Constitution of India: हथियार रखना मूलभूत अधिकार क्यों नहीं है!

परतंत्रता के दौर में ब्रिटिश भारत की सरकार को लगता था कि शस्त्र रखने के अधिकार से भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ कभी भी विद्रोह हो सकता है. संविधान सभा ने माना कि अब तो भारत स्वतंत्र हो गया है, और ऐसी स्थितियां नहीं बननी चाहिए कि लोगों को हथियार रखने की जरूरत पड़े. इसे मूलभूत अधिकार तो कतई नहीं माना जा सकता है. अंततः ऐसा ही हुआ.

Source: News18Hindi Last updated on: October 1, 2022, 1:03 pm IST
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Constitution of India: हथियार रखना मूलभूत अधिकार क्यों नहीं है!

पूरी दुनिया में यह एक पुरानी बहस है कि क्या हथियार या शस्त्र धारण करना व्यक्ति का मूलभूत अधिकार है? अमेरिका समेत कई देशों में जितनी जनसंख्या है, उससे ज्यादा संख्या हथियारों की है. यह जरूर सोचा जाना चाहिए कि आखिर हर व्यक्ति को हथियार रखने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? या हथियार रखना मूलभूत अधिकार क्यों माना जाना चाहिए? इस चर्चा का एक प्रभावी पक्ष यह है कि लोग यह मानते रहे हैं कि अपनी स्वयं की सुरक्षा के लिए उन्हें हथियार धारण करने का अधिकार मिलना चाहिए. ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए वे संभवतः राज्य व्यवस्था पर पूरा विश्वास कर नहीं पाते हैं. भारत में भी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी यह माना जाता रहा कि हर व्यक्ति को हथियार रखने का अधिकार होना चाहिए.


वर्ष 1895 में स्वतंत्र भारत की कल्पना करते हुए भारत के संविधान का एक प्रस्ताव बनाया गया था. जिसे स्वराज बिल (स्वराज विधेयक) 1895 के रूप में जाना जाता है. इस प्रस्तावित विधेयक में भी यह उल्लेख था कि “भारत के सभी नागरिकों को हथियार धारण करना चाहिए ताकि साम्राज्य की व्यवस्था बनाई रखी जा सके और आंतरिक और बाहरी शत्रुओं से रक्षा की जा सके.” इसके बाद वर्ष 1928-29 में भारत के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की पहल पर आल इंडिया कांफ्रेंस ने भारत के लिए अपना संविधान रचने के लिए मोती लाल नेहरु की अध्यक्षता में एक समिति बनाई. इस नेहरु समिति ने जो रिपोर्ट बनाई उसे नेहरु रिपोर्ट कहा जाता है. इस समिति की रिपोर्ट के मूलभूत अधिकारों के अंतर्गत अनुच्छेद 4 (18) में भी यह प्रावधान दर्ज था – “हर नागरिक को इस सम्बंध में बनाए गए नियमों के अधीन शस्त्र रखने और धारण करने का अधिकार होगा”.


वर्ष 1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन में भारत के सामाजिक-आर्थिक घोषणा पत्र में भी हथियार रखने और धारण करने के अधिकार को स्वीकार किया गया था. बाद में इसी घोषणा पत्र के बिंदु भारत के संविधान में दर्ज राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल हुए, लेकिन बस शस्त्र रखने और धारण करने का अधिकार संविधान में शामिल नहीं हुआ. हुआ यूं था कि ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड लिटन के काल में ब्रिटेन की संसद ने भारतीय शस्त्र अधिनियम, 1878 बनाया था. अधिनियम के मुताबिक किसी भी भारतीय नागरिक के लिए बिना अनुमति-अनुज्ञा के हथियार रखना या उसका व्यापार करना एक दंडनीय अपराध था. लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह मांग की जाती रही कि ब्रिटिश साम्राज्य की सरकार को इस कानून को रद्द करना चाहिए क्योंकि स्वयं की रक्षा करने के लिए भारतीयों को भी शस्त्र रखने का अधिकार है.


संविधान सभा के मसौदे में स्वतंत्रता से सम्बंधित मूलभूत अधिकारों के अनुच्छेद 13 (भारत के संविधान-1950 का अनुच्छेद 19) पर बहस के दौरान सभा के सदस्य एच.वी.कामत ने कहा कि “पिछली शताब्दी में अंग्रेजों ने शस्त्र सम्बंधी कानून बनाया था. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वर्ष 1931 के कांग्रेस अधिवेशन में विभिन्न प्रस्तावों पर चर्चा की गई थी. उनमें से सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक प्रस्ताव मूल अधिकारों से सम्बंधित था. उन मूल अधिकारों के प्रस्ताव में अभिव्यक्ति, संगठन बनाने, विधि के समक्ष समानता, सभी धर्मों के प्रति राज्य के भावों में तटस्थता, निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकारों की बात की गई थी. एच.वी. कामत ने कहा कि “कराची अधिवेशन के स्वीकार किए गए बाकी के मूल अधिकार सम्बंधी प्रस्ताव तो सभा में स्वीकार किए जा रहे हैं, लेकिन कराची अधिवेशन के प्रस्ताव में दर्ज एक मूल अधिकार यह भी है कि प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार होगा कि वह तत्संबंधी नियमों और आरक्षणों के अधीन हथियार रखे और उन्हें धारण करे”. वे चाहते थे कि स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकारों में “हथियार रखने” के अधिकार को भी शामिल किया जाए.



इसी तरह के प्रस्ताव शंकर देव और आचार्य जुगल किशोर ने भी प्रस्तुत किए थे. एच.वी. कामत ने कहा कि यह कहा जा सकता है कि “देश में कई विध्वंसकारी अथवा इसी प्रकार के लोग हैं और वे इस अधिकार का दुरूपयोग कर सकते हैं. अगर साधारण नागरिक को इस प्रकार का अधिकार प्रदान किया गया, वे उससे लाभ उठा सकते हैं. परन्तु क्या मैं इस सभा से यह कह सकता हूं कि विध्वंसकारी तथा अन्य दुष्ट और दुराचारी तथा अपराधी हथियारों को प्राप्त करते रहे हैं और करते रहेंगे, चाहे हथियार सम्बंधी कोई कानून हो या न हो. वास्तव में कानून के मार्ग पर चलने वाले लोगों को ही इस व्यवस्था से हमेशा हानि हुई है. और इन दुष्टों से उन्हीं की रक्षा करने की आवश्यकता है. अगर यह प्रस्ताव नहीं स्वीकार किया गया तो इससे देशवासियों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा और वे सोचेंगे कि सरकार उनसे डरती है. सरकार के मंत्रियों के लिए यह कहना उचित है कि उन्हें लोगों की रक्षा करनी है. अपने बंगलों के बाहर संतरियों के तैनात करके वे यह तर्क उपस्थित कर सकते हैं. परंतु किसी साधारण नागरिक की रक्षा के लिए संतरी नहीं रहते.”


मौलाना हसरत मोहानी ने भी कामत के प्रस्ताव का समर्थन किया. डॉ. भीमराव आंबेडकर ने एच.वी. कामत के संशोधन प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया. उन्होंने अपने जवाब में कहा कि “जिन परिस्थितियों में कांग्रेस ने ऐसे प्रस्ताव (नागरिकों को हथियार रखने की स्वतंत्रता का मूलभूत अधिकार) स्वीकार किए थे, वे परिस्थितियां अब नहीं हैं. ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को शस्त्र रखने की आज्ञा नहीं दी थी और उन्होंने ऐसा शांति व्यवस्था के आदेश के आधार पर नहीं किया था बल्कि उनका यह मानना था कि एक विदेशी सरकार के विरुद्ध अधीनस्थ प्रजा (ब्रिटेन की सरकार के अधीन भारत के लोग) को हथियार धारण करने का अधिकार नहीं होना चाहिए, जिससे कि वह सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए संगठित न हो सकें. वर्तमान परिस्थितियों में मैं स्वयं यह नहीं सोच सकता कि राज्य किस प्रकार शासन-कार्य का संचालन कर सकेगा; यदि प्रत्येक व्यक्ति को बाजार जाने और बेरोकटोक तमाम तरह के आक्रमणकारी शस्त्र खरीदने का अधिकार प्राप्त हो”.


एच.वी. कामत का तर्क था कि “शस्त्र रखने का मूलभूत अधिकार देकर उसे अन्य अधिकारों की तरह ही परंतुक (वे शर्तें जो यह बताती हैं कि कब मूलभूत अधिकार को सीमित किया जा सकेगा) से नियंत्रित भी तो किया जा सकता है. डॉ. आंबेडकर ने कहा कि “…(अनुच्छेद का) परंतुक (शर्तें) क्या कहता है? न्यायालयों के मुताबि नियमन का मतलब है ‘शर्तों का प्रावधान”; पर “शर्तें” कभी ऐसी नहीं हो सकतीं कि वे नागरिकों के हथियार रखने के अधिकार को निरस्त कर सकें. ऐसे में “नियमन” किसी भी ऐसे नागरिक के हथियार रखने के अधिकार में बाधा नहीं डालेगा, जो हथियार रखना चाहता है. सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के ऐसे मौलिक अधिकार देने की नीति पर मुझे बड़ी आपत्ति है. यदि इसे मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार कर लिया जाए तो सब तरह के लोगों को, चाहे वे स्वभाव से अपराधी ही हों, शस्त्र धारण करने के अधिकार की मांग करने का हक हो जाएगा, आप तब यह कह ही नहीं सकते कि इस परंतुक (शर्तों) द्वारा किसी व्यक्ति को इस कारण शस्त्र-धारण करने का अधिकार नहीं होगा कि वह विशेष वर्ग से है. हमें इस बात पर आग्रह नहीं करना चाहिए कि व्यक्ति को शस्त्र धारण करने का अधिकार हो, बल्कि इस बात का आग्रह करना चाहिए कि शस्त्र धारण करने का कर्तव्य हो. सच तो यह है कि जब कोई आपातकालीन स्थिति निर्मित हो, जब युद्ध हो, जब विप्लव हो, जब राज्य की स्थिरता और सुरक्षा संकट में हो, उस समय राज्य की रक्षा हेतु राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को शस्त्र धारण करने के लिए आमंत्रित करने का अधिकार हो.”


परतंत्रता के दौर में भारतीयों के साथ हिंसा और शोषण होता था, लेकिन उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए भी शस्त्र रखने का अधिकार नहीं था. ब्रिटिश भारत की सरकार को लगता था कि शस्त्र रखने के अधिकार से भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ कभी भी विद्रोह हो सकता है. भारतीयों द्वारा उस खास स्थिति में इस अधिकार की मांग की जा रही थी, लेकिन संविधान सभा ने माना कि अब तो भारत स्वतंत्र हो गया है, और ऐसी स्थितियां नहीं बनना चाहिए कि लोगों को हथियार रखने की जरूरत पड़े. इसे मूलभूत अधिकार तो कतई नहीं माना जा सकता है. अंततः ऐसा ही हुआ; हथियार रखना व्यक्ति का अधिकार नहीं माना गया.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: October 1, 2022, 1:03 pm IST
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