राजनीति के हवन में हिन्दू-मुसलमान और गांधी

महात्मा गांधी कहते हैं कि “धमकियों अथवा वास्तविक हिंसा के आगे झुक जाना अपने आत्म सम्मान और धार्मिक विश्वासों का हनन है. धर्म तो इस बात में है कि आसपास चाहे जितना ही शोरगुल होता रहे, फिर भी हम अपनी प्रार्थना में तल्लीन रहें. यदि हम एक दूसरे को अपनी धार्मिक इच्छाओं का सम्मान करने के लिए बाध्य करने की बेकार कोशिश करते रहे.

Source: News18Hindi Last updated on: April 11, 2021, 8:57 PM IST
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राजनीति के हवन में हिन्दू-मुसलमान और गांधी
गांधी व्यवहार के मूल में है कि अगर आप खुद को बदलेंगे तो आप अपनी दुनिया में बदलाव की शुरुआत कर लेते हैं.
उपनिवेशवाद ने भारत को आर्थिक विपन्नता और साम्प्रदायिक वैमनस्यता में धकेल दिया था. वास्तव में भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के भीतर एक और आन्दोलन चल रहा था, वह आन्दोलन था भारत को एक व्यापक राष्ट्र बनाए रखने का. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय उपमहाद्वीप कई भू-राज्य सीमाओं में बंटा हुआ क्षेत्र रहा है. कभी किसी राज्य व्यवस्था (मौर्य काल, मुग़ल काल, गोंडवाना आदि) का फैलाव विस्तृत क्षेत्र में रहा, यह एक तथ्य है, किन्तु इस उपमहाद्वीप में भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक, भौगोलिक विविधता की मौजूदगी रही है, यह तथ्य भी हमें स्वीकार करना होगा.

जब-जब इस विविधता को नकार कर एकाधिकारवादी सत्ता स्थापित करने की कोशिश हुई है, उसके दूरगामी परिणाम नकारात्मक ही रहे हैं. साम्प्रदायिक विद्वेष का स्तर जितना बढ़ता है, समाज में करुणा, समानुभूति और प्रेम का स्तर उतना ही घटता है. गांधी कभी भी सत्ता की राजनीति को सुहाएंगे नहीं, क्योंकि गांधी हिंसा और विद्वेष की राजनीति को उजागर करके समाज को यह बताते रहते हैं कि हिंसा तुममें नहीं है, राजनीति तुम्हें हिंसा सिखाती है, इससे बच कर रहना.

ब्रिटिश उपनिवेश के रूप में भारत में साम्प्रदायिक द्वेष को नया मुकाम मिला. यही कारण है कि जब आज़ादी के लिए लड़ाई हुई तब संघर्ष करने वालों को यह अहसास था कि यदि वास्तव में अंग्रेजों से आज़ाद होना है तो जरूरी है कि साम्प्रदायिकता से भी समानांतर रूप से मुकाबला किया जाना होगा. गौर से देखेंगे तो आप पायेंगे कि बीसवीं सदी की शुरुआत में बंगाल विभाजन का उद्देश्य ही भारतीय समाज का बंटवारा था. इसके बाद धर्म के आधार पर संगठनों का निर्माण होने लगा. बात यहीं तक सीमित नहीं रही. ब्रिटिश शासन व्यवस्था ने कोशिश शुरू की कि भारतीय समाज में मौजूद जाति व्यवस्था का उपयोग करके स्वतंत्रता आन्दोलन की व्यापकता को सीमित किया जाए. हम जानते हैं कि इसी विषय पर डा. बी. आर. आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच टकराव भी हुआ था. संकुचित राष्ट्रवाद की अवधारणा के तहत एक षड्यंत्र का शिकार भारत हुआ है और वह षड्यंत्र रहा है, विविधता की ताकत को कमज़ोर करने का; विविधता को समाप्त करके एक सम्प्रदाय, एक जाति, एक संस्कृति, एक भाषा को सत्तासीन करने का. जब जब यह विचार प्रभावी हुआ है, भारत भीतर से कमज़ोर हुआ है.

समस्या यह है कि हमारी साम्प्रदायिकता बर्बरता के स्तर तक पहुंच रही है, हमारे प्रगतिशील राजनीतिज्ञ और समाजकर्मी यह बूझ पाने में नाकाम रहे हैं. भारत में साम्प्रदायिकता एक एक ज्वालामुखी के रूप में विद्दमान है और इसके चरित्र को समझने-समझाने का काम आज़ादी के साथ ही सबसे पहले कदम के रूप में शुरू होना चाहिए था, वह काम हुआ ही नहीं.
हमने आर्थिक मानकों को पहली प्राथमिकता दी और सामाजिक-मज़हबी सह-अस्तित्व को प्राथमिकता की सूची में रखा ही नहीं. परिणाम यह हुआ कि हमारी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था आर्थिक पूंजी पर एकाधिकार बढाने वाली नीति बनाती रही, इसके साथ ही इस करुणा, बंधुता और समानता को तहस-नहस करने वाली साम्प्रदायिकता के ज्वालामुखी को भी पालती-पोसती रही.

आज जब भी साम्प्रदायिकता की बहस होती है, तब यह प्रचारित होता है कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में धर्म निरपेक्षता का मतलब होता है मुस्लिम समाज का पक्ष लेना और हिन्दू समाज की विरोध करना; हम यह समझने को तैयार नहीं हैं कि यह धारणा बनी कैसे? इस बात को महात्मा गांधी अच्छे से समझते रहे और उन्होंने कहा भी है कि हिन्दू और मुसलमान मुंह से तो कहते हैं कि धर्म में जबरदस्ती का कोई स्थान नहीं है, लेकिन यदि हिन्दू गाय को बचाने के लिए मुसलमान की ह्त्या करें, तो यह जबरदस्ती के सिवा और क्या है? यह तो मुसलमान को बलात हिन्दू बनाने जैसी ही बात है. जब अंग्रेजों के लिए गायें कटती हैं, तब हम कुछ नहीं बोलते और चुप रहते हैं, किन्तु जब कोई मुसलमान गाय की हत्या करता है, तभी हम क्रोध के मारे लाल-पीले हो जाते हैं. गाय के नाम से जितने झगड़े हुए, उनमें से प्रत्येक में निरा पागलपन भरा शक्ति क्षय हुआ है. इससे एक भी गाय नहीं बची. उलटे मुसलमान ज्यादा जिद्दी बने और इस कारण ज्यादा गायें कटने लगीं.  और इसी तरह यदि मुसलमान जोर जबरदस्ती से हिन्दुओं को मस्जिदों के सामने बाजा बजाने से रोकने की कोशिश करते हैं, तो यह भी जबरदस्ती के सिवा और क्या है? मुसलमानों को हिन्दुओं से डरा धमकाकर बाजा बंद करवाने की आशा नहीं रखना चाहिए.

 यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि हम अपने धर्म को कितना ही बड़ा और महान मानते हों, इसके लिए हमें दंगे करने की इच्छा नहीं होती है, क्योंकि कम से कम धर्म दंगों का कौशल नहीं सिखाता. दंगों का कौशल तो धर्म के डकैत सिखाते हैं. साम्प्रदायिक दंगे तभी होते हैं, जब दंगे करवाए जाते हैं. दंगे तभी होते हैं, जब राजनीतिक को किसी लाभ की अपेक्षा होती है. राजनीति का लाभ इसी में होता है कि लोगों में (हिन्दू और मुसलमान या अन्य) डर बना रहे. जब यह डर बना रहता है, तब सत्ता को कहीं भी हिंसा करने, कत्लेआम करने, पूंजी को अपने नियंत्रण में लेकर उसका सौदा करने का असीमित अधिकार मिल जाता है. उसे यह अधिकार तभी मिलता है, जब नागरिक डरे हुए होते हैं.महात्मा गांधी कहते हैं कि धमकियों अथवा वास्तविक हिंसा के आगे झुक जाना अपने आत्म सम्मान और धार्मिक विश्वासों का हनन है. धर्म तो इस बात में है कि आसपास चाहे जितना ही शोरगुल होता रहे, फिर भी हम अपनी प्रार्थना में तल्लीन रहें. यदि हम एक दूसरे को अपनी धार्मिक इच्छाओं का सम्मान करने के लिए बाध्य करने की बेकार कोशिश करते रहे, तो भावी पीढियां हमें धर्म तत्व से बेखबर जंगली ही समझेंगी......मैंने गंभीरता से सोचा, जिस तरह हिन्दू गोवध से दुखी होते हैं, उसी तरह मुसलामानों को मस्जिदों के सामने बाजा बजने पर बुरा लगता है, लेकिन जिस तरह हिन्दू मुसलमानों को गोवध न करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते, उसी तरह मुसलमान भी हिन्दुओं को डरा धमका कर बाजा या आरती बंद करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते. उन्हें हिन्दुओं की सदइच्छा में विश्वास करना चहिये. हिन्दू के नाते मैं हिन्दुओं को सलाह जरूर दूंगा कि वे सौदेबाजी की भावना पाले बिना मुसलमान पड़ोसियों के भावों को समझें और उनका ख्याल रखे. मैंने सुना है कि कई जगह हिन्दू लोग जानबूझ कर और मुसलमानों का जी दुखाने के इरादे से ही आरती ठीक उसी समय करते हैं जबकि मुसलमानों की नमाज़ शुरू होती है. यह एक हृदयहीन और शत्रुतापूर्ण कार्य है. मित्रता में मित्र के भावों का पूरा-पूरा ख्याल रखा जाना चाहिए. इसमें तो कुछ सोच विचार की भी बात नहीं है. मुझे इस बात का पूरा निश्चय है कि यदि नेता न लड़ाना चाहें, तो आम जनता को लड़ना पसंद नहीं है. इसलिए यदि नेता लोग इस बात पर राज़ी हो जाएँ कि दूसरे सभ्य देशों की तरह हमारे देश में भी आपसी लड़ाई झगड़ों का सार्वजनिक जीवन से पूरा उच्छेद कर दिया जाना चाहिए और वे जंगलीपन और अधार्मिकता के चिन्ह माने जाने चाहिए, तो मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आम जनता शीघ्र ही उनका अनुसरण करेगी”.

महात्मा गांधी विभिन्न विषयों पर जो पक्ष रखते हैं, उनमें केंद्र में होता है “स्व” और “भाव”; उनकी साफ़ मान्यता है कि कुछ भी करने के पीछे हमारी मंशा और मान्यता क्या है; यह सबसे अहम् और निर्णायक तत्व हैं.


गांधी व्यवहार के मूल में है कि अगर आप खुद को बदलेंगे तो आप अपनी दुनिया में बदलाव की शुरुआत कर लेते हैं. यदि हम अपने विचार का तरीका बदलते हैं और उसे लागू करने का निश्चय करते हैं, तो हमारे काम करने के तरीके में भी बदलाव आता है. इस बदलाव को बाहरी दुनिया नज़र-अंदाज़ नहीं कर पाती है और हमारे भीतरी बदलाव का असर बाहरी दुनिया पर भी पड़ता है. यदि हम खुद में बदलाव लाये बिना, परिवार, समुदाय या दुनिया में बदलाव की अपेक्षा कर रहे हैं, तो सबसे पहले तो ऐसा बदलाव होगा नहीं; और अगर हुआ भी तो आप पाएंगे कि आपकी अपनी खामियां, क्रोध, भीतरी हिंसा और नकारात्मकता ज्यों की त्यों बनी हुई हैं.

हमारा अहंकार हमें वैश्विक हित से जुड़ने नहीं देता है. और यदि आप अपने अहंकार को मिटाए बिना यदि कोई सफलता हासिल हो भी जाती है तो इससे हमारा अहंकार और मज़बूत और अधिक शक्तिशाली हो जाता है. चूंकि हमारा अहंकार चीजों को विभाजित करना, दुश्मनों को ढूंढना और अलगाव पैदा करना पसंद करता है, इसलिए यह हमारे जीवन और दुनिया में और भी अधिक समस्याएं और संघर्ष पैदा करने की कोशिश करना शुरू कर सकता है. इन सन्दर्भों में समानुभूति का स्थाई चरित्र, एक बेहतर समाज के निर्माण की स्थापना की संभावना को स्थापित करता है.

आखिर समानुभूति है क्या?
गांधी जी कहते हैं कि “मैं तुम्‍हें एक ताबीज देता हूं. जब भी दुविधा में हो या जब अपना स्‍वार्थ तुम पर हावी हो जाए, तो इसका प्रयोग करो. उस सबसे गरीब और दुर्बल व्‍यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो, और अपने आप से पूछो- जो कदम मैं उठाने जा रहा हूं, वह क्‍या उस गरीब के कोई काम आएगा? क्‍या उसे इस कदम से कोई लाभ होगा? क्‍या इससे उसे अपने जीवन और अपनी नियति पर कोई काबू फिर मिलेगा? दूसरे शब्‍दों में, क्‍या यह कदम लाखों भूखों और आध्‍यात्मिक दरिद्रों को स्‍वराज देगा?  तब तुम पाओगे कि तुम्हारी सारी शंकाएं और स्वार्थ पिघल कर खत्म हो गए हैं.“

गांधी समानुभूति का व्यवहार करते हुए यह सत्य स्थापित भी करते हैं कि किसी एक व्यक्ति का जीवन, अकेले उसका जीवन नहीं होता है. वस्तुतः समानुभूति के दायरे का विस्तार मानव जीवन और समाज के उन सभी पहलुओं तक है, जिनसे यह समाज बनाता है. मसलन – सामाजिक सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार करना और उसके साथ सह-अस्तित्व की अवधारणा को अपनाना, ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना की पहल करना जो सहिष्णु हो और लगातार यह प्रयास करे कि देश में भेदभाव और असमानता की खाई ख़तम की जाए, आर्थिक न्याय हो, प्रकृति को धर्म का मूल मानना.

गांधी ने धर्म को चेतना का मूल स्रोत माना था, जिसे भौतिक रूप से तो आघात पहुँचाया जा सकता है, किन्तु उससे उत्पन्न हुई चेतना को कोई आघात नहीं पहुंचा सकता. क्या गांधी की ह्त्या से उनका विचार और मूल्य खतम हो गए? क्या कबीर की मृत्यु से कबीर के विचार और मूल्यों की मृत्यु हो गयी? क्या बुद्ध और महावीर का शरीर मौजूद नहीं होने से सिद्धांत लुप्त हो गए? बस बात इतनी सी ही है कि मंदिर और मस्जिद तो किसी सम्प्रदाय के तात्कालिक शरीर हैं, उनकी अमरता और उनके मूल्यों और सिद्धांतों में है. राजनीति ने हमें इस सच से विमुख कर दिया है बस!

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: April 11, 2021, 8:55 PM IST
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