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आदिवासी और संविधान -2: क्या संविधान सभा ने आदिवासी अस्मिता के सवाल के साथ न्याय किया?

यह एक सच है कि भारत ने आज़ादी के आंदोलन और आज़ादी के समय साम्प्रदायिकता और छुआछूत-जातिगत शोषण की व्यवस्था...

Source: News18Hindi Last updated on: April 6, 2020, 4:34 PM IST
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आदिवासी और संविधान -2: क्या संविधान सभा ने आदिवासी अस्मिता के सवाल के साथ न्याय किया?
संविधान की विकास गाथा.
यह एक सच है कि भारत ने आज़ादी के आंदोलन और आज़ादी के समय साम्प्रदायिकता और छुआछूत-जातिगत शोषण की व्यवस्था के विषय पर बहस चरम पर थी, इन पर राजनीतिक चेतना भी ऊंचे मुकाम पर थी. इसके दूसरी तरफ भारत में आदिवासियों के हकों और अस्मिता के सवाल पर तुलनात्मक रूप से बहुत कम बहस और कम पहल हुई. दलित समुदाय, छुआछूत और जाति के विषय पर बहस गंभीर थी, और उसी में थोड़ा स्थान आदिवासी विषय को दिया गया. संविधान सभा में इस आदिवासी समुदाय के अधिकारों पर प्रावधान और व्यवस्था बनाने का काम अल्पसंख्यकों के अधिकारों की उप-समिति के द्वारा करना तय हुआ था. इस समिति ने अल्पसंख्यकों को तीन भागों में बांटा था –

कक्षा अ – भारतीय संघ में रियासतों को छोड़कर आधे प्रतिशत के कम आबादी वाले यानी एंग्लो इंडियन, पारसी और आसाम के मैदानों में रहने वाले कबीले; कक्षा ई – वे जिनकी आबादी डेढ़ प्रतिशत से अधिक नहीं है यानी भारतीय ईसाई और सिख और कक्षा उ – वे जिनकी आबादी डेढ़ प्रतिशत से अधिक है यानी  मुसलमान और परिगणित जातियां;

आज़ादी का आन्दोलन और आदिवासियों के साथ राजनीतिक भेदभाव

आदिवासी प्रतिनिधि सजग थे कि किसी भी तरह की ख़ास तमगे वाली पहचान, मसलन अल्पसंख्यक घोषित होना, आदिवासियों के मूलनिवासी होने की पहचान पर आने वाले समय में एक प्रश्न चिन्ह लगाती रहेगी. संविधान निर्माण की प्रक्रिया के दौरान दलित और आदिवासियों को परिगणित जातियों की कक्षा में शामिल किया गया. आदिवासी समुदाय को अल्पसंख्यक के श्रेणी में रखे जाने आदिवासी नेता सहमत नहीं थे. उनकी बुनियादी मान्यता यह थी कि आदिवासी भारत के मूलनिवासी हैं और किसी भी अन्य समुदाय से पहले से भारत भूमि पर निवास करते आये हैं. उन्हें एक अलग श्रेणी में रखे जाना गलत नीति है क्योंकि इससे यह मान्यता स्थापित हो जायेगी कि आदिवासी भारत में हाल की कुछ सदियों में आकार बसे हुए समुदाय हैं और इस आधार पर उनके साथ दोयम दर्जे का सलूक होने लगेगा. जयपाल सिंह ने 24 अगस्त 1949 को कहा कि “मैं पहले ही कह चुका हूं कि यदि किन्हें लोगों को भारत में राज करने का अधिकार है, तो आदिवासियों को ही है. वे प्रथम श्रेणी के भारतीय हैं और अन्य लोग दूसरी, तीसरी, चौथी अथवा किसी अन्य श्रेणी की भारतीय हैं”. मूलनिवासी होने के कारण उनका दावा बिलकुल उचित भी था. चूंकि वे भेदभाव की राजनीति को समझ चुके थे, इसलिए वे शासन व्यवस्था में आदिवासियों की मूल पहचान बरकरार रखने की कोशिश कर रहे थे.
उन्हें संविधान सभा में आदिवासी मसलों पर की जा रही बहसों में आदिवासियों को लाचार समूह के रूप में पेश किये जाने से आपत्ति थी. उन्होंने कहा भी कि “हम किसी प्रकार की भीख नहीं मांग रहे हैं, बहुसंख्यक समुदाय ने पिछले छः हज़ार वर्षों में जो पाप किये हैं, उनके लिए उसे प्रायश्चित करना चाहिए. इसका निर्णय वे करें कि भूतपूर्व शासकों ने इस देश के आदिवासियों के साथ न्याय किया या नहीं?” आक्सफोर्ड विश्वविध्यालय में अर्थशास्त्र पढ़कर आने वाले जयपाल सिंह संविधान सभा में निर्दलीय सदस्य के रूप में बिहार से चुन कर आये थे. उनका कहना था कि “वास्तव में तत्कालीन राजनीति में कांग्रेस ने भी आदिवासियों को नेतृत्व का अवसर प्रदान नहीं किया. बिहार में आदिवासियों की जनसँख्या 41 लाख थी, लेकिन वहां की विधान सभा में केवल 7 आदिवासी सदस्य चुने गए. कांग्रेस ने भी सामान्य स्थान से किसी आदिवासी को चुनाव लड़ने के लिए खड़ा नहीं किया. मध्यप्रांत और बरार में 29 लाख की आदिवासी जनसँख्या होने के बावजूद उनके लिए केवल एक स्थान रखा गया. आदिवासी नेतृत्व का यह अनुभव था कि आज लोकतंत्र की बात की जा रही है किन्तु आदिवासियों को जंगलों से निकाल कर विधान मंडल में स्थान नहीं दिया जा रहा है.

आर्यों ने आदिवासियों को बेदखल किया

आदिवासी मानते हैं कि जंगल और प्रकृति तो पहले सब जगह थी. पहले के समय में जंगल आज की तरह कोई वर्गीकृत क्षेत्र नहीं था. आदिवासी भी समतल इलाकों में रहते थे, किन्तु आर्यों के हमलों के कारण उन्हें अपने लिए नए ठिकाने खोजने पड़े. संविधान की रचना के दौरान यह बात बहुत स्पष्ट रूप से सभा में दर्ज की गई कि इस देश की भूमि पर रहने वाले प्राचीन लोगों और नए आगंतुकों के बीच संघर्ष भी हुए हैं. आर्य चूंकि आक्रांत (आक्रमण करके कब्ज़ा करने वाले) थे, इसलिए प्राचीन लोगों ने उनका स्वागत नहीं किया. आर्यों ने आदिवासियों को दूर के स्थानों पर भगा दिया. आर्य गंगा के उपजाऊ मैदानों में बस गए, इसलिए आदिवासियों को जंगल में जाकर रहना पड़ा. आर्य पहाड़ों में जाकर नहीं बस सकते थे, इसलिए आदिवासी पहाड़ों में रहने लगे. जयपाल सिंह ने कहा कि “नए आगंतुकों ने सीधे-सादे अनजान आदिवासियों का सदैव शोषण किया, उन्होंने उनकी भूमि लूट ली, उनके अधिकार छीन लिए और उनके स्वछंद जीवन यापन करने के उनके स्वातंत्र्य का अपहरण कर लिया. यह स्वाभाविक ही है कि आदिवासियों को ये सब बातें नापसंद हैं. हज़ारों वर्षों से वे जिस कटुता का सामना करते रहे हैं, उसका अंत होना चाहिए.....भारत में हर विद्रोही को साम्यवादी कहने की प्रथा चल पड़ी है. हममे से जो लोग यह कहते हैं कि आदिवासियों को संरक्षण मिलना चाहिए, उन्हें पृथक्करणवादी कहा जाता है. किसी को आदिवासियों से यह कहने का मुंह नहीं है कि लोकतंत्र क्या है? आदिवासी समाज सबसे अधि़क लोकतंत्रात्मक है. क्या भारत के अन्य समाज भी यही कह सकते हैं? क्या वे लोग जो शताब्दियों से वर्ण व्यवस्था के अधीन रहे हैं, ईमानदारी से यह कह सकते हैं कि उनका दृष्टिकोण लोकतंत्रात्मक है? आदिवासी में सब समान हैं, चाहे वे धनी हों या निर्धन! आदिवासी सबसे प्राचीन लोकतंत्र प्रेमी हैं और वे भारत की प्रतिष्ठा अथवा शक्ति को किसी प्रकार से कम न होने देंगे. देश के विभाजन के लिए वे लोग उत्तरदायी नहीं है”. संविधान सभा के बहस के अध्ययन से पता चलता है कि तब भी आर्यों या हिंदूवादी राजनीति की मुखलफत करने वालो को साम्यवादी या अलगाववादी करार दिया जाता था, जैसे कि आज किया जाता है.अल्पसंख्यक कहे जाने का विरोध किया आदिवासी प्रतिनिधियों ने

असमानता की खाई इतनी गहरी हो चुकी है, कि इसे विशेष संवैधानिक प्रावधान किये, पाटा भी नहीं जा सकता है. ये खाई केवल आर्थिक गरीबी के कारण नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के प्रति सांस्कृतिक-सामाजिक-सामन्ती भावना के कारण भी गहरी हुई है. इस विषय पर संविधान सभा के सदस्य जयपाल सिंह ने 27 अगस्त 1947 को सभा में कहा कि “मैं भी परामर्श समिति का सदस्य हूँ किन्तु अभी अपने साथियों को रिपोर्ट के लिए बधाई देने के लिए खडा नहीं हुआ हूँ. हम संख्या की दृष्टि से अल्पसंख्यक हैं; इस बात को सामने रखकर हम यहाँ व्यवहार नहीं कर रहे हैं. हिंदुओं या मुसलामानों से हम कम हैं अथवा पारसियों से अधिक, हमारी इस स्थिति का इस बात से कोई सम्बन्ध नहीं. हमारा पक्ष तो इस बात पर निर्भर है कि हमारे और जाति के अन्य लोगों के सामाजिक, आर्थिक और शिक्षा स्तरों में जमीन और आसमान का फर्क है. और यह संविधान द्वारा लगाई गई किसी विशेष शर्त द्वारा ही संभव हो सकता है कि हम लोगों को साधारण जनता के तल तक लाया जा सके. मेरे विचार में आदिस्वामी अल्पसंख्यक नहीं हैं. मेरा तो हमेशा से ही यह ख्याल रहा है कि वे लोग जो देश के आदिस्वामी थे उनकी संख्या चाहे कितनी ही थोड़ी क्यों न हो कभी भी अल्पसंख्यक नहीं समझे जा सकते. उन्हें ये अधिकार परम्परा से प्राप्त हुआ हुये हैं और संसार में कोई भी उनसे ये छीन नहीं सकता. हम इस समय परम्परा से प्राप्त इन अधिकारों की मांग नहीं कर रहे हैं. हम तो दूसरे लोगों से जो व्यवहार होता है उसकी ही मांग करते हैं. भूतकाल में हमे इस तरह अलग-अलग रखा गया था मानों कि हम किसी चिड़ियाघर में रहते हों. इसके लिए मुझे बड़े राजनैतिक दलों, अंग्रेजी सरकार और प्रत्येक शिक्षित भारतीय को धन्यवाद देना है.

ऐतिहासिक भेदभाव हुआ आदिवासियों के साथ

जयपाल सिंह ने कहा कि भूतकाल में हमारे प्रति सब लोगों का इस प्रकार का व्यवहार रहा है. हमारा कहना तो यह है कि आपको हमारे साथ मिलना ही होगा और हम भी आपके साथ मिलने के लिये तैयार हैं. इसी कारण से तो हमने धारासभाओं में स्थानों की सुरक्षा के लिये जोर लगाया है ताकि हम आपको अपने समीप आने के लिए बाध्य कर सकें और स्वयं अवश्य ही आपके समीप आवें. हमने पृथक निर्वाचन की कभी मांग नहीं की और वस्तुतः हमें यह कभी प्राप्त भी नहीं हुआ. केवल आदिवासियों के एक छोटे से अंग को जो कि अन्य मतों को और विशेषकर पाश्चात्य ईसाई धर्म को अपना चुका था, पृथक निर्वाचन प्राप्त हुआ था. परन्तु इनकी बहुत बड़ी संख्या, जहां कहीं पर भी उन्हें मत देने का अधिकार प्राप्त हुआ था, साधारण निर्वाचन के ही मातहत थी. हां, उनके लिये स्थान सुरक्षित कर दिये गये थे. अतः जहां तक आदिवासियों का संबंध है, कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ. परन्तु आंकड़ों की दृष्टि से एक बहुत बड़ा परिवर्तन हो चुका है.

यह समाज बेहद उपेक्षा और सामाजिक-राजनीतिक बहिष्कार का शिकार हुआ, या कहें कि षड्यंत्रों का. भारत में जब ब्रिटिश साम्राज्य के तहत चुनाव हुए, तब भी आदिवासियों कि उनकी संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं मिला. जयपाल सिंह ने सभा को बताया कि “सन् 1935 के एक्ट के अनुसार भारत की सारी प्रांतीय धारासभाओं (यानी राज्यों में) के 1585 सदस्यों में से आदिवासियों के केवल 24 सदस्य ही थे और केन्द्र में तो एक भी उनका सदस्य न था. अब वयस्क मताधिकार विधि के अनुसार, जो प्रत्येक लाख आबादी के पीछे एक सदस्य भेजने का अधिकार देती है, हमारी स्थिति में बड़ा भारी फर्क पड़ जायेगा. अब यह गिनती पहले से दस गुना होगी. जब मैं भारतीय भारत का जिक्र करता हूं, तो क्या मैं देशी रियासतों से भी यह निवेदन कर सकता हूं. देशी रियासतों में आदिवासियों को कहीं थोड़ा-सा भी प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं. मैं आशा करता हूँ,  भारतीय भारत के भाव वहां पर भी उचित रूप से प्रवेश कर जायेंगे”.

सभा में यह बात कही गई कि परिगणित जातियों के लिए नियुक्तियों में आरक्षण की बात कही गई, किन्तु आदिवासियों को इस मामले में भुला ही दिया गया. इस विषय पर जयपाल सिंह और पं. गोविन्द वल्लभ पन्त के बीच नोक-झोंक भी हुई. किसी के द्वारा यह कहे जाने पर कि अल्पसंख्यक और कबाइली विदेशियों का मुंह ताकते हैं, जयपाल सिंह ने कहा कि “हम विदेशियों का नहीं देशवासियों का मुंह ताकते हैं. हम विदेश नहीं गए, हम बातचीत करने लन्दन नहीं गए. हम मंत्रिमंडल मिशन के आपस भी नहीं गए. हम केवल अपने देशवासियों की ओर देखते हैं कि वह हमसे समुचित और न्यायमुक्त व्यवहार करें. गत छः हजार वर्षों से हमारे साथ भद्दा व्यवहार किया जा रहा है. सलाहकार समिति में किसी आदिवासी महिला सदस्य का नाम नहीं है”. यह महत्वपूर्ण बिंदु है कि आदिवासी समुदाय के मन में यह बात बहुत गहरे तक जमी हुई है कि मूल निवासियों के साथ आर्यों ने बुरा बर्ताव किया, उनसे उनके संसाधन तो छीने ही, साथ में उन्हें असभ्य साबित करते हुए उनकी पारंपरिक व्यवस्थाओं का अपमान किया.

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह लेखक के निजी विचार हैं)
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ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: April 6, 2020, 4:34 PM IST
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