भारत की भीतरी दासता से मुक्ति पर संवैधानिक बहस

जब भारत आज़ाद भी नहीं हुआ था, तब स्पष्ट नीति बनने लगी थी कि बलात श्रम, बेगार और मानव व्यापार को खत्‍म करके ही हम भीतरी दासता से मुक्त हो सकेंगे. हम देखते हैं कि सात दशक गुज़र जाने के बाद भी भारत में बच्चों, किशोरवय व्यक्तियों, औरतों और महिलाओं का व्यापार होता है. यह केवल सामाजिक विसंगति ही नहीं है, बल्कि नई आर्थिक व्यवस्था ने बेगार और मानव व्यापार को नए रूप प्रदान कर दिए हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: June 30, 2022, 9:28 pm IST
शेयर करें: Share this page on FacebookShare this page on TwitterShare this page on LinkedIn
विज्ञापन
भारत की भीतरी दासता से मुक्ति पर संवैधानिक बहस
भारत की भीतरी दासता के शिकार मजदूर, कारीगर, महिलाएं, दलित और आदिवासी थे.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसी भी देश की तरह ही भारत भी दो-तरह की गुलामी, शोषण और दासता की गिरफ्त में रहा था. एक दासता तो ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार की थी. जो राजनीतिक-आर्थिक हितों के चलते भारत का शोषण कर रही था. लेकिन दूसरी दासता भारत के भीतर यानी अपनी सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था की थी. जिसमें लैंगिक-जाति आधारित शोषण की व्यवस्था बनाई गई थी. भारत की भीतरी दासता के शिकार मजदूर, कारीगर, महिलायें, दलित और आदिवासी थे. जब भारत का संविधान बन रहा था, तब संविधान सभा के सदस्यों ने खुलकर भीतरी दासता की इस गंभीर बीमारी की जांच-पड़ताल की. वे मान रहे थे कि अँगरेज़ तो चले गए, लेकिन क्या वास्तव में भारत के लोग यानी भारत के इंसान, भारत के नागरिक खरीदे-बेंचे नहीं जायेंगे. क्या भारत में मानव-व्यापार नहीं होगा? क्या अब महिलाओं का लैंगिक शोषण और उनके शरीर का व्यापार न होगा? क्या अब गरीब-वंचितों से बेगार नहीं कराई जायेगी. इन प्रश्नों के सन्दर्भ में मूलभूत अधिकारों में यह प्रतिबद्धता व्यक्त की गई कि स्वतंत्र भारत में मानव व्यापार और बेगार नहीं होगी.



जब भारत आज़ाद भी नहीं हुआ था, तब इस विषय पर स्पष्ट नीति बनने लगी थी. बिलकुल शुरूआती दिनों से ही यह बात स्पष्ट थी कि बलात श्रम, बेगार और मानव व्यापार को खत्‍म करके ही हम भीतरी दासता से मुक्त हो सकेंगे.



23 अप्रैल 1947 को यानी भारत के आज़ाद होने से साढ़े चार महीने पहले ही भारत की संविधान सभा द्वरा बनाई गई अल्पसंख्यक और मौलिक अधिकार सम्बन्धी सलाहकार समिति ने अपनी पहली रिपोर्ट संविधान सभा के सामने प्रस्तुत कर दी थी. इस समिति के अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल थे. इसी रिपोर्ट में “स्वतंत्रता  के अधिकार” सम्बन्धी भाग में अनुच्छेद 11 में मौलिक अधिकार के रूप में उल्लेख था कि –



अनुच्छेद 11


मनुष्यों का व्यापार और बेगार और इसी प्रकार दूसरी तरह बलपूर्वक काम लेने की आज्ञा नहीं है और इस निषेध का किसी भी प्रकार उल्लंघन किया जाना अपराध समझा जाएगा.



मगर शर्त यह है कि इस वाक्य-खंड के किसी आदेश से सरकार को सार्वजनिक कामों के लिए अनिवार्य रूप से सेवा कराने में कोई बाधा नहीं होगी, लेकिन ऐसा करने में जाति, धर्म, वर्ण या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं बरता जाएगा.


सभा के सदस्य के. एम्. मुंशी ने इस अनुच्छेद में से व्याख्या (कि मगर शर्त यह है कि इस वाक्य-खंड के किसी आदेश से सरकार को सार्वजनिक कामों के लिए अनिवार्य रूप से सेवा कराने में कोई बाधा नहीं होगी, लेकिन ऐसा करने में जाति, धर्म, वर्ण या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं बरता जाएगा.) को निकाल देने का प्रस्ताव रखा था. इस पर डॉ. भीम राव आंबेडकर ने कहा था कि “मेरा ख़याल है कि उसके (व्याख्या निकाल देने के) गंभीर परिणाम हो सकते हैं और सैनिक और सामाजिक कामों के लिए अनिवार्य सेवा लेने के जो राज्य को अधिकार हैं, इससे उस प्रभाव पड़ेगा. मेरी तो सलाह होगी कि हमें व्याख्या नहीं निकालना चाहिए और इसे ज्यों का त्यों छोड़ देना चाहिए और इस पर तब तक विचार करना नहीं चाहिए, जब प्रांतीय और देशी राज्यों के विधान अपने-अपने रूप में पुनः बनाए जाएंं.”


इस चर्चा में दाक्षायणी वेलायुदन, बी. दास, पी. के. सेन. अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर, एम्. अनंतशयनम आयंगर आदि ने भी भाग लिया.


इस पहली चर्चा के बाद मौलिक अधिकारों की रिपोर्ट के साथ यह अनुच्छेद भी संविधान सभा की मसौदा समिति के पास भेजा गया.


डॉ. आंबेडकर की अध्यक्षता वाली समिति ने भी इस अनुच्छेद को अपने मसौदे में अनुच्छेद 17 के रूप में ज्यों का त्यों ही रखा.


इस विषय पर 3 दिसंबर 1948 को बहुत गंभीर चर्चा हुई. इससे यह साफ़-साफ़ संकेत मिलते हैं कि भारत में उस वक्त किन-किन रूपों में दासता, बेगार और शोषण की व्यवस्थाएं बनी हुई थीं. चर्चा शुरू होने पर सबसे पहले क़ाज़ी सैय्यद करीमुद्दीन ने यह संशोधन प्रस्ताव दिया कि  इस अनुच्छेद में यह जोड़ दिया जाए – “संघ-राज्य में अपराध के लिए दंड के रूप में होने के सिवाए किसी अन्य रूप में दासता अथवा बेगार जैसी अनिच्छापूर्वक सेवा का अस्तित्व नहीं होगा”. दामोदर स्वरुप सेठ चाहते थे कि इसमें लिखा जाए – सभी तरह की दासवृत्ति और दासत्व तथा….)


संविधान सभा में बेहद सजग भूमिका निभाने वाले प्रो. के. टी. शाह इसमें और स्पष्टता लाना चाहते थे. उनका सुझाव था कि इस खंड में हम रखें कि – “मानव-पणन और बेगार” इन शब्दों के स्थान पर “मानव-पणन अथवा धर्म के नाम पर देवदासी बनाने या किसी अन्य प्रकार की दासता एवं अपमान के जीवन में डालने के लिए मानव का अर्पण तथा बेगार…ये शब्द रख दिए जाएं. उन्होंने कहा कि मानव-पणन का मतलब है लोगों को वस्तु के समान बेचने और खरीदने की संभावना, अतऐव इसका वर्जन करना चाहिए. मानव-पणन प्राचीन काल की गुलामी प्रथा तक ही सीमित नहीं है. यह अब भी होता है – शायद इस परिषद् के भोले सदस्यों को जितना पता है, उससे कहीं अधिक पैमाने पर होता है. मैनें इस संशोधन में उस विशेष प्रकार की दासता को ही ध्यान में रखा है, जो इस देश में व्यापक पैमाने पर प्रचलित है, जिसमें धर्म के नाम पर नवयुवतियों को मंदिरों के अर्पण कर दिया जाता है और कच्ची उम्र से ही इन्हें दुराचारपूर्ण व्यापार के काम में लाया जाता है. मेरे विचार से इसे बंद करना चाहिए”. अब से सात दशक पहले भारत में धर्म की विसंगतियों पर खुल कर बात करने की स्वतंत्रता थी. इससे लोगों की भावनाओं को ऐसी ठेस नहीं पहुँचती थी, जिससे प्रेरित होकर वे झुण्ड में हिंसा करने निकल पड़ें.


सभा के सदस्य एच.वी. कामत का सुझाव था कि लोक (सार्वजनिक) उद्देश्य के स्थान पर राष्ट्रीय उद्देश्य कर दिया जाए. यानी जब कोई युद्ध होगा, जब कोई संकट काल आएगा, जब राज्य के स्थाईत्व पर संकट आएगा, जब कोई विप्लव होगा, विशेषतया उसी समय राष्ट्रीय सेवा का प्रश्न उठेगा. मेरा ऐसा आशय नहीं है कि सैनिक सेवा के लिए ही ऐसा हो, किन्तु राष्ट्रहित में किसी प्रकार की सेवा के निमित्त भी ऐसा होना चाहिए”.


ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर का आग्रह था कि “मनुष्यों का व्यापार” शब्द के बाद वैश्यावृत्ति (प्रोस्टीट्यूशन) लफ्ज़ जरूर जोड़ा जाना चाहिए. उनका कहना था कि “सरकार को बेगार” लेने के जो अख्तियार इस अनुच्छेद में दिए गए हैं, वह कमोबेश पहसे से भी मौजूद हैं और अब भी सरकार ओहदेदार अपने रौब की वजह से बेगार लेते हैं. अगर इसमें यह बात आ जाए कि इसका मुआवजा दिया जाएगा, तो यह कमी भी दूर हो जाती है”.


उड़ीसा का प्रतिनिधित्व करने वाले बी. दास ने संजीदा बात कही कि “मैनें स्त्रियों के क्रय-विक्रय की महान बुराई को दूर करने के लिए प्रारूपित संविधान में व्यवस्था करने की आवश्यकता बताई थी. इस व्यापार का अर्थ है स्त्रियों की वैश्यावृत्ति धारण करने के लिए बलात बाध्य करना. हमें पाखंडी बनकर इस तथ्य को छिपाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए कि भारत में स्त्रियों का ऐसा व्यापार नहीं चलता है. हमें स्वीकार कर लेना चाहिए कि स्त्रियों का ऐसा व्यापार होता है और जिसके लिए सर्वत्र पुरुष ही उत्तरदायी है”.


राजबहादुर ने कहा कि दासता के संमान बेगार का भी बड़ा काला और दुखद इतिहास है. मैं एक रियासत से आया हूँ, अतः मैं जानता हूँ कि रियासतों की दलित तथा मूक जनता के लिए यह बेगार, यह बलात श्रम, कितना भयानक सिद्ध हुआ है. यदि इस बेगार की पूरी कथा लिखी जाए तो वह मानव के दुखों, कष्टों, रक्त और आंसुओं से परिपूर्ण होगी. मैं जानता हूँ कि किस प्रकार कुछ नरेश साधारण जन को दुःख देकर अपने भोग-विलास, अपने असंयमित जीवन में लिप्त रहे, किस प्रकार उन्होंने अपने आनंद के लिए दलित श्रमिकों और मूक अज्ञान जनता का उपयोग किया? मुझे पता है कि बतख का शिकार करने के लिए, किस प्रकार बहुत से लोग ठंडे शीत सर्दी के दिनों में सारे-सारे दिन कीचड में बलात बाँध कर खड़े रखे जाते हैं. मुझे पता है कि किस प्रकार आखेट क्रीडा के निमित्त बहुत सारे लोगों को शेर का हांका करने के लिए बाँध लिया जाता है ताकि नरेश उसे गोली मार सकें. मुझे पता है कि बहुधा छोटे-छोटे अधिकारी केवल ऐसे अत्याचार ही नहीं करते वरन जो श्रमिक इस बेगार की विपत्ति से बचना चाहते हैं, उनसे बलात घूस भी लेते हैं. सार रूप में मैं कह सकता हूँ कि यह अनुच्छेद जन-साधारण की स्वतंत्रता का घोषणा-पत्र है”.


मद्रास की तरफ से संविधान सभा के सदस्य एस. नागप्पा ने कहा कि “बेगार मेरे अपने प्रदेश में भी प्रचलित है. विशेषतया हरिजनों में. जब भी पशुओं की मृत्यु हो जाती है, तब पशु का स्वामी इन गरीब हरिजनों को बुलाता है, मृत पशु को उठवाता है, उनका चमड़ा उतारकर उसे रंगकर, चप्पल बनाकर उसे मुफ्त देने के लिए कहता है. इसके बदले उन्हें क्या मिलता है? त्योहारों पर कुछ खाना. पुलिस भी बलात श्रम लेती है. जब कोई ह्त्या हो जाए तो शव-परीक्षण के पश्चात इन लोगों को पुलिस बाध्य करती है कि वे शवों को हटायें और अन्य अन्तयेष्टि क्रियायें करें. जमींदारों के परिवार में कोई विवाह होता है तो वह इन लोगों से, विशेषतः हरिजनों से अपने सारे मकास में सफेदी करवाता है तथा इसके बदले में उन्हें सिवाय उस दिन के भोजन के और कुछ नहीं मिलता”.


टी.टी. कृष्णमाचारी का कहना था कि “इस भाग विशेष में समाज की समस्त प्राचीन कु-प्रथाओं के सुधारने का प्रयत्न व्यर्थ है. यदि वे बुराइयां ऐसी हैं कि वे लोग, जिनका उसमें स्वार्थ निहित है, कदाचित उन बुराइयों को चिरस्थाई बनाने का प्रयत्न करेंगे, तो अवश्य ही हमें उनके विरुद्ध व्यवस्था करना चाहिए; किन्तु यदि उन कुप्रथाओं के विरुद्ध जनमत पहले से ही सुसंगठित हो तो मेरे विचार में संविधान में ऐसी प्रथाओं पर रोक लगाकर, हमें संभवतः भारत की शुभकीर्ति पर कलंक नहीं लगना चाहिए. इन मूलाधिकारों में हमारी युगों से चली आ रही समस्त बातों को, जो अब तक प्रचलित हैं, नहीं आने दें. समाज के कुछ भागों में प्रचलित वे प्रथाएं बुरी हैं, किन्तु वे उचित समय पर, कदाचित दो, तीन अथवा चार वर्ष में समुचित क़ानून निर्माण द्वारा मिटाई जा सकती हैं. जो चीज़ कल समाप्त होने वाली है, उसे मूल अधिकारों में क्यों रखा जाए?”.  उनका मानना था कि समाज में बदलाव आने से ये शोषणकारी व्यवहार और कुरीतियां अपने आप मिटती जायेंगी, लेकिन शायद यह बदलाव बिना प्रतिबद्ध पहल के आने में सैंकड़ों वर्ष भी लग सकते हैं.


इस पूरी बहस के बाद  3 दिसंबर 1948 को ही डॉ. भीम राव आंबेडकर ने अंततः इस अनुच्छेद को व्यापकता में ही रखा और देवदासी, दासता, वैश्यावृत्ति, जमींदारों के व्यवहार से सम्बंधित कोई शब्द भी जोड़ने के लिए सहमति नहीं दिखाई. अंततः यह अनुच्छेद उसी रूप में पारित हुआ, जिस रूप में इसे संविधान सभा की अल्पसंख्यक और मौलिक अधिकार सम्बन्धी सलाहकार समिति और फिर मसौदा समिति ने सभा के सामने प्रस्तुत किया था.


बहरहाल, हम यह भी देखते हैं कि सात दशक गुज़र जाने के बाद भी भारत में बच्चों, किशोरवय व्यक्तियों, औरतों और महिलाओं का व्यापार होता है. यह केवल सामाजिक विसंगति ही नहीं है, बल्कि नई आर्थिक व्यवस्था ने बेगार और मानव व्यापार को नए रूप प्रदान कर दिए हैं. इस अनुच्छेद से सम्बंधित अनुभव बताता है कि भारत की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था ने, भारत के लोगों ने संविधान को पूरी तरह से अपनाया नहीं है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

और भी पढ़ें
First published: June 30, 2022, 9:28 pm IST
विज्ञापन

राशिभविष्य

मेष

वृषभ

मिथुन

कर्क

सिंह

कन्या

तुला

वृश्चिक

धनु

मकर

कुंभ

मीन

प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
और भी पढ़ें
विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें