जड़ों को बचाना ही जीवन कर्म है!

बीमारी के इलाज़ के लिए व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत बनाया जाता है. जब भी हम बीमारी को बाहर खोजने की कोशिश करेंगे, तब समाधान दुरूह होता जाएगा, क्योंकि समाधान भी तब बाहर की खोजा जाएगा. गांधी ने मानव स्वभाव से समाज परिवर्तन की कल्पना की और उस कल्पना को साकार करने का बेहद कठिन साध्य धारण किया.

Source: News18Hindi Last updated on: May 9, 2021, 2:09 PM IST
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जड़ों को बचाना ही जीवन कर्म है!
गांधी ने मानव स्वभाव से समाज परिवर्तन की कल्पना की
हम समस्याओं से ही नहीं घिरे होते हैं, हम वास्तव में समाधानों से ज्यादा घिरे हुए हैं. ज़रा सोचिए कि समस्या कहां से आती है और समाधान कहां से आता है? असल में समस्या का निर्माण उस स्थिति में होता है, जब व्यक्ति भीतर से कमज़ोर पड़ जाता है. ठीक उसी तरह जैसे प्रतिरोधक क्षमता के कमज़ोर पड़ जाने से संक्रमण आ जाता है. ज़रा यह सोचिये कि बीमारी का इलाज़ कैसे होता है? बीमारी के इलाज़ के लिए व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत बनाया जाता है. जब भी हम बीमारी को बाहर खोजने की कोशिश करेंगे, तब समाधान दुरूह होता जाएगा, क्योंकि समाधान भी तब बाहर की खोजा जाएगा. गांधी ने मानव स्वभाव से समाज परिवर्तन की कल्पना की और उस कल्पना को साकार करने का बेहद कठिन साध्य धारण किया.

समाधान की शुरुआत स्वयं से होती है. यही शुरुआत गांधी जी ने की. “मैं घृणा से नहीं परन्तु प्रेम की शक्ति से लोगों को अपनी बात समझाऊंगा और अहिंसा के द्वारा आर्थिक समानता पैदा करूंगा. मैं सारे समाज को अपने मत का बनने तक रुकुंगा नहीं, बल्कि अपने पर ही प्रयोग शुरू कर दूंगा. इसमें जरा भी शक नहीं कि अगर मैं 50 मोटरों का तो क्या, 10 बीघा जमीन का भी मालिक हूं, तो मैं अपनी कल्पना की आर्थिक समानता को जन्म नहीं दे सकता. उसके लिए मुझे गरीब बन जाना होगा. यही मैं पिछले 50 सालों से या उससे भी ज्यादा वक्त से करता आया हूँ”.

इस आर्थिक गैरबराबरी को मिटाने के लिए गांधी जी ने ट्रस्टीशिप का उल्लेख किया है. वस्तुतः यह भी समानुभूति का ही एक रूप है. उन्होंने लिखा है कि “आर्थिक समानता की जड़ में धनिक का ट्रस्टीपन निहित है. इस आदर्श के अनुसार धनिक को अपने पड़ोसी से एक कौड़ी भी ज्यादा रखने का अधिकार नहीं है. तब उसके पास जो ज्यादा है, क्या वह उससे छीन लिया जाए? ऐसा करने के लिए हिंसा का आश्रय लेना पड़ेगा. और हिंसा के द्वारा ऐसा करना संभव हो, तो भी समाज को उससे कुछ फायदा होने वाला नहीं है. क्योंकि द्रव्य इकठ्ठा करने की शक्ति रखने वाले एक आदमी की शक्ति को समाज खो बैठेगा. इसलिए अहिंसक मार्ग यह हुआ कि जितनी मान्य हो सके, उतनी अपनी आवश्यकतायें पूरी करने के बाद जो पैसा बाकी बचे उसका वह प्रजा की और से ट्रस्टी बन जाए. अगर वह प्रामाणिकता से संरक्षक बनेगा तो जो पैसा पैदा करेगा, उसका सद्व्यय भी करेगा. वह खुद को समाज का सेवक मानेगा, समाज की खातिर कमाएगा, समाज कल्याण के लिए खर्च करेगा, तब उसकी कमाई में शुद्धता आएगी. उसके साहस में अहिंसा भी होगी’.

गांधी जी मानते हैं “ऐसा प्रश्न हो सकता है कि मनुष्य स्वभाव में ऐसे किसी परिवर्तन का उल्लेख इतिहास में कहीं देखा गया है”? व्यक्तियों में तो ऐसा परिवर्तन हुआ है. सवाल का दूसरा इसका अर्थ यह भी है कि व्यापक अहिंसा का प्रयोग आज तक नहीं किया गया है. मनुष्य को अपनी हिंसक शक्ति का भान है क्योंकि वह उसे लाखों वर्षों से विरासत में मिली हुई है. जब उसे चार पैर की जगह दो पैर और दो हाथ वाले प्राणी का आकार मिला, तब उसमें अहिंसक शक्ति भी आई.
उल्लेखनीय है कि पूंजीपति वर्ग को ट्रस्टीशिप की अवधारणा नहीं सुहाती है. इसका प्रमाण पर गौर करिये - महादेवभाई और किशोरीलाल जी ने ट्रस्टीशिप पर एक आधार पत्र तैयार किया. गांधी जी ने इस पर अपनी सहमति दे दी. यह आधारपत्र बिड़ला जी के पास भेजा गया ताकि वे देश के व्यापारियों और पूंजीपतियों के सामने इसे प्रस्तुत करते और ट्रस्टीशिप की सोच को व्यवहार में लाने की पहल करते. इसे लेकर प्यारेलाल जी ने दि लास्ट फेज़ में लिखा है कि ट्रस्टीशिप के आधारपत्र का क्या हुआ, यह किसी को पता नहीं. इसका अर्थ हुआ कि यह बात सम्पत्तिवानों को मंज़ूर नहीं हुई.
गांधी जी ने यह स्पष्ट तौर पर माना कि

भारत जाति, वर्ग और व्यवस्था के भ्रष्ट आचरण के कारण चुनौतियों में फंसा है. जमीन पर किसान और मजदूरों का ही सबसे पहला हक़ होता है, उनके परिश्रम से ही पृथ्वी फलप्रसु और समृद्ध हुई है. जमीन जमींदारों की नहीं होती. अहिंसक पद्धति में मजदूर और किसान पूंजीपति से बलपूर्वक जमीन नहीं छीन सकते. किसानों और मजदूरों को इस तरह काम करना चाहिए कि जमींदारों के लिए उनका शोषण करना असंभव हो जाए. उनमें आपस में घनिष्ट सहकार होना जरूरी है, शिक्षा हासिल करना जरूरी है. अगर विधान सभाएं किसानों के हितों की रक्षा करने में असमर्थ सिद्ध होती हैं, तो किसानों के पास सविनय अवज्ञा और असहयोग का अचूक इलाज़ हमेशा होगा ही.
न्याय का हक़ जीवन की अनिवार्यता है. यह अनुभव दुखद है कि आज प्रतीत हो रहा है कि राज्य का स्वभाव वंचितों को न्याय से वंचित रखने का है और हमारी भूमिका यह है कि फिर भी हिंसा और असहिष्णुता पैदा नहीं होने देना चाहिए. इसके बहुत गहरे दुष्प्रभाव होते हैं. गांधी जी का विचार मुख्य रूप से अनुभूति और समानुभूति के औज़ार से बदलाव को तराशने की कोशिश करता है. मौजूदा राजनीति मज़हबी ध्रुवीकरण यानी हिन्दू-मुस्लिम या जाति आधारित ध्रुवीकरण की धुरी पर घूम रही है. कट्टरता और राजनीतिक अंधविश्वास राष्ट्र व समाज के हितों को कैद कर चुका है. यह ध्रुवीकरण पिछले 5-10 सालों में रचा गया हो ऐसा भी नहीं है.

हरिजन सेवक में 26 अक्टूबर 1947 को गांधी जी की महत्वपूर्ण टिप्पणी है. वे लिखते हैं कि “हमारे देश की बदकिस्मती से हिंदुस्तान और पाकिस्तान नाम के जो दो टुकड़े हुए हैं, उसमें धर्म को ही कारण बनाया गया है. यह सवाल कई बार पूछा गया है कि दोनों के बीच लड़ाई होने पर क्या पाकिस्तान के हिन्दू हिंदुस्तान के हिन्दुओं के साथ और हिंदुस्तान के मुसलमान पाकिस्तान के मुसलमानों के साथ लड़ेंगे?” प्रतिबद्धताएं और राष्ट्र प्रेम की भावना व्यक्ति के मन के खेतों में बोई जाती है और वहीँ उसकी फसल पकती है. सवाल यह है कि मन के खेतों में हम बोते क्या हैं-आपसी प्रेम, सद्भाव या हिंसा? दिल्ली डायरी में उन्होंने लिखा कि “अगर लड़ाई छिड जाए, तो पाकिस्तान के हिन्दू वहां पांचवी कतार वाले नहीं बन सकते. कोई भी इसे बर्दाश्त नहीं करेगा. अगर वे पाकिस्तान के प्रति वफादार नहीं है, तो उनको पाकिस्तान छोड़ देना चाहिए. इसी तरह जो मुसलमान पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं, उन्हें हिन्दुस्तानी संघ में नहीं रहना चहिए. सरकार का फ़र्ज़ है कि वह हिन्दुओं और सिक्खों के लिए इन्साफ हासिल करे. मुसलमान लोग यह कहते सुने जाते हैं कि हंस के लिया पाकिस्तान, लड़ के लेंगे हिंदुस्तान. कुछ मुसलमान सारे हिंदुस्तान को मुसलमान बनाने की बात सोच रहे हैं. यह काम लड़ाई के जरिये कभी नहीं हो सकेगा. पाकिस्तान हिन्दू धर्म को कभी बर्बाद नहीं कर सकेगा. सिर्फ हिन्दू ही अपने आपको और अपने धर्म को बर्बाद कर सकते हैं. इसी तरह अगर पाकिस्तान बर्बाद हुआ, तो वह पाकिस्तान के मुसलमानों द्वारा ही बर्बाद होगा, हिंदुस्तान के हिन्दुओं द्वारा नहीं”. इस टकराव को समाप्त करने का एकमात्र रास्ता उन्हें इन्सानियत में ही दिखाई दिया. उन्होंने कहा कि

अगर हिंदुस्तान से हर एक मुसलमान को भगाने और पाकिस्तान से हर एक हिन्दू और सिक्ख को भगाने की नीति अपनाई जाती है, तो इससे दोनों देश और दोनों में इस्लाम और हिन्दू धर्म बर्बाद हो जायेंगे। भलाई सिर्फ भलाई से ही पैदा होती है, प्यार से प्यार पैदा होता है.


आधुनिक भारत में समानुभूति का व्यवहार करने वालों में महात्मा गांधी को केन्द्रीय स्थान देना इसलिए जरूरी है क्योंकि उन्होंने इसे ही अपने जीवन का आधार बनाया. उनके लिए समानुभूति महज़ एक सिद्धांत या चर्चा का विषय भर नहीं रहा. वर्ष 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आने के बाद मोहनदास करमचंद गांधी ब्रिटिश उपनिवेशवाद से भारत को आज़ाद करने के लिए आन्दोलन चलाना चाहते थे. उनका शुरू से ही यह विश्वास था कि यदि आज़ादी का राष्ट्रीय आन्दोलन स्थापित करना है तो सबसे पहले यह जानना, समझना, महसूस करना होगा कि भारत के लोगों, खासकर गरीबों और गाँव के लोगों का जीवन कैसा है? इसके लिए भारत के कोने-कोने को छूना होगा, वहां रहना होगा, उनकी बात सुनना होगी और हर उस पल को स्वयं में उतार लेना होगा. इसके लिए उन्होंने सबसे पहले अपनी वेशभूषा को बदला और धोती धारण की. जिनसे जुड़ना था, उनसे जुड़ने के लिए वेशभूषा और शरीर के भाव बदलने भी जरूरी थे ताकि भारत के आम लोग उनसे संवाद करने को तैयार हों.

समानुभूति का तत्व अपने भीतर उतारने के लिए एक अहम् काम होता है, उनके जैसा जीवन जीना, जिनसे जुड़ना है. यही गांधी जी ने भी किया. साबरमती आश्रम की व्यवस्था बताती है कि उन्होंने किसान, मजदूर, पशुपालक, शिक्षक, बुनकर, चिकित्सक, सफाईकर्मी, चर्मकार, दर्जी आदि की भूमिकाएं निभाए, भोजन का उत्पादन किया, कपड़े तैयार किए. समानुभूति का व्यवहार उन्होंने प्रयोगधर्मिता के तहत नहीं किया, जीवन शैली के रूप किया. इस देश की जाति आधारित व्यवस्था, ख़ास तौर पर दलितों और उनमें भी मानव मल ढ़ोने वाले समुदाय को गरिमापूर्ण स्थान दिलाने के लिए उन्होंने शुरुआत अपनी सदइच्छा व्यक्त करके या व्याख्यान देकर नहीं, बल्कि खुद पाखाना/मैला साफ़ करना शुरू करके की. पीड़ा को दूर करने के लिए पीड़ा को सहकर महसूस करना ही समानुभूति का सबसे प्रभावी तत्व है. हिंदुस्तान के हिन्दू-मुस्लिम धर्म के आधार पर बंटवारे और साम्प्रदायिक हिंसा की पीड़ा को उन्होंने यह कह कर अभिव्यक्त किया – “मैं एक मुसलमान हूँ, और एक हिन्दू, एक ईसाई और एक यहूदी और वह सबकुछ हूँ, जो आप सब हैं!” अपने आप में यह एक बहुत गहरा समानुभूतिक वक्तव्य है. अगर हम खुद को बदल सकें, तो दुनिया में प्रवृत्ति भी बदल जाएगी. जैसे-जैसे आदमी अपना स्वभाव बदलता है, वैसे-वैसे उसके प्रति दुनिया का नजरिया भी बदलता जाता है. हमें यह देखने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए कि दूसरे क्या करते हैं."
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: May 9, 2021, 2:09 PM IST
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