उपनिवेशवाद ने भारत को गरीब ही नहीं, सांप्रदायिक भी बनाया है!

बीसवीं सदी की शुरुआत से ही उपनिवेशवादी सरकार ने भारत को भौगोलिक और साम्प्रदायिक आधारों पर तोड़ना शुरू कर दिया था. 20 जुलाई, 1905 को वायसराय लार्ड कर्ज़न की बंगाल विभाजन की घोषणा के बाद 16 अक्तूबर, 1905 को मुस्लिम बहुल क्षेत्र से हिन्दू क्षेत्र (पूर्वी और पश्चिमी बंगाल) को अलग कर दिया.

Source: News18Hindi Last updated on: October 5, 2020, 9:54 AM IST
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उपनिवेशवाद ने भारत को गरीब ही नहीं, सांप्रदायिक भी बनाया है!
उपनिवेशवाद ने भारत को गरीब ही नहीं, सांप्रदायिक भी बनाया है!
200 साल उपनिवेश यानी गुलाम बने रहने के दौरान जो गलतियां हुईं और ब्रिटिश सत्ता ने जो षड्यंत्र रचे, हमें उनसे मुक्त होने की पहल करनी चाहिए थी. इसके उलट हम उन्हें और प्रभावी बनाते गए. मसलन सांप्रदायिकता की फसल. ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने भारत को जो सबसे गहरा घाव दिया था, वह था सांप्रदायिकता का. वर्ष 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय की बहुत सक्रिय भूमिका रही थी. इसके बाद भी लगातार मुसलमान आजादी के लिए चल रहे संघर्ष में सक्रिय रहे. हिन्दू-मुस्लिम एकजुटता को तोड़ने के लिए 'फूट डालो और राज करो' की नीति अपनाई गई.

बीसवीं सदी की शुरुआत से ही उपनिवेशवादी सरकार ने भारत को भौगोलिक और साम्प्रदायिक आधारों पर तोड़ना शुरू कर दिया था. 20 जुलाई, 1905 को वायसराय लार्ड कर्ज़न की बंगाल विभाजन की घोषणा के बाद 16 अक्तूबर, 1905 को मुस्लिम बहुल क्षेत्र से हिन्दू क्षेत्र (पूर्वी और पश्चिमी बंगाल) को अलग कर दिया. बंगाल विभाजन का मकसद भारत को अलग-अलग स्तरों पर विभाजित करके कमजोर करना था ताकि राष्ट्रवादी स्वतंत्रता आन्दोलन कमज़ोर पड़ जाए. लार्ड कर्ज़न के गृह सचिव हर्बर्ट रिसले के द्वारा 5 फ़रवरी और 6 दिसंबर 1904 को लिखे पत्रों से यह साबित भी होता है. इनमें उल्लेख है कि 'एकीकृत बंगाल एक ताकत है. इसका विभाजन कई मायनों में आगे जाएगा. कांग्रेस ने बंगाल विभाजन का विरोध किया है, यह हमारे लिए सकारात्मक है हमारा मकसद एकजुट दल को कमज़ोर करना ही सबसे अहम् मकसद है.' बंगाल विभाजन के साथ ही ब्रिटिश शासन ने मुस्लिम समुदाय को अपने अलग संगठन बनाने के लिए प्रेरित भी किया. बहरहाल वर्ष 1911 में बंगाल विभाजन को समाप्त कर दिया गया, लेकिन तब तक हिन्दू-मुस्लिम समुदायों में दूरियां बढ़ चुकी थीं.

इसी संदर्भ में ब्रिटिश शासन ने वर्ष 1909 में मुस्लिम संप्रदाय को पृथक निर्वाचिका का अधिकार देकर हिन्दू-मुसलमान विभाजन को गहरा कर दिया. वर्ष 1906 में मुस्लिम अभिजात वर्ग द्वारा मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए स्थापित मुस्लिम लीग को ब्रिटिश शासन ने संरक्षण प्रदान किया. लीग की मान्यता थी कि इस पहल के जरिये वे संसदीय व्यवस्था के तहत मुसलमानों पर हिन्दुओं के प्रभुत्व के विस्तार को रोक पाएंगे. इसीलिए प्रिंस आगा खान के नेतृत्व में अक्टूबर 1906 में भारत के विभिन्न हिस्सों से 35 मुस्लिम प्रतिनिधियों के समूह ने तत्कालीन वायसराय लार्ड मिन्टो से शिमला में मुलाकात कर स्थानीय, प्रांतीय और केंद्रीय चुनावों में मुसलमानों को पृथक निर्वाचिका का अधिकार देने की मांग की. कहा जाता है कि इस मुलाकात को संभव बनाने में नवाब मोहसिन-उल-मुल्क की अहम् भूमिका थी.

प्रतिनिधिमंडल का मानना था कि हिन्दू बहुमत के कारण मुसलमानों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है. पृथक निर्वाचिका का मतलब था कि मुस्लिम बहुल चुनाव क्षेत्र में प्रतिनिधि के लिए केवल मुस्लिम समुदाय के द्वारा मतदान. यह उल्लेख करना जरूरी है कि मोरले-मिंटो सुधार के नाम पर वर्ष 1909 में भारत परिषद अधिनियम लागू किया गया था. इस अधिनियम में परिषद् के आधे से ज्यादा सदस्य ब्रिटिश शासन के प्रतिनिधि रहते थे, बाकी के सदस्य भारत के प्रतिनिधि होते थे. इनका चुनाव प्रत्यक्ष निर्वाचन से नहीं बल्कि जमींदारों, पूंजीपतियों, विश्वविद्यालय और स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों के मतों से होता था. यानी वास्तव में यह परिषद भारत के लोगों की परिषद् नहीं होती थी.
इस क़ानून ने परिषद् में भारतीय प्रतिनिधियों के अधिकारों में कोई वृद्धि नहीं की. इससे भी आगे बढ़कर ब्रिटिश शासन ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचिका की व्यवस्था बनाकर शासन और समाज के बीच की खाई को और ज्यादा गहरा कर दिया था, क्योंकि पृथक निर्वाचिका से भारत के प्रतिनिधि समूह, जो पहले से अल्पमत में था कि सीमित ताकत को विभाजित कर दिया गया. ब्रिटिश शासन का आंकलन था कि पृथक निर्वाचिका की व्यवस्था से भारत का राष्ट्रवादी आन्दोलन और ज्यादा कमजोर हो जाएगा.

भारत परिषद अधिनियम, 1909 में प्रावधानित साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को भारत शासन/सरकार अधिनियम, 1919 में और ज्यादा मजबूत कर दिया गया. ब्रिटिश सरकार ने यूरोपियन समुदाय और सिख समुदाय के लिए भी इसी तरह के आरक्षण की व्यवस्था कर दी. सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति के आधार पर बंगाल में 250 स्थानों में से 117 स्थान मुस्लिमों के लिए तय हुए. पंजाब में सिखों के लिए स्थान तय हुए. बंबई परिषद में मराठा समुदाय के लिए और मद्रास परिषद में गैर-ब्राह्मणों, ईसाइयों और एंग्लो-भारतीयों के लिए स्थान तय किए गए. साम्प्रदायिक विभाजन रोग अपने आप नहीं उगा था, इसे उगाया गया था. भारत ने इस रोग को उखाड़ फेंकने के बजाए, इसका पालन-पोषण किया है.

साल 1930 और 1931 में हुए गोलमेज़ सम्मेलनों के बाद ब्रिटिश सरकार ने संविधान में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व के लिए 'साम्प्रदायिक पंचाट-कम्युनल अवार्ड' पारित कर दिया, जिसमें छुआछूत और अस्पृश्यता से पीड़ित वंचित समुदायों को भी पृथक निर्वाचिका का अधिकार प्रदान किया गया. इसके तहत अस्पृश्य समुदायों के लिए 71 स्थान स्थान तय किए गए. यानी ब्रिटिश सरकार ने जाति के आधार पर भी भारत को विभाजित करने की नीति को आगे बढ़ा दिया. भारत में एक तबके के साथ वर्ण-व्यवस्था के तहत जिस तरह का अमानवीय व्यवहार किया जाता रहा है, उसे देखते हुए डॉ. बीआर आंबेडकर मानते थे कि स्वतंत्र राजनैतिक अस्मिता का निर्माण किए बिना जातिवादी गुलामी से मुक्ति नहीं मिलेगी. जबकि महात्मा गांधी पृथक निर्वाचिका के अनुभवों से यह सीख चुके थे कि दलितों को पृथक निर्वाचिका का अधिकार देकर ब्रिटिश शासन भारत को हमेशा के लिए छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट देगा. यही कारण था कि उन्होंने पृथक निर्वाचिका के स्थान पर दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की वकालत की. इसके आधार पर वंचित अस्पृश्य तबकों को 71 के स्थान पर 148 स्थानों पर आरक्षण मिला.इसके बाद भारत शासन अधिनियम, 1935 में भी साम्प्रदायिक आधार पर निर्वाचन की व्यवस्था जारी रखी गयी. इसके साथ ही डॉ. बीआर आंबेडकर के संघर्ष से अनुसूचित जाति समुदाय और महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित किए गए. महात्मा गांधी और डॉ. बीआर आंबेडकर के बीच हुए पूना पैक्ट के कारण जातिगत आधार पर निर्वाचिका की व्यवस्था तो नहीं आई, किन्तु संसदीय व्यवस्था में वंचित तबकों के प्रतिनिधित्व को संरक्षित करने के लिए स्थान आरक्षित किए गए. कुछ लोग यह मानते हैं कि यह डॉ. बीआर आंबेडकर की राजनीतिक पराजय थी, किन्तु उन्हें व्यापक भारतीय दृष्टिकोण से भी इसका विश्लेषण करना चाहिए.

बीसवीं सदी की शुरुआत में साम्प्रदायिकता के जो बीज बोए गए थे, वे अब बड़े-बड़े दरख्त बन चुके थे. भारत केवल ब्रिटेन से आज़ादी की लड़ाई ही नहीं लड़ रहा था, यह अंदरूनी तौर पर साम्प्रदायिकता और हज़ारों सालों तक पाली-पोसी गयी जातिवादी व्यवस्था से आज़ादी की लड़ाई भी लड़ रहा था. कुल मिलाकर सभी लड़ाइयां नई-नई चुनौती खड़ी कर रही थीं. ग्रेनविल आस्टिन लिखते हैं कि 'मुसलमानों के अन्दर ही अन्दर सुलग रहे असंतोष को मुहम्मद अली जिन्ना ने मूर्त रूप दिया और मुस्लिम हितों की इस दावेदारी में जिन्ना ने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को मुस्लिम राजनीति के पूर्व-आधार की तरह पेश किया.'

दूसरे विश्व युद्ध से उत्पन्न स्थितियों और भारत में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलनों के मद्देनज़र चलते भारत आज़ादी की तरफ बढ़ रहा था. आखिर में ब्रिटिश संसद ने मार्च 1946 में कैबिनेट मिशन को भारत भेजा ताकि स्वतंत्रता की प्रक्रिया तय हो. इसका उद्देश्य भारत की स्वतंत्रता की रूपरेखा बनाना था. कैबिनेट मिशन के निर्णय के आधार पर अंतरिम सरकार के गठन के विषय पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद बने रहे.


संविधान सभा के गठन के लिए हुए चुनावों में 214 सामान्य स्थानों में से 205 स्थान हासिल कर लिए, जबकि मुस्लिम बहुत 78 स्थानों में से मुस्लिम लीग को 73 स्थान मिले. यह स्थिति मुस्लिम लीग को स्वीकार्य नहीं थी. इसी बीच साम्प्रदायिक हिंसा शुरू हो गयी और स्थितियां बिगड़ती चली गईं. बंगाल में हिन्दुओं के साथ हिंसा हुई, तो वहीं बिहार में मुसलमानों पर अत्याचार हुए. ऐसे ही माहौल में 24 अगस्त 1946 को अंतरिम सरकार के 14 मंत्रियों वाले मंत्रिमंडल का गठन कर दिया गया और पंडित जवाहर लाल नेहरु अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री बने. इसके बाद अक्‍टूबर 1946 में मुस्लिम लीग भी अंतरिम सरकार में शामिल हो गई, लेकिन उसने 9 दिसंबर 1946 से शुरू हुए संविधान सभा की कार्यवाही में सहभागिता नहीं की.

वास्तविकता यह है कि ब्रिटिश उपनिवेशवादी राज व्यवस्था में अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए भारत में साम्प्रदायिकता के हथियार का सहारा लिया. हमारी किताबों में टुकड़ों-टुकड़ों में यह सच मौजूद है, किन्तु हमारी राजनीतिक प्रक्रियाओं ने इस सच को समाज की समझ से दूर बनाए रखा क्योंकि राजनीतिक दलों ने मूलतः जातिवाद और साम्प्रदायिकता को ही राजनीति का आधार बनाया और फिर 1990 के दशक से लागू हुई उदारीकरण-निजीकरण की आर्थिक नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने में इस विभाजन और वैमनस्यता ने कारगर भूमिका निभाई. आज यह जरूरी है कि हम भारतीय साम्प्रदायिक राजनीति की पृष्ठभूमि को सामने लायें और जो गलत हुआ है, उसे ढ़ोने के बजाय, नए भविष्य को गढ़ने की जिम्मेदारी उठाएं. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: October 5, 2020, 9:49 AM IST
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