संविधान की विकास गाथा: वर्तमान भारत में क्रान्ति की संभावना

हमारे संविधान (Constitution) के मुताबिक़ सामाजिक और राजनीतिक न्याय मूल अधिकार (Fundamental Rights) हैं और न्यायलय में प्रवर्तनीय हैं, किन्तु आर्थिक न्याय (Economic Justice) और आर्थिक लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान (नीति निदेशक तत्व) न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: September 13, 2020, 5:12 PM IST
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संविधान की विकास गाथा: वर्तमान भारत में क्रान्ति की संभावना
हमारे संविधान के मुताबिक़ सामाजिक और राजनीतिक न्याय मूल अधिकार हैं
अब यह माना जा सकता है कि भारत में सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों (Social and Political Rights) को सम्पूर्ण बनाने के लिए आर्थिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्य (Constitutional Values) आधारित अर्थव्यवस्था (Economy) का निर्माण करने के लिए किये गए प्रावधानों को लागू करने के लिए लिए “राज्य” को बाध्य बनाया जाना चाहिए था. संविधान (Constitution) में लिखे गए नीति निदेशक तत्वों की राज्य द्वारा की गयी उपेक्षा का परिणाम यह हुआ है कि भारत पूरी तरह से उपनिवेशवाद (colonialism) से मुक्त नहीं हो पाया और भीतरी परतंत्रता बनी रही. समाज में तार्किक-वैज्ञानिक सोच भी विकसित नहीं हो पायी. इसका लाभ उठाकर राजनैतिक दलों ने जातिवाद (Casteism) और साम्प्रदायिकता (Communalism) को सामजिक व्यवस्था के उच्चतम शिखर पर बिठा दिया.

हमारे संविधान के मुताबिक़ सामाजिक और राजनीतिक न्याय मूल अधिकार (Fundamental Rights) हैं और न्यायलय में प्रवर्तनीय हैं, किन्तु आर्थिक न्याय (Economic Justice) और आर्थिक लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान (नीति निदेशक तत्व) न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं हैं. यानी यदि किसी गर्भवती महिला को प्रसूति लाभ (Maternity Benefit) न मिले, तो वह अदालत में मातृत्व हक़ की मांग नहीं कर सकती है. किसान को यदि उसकी फसल की सही कीमत न मिले तो, वह अदालत (Court) से न्याय (Justice) की उम्मीद नहीं कर सकता है. ऐसे विषय जब भी अदालत में लाये जाते हैं, तब अदालत उनमें यह कह कर दखल देने से इनकार कर देती है कि यह नीतिगत मामला है और हम इसमें दखल नहीं दे सकते!

संविधान लागू होने के 7 दशक बाद यह साफ़ नज़र आने लगा है कि भारतीय नागरिक समाज ने अपने राजनीतिक निर्णय तय करते समय आर्थिक न्याय, आर्थिक समानता और संसाधनों के जवाबदेय उपयोग जैसे विषयों को नज़र अंदाज़ किया है. एकतरफ तो इसके कारण से समाजवाद की अवधारणा कमज़ोर हुई, तो वहीं दूरी तरफ भारतीय व्यवस्था पूंजीवाद की तरफ अग्रसर हुई. आज राज्य जिस तरह से नीति बना कर और संवैधानिक सिद्धांतों की उपेक्षा करके प्रकृति संसाधनों पर निजी एकाधिकार को स्थापित कर रहा है, उससे भारत का भविष्य गहरे अन्धकार की तरफ बढ़ रहा है. पानी, जमीन, जंगलों पर निजी प्रभुत्व को बढ़ावा देने के साथ ही राज्य राजकीय संसाधनों (मसलन रेल, विमानपत्तन, बीमा, बैंक आदि) का भी निजीकरण कर रहा रहा है, उससे यह साफ़ संकेत मिलते हैं कि राज्य के लिए न तो नागरिक हित महत्वपूर्ण हैं, न ही पर्यावर्णीय और नागरिक हित; वह आर्थिक विकास के नाम पर जन-समाज से युद्ध की भूमिका में नज़र आता है.
वास्तव में नीति निदेशक तत्वों के विषय में भी राज्य को बाध्य किया जाना चाहिए था और ये तत्व न्यायलय में प्रवर्तनीय होने चाहिए थे क्योंकि इन तत्वों के उल्लंघन से मौलिक अधिकारों का उल्लंघन सीधे जुड़ा हुआ है. मसलन नीति निदेशक तत्वों में उल्लेख है कि पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से पर्याप्त आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार है; किन्तु 70 वर्ष गुज़र जाने के बाद ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि स्त्रियों के लिए आजीविका के अवसर जुटाने के लिए मातृत्व अधिकारों की जरूरत होती है, जिन्हें भारत की सरकारों ने कभी भी गंभीरता से नहीं लिया.
इन्ही नीति निदेशक तत्वों में उल्लेख है कि राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिए उपबंध करेगा. इस विषय पर भी भारतीय राज्य व्यवस्था बनाने के लिए बाध्य नहीं रहा. इसके कारण एक तरफ तो महिलाओं के जीवन का अधिकार सीमित हुआ, वहीँ भारत में मातृत्व मृत्यु और नवजात शिशु मृत्यु दर का स्तर दुनिया में बहुत ऊंचा बना रहा. यदि स्त्री-पुरुषों को आजीविका के समान अवसर उपलब्ध कराने की बाध्यता होती तो महिलाओं के मातृत्व अधिकारों को भी मौलिक अधिकार माना जाता.

बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय ने अलग अलग समय पर मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों की परस्पर सम्बद्धता को परिभाषित किया है. वर्ष 1992 में मोहिनी देवी बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य के मामले में शिक्षा के अधिकार को (जो उस वक्त नीति निदेशक तत्वों में शामिल था) अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना. इसके पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा था कि “राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों को मौलिक अधिकारों के अध्याय के अनुरूप और उसके सहायक के रूप में होना होगा; फिर भी किसी व्यक्ति या उसकी ओर से किसी व्यक्ति या उसकी ओर से प्रस्तुत मौलिक अधिकारों के विस्तार और सीमा पर भरोसा करने के मामले में न्यायालय राज्य के इन निर्देशक सिद्धांतों की पूरी तरह से अवहेलना नहीं कर सकता बल्कि उसे सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत को अपनाना चाहिए और दोनों को यथासंभव प्रभाव देने का प्रयास करना चाहिए”. इसका आशय यह है कि यदि न्यायपालिका सचमुच कार्यपालिका से पृथक हो (यानी सरकार के दबाव-प्रभाव से मुक्त हो) तो अबाध्यकारी होने के बावजूद ये सिद्धांत सजीव रूप ले सकते हैं.

लेकिन समय के गुजरने की साथ साथ ये सिद्धांत कमज़ोर कर दिए गए. एक तरफ तो सरकार यह दावा करती है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. दुनिया में सबसे बड़ी मूर्तियों का निर्माण भारत में हो रहा है. सबसे तेज़ गति से प्राकृतिक संसाधनों का शोषणणात्मक तरीके से दोहन हो रहा है, लेकिन यहाँ श्रमिक और सरकारी अफसर के पारिश्रमिक में न केवल 40 गुने का अंतर है, बल्कि मजदूर के रोज़गार मिलने में पूरी तरह अनिश्चितता है, उसे स्वास्थ्य और आराम का अधिकार नहीं है. एकतरफ तो नागरिक के शोषण-छुआछूत के विरुद्ध अधिकार, रोज़गार में समानता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया है, यानी इन अधिकारों की सुरक्षा के लिए कोई भी नागरिक अदालत की शरण में जा सकता है, किन्तु “राज्य विधान, आर्थिक संगठन द्वारा या किसी ने तरीके से सभी कर्मकारों को काम, निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवनस्तर और अवकाश का सम्पूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएं तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा, सरीखा विषय नीति निदेशक तत्वों में शुमार किया गया है. यही कारण है कि आज भी भारत की सरकारें असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले 40 करोड़ लोगों के लिए “न्यूनतम मजदूरी” की नीति बनाती हैं “निर्वाह मजदूरी” की नहीं; क्योंकि वे आर्थिक न्याय के लिए बाध्य नहीं हैं. मौजूदा न्यूनतम मजदूरी की अवधारणा अपने आप में प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण (जीवन जीने का अधिकार) के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है.
इसी तरह कृषि और पशुपालन के संरक्षण के लिए जनपक्षीय नीतियां बनाने से राज्य को गुरेज़ रहा है. 5 दशकों से ज्यादा समय से जारी कृषि उपज की न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति इस बात की उदाहरण है कि भारत में उत्पादकों को उनकी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिलता है और सरकार ने ऐसी नीतियां कभी नहीं बनायी, जिनके माध्यम से किसानों-पशुपालकों को उनकी उपज का खुले बाज़ार में “उचित मूल्य” मिलता रहे.

इन प्रावधानों के बनते समय ही 19 नवम्बर 1948 को दामोदर स्वरुप सेठ ने संविधान सभा में कहा था कि हम जिस समाज में रह रहे हैं, उसकी व्यवस्था और स्वरुप पूंजीवाद पर आश्रित है. समाज में हम शोषक और शोषित वर्गों को साथ-साथ उपस्थित देखते हैं. शोषक वर्ग मज़े में है और शोषित वर्ग दबा और पिसा हुआ है. हम जनसमूह और मजदूरों का वास्तविक कल्याण तब तक नहीं कर सकते हैं, जब तक उत्पादन, संचार, साख, विनिमय, खनिज पदार्थ, प्राकृतिक शक्ति और अन्य आर्थिक उद्योग धंधे समाज के नियंत्रण में रखे जाने का समय आ जाएगा.

इसी दिन हुसैन इमाम ने कहा कि हम सामाजिकीकरण की बात कर रहे हैं, किन्तु इसमें उसके लिए व्यवस्था तो है ही नहीं. उदाहरण के लिए भूमि का राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया. साथ ही नीति निदेशक तत्वों में यह भी कहीं उल्लेख नहीं है कि राजनीतिक दलों द्वारा भी इन तत्वों का अनुसरण किया जाना चाहिए. जिस रूप में ये सिद्धांत रखे गए हैं, उससे केवल यही अर्थ निकलता है कि यदि जनता और शासन व्यवस्था दोनों भली हैं, तो इन तत्वों का पालन कर लिया जाएगा”. जब नीति निदेशक तत्वों पर बहस हो रही थी तब डा. अम्बेडकर से कहा गया कि क्या वे कोई ऐसी विधि बताने की कृपा करेंगे, जिसके द्वारा राज्य के शासनों को निदेशक तत्वों का उल्लंघन करने से रोका जा सकेगा.

भारत के संविधान का मसौदा बनाने की जिम्मेदारी हासिल करने से पहले डा. बी. आर. अम्बेडकर ने खुद कहा था कि संविधान में इन सिद्धांतों को मौलिक अधिकार के रूप में रखना चाहिए और ऐसी योजना को दस वर्ष के अन्दर कार्यरूप दे दिया जाना चाहिए, लेकिन जब वे मसौदा बना रहे थे, तब उनका तर्क था कि समाज को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने के लिए, चुनावी प्रक्रिया में जनमत को विचारपूर्ण बनाने के लिए नीति निदेशक तत्वों को न्यायालय में प्रवर्तनीय बना कर राज्य के लिए बाध्यकारी नहीं किया जाना चाहिए. उनका मानना था कि यदि कोई राजनैतिक दल और उसकी सरकार इन तत्वों पर ठोस पहल नहीं करेगी तो भारत के लोग उसके विरोध में मत देकर पद से हटा देंगे. इससे राजनीतिक दलों में इन तत्वों का पालन करने की चेतना बनी रहेगी. उनका मानना था कि संसदीय प्रजातंत्र में एक व्यक्ति, एक मत की व्यवस्था है. इसके लिए जरूरी होगा कि मतदाताओं को व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से शासन का काम आंकने का अवसर दिया जाए, इससे शासन आलोचना के शिकंजे में रहेगा. इससे राजनीतिक व्यवस्था में किसी विशेष जनसमाज का स्थाई एकाधिपत्य भी स्थापित नहीं होगा”. लेकिन इस विचार को लागू करने के लिए संवैधानिक समाज के निर्माण की पहल करने की जरूरत थी, जनता को नागरिक बनाए जाने के लिए नागरिकता निर्माण पाठ्यक्रम की जरूरत थी, जिसकी पूरी तरह से उपेक्षा की गई.

वास्तव में भारत को आज फिर एक नए अहिंसक आन्दोलन की, नई अहिंसक क्रान्ति की जरूरत है. यह क्रान्ति है नीति निदेशक तत्वों को बाध्यकारी बनाने की. यदि संविधान के चौथे भाग को अनिवार्य और न्यायालय में प्रवर्तनीय बना दिया जाए, तो भारत में संविधान आधारित नए मूलभूत बदलाव का सूत्रपात होगा.
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: September 13, 2020, 5:12 PM IST
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