भारत की न्यायपालिका क्यों खो रही है सम्मान?

संविधान के क्रियान्वयन के 70 वर्षों के अनुभव के बाद यह समझ आने लगा है कि भारत में न्यायपालिका दो वर्गों में बनती हुई है. एक है उच्च स्तरीय न्यायपालिका (उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय) और दूसरा वर्ग है अधीनस्थ न्यायपालिका.

Source: News18Hindi Last updated on: November 30, 2020, 11:53 AM IST
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भारत की न्यायपालिका क्यों खो रही है सम्मान?
संविधान के क्रियान्वयन के 70 वर्षों के अनुभव के बाद यह समझ आने लगा है कि भारत में न्यायपालिका दो वर्गों में बनती हुई है. एक है उच्च स्तरीय न्यायपालिका (उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय) और दूसरा वर्ग है अधीनस्थ न्यायपालिका.
लगातार क्या भारतीय व्यवस्था अपने भीतरी विरोधाभासों के टकरावों से उत्पन्न होने वाली चिंगारियों की गर्मी महसूस करने लगी है? जिस रूप में कार्यपालिका पर नियंत्रण स्थापित करके विधायिका और न्यायपालिका को अधिगृहीत करने की कोशिश की जा रही है, उससे ऐसे प्राथमिक परिणाम तो मिलते ही हैं. 1970 के दशक में राजनीतिक सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण के लिए पहल की जा रही थी, भारत में विविधता (पंथ, संस्कृति, भाषा, संस्कृति और विचार) के स्वरूप को खुरचकर विकृत करके एक पंथ, एक विचार, एक संस्कृति को शासक के रूप में स्थापित करने की कोशिशें चरम पर हैं. इसके लिए राजनीतिक प्रक्रिया के तहत भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की हर तरह की उपेक्षा करने के लिए कार्यपालिका को हथियार बनाया जा रहा है. विधायिका में बहुमत के माध्यम से कार्यपालिका पर नियंत्रण स्थापित होता है.

जब संविधान रचा जा रहा था, तब बहुमत का आशय यह माना गया था कि जिस विचार और नीति को भारत के लोग मान्यता या सहमति प्रदान करेंगे, वह विचार और उसका राजनीतिक दल राज्य और केंद्र में सरकार का संचालन करेंगे. स्वाभाविक रूप से संसदीय लोकतंत्र में चुनाव के माध्यम से विधायिका की सत्ता का सूत्र हासिल होता है और विधायिका में बहुमत या ज्यादा बहुमत के माध्यम से राजनीतिक दल को कार्यपालिका पर नियंत्रण हासिल हो जाता है. यह साफ नजर आता है कि विधायिका और कार्यपालिका एक गठजोड़ का रूप ले लेते हैं. व्यापक रूप में यह भी आशंका व्यक्त की जा सकती है कि यह गठजोड़ मिलकर भारत में लोकतंत्र के रास्ते का उपयोग अधिनायकवाद की मंजिल को हासिल करने में बखूबी कर सकते हैं. संकेत तो इसके मिलने ही लगे हैं.

लेकिन दुनिया में और भारत में भी एक बहुत स्पष्ट बहस रही है कि यदि न्यायपालिका स्वतंत्र और निष्पक्ष हो, यदि न्यायपालिका संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हो, तो वह विधायिका और कार्यपालिका के गठजोड़ को अधिनायकवाद की स्थापना करने से रोक सकती हैं. यह जान लेना जरूरी है कि संविधान निर्माण करने वाली सभा में सबसे ज्यादा बहस भारत में न्याय व्यवस्था के स्वरूप और उसकी प्रभुता को गढ़ने के लिए की गई थी.

यही कारण है कि भारतीय संविधान में दर्ज दो अनुच्छेद बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं. राज्य की नीति के निदेशक तत्वों (भाग 4) के अंतर्गत अनुच्छेद 50 में लिखा गया है कि 'राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने के लिए राज्य कदम उठाएगा.' इसका मतलब है कि यह राज्य (यानी कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनो की) जिम्मेदारी होगी कि कार्यपालिका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका को प्रभावित या नियंत्रित करने का जतन नहीं करेंगी.
इसके बाद अनुच्छेद 124 (7) में लिखा है कि 'कोई भी व्यक्ति, जिसने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पद धारण किया है, भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी न्यायालय में या किसी प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन या कार्य नहीं करेगा.' इसका यह मतलब माना जाता है कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश “वकालत” का का कार्य नहीं करेगा.


इसी आधार पर भारत के पहले विधि आयोग ने अपनी चौदहवीं रिपोर्ट (सितम्बर 1958) में सर्वसम्मति से और स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था कि कानून बनाकर सर्वोच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीशों की किसी अन्य पद या भूमिका में नियुक्ति नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और गरिमा पर आघात लगता है. विधि आयोग का मानना था कि ऐसी स्थिति में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को केवल अनुच्छेद 128 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में ही सेवावृद्धि या अस्थाई भूमिका लेने के लिए तैयार होना चाहिए, इससे इतर कोई और भूमिका नहीं. विधि आयोग ने इस प्रश्न पर संविधान में प्रावधान करने की बात इसलिए कही थी क्योंकि अनुच्छेद 124 (7) में उल्लिखित शब्द “अभिवचन या कार्य” से यह ध्वनि निकलती है कि इस प्रावधान में सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीशों को केवल न्यायिक कार्य न करने देने की व्यवस्था की गयी है. इसी तरह अनुच्छेद 220 में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से अपेक्षा की गई है कि वह केवल उन न्यायालयों में वकालत नहीं करेगा, जहां वह स्थाई न्यायाधीश के रूप में नियुक्त रहा हो.

भारत के राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग या राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण आयोगों में बाकायदा यह प्रावधान किए गए हैं कि इन आयोगों में उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त जजों की नियुक्ति की जायेगी.न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता के नज़रिए से यह एक विसंगतिपूर्ण स्थिति है क्योंकि कई मामलों में आयोगों के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में इन सेवानिवृत्त न्यायाधीशों द्वारा दिए गए निर्णयों का अक्सर कोई सम्मान नहीं होता है, ये निर्णय कार्यपालिका के लिए बाध्यकारी नहीं होते हैं. यदि इन आयोगों के निर्देशों की सुनवाई न हो तो, इन्हें उच्चतम न्यायालय में अपील करना होती है. इसके बाद सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय के वर्तमान न्यायमूर्ति इन्हें खारिज भी करते हैं.

पहले विधि आयोग के सदस्य और बम्बई उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश एमसी छागला को विधि आयोग की इसी रिपोर्ट के जमा होने के तुरंत बाद अमेरिका में भारत का राजदूत बना दिया गया था. इस नियुक्ति की विधि आयोग के अध्यक्ष एमसी सीतलवाड़ ने कड़ी आलोचना की थी.
भारत में सैद्धांतिक और नैतिकता के पैमानों पर उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अन्य पदों पर सरकार द्वारा नियुक्ति करना और न्यायाधीशों द्वारा इन्हें स्वीकार अनुचित माना जाता रहा है. इस पर बहस भी होती रही है. पिछले मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्य सभा में मनोनीत किए जाने पर भी धारदार बहस हुई. विधि सेंटर फार लीगल पालिसी के अध्ययन के मुताबिक उच्चतम न्यायालय के 70 प्रतिशत जजों को सेवानिवृत्ति के बाद नयी सरकारी नौकरी मिल जाती है. जॉब्स फॉर जस्टिसेस–करप्शन इन दि सुप्रीम कोर्ट आफ इंडिया के मुताबिक सरकार के पक्ष में निर्णय देने वाले न्यायाधीशों को सरकारी नौकरी मिलने की संभावना 15 से 20 प्रतिशत ज्यादा होती है.

एक व्यवस्था के रूप में भारत में न्यायपालिका कार्यपालिका के आभामंडल और दबाव दोनों से ही मुक्त नहीं हो पायी है. वीआर कृष्णा अय्यर केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार में मंत्री बनने के बाद उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश बने. न्यायमूर्ति कोका सुब्बाराव ने विपक्षी दल की तरफ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए पद से त्यागपत्र दिया. न्यायमूर्ति बहारुल इस्लाम कांग्रेस पार्टी के राज्य सभा सदस्य थे. वे संसद से इस्तीफ़ा देकर न्यायाधीश बने और फिर राज्य सभा के सदस्य बन गए.

इसी तरह एमसी छागला बम्बई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने और इसके बाद शिक्षा मंत्री और विदेश मामलों के मंत्री बने. हमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश हिदायतुल्लाह का भी उदाहरण लेना होगा, जो वर्ष 1969 में तत्कालीन परिस्थितियों में उप राष्ट्रपति बने और फिर वर्ष 1978-79 से वर्ष 1984 तक उप-राष्ट्रपति रहे. पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्र को कांग्रेस की तरफ से राज्य सभा का सदस्य बनाया गया था. न्यायमूर्ति पी. सतासिवम केरल के राज्यपाल बने और फिर रंजन गोगोई राज्यसभा में गए. ऐसा लगता है कि न्यायविद समाज के कई वरिष्ठ सदस्य अपने लाभ और हितों के लिए न्यायपालिका की संवेदनशीलता और शुचिता की आहूति देने के लिए तत्पर रहे हैं. यही न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है.

इसके अलावा उच्चतम न्यायालय के व्यापक मामलों में अधिकारों को चुनौती दी जाती रही है. पंजाब के गोलकनाथ परिवार की जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा था, इसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी कि इस कृत्य से उसके संपत्ति रखने, अर्जन करने और व्यवसाय करने के संवैधानिक मौलिक अधिकार का हनन हो रहा है. इस प्रकरण में यह प्रश्न उठा कि क्या सरकार संविधान में दर्ज मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है? 11 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने माना कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने का अधिकार है.

इसके बाद केरल में सरकार एडनीर मठ की जमीन का सार्वजनिक उपयोग के लिए अधिग्रहण कर रही थी. इसे मठ की तरफ से केशवानंद भारती ने पहले केरल उच्च न्यायालय में और फिर उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी. इस बार 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गोलकनाथ प्रकरण के निर्णय को पलट दिया और निर्णय दिया कि संसद को संविधान संशोधन का अधिकार तो हैं, किन्तु संसद भी संविधान के मूलभूत लक्षणों (भारत की प्रभुता और अखंडता, संविधान की सर्वोच्चता, परिसंघीय प्रणाली, मूलभूत अधिकार और उद्देशिका में शामिल तत्व) में संशोधन करने का अधिकार नहीं है.

इसके साथ कार्यपालिका यह भी साबित करने की कोशिश करती रही है कि न्यायपालिका को न्यायिक पुनर्विलोकन का अधिकार नहीं है, लेकिन भारत के उच्चतम न्यायालय ने कार्यपालिका और विधायिका के दबावों को झेलते हुए बार-बार यह स्थापित किया है कि न्यायपालिका को न्यायिक पुनर्विलोकन करने का अधिकार है यानी अगर संघ द्वारा बनाया गया कोई भी क़ानून नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को सीमित करता है या संविधान की मूल स्वरूप को चोट पहुंचाता है, तो उच्चतम न्यायालय ऐसे कानूनों को भी निष्क्रीय कर सकता है. 1970 के दशक में तत्कालीन सरकार का पक्ष लेने के कारण न्यायमूर्ति एएन राय को वर्ष 1973 में और इसके बाद न्यायमूर्ति एचएम बेग को वरिष्ठता क्रम में न होने के बावजूद मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया. बाद में न्यायमूर्ति एचएम बेग आठ साल तक अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष भी रहे.

न्याय और न्यायपालिका को एक दूसरे के साथ सामंजस्य में देखने और समझने की जरूरत है. संविधान सभा में तीन मौकों पर न्यायपालिका के रूप-स्वरूप स्वभाव पर बहसें हुईं. पहली बार यह विषय मौलिक अधिकारों की रिपोर्ट के साथ आया. फिर राज्य की नीति के निदेशक तत्वों के साथ भी आया. इसके बाद उच्चतम न्यायालय और संघ न्यायपालिका के लिए प्रावधान तय करते समय खूब बहस हुईं. वास्तव में जिस तरह का संवैधानिक ढांचा बनाया जा रहा था, उसमें बहुत जरूरी तक कि संविधान की व्याख्या, टीका और संरक्षण की जिम्मेदारी और अधिकार न्यायपालिका को सौंपे जाते. दूसरी बात यह है कि भारत की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था अपने मूल स्वभाव से समावेशी और लोकतांत्रिक नहीं रही है. संविधान असमानता, शोषण और छुआछूत ख़त्‍म करने का लक्ष्य रखता है, किन्तु समाज इन्हें पालने-पोसने का; चूंकि राजनीति के हित समाज को खुश रखने में होते हैं, इसलिए यह आशंका हमेशा बनी रही है कि राजनीति भी सामाजिक-आर्थिक न्याय को मूल सिद्धांत के रूप में स्वीकार नहीं करेगी. ऐसी अवस्था में न्याय व्यवस्था कमज़ोर होने से संविधान का सपना पूरा गढ़े जाने से पहले ही धराशायी हो जाने का खतरा भी था.

संविधान के क्रियान्वयन के 70 वर्षों के अनुभव के बाद यह समझ आने लगा है कि भारत में न्यायपालिका दो वर्गों में बनती हुई है. एक है उच्च स्तरीय न्यायपालिका (उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय) और दूसरा वर्ग है अधीनस्थ न्यायपालिका.


हालांंकि अधीनस्थ न्यायपालिका (जिला और सत्र न्यायालय, दंडाधिकारी) उच्च न्यायालय के प्रशासन के अधीन आते हैं, किन्तु व्यावहारिकता में वे कार्यपालिका से बहुत प्रभावित होते हैं, यानी उसे स्वतंत्र मानना एक बहुत ही मासूम का अन्धविश्वास है. जब भी यह बहस की जाती है कि न्यायपालिका कार्यपालिका से स्वतंत्र होना चाहिए, तब इस वर्गीकरण का महत्व बहुत बढ़ जाता है.

मौजूदा प्रावधानों में जितना न्याय व्यवस्था का अधीनस्थ होता जाता है, कार्यपालिका का दखल उतना ही बढ़ता जाता है. यह याद रखना बहुत जरूरी है कि राजस्व और स्थानीय क़ानून-व्यवस्था के सन्दर्भ में जिला कलेक्टर को जिला दंडाधिकारी के भूमिका प्राप्त है, जबकि उपखंड स्तर पर सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट भी कार्यपालिका का ही प्रतिनिधि होता है. इसके बाद पंचायत स्तर पर ग्राम न्यायालय, न्याय पंचायत, पंचायत अदालत, ग्राम कचहरी सरीखी व्यवस्थाएं भी अस्तित्व में आए हैं. हमेशा से यह एक सार्थक सोच रही है कि न्याय व्यवस्था का विकेंद्रीकरण होना चाहिए ताकि नागरिकों को न्याय पाने के लिए लम्बे समय और लम्बी दूरी का दर्द न भोगना पड़े; दुखद यह है कि इस सोच के साथ “न्याय” की मूल भावना का विकास नहीं हो पाया.

अब वह समय भी आ गया है, जब हमें केवल आर्थिक या भौतिक भ्रष्टाचार के पैमाने पर ही न्यायिक भूमिका के निर्वहन को नहीं मापना चाहिए, बल्कि अब राजनीतिक और पंथीय विचारधाराओं के आधार पर भी न्यायाधीशों की भूमिका और काम का आकलन होना चाहिए. जब यह अध्ययन किया जाएगा कि संवेदनशील मामलों में या ऐसे मामलों में, जिनमें सरकार या सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के हित/स्वार्थ निहित हैं, कुछ न्यायाधीशों ने पक्षपात किया है?; तब शायद न्यायपालिका की निष्पक्षता का ज्यादा बेहतर आकलन हो पाएगा. केवल यह सोचना कि आर्थिक दुराचार करने वाले या आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने वाले न्यायाधीशों के चरित्र पर ही सवाल उठाये जाने चाहिए, एक सीमित नजरिया होगा. (डिसक्‍लेमर- यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: November 30, 2020, 11:53 AM IST
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