से केवल 304 में ही 4 विशेषज्ञ पदस्थ थे.

भारतीय लोक स्वास्थ्य मानकों (आईपीएचएस) का भारत में भयानक उल्लंघन होता है. भारत में हर 1.20 लाख की जनसंख्या पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित है. वर्ष 2011 की जनगणना के मान से 5183 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित हो रहे हैं, जिनमें से केवल 439 में ही आईपीएचएस मानको का पालन हुआ है. इनमें से केवल 2679 में ही एक्स-रे किये जाने की व्यवस्था है. और जो व्यवस्था है, उसमें से कितनी मशीनें बेकार पड़ी हैं, यह कोई भी अखबार उठाकर देख लीजिये.
देश में 155404 उप-स्वास्थ्य केंद्र स्थापित हैं, जिनमें से केवल 5363 में ही भारतीय लोक स्वास्थ्य मानकों का पालन हो पाया है यानी मानकों के मुताबिक शौचालय, आवास, दवाएं, जांचों, मानव संसाधन, पेय जल आदि की व्यवस्था बनी है. जब हम लोक स्वास्थ्य केन्द्रों की बात करते हैं, तब यही दुखद स्थिति फिर दिखाई देती है.
देश में 24918 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में से केवल 3278 केंद्र ही मानकों के मुताबिक़ स्थापित हैं. और केवल 8514 केंद्र (34.2 प्रतिशत) की 24 घंटे संचालित होते हैं.
भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में लोक स्वास्थ्य की स्थिति बेहतर होने के बजाये खराब होती जा रही है. 31 मार्च 2019 की स्थिति में भारत में 234220 एएनएम कार्यरत थीं. एक साल बाद 31 मार्च 2020 को यह संख्या कम होकर 212593 रह गयी, लगभग सवा लाख एएनएम कम हो गयीं.

इसी तरह लोक स्वास्थ्य व्यवस्था में एक साल में डाक्टर्स की संख्या 29799 से घट कर 28516 रह गयी. इतना ही नहीं नर्सिंग स्टाफ भी 80976 से कम होकर 71847 रह गया. वर्ष 2020 की जनसँख्या के आधार पर मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में 14106 उप-स्वास्थ्य केंद्र होने चाहिए थे, किन्तु सरकार ने केवल 10226 ही स्थापित किये हैं, यानी 28 प्रतिशत की कमी है. 2260 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित होने चहिये थे, किन्तु केवल 1199 ही स्थापित किये गए. इस तरह से मध्यप्रदेश में 47 प्रतिशत पीएचसी कम हैं. वर्तमान स्थिति में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की बहुत बड़ी सहयोगी भूमिका हो सकती थी. राज्य को 565 ऐसे केन्द्र स्थापित करने चाहिए थे, लेकिन 309 ही किये गए यानी 45 प्रतिशत की कमी है. आदिवासी क्षेत्रों में हालात इससे भी ज्यादा खराब हैं.भारत के स्तर पर वर्तमान जनसँख्या के मान से 46140 उपस्वास्थ्य केन्द्रों, 9231 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और 3002 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की कमी है. भारत में चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था के क्षेत्र में निजी महाविद्यालयों को खुलकर शोषण करने का अधिकार दिया हया है. उनका लगभग कोई नियमन नहीं है. यही कारण है कि निजी अस्पताल में चिकित्सा शिक्षा पूरी करने के लिए 50 लाख रुपये से 1 करोड़ रुपये तक छात्रों को व्यय करना पड़ते हैं. स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए तो 2 करोड़ रुपये तक व्यय करना पड़ रहे हैं. चिकित्सा व्यवस्था के इस रूप का मतलब समझते हैं आप? नहीं समझ पायेंगे. एक ताज़ा उदाहरण उल्लेखनीय है. मध्यप्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री गोपाल भार्गव ने जब देखा कि स्वास्थ्य व्यवस्था अब कोविड काल का सामना नहीं कर पा रही है, तो उन्होंने अपने विधान सभा क्षेत्र में कोविड केयर सेंटर/अस्पताल के लिए स्वयं एक विज्ञापन जारी किया – एमडी डाक्टर की नियुक्ति के लिए. जिसे वे दो लाख रुपये प्रतिमाह का वेतन और अन्य सभी सुविधाएं देने वाले थे. यह वेतन भारत के एक व्यक्ति की औसत मासिक आय से 20 गुना की राशि का है. इसके बावजूद उन्हें स्नातकोत्तर चिकित्सक ढूँढने के लिए खासी मशक्कत करना पड़ रही है.

आज जबकि भारत में कोविड19 के कारण हाहाकार मचा हुआ है, तब हम देख रहे हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का तंत्र पूरी तरह से ढहा हुआ नज़र आता है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आर्थिक महाशक्ति बनते भारत ने समाज के स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण सूचक नहीं माना. इसके बजाये स्वास्थ्य को मुनाफाखोरी के लिए खुले बाज़ार के हाथ में देने की प्रक्रिया को आगे बढाया. आज यदि भारत में उप-स्वास्थ्य केंद्र अपनी पूरी क्षमता से संचालित हो रहे होते, तो संभवतः गांवों के ही स्तर पर कोरोना संक्रमण के प्राथमिक संकेतों की पहचान की जा सकती थी और गांवों में वैसा भयभीत कर देने वाला वातावरण नहीं बनता, जैसा की आज बन गया है. हमारे मुख्यमंत्रीगण गांवों के ऐसे चित्र अपने ट्विटर से गर्व के साथ जारी कर रहे हैं, जिनमें यह दिखाया गया है कि गाँव के लोगों ने ही अपने गांव को बंद कर दिया है, लेकिन क्या मुख्यमंत्री अपने राज्य उप-स्वास्थ्य केन्द्रों पर हो रहे उपचार के चित्र जारी करने की स्थिति में हैं?

जिस समय कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर आई है, वही वायरल बुखार का भी वक्त है. जिसमें लोगों को सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत पड़ती है. हम देख रहे हैं कि हमारा समाज स्वास्थ्य व्यवस्था में अपना विश्वास इस हद तक खो चुका है, कि वह किसी अस्पताल तक जाना ही नहीं चाहता है.
उसे यह विश्वास हो गया है कि उसके साथ वहां दुर्व्यवहार होगा. वहां न तो जांच होगी, न उसके उचित सलाह ही मिल पाएगी! ऐसा इसलिए होगा क्योंकि वर्तमान में एक-एक डाक्टर पर 5-5 डाक्टर और एक-एक स्वास्थ्य कर्मी पर 5-5 स्वास्थ्य कर्मी का बोझ है. जो उन्हें एक स्तर के बाद झुंझलाने या क्रोध करने के लिए मजबूर कर देता है.

स्वास्थ्य को एक मूल्यवान सेवा माना गया है. ठीक वैसे ही जैसे सोने-चांदी को मूल्यवान धातु माना जाता है. लेकिन सोने-चांदी का उपभोग न करने का विकल्प व्यक्ति के पास होता है और इसके बिना जीवन चल सकता है, किन्तु स्वास्थ्य सेवाओं के बिना न तो जीवन चल सकता है, न ही व्यक्ति के पास उसे त्याग देने का विकल्प होता है. मध्यप्रदेश में सरकार के स्वास्थ्य संसाधन सीमित हैं और इसीलिए निजी क्षेत्र के अस्पतालों को उपचार के लिए अनुमति दी गयी है. औपचारिकता के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने निजी अस्पतालों से उपचार शुल्क की सूची जमा कराई है. ऐसा नहीं लगता है कि मध्यप्रदेश सरकार के एक भी मंत्री या अधिकारी ने इन सूचियों को देखा-पढ़ा भी है. राज्य में निजी अस्पतालों ने सरकार को बाकयदा सूचित किया है कि वे कोरोना संक्रमण के उपचार के लिए लोगों से 20 से 40 हज़ार रुपये प्रतिदिन लेंगे. इन सूचियों में भी 3 से 4 ऐसे मद हैं, जिनका शुल्क ही दर्ज नहीं है. आखिर में यह उपचार 70 हज़ार रुपये प्रतिदिन तक पहुँच रहा है. आखिर में यह देखा जा रहा है कि यदि 7 दिन अस्पताल में आक्सीजन या गहन चिकित्सा इकाई में उपचार करवाना पड़ गया तो इसके लिए 2 लाख से 9 लाख रुपये तक का भुगतान करना पड़ रहा है.

हम ऐसी स्थिति में आ कर खड़े हो गए हैं, जहां आक्सीजन का अकाल का सामना करना पड़ रहा है. अस्पताल में चिकित्सक नहीं हैं, कोविड की कोई दवा नहीं है, अस्पताल में आक्सीजन की कमी है, इसके बावजूद निर्ममता के साथ आर्थिक लाभ कमाया जा रहा है.
15 सालों से भारत की स्वास्थ्य नीति में ग्राम स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता समिति (वीएचएनएससी) का वजूद है. इस समिति के गठन के पीछे की अवधारणा यह थी कि गाँव के स्तर पर समुदाय के कुछ सदस्यों को लोक स्वास्थ्य के मूलभूत पहलुओं पर प्रशिक्षित किया जा सकेगा, उनके कौशल को विकसित किया जा सकेगा. किन्तु भारत ने इस समिति के गठन की केवल औपचारिकता की पूरी की, वास्तव में इस समिति को सशक्त बनाने में उसने भरपूर बेईमानी की गयी. आज भी इस समिति का वजूद है, किन्तु सरकारें वीएचएनएससी को स्वास्थ्य व्यवस्था की एक प्रभावी और कुशल सामुदायिक इकाई बनाने में असफल रहीं. इसका मूल कारण यह है कि यदि वीएचएनएससी वास्तव में सशक्त होती, तो वह सरकार से स्वास्थ्य के अधिकार पर सवाल-जवाब करती, सेवाओं की मांग करती, जो सरकार पूरी नहीं करना चाहती थी. आज वास्तव में अगर वीएचएनएससी प्रशिक्षित और कौशल संपन्न होती, तो गांवों के स्तर पर कोविड19 के प्रबंधन के काम में बहुत प्रभावी भूमिका निभा सकती थी.

ज़रा विचार कीजिये कि कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर जिस तरह से बढ़ रही है, क्या केवल महानगरीय बड़े अस्पताल नागरिकों के उपचार की भूमिका निभा पायेंगे? यह संभव नहीं है. अब भी सरकारें प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को मज़बूत बनाने में कोई रूचि नहीं दिखा रही है. सच तो यह है कि जो आंकड़े शहरों से आ रहे हैं, गांवों में स्थिति ज्यादा गंभीर और विध्वंसकारी है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: May 4, 2021, 3:33 PM IST
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