मतदाता और मतदान के सिद्धांतों की बहस के 100 साल

केवल संविधान की किताब में यह लिख देने से भारत महान लोकतंत्र नहीं बन सकता है कि 'हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं'... अगर हम प्रतिबद्ध थे और हैं, तो क्या हमारी सामाजिक व्यवस्थाएं अस्पृश्यता को ख़त्म करने के लिए प्रतिबद्ध हैं? क्या समाज सरकार की उन आर्थिक विकास की नीतियों के विरोध में जनमत प्रस्तुत करने के लिए तैयार है, जिन नीतियों से पर्यावरण और पारिस्थितिकी का विनाश हो रहा है?

Source: News18Hindi Last updated on: October 19, 2020, 12:29 PM IST
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मतदाता और मतदान के सिद्धांतों की बहस के 100 साल
सवाल यह है कि क्या वास्तव में भारत के नागरिक चुनाव और मतदान की महत्ता को आत्मसात कर पाए हैं?
लगातार यह बात की जाती रही है कि भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है. यहां चुनाव होते हैं. अब 18 साल से ज्यादा उम्र के हर व्यक्ति को चुनाव में मतदान करके खुद अपनी सरकार चुनने का अधिकार है. सवाल यह है कि क्या वास्तव में भारत के नागरिक चुनाव और मतदान की महत्ता को आत्मसात कर पाए हैं? गौर से देखिये. आपको पता चलेगा कि राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल गुटों ने निहित सामाजिक-आर्थिक-साम्प्रदायिक स्वार्थों को समाज को घोंट-घोंटकर पिलाया है. और फिर इन्हीं स्वार्थों को वे चुनाव के माध्यम से राष्ट्र की प्राथमिकता के रूप में स्थापित करवा लेते हैं. हमारी शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक आन्दोलनों और प्रगतिशील संगठनों की सबसे बड़ी असफलता यही रही है कि ये समाज में जिम्मेदार नागरिक शिक्षा का प्रसार नहीं कर पाए.

पिछले कुछ सालों में जब यह देखा गया कि भारत खुद को एक लोकतंत्र कहता है, किन्तु चुनावों में तो 50-55 प्रतिशत मतदाता ही भाग लेते हैं. कहीं-कहीं तो केवल 40 प्रतिशत मतदान होता है. फिर इनमें से जिन्हें ज्यादा मत मिल जाते हैं, वे सत्ता पा जाते हैं. आंकलन बताते हैं कि वास्तव में 28 से 35 प्रतिशत लोगों के मत से ही भारत में राज्यों और केंद्र में सरकारों का गठन होता है. अपने आप में यह भारतीय लोकतंत्र के कमज़ोर होने का प्रतीक है. यह प्रमाण है, इस बात का कि भारत के नागरिकों को अब तक उनके अपने एक मत (वोट) के महत्व का अहसास ही नहीं हो पाया है! इसका मतलब यह भी है कि ब्रिटिश उपनिवेश से मुक्त हो जाने के बाद, एक गंभीर संविधान के अस्तित्व में आ जाने के बाद भी भारत के लोग मानते हैं कि अब भी पूंजीपतियों, जमींदारों, सैन्य शक्ति संपन्न समूहों, राजघरानों का ही राज है. भारत के लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती थी कि भारत के नागरिक कितने मज़बूत और सक्षम बनाए जाते! निश्चित रूप में इस मामले में भारतीय लोकतन्त्र पूरी तरह से सफल नहीं रहा.

100 साल पहले यानी 9 जून 1920 को नवजीवन में अपने एक लेख में उन्होंने लिखा था कि मतदाता उम्मीदवार की योग्यताओं से ज्यादा उनसे अपने निजी संबंधों और जुड़ाव को ज्यादा महत्व देते हैं. मतदाता को अपने आप को किसी दल या समूह से नहीं जोड़ना चाहिए. उन्हें मतदाता के विचारों को तवज्जो देना चाहिए, उनके दल को नहीं. इतना ही नहीं, उम्मीदवार के विचारों से ज्यादा उनके चरित्र को महत्व दिया जाना चाहिए. एक चरित्रवान व्यक्ति किसी भी भूमिका में अपने आपको सार्थक बना सकता है. यहाँ तक कि उसकी गलतियाँ भी बहुत मायने नहीं रखेंगी. मैं मानता हूँ कि जिस व्यक्ति का चरित्र नहीं होगा, वह राष्ट्र की सेवा नहीं कर सकता है. अगर मैं मतदाता हूँ, तो मैं उम्मीदवार के चरित्र को पहले परखूंगा, फिर उसके विचार को महत्व दूंगा.

यदि देश के मतदाता जब भी मौका आता, यह सोचकर अपने मतदान का निर्णय लेते कि कोई सा दल और कौन सा प्रतिनिधि समाज को जोड़ने की नीति पर चलने वाला है? कौन सा दल प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की नीति अपनाता है? कौन सा दल न्याय, शिक्षा, स्वास्थय और साम्प्रदायिक सद्भावना को प्राथमिकता देता है? और इसी आधार पर अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते. इससे भारत की व्यवस्था का चरित्र सुधरता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके उलट साम्प्रदायिक-पूंजीवादी संगठनों ने राजनीतिक दलों के माध्यम से मतदाताओं का ही चरित्र नकारात्मक बना दिया.
महात्मा गांधी ने लोक प्रतिनिधियों से अपनी अपेक्षाएं दर्ज की हैं. उन्होंने कहा था कि ]अगर वे (मतदाता) आलसी और निष्क्रिय बने रहें तो वे धारा सभाओं के सदस्यों के गुलाम बन जायेंगे. यदि वे उद्यमी और बुद्धिमान न बने तो वे 1500 खिलाड़ियों (सदस्यों) के हाथ के प्यादे बन जायेंगे- भले ही वे कांग्रेसजन हों या कोई हों. अगर मतदाता केवल हर तीसरे या पांचवे साल अपने मत दर्ज कराने के लिए ही नींद से जागें और मत देकर फिर गहरी नींद में सो जाएँ, तो उनके सेवक जरूर उनके स्वामी बन जायेंगे'.


मतदाता का काम पांच साल में केवल एक बार नहीं आता है. दिल्ली डायरी में महात्मा गांधी ने लिखा था कि 'प्रजातंत्र में लोगों को चाहिए कि वे सरकार की कोई गलती देखें, तो उसकी तरफ उसका ध्यान खींचे और संतुष्ट हो जाएँ. अगर वे चाहें तो अपनी सरकार को हटा सकते है, मगर उसके खिलाफ आन्दोलन करके उसके कामों में बाधा न डालें. हमारी सरकार जबरदस्त जलसेना और थल सेना रखने वाली कोई विदेशी सरकार तो है नहीं. उसका बल तो जनता ही है'.

महात्मा गांधी के इस वक्तव्य में यह विचार साफ़ झलकता है कि प्रजातंत्र और हिंसा का कोई मेल नहीं है, नागरिकों का काम है कि वे सरकार को उसकी गलतियों का अहसास करवाएं और यदि सरकार उसे न समझे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में होने वाले चुनावों में अपना मत व्यक्त करके सरकार बदल दें. इसके लिए जरूरी है कि नागरिक अपनी बातो तो लोकतांत्रिक तरीके से सार्वजनिक बहस के माध्यम से सबके सामने लायें. इससे जन माध्यमों और विपक्षी दलों को जानकारी हो जायेगी कि देश के लोग क्या चाहते हैं? इससे विपक्षी दल अपने मुद्दे तय कर सकेंगे और चुनाव में जनमत के मुताबिक़ अपने नीतिगत प्राथमिकताओं को सामने रख सकेंगे. अपने इस वक्तव्य में गांधी जी ने यह विश्वास रखा था कि भारत के सरकारें अपने नागरिकों के खिलाफ विदेशी सरकारों की तरह दुर्व्यवहार नहीं करेंगी. जब समुदाय सरकार से अपनी असहमति व्यक्त करेगा या सरकार की नीतियों का तार्किक विरोध करेगा, तब स्वतंत्र भारत की सरकारें जनता के खिलाफ सैन्य शक्ति का उपयोग नहीं करेंगी.क्या आयु का नागरिक सजगता से कोई सम्बन्ध है? महात्मा गांधी ने कहा था कि “मैंने बालिग़ मताधिकार का वरण किया है. इसका मुख्य कारण यह है कि यह न केवल मुसलमानों की, परन्तु तथाकथित हिन्दुओं की, ईसाइयों की, मजदूरों की और सभी प्रकार के वर्गों की साड़ी उचित महत्वाकांक्षायें सन्तुष करने के लिए समर्थ बनता है. मैं विश्वास दिलाता हूँ कि 21 या 18 वर्ष की उम्र से ऊपर सब बालिग़ स्त्री-पुरुषों को मत देने का अधिकार रहेगा. मैं अपने जैसे बूढों को यह अधिकार नहीं देना चाहता. ऐसे लोग किसी काम के नहीं. उनके लिए मौत है, जिन्दगी नौजवानों के लिए है. मैं तो चाहूंगा कि जैसे 18 वर्ष की उम्र से के लोगों को मत देने का अधिकार नहीं होगा, उसी तरह 50 साल से ऊपर की उम्र के लोगों को भी इससे वंचित रखना होगा'. बाद में अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने कहा था कि अब मैं मानने लगा हूँ कि मताधिकार के लिए अक्षर ज्ञान का होना आवश्यक है. मत को एक विशेष अधिकार के रूप में माना जाए और उसके लिए कुछ योग्यता आवश्यक समझी जाए'.

संविधान के अनुच्छेद 326 में 21 वर्ष के व्यक्ति को मतदान का अधिकार दिया गया था. 20 दिसंबर 1988 को इसमें 61वें संविधान संशोधन के माध्यम से इस उम्र को 18 वर्ष कर दिया गया.

वर्ष 1920 में उन्होंने कहा था कि मैं यह बताने का प्रयास कर रहा हूँ कि हमें ऐसे मतदाता चाहिए, जो निष्पक्ष, स्वतंत्र और समझदार हों. यदि वे देश के विषयों में रूचि न लें, उनसे जुडाव न रखें और वे ऐसे लोगों को चुनें, जिनसे उनका कोई निजी जुड़ाव या सम्बन्ध हो या जो उनकी अपनी निजी जरूरतों को पूरा करने के लिए हों; इससे देश की स्थितियां नहीं सुधरेंगी; इसके उलट यह व्यवहार (मतदाताओं का) बहुत नुकसानदायक सिद्ध होगा'. अब भारत में मतदान के दौरान “इनमें से कोई नहीं' का विकल्प मौजूद है, यह बात वर्ष 1920 में महात्मा गांधी ने भिन्न रूप में कही थी – यदि मतदाता को उम्मीदवार से अपने प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिलते हैं, तो वह मतदान में अनुपस्थित रह सकता है. ऐसी अनुपस्थिति भी उसके मत का प्रदर्शन मानी जायेगी'.

जनवरी 1939 के आखिरी सप्ताह में कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन के नुमाइंदों के लिए चुनाव हो रहे थे, तब कुछ मतदाताओं ने पाया कि उनके नाम पर पहले ही कोई मतदान करके जा चुका था. इसकी शिकायत महात्मा गांधी से हुई. तब उन्होंने हरिजन अखबार में 'आंतरिक क्षय-इंटरनल डिके' शीर्षक से एक लेख में लिखा कि भेष बदल कर मतदान करना (प्रतिरूपण) भी भ्रष्टाचार का ही एक रूप है. महात्मा गांधी ने सुझाव दिया कि जब भी कोई मतदाता मतदान के लिए जाए, तो अपने साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का परिचय पत्र साथ में रखे और वोट डालते समय यह परिचय पत्र देखा जाए. बाद में मतदाता परिचय पत्र के रूप में यह प्रयोग व्यापक रूप से अपनाया गया.

सचमुच, लोकतंत्र की स्थापना के लिए समाज को चारित्रिक रूप से बेहद परिपक्व और मज़बूत होना बहुत जरूरी है. केवल संविधान की किताब में यह लिख देने से भारत महान लोकतन्त्र नहीं बन सकता है कि 'हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं'... अगर हम प्रतिबद्ध थे और हैं, तो क्या हमारी सामाजिक व्यवस्थाएं अस्पृश्यता को ख़तम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं? क्या समाज सरकार की उन आर्थिक विकास की नीतियों के विरोध में जनमत प्रस्तुत करने के लिए तैयार है, जिन नीतियों से पर्यावरण और पारिस्थितिकी का विनाश हो रहा है? क्या समुदाय दलितों, आदिवासियों और महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को अस्वीकार करके अपनी सरकारों को बदलने के लिए मतदान करता है? नहीं! 28 जुलाई 1921 को यंग इंडिया में गांधी जी ने लिखा था कि स्वराज्य का अर्थ है देश की बहुसंख्यक जनता का शासन.


जाहिर है कि जहां बहुसंख्यक जनता नीतिभ्रष्ट हो या स्वार्थिक हो, वहां उसकी सरकार अराजकता की स्थिति पैदा कर सकती है, दूसरा कुछ नहीं.' फिर 16 अप्रैल 1931 को उन्होंने यंग इंडिया में लिखा कि कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि 'भारतीय स्वराज्य तो ज्यादा संख्या वाले समाज का यानी हिन्दुओं का ही राज्य होगा.' इस मान्यता से ज्यादा बड़ी दूसरी कोई गलती नहीं हो सकती. अगर यह सही सिद्ध हो तो अपने लिए मैं ऐसा कह सकता हूं कि मैं उसे स्वराज्य मानने से इनकार कर दूंगा और अपनी सारी शक्ति लगाकर उसका विरोध करूंगा. मेरे लिए हिन्द स्वराज्य का अर्थ सब लोगों का राज्य, न्याय का राज्य है'. इस सपने को अगर कोई पूरा कर सकता है, तो वे हैं मतदाता!

बाद में भारत के संविधान ने भी हर वयस्क (तब 21 वर्ष की उम्र) को मतदान का अधिकार दिया, किन्तु सजगता की पहल देश ने नहीं की.
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: October 19, 2020, 12:23 PM IST
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