क्या देश में प्राकृतिक न्याय की अवधारणा संकट में है?

कृषि व्यवस्था की नींव को झकझोरने वाले तीन कृषि कानून बना दिए गए. इसका प्रभाव न केवल किसानों पर पड़ने वाला है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा की व्यवस्था पर भी इसके आघात हो सकते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: October 12, 2020, 10:32 AM IST
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क्या देश में प्राकृतिक न्याय की अवधारणा संकट में है?
अनुभव बताते हैं कि सरकार अपने निर्णयों को जवाबदेहिता से परे मानने के दंभ से ग्रसित हो चुकी है.
पिछले दिनों भारत की व्यवस्थाओं में कुछ बहुत बड़े बदलाव किए गए. श्रम कानूनों में बदलाव करके श्रम संहिताएं बनाई गईं लेकिन श्रमिकों के पक्ष और हितों पर बहस का मौका नहीं दिया गया. इसी तरह कृषि व्यवस्था की नींव को झकझोरने वाले तीन कृषि कानून बना दिए गए. इसका प्रभाव न केवल किसानों पर पड़ने वाला है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा की व्यवस्था पर भी इसके आघात हो सकते हैं. लेकिन किसानों और खाद्य सुरक्षा संगठनों की बात नहीं सुनी गई.

सितंबर 2020 में ही भारत सरकार ने विदेशी अंशदान (नियमन) अधिनियम में ऐसे बदलाव किए, जिनसे विदेशी स्रोतों से अनुदान प्राप्त करके सामाजिक-आर्थिक बदलाव और समानता के लिए कार्य करने वाली नागरिक संस्थाओं के लिए अनुदान प्राप्त करना लगभग असंभव बना दिया गया. इसमें न तो संसदीय प्रक्रिया का ही पालन नहीं किया गया, न ही संवाद के लिए कोई मौका दिया गया.

महत्वपूर्ण यह है कि ये बदलाव ऐसे समय में किए गए, जबकि केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व कोविड 19 महामारी के जाल में उलझा हुआ था. इसी वक्त पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम के प्रावधान लागू थे, जिनके चलते इन वृहद् वैधानिक प्रावधानों पर बहस, संवाद और लोकतांत्रिक आलोचना के तरीकों को इस्तेमाल करना संभव नहीं था. आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत जन-प्रदर्शन आपराधिक कृत्य घोषित है, किन्तु सरकार संसद के खाली सदन में भारत की जड़ों पर गहरे नकारात्मक प्रभाव डालने वाले क़ानून बनाने के लिए स्वच्‍छंद व्यवहार का अवसर तलाश रही थी.

राज्य ने व्यावहारिक रूप से संविधान और संवैधानिक मूल्यों को काल-कोठरी में डाल दिया है. यह बहुत दुखदायी है कि भारत में कानून बनाने के लिए सरकार कूटनीतिक व्यवहार कर रही है.
अनुभव बताते हैं कि सरकार अपने निर्णयों को जवाबदेहिता से परे मानने के दंभ से ग्रसित हो चुकी है. वह 90 प्रतिशत नागरिकों को 'आयकर चोरी' की आरोपी के रूप में प्रस्तुत करती है, जबकि वे आर्थिक गरीबी के कारण टैक्स नहीं चुका पाते हैं, वह अल्पसंख्यकों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित है, यही कारण है कि संसद में एक सदस्य द्वारा ग्राहम स्टेंस के बारे में दिए गए मिथ्या वक्तव्य पर उसने कार्यवाही नहीं की, बर्बरता की शिकार युवती की अंतिम संस्कार दोहरे अमानवीय तरीके से किया जाता है और उसे सही ठहराने के लिए सरकार विपक्षी दलों, सामाजिक संस्थाओं और पत्रकारों के साथ तिहरे दर्जे का बुरा व्यवहार करती है. इसके आगे अब भारत में 10 करोड़ गरीबों, बच्चों, दलितों, महिलाओं, आदिवासियों आदि के कल्याण के लिए सक्रिय 20 हज़ार सामाजिक संस्थाओं को 'राष्ट्रद्रोह' का स्थाई आरोपी बना दिया. भारत में सहिष्णुता और असहमति को राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में डाल दिया गया है. 7 दशकों में नागरिक शिक्षा की जो अपेक्षा हुई, उसका परिणाम यह है कि समाज का बड़ा तबका 'राज्य' को हर ऐसी कार्यवाही करने का अधिकार दे रही है जिनसे इंसाफ, बंधुता और प्रजातांत्रिक मूल्यों का दमन किया जा सके.

इसी दौरान उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक युवती के साथ वीभत्स, बर्बर और अमानवीय व्यवहार होता है. यह घटना अन्याय की सीमाओं के परे जाकर किए गए व्यवहार के रूप में महसूस की जानी चाहिए. एक युवती की जीभ काट लेना, रीढ़ की हड्डी तोड़ देना, और इस पर भी समाज का दो भागों में बंट जाना, ये नए भारत के चरित्र को परिभाषित करने वाले मानक हैं. ये वही समाज है, जिसे कट्टर राष्ट्रवादी राजनीति एक ख़ास धर्म के अधीन लाने में जुटी है. सोचिये कि उस भारत का चरित्र कैसा होगा, जो भीड़ हिंसा पर इसलिए चुप हो जाती है क्योंकि मारे जाने वाला व्यक्ति दूसरे समुदाय का या दलित था! ये कैसा समाज है, जो बलात्कारी का समर्थन इसलिए करता है क्योंकि वह किसी ऊंची जाति से संबंध रखता है!

ये कुछ सूचक हैं. ये पूरी कहानी नहीं हैं. इनके माध्यम से हम यह समझना चाहते हैं कि क्या वर्तमान भारत में 'नैसर्गिक न्याय' की अवधारणा का कहीं कोई वजूद है या नहीं? सांप्रदायिक और पूंजीवादी राजनीति के गठजोड़ ने वर्ष 1990 के बाद से लागू हुई नई आर्थिक नीतियों को जड़ें जमाने में मदद करने के लिए जो वातावरण बनाया, उसका परिणाम हुआ कि भारत में 'मूलभूत अधिकार' को राष्ट्रविरोधी अवधारणा माना जाने लगा.राष्ट्रवादी राजनीति ने बहुत रणनीतिगत तरीके से सांप्रदायिकता के जहर को फैलाकर हिंसा को लोक-स्वीकार्यता दिलाने की पहल की और बहुत हद तक इसमें सफल रही. आप आसानी से अपने आसपास यह देख सकते हैं कि राष्ट्रविरोधी गतिविधि के मुहावरे मात्र का उपयोग करके नागरिक संस्थाओं को प्रतिबंधित किया जा सकता है. और व्यापक समाज भी यह समझ नहीं पाता है कि आखिर किसी नागरिक संस्था के राष्ट्र विरोधी होने के कौन से प्रमाण सरकार को मिले हैं?

आर्थिक विकास के नाम पर भारत की देशज पूंजी पर कब्‍जा जमाने के लिए विदेशी निवेश निर्बाध गति और असीमित मात्रा से भारत में प्रवेश कर सकता है, किन्तु सामाजिक समानता, न्याय, बंधुता, नागरिक स्वतंत्रता और जवाबदेहिता की मांग करने वाली नागरिक संस्थाएं एक ठोस क़ानून का पालन करते हुए भी विदेशी स्रोतों से अनुदान लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं. यह विरोधाभास क्यों? ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकारें चाहती हैं कि आर्थिक विकास के आवरण के भीतर खलबला रहे दुःख, निर्धनता, अपमान और अन्याय को उजागर नही होने देना चाहिए. यदि यह उजागर होता है, तो इससे पूंजी पर एकाधिकार और प्राकृतिक संसाधनों के विनाश का सच उजागर हो जाएगा और सरकारें समाज को अपना गुलाम बनाए रख कर उस पर निरंकुश तरीके से शासन नहीं कर पाएंगी.

भारत के संविधान में 'प्राकृतिक न्याय' की यूं तो कोई स्पष्ट अवधारणा मौजूद नहीं है, किन्तु मानव समाज के विकास और सभ्यता के मानकों पर इसे मूल तत्व माना गया है. मानव होने के नाते, किसी क़ानून की किताब में लिखा हो या न लिखा हो, हर इंसान को प्राकृतिक न्याय को हासिल करने का अधिकार है. भारतीय संविधान की रचनाकार सभा की पूरी बहस वास्तव में प्राकृतिक न्याय को चारित्रिक स्वरुप में बखूबी अपनाई है. अस्पृश्यता के व्यवहार को ख़त्‍म करने का प्रावधान, सभी को अपना धर्म मानने, उपासना करने और उसका प्रचार करने का अधिकार, बंधुआ होने से मुक्ति सरीखे अधिकार इसमें शामिल हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संविधान की उद्देशिका में ही भारतीय सामाजिक और राज्य व्यवस्था के चरित्र को आकार देने के लिए न्याय, बंधुता, समानता और स्वतंत्रता का उल्लेख है.

प्राकृतिक न्याय का सीधा सा मतलब है प्रकृति का नियम. शासन व्यवस्था के सन्दर्भ में यह कहा जाता है कि जीवन व्यवहार, घटनाओं, नीति, व्यवस्था आदि के सन्दर्भ में न्यायसंगति के साथ सही और गलत का बोध होना.


महत्वपूर्ण यह है कि ये बदलाव ऐसे समय में किए गए, जबकि केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व कोविड 19 महामारी के जाल में उलझा हुआ था. शासन व्यवस्था में इस बोध का होना एक किस्म से अनिवार्यता है. इस बोध से ही राज्य को निरंकुश और अन्यायकारी होने से रोका जा सकता है. शासन व्यवस्थाओं का इतिहास बताता है कि जब सरकारों में सही और गलत का बोध क्षीण हो जाता है, तब शासन व्यवस्था मानवी और जवाबदेह नहीं रह जाती है. धर्म या राष्ट्रीयता के नाम पर अन्याय और हिंसा को भी स्वीकार किया जाने लगता है.

आरंभ में प्राकृतिक न्याय के अवधारणा को केवल न्यायिक कार्यवाही या न्यायपालिका के संदर्भ में ही जांचा-परखा-समझा जाता था, किन्तु वास्तव में प्राकृतिक न्याय किसी भी जनकल्याणकारी राज्य का मूल चरित्र होना चाहिए. यदि कोई राज्य व्यवस्था जन कल्याणकारी राज्य के मार्ग से भटकती है और प्रताड़ना के लिए ही नियम बनाती है, तो वह अन्याय की पक्षधर हो जाती है. हम भारत में भी यही संकेत देख रहे हैं, जहां बर्बरता की शिकार युवती और बर्बरता के आरोपी के साथ उसके धर्म और जाति के आधार पर पूरी व्यवस्था अपनी भूमिका निभाती है. जहां राज्य और केंद्र सरकारें किसानों-मजदूरों-नागरिक संस्थाओं को गहरे तक प्रभावित करने वाली कानूनी व्यवस्थाएं बनाती हैं, किन्तु नैसर्गिक न्याय की अवधारणा के तहत उन तबकों-समूहों को अपनी बात रखने का कोई अवसर ही उपलब्ध नहीं करवाती हैं. यानी राज्य में सही-गलत का बोध क्षीण हो चुका है और वह पूर्ण निरंकुशता की तरफ तेज़ी से बढ़ रहा है.

वर्ष 1947 में आज़ादी के साथ जब संविधान निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई, तब सबसे बड़ी उम्मीद थी कि भारत प्राकृतिक न्याय की अवधारणा को ही राज्य व्यवस्था का मूल तत्व बनाएगा. किन्तु 70 वर्ष गुज़र जाने के बाद हमें यह अहसास होने लगा है कि भारत इस अवधारणा में पूर्ण विश्वास रखता ही नहीं है.


प्राकृतिक न्याय की सोच में दो सिद्धांत समाहित होते हैं. पहला- किसी भी तरह के पूर्वाग्रह की तुलना में नियम का महत्व होना और दूसरा-निष्पक्ष सुनवाई होना. प्राकृतिक न्याय का पहला सिद्धांत यह है कि किसी भी व्यक्ति के बारे में किसी भी कारण से (जाति, भाषा, लिंग, आर्थिक स्थिति, धर्म या अन्य कुछ भी) पूर्व राय नहीं बनाई जानी चाहिए. यदि कोई न्यायाधीश किसी पूर्वाग्रह के आधार पर सुनवाई करेगा या निर्णय देगा, तो इससे व्यक्ति के द्वारा किन परिस्थितियों में, किन कारणों या मंशा के साथ कोई कृत्य किया गया है या वह कृत्य किया ही नहीं गया है. यह स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ पायेगा. इसी तरह यदि सरकार किसी समुदाय या संस्था के लिए किसी पूर्वाग्रह पर आधारित नियम या विधान बनाती है, तो उसमें “अन्याय” सन्निहित होगा ही. स्वतंत्रता के बाद भारत में पूर्वाग्रह के आधार पर धार्मिक अल्पसंख्यकों, संस्थाओं या विविध विचारधाराओं को सीमित करने सम्बन्धी क़ानून बनाए जा रहे हैं. जब सरकार और न्यायपालिका ही पूर्वाग्रह से ग्रसित हो, वहां क्या न्याय की कल्पना संभव है? क्या पूर्वाग्रह से मुक्त होकर अपराधी और अपराध का आंकलन संभव नहीं है?

इसी तरह विषय से सम्बंधित पक्षों को सुने जाने की व्यवस्था भी एक अनिवार्यता है. यदि सरकार और न्यायपालिका कोई भी निर्णय लेते समय यदि सम्बंधित पक्षों के वक्तव्य नहीं सुनती है और निर्णय लेते समय उनका पूरा सन्दर्भ नहीं लेती है, तो वह निर्णय संदेह के दायरे में होता है. जब भारत सरकार बुनियादी तौर पर पूर्वाग्रह से ग्रसित है और सम्बंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर ही नहीं देती है, तो इसका आशय है कि वह प्राकृतिक न्याय की अवधारणा का पालन नहीं करती है. (यह लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: October 12, 2020, 10:12 AM IST
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