गांधी का संविधान – 2: किस तरह का संविधान चाहते थे महात्मा गांधी?

महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने कुछ प्रयोग करने के जोखिम उठाये हैं, उनके परिणाम हमारे जीवन को सही पगडण्डी पर लाने में मदद कर सकते हैं. गांधी जी के रहते हुए ही यह कहा जाने लगा था कि वे आदर्श की बात कर रहे हैं, व्यावहारिकता की नहीं.

Source: News18Hindi Last updated on: July 28, 2020, 1:58 PM IST
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गांधी का संविधान – 2: किस तरह का संविधान चाहते थे महात्मा गांधी?
(न्यूज 18 क्रिएटिव)-आनंद
संविधान महज़ एक किताब या किताबी अवधारणा नहीं है. यह एक सपना है कि हम पाने समाज, मुल्क और लोगों को किस तरह का रूप देना चाहते हैं. भारत के प्रचलित संविधान में भी एक सपना है – आज़ादी का, बंधुता का, न्याय का और समानता का. यदि इस सपने में राजनीतिज्ञों, सामाजिक समूहों, विचारकों, छात्रों, युवाओं, किसानों या मजदूरों और नागरिकों का विश्वास ही न हो, तो संविधान एक बेकार सपना हो जाता है. वस्तुतः भारत का संविधान तभी सफल हो सकता है, जब हम अपना जीवन दूसरों के साथ साझा करने के लिए तत्पर हों. बात संपत्ति या जमीन साझा करने की नहीं है, जीवन साझा करने की है. महात्मा गांधी ने जिस संविधान का सपना बुना था, उसमें उन्होंने सोचा था कि एक इंसान दूसरे इंसान में अपने जीवन का प्रतिबिम्ब देखेगे. जब वह ऐसा करेगा तो वह किसी का अहित नहीं चाहेगा. जब वह अपना जीवन दूसरे व्यक्ति या समुदाय के साथ साझा करेगा, तब वह सभ्यता के सुखद मुकाम पर होगा.

सभ्यता और नीति

गांधी जी ने लिखा कि लोग अपने खिलाफ़ कोई बात कहना-सुनना नहीं चाहते हैं, इसलिए उन्हें यह अहसास ही नहीं होता कि जिसे वे सभ्यता का विकास कहते हैं, वह वास्तव में रोग है. उन्होंने लिखा कि लोग बाहरी दुनिया की खोजों और शरीर के सुख में सार्थकता और पुरुषार्थ  मानते हैं. सौ साल पहले यूरोप के लोग जैसे घरों में रहते थे, उनसे ज्यादा अच्छे घरों में आज वे रहते हैं; यह सभ्यता की निशानी है. पहले लोग चमड़े के कपड़े पहनते थे और भालों का इस्तेमाल करते थे, अब वे लंबे पतलून पहनते हैं और भाले के बदले एकसाथ पांच गोलियां छोड़ने वाली बन्दूक का इस्तेमाल करते हैं. पहले मामूली हल से मेहनत करके जमीन जोतते थे, उसकी जगह भाप के यंत्रों से हल चलाकर एक आदमी बहुत सारी जमीन जोत लेता था है और बहुत सारा पैसा कमा लेता है. यह सभ्यता की निशानी है. पहले लोग बैलगाड़ी से बारह कोस की मंजिल तय करते थे, अब रेलगाड़ी से चार सौ कोस की मंजिल तय करते हैं. यह सभ्यता की चोटी मानी गई. फिर लोग सोचते हैं कि हवाई जहाज़ से चंद घंटों में दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच सकेंगे. हाथ-पैर हिलाने की जरूरत नहीं रहेगी. एक बटन दबाया, सामने पहनने की पोशाक हाज़िर, दूसरा बटन दबाया और अखबार हाज़िर, तीसरा बटन दबाया गाड़ी चलने के लिए तैयार. उसे हमेशा नए भोजन मिलेंगे, हाथ पैरों का काम नहीं करना पड़ेगा, सारा काम यंत्रों से ही हो जाएगा. आज तोप के एक गोले से हज़ारों जानें ली जा सकती हैं. यह सभ्यता की निशानी है. पहले लोग खुली हवा में अपने को ठीक लगे, उतना काम स्वतंत्रता से करते थे. अब हज़ारों आदमी कारखानों में या खानों में इकठ्ठा होकर काम करते हैं, उनकी हालत जानवर से भी बदतर है. पहले लोगों को मार-पीटकर गुलाम बनाया जाता था, अब पैसों और भोग का लालच देकर गुलाम बनाया जाता है. पहले ऐसे रोग नहीं थे, जैसे आज लोगों में पैदा कर दिए गए हैं. डॉक्टर इलाज़ खोज रहे हैं कि इन्हें कैसे मिटाएं, ऐसे में अस्पताल बढ़े हैं; यह सभ्यता की निशानी है. सभ्यता के इन अनुभवों में नीति या धर्म की बात ही नहीं है.”

गांधी जी ने यह स्पष्ट किया कि नीति से हटकर हासिल किया गया आविष्कार आखिर में संकट को ही जन्म देगा. समाज अपनी आकांक्षाओं का गुलाम तो है ही, ऐसे में हमारी व्यवस्था और बाज़ार उस कमजोरी का भरसक लाभ उठाता है. हम देख रहे हैं कि जिसे गांधी जी ने सभ्यता कहा, उसे आज हम बोलचाल की भाषा में “विकास” कहने लगे हैं. अपने लाभ और लोभ के लिए जिस तरह से धरती का शोषण किया गया, जिस तरह से नदियों, पहाड़ों, ग्लेशियर्स और मिट्टी के साथ बुरा बर्ताव किया गया, उसने दुनिया और, मानव समाज के अस्तित्व पर संकट बिछा दिया है. यह सभ्यता ऐसी है कि अगर हम धीरज धरकर बैठे रहेंगे, तो सभ्यता की चपेट में आये हुए लोग खुद की जलाई हुई आग में जल मरेंगे.
राष्ट्रीय सुरक्षा

ऐसा नहीं है कि गांधी राष्ट्र की सुरक्षा पर किसी तरह का समझौता करना चाहते थे या किसी भी अन्य देश को भारत पर कब्ज़ा करते देखना चाहते थे, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा में भी सत्य, अहिंसा और अभय के मूल्य हो सकते हैं, यही बात गांधी जी के सपने के संविधान में बिखरी हुई दिखाई देती है.

विदेशी हमलों से सुरक्षा के लिए भी विकेन्द्रीकरण एक अनिवार्य रणनीति है. विकेन्द्रीकरण अकेले आधुनिक हथियारों से जूझ सकता है. स्वतंत्र भारत का गांधीवादी संविधान में लिखा गया है कि जब बड़े-बड़े कारखाने और उद्द्योग केंद्रीयकृत हो जाते हैं, यानी एक ही जगह केंद्रित हो जाते हैं, तो उन्हें थोड़े से आधुनिक हथियारों से निशाना बनाकर राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को आसानी से तोड़ा जा सकता है. लेकिन यदि भारत में उद्योगों का विकेन्द्रीकरण हो तो उन्हें कोई भी आधुनिक हथियार एक साथ नहीं मिटा सकते हैं. व्यवसाय-उद्योगों का केन्द्रीयकरण देश की सुरक्षा व्यवस्था को कमज़ोर करता है. आज जबकि दुनिया में सतत युद्ध चल रहे हैं, सरहदी टकराव जारी हैं, तब सहकारिता आधारित आर्थिक नीति देश को भीतर से मज़बूत बनाए रखती है. उत्पादन की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था से युद्ध जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी देश को अपनी बुनियादी जरूरतों के सामान के अभाव का सामना नहीं करना पड़ेगा.वैश्विक शान्ति

चूंकि जिस दौर में भारत की आज़ादी साकार हो रही थी, वह दौर दुनिया भर में युद्धों और हिंसा का दौर था. उस वक्त दुनिया में “अंतर्राष्ट्रीय शान्ति” के नाम पर बहुत चर्चाएं चल पड़ी थीं. यह विकल्प भी रखा गया कि दुनिया के देश सुलह और मध्यस्थता के जरिये आपसी झगड़ों का निपटारा करेंगे. सेन फ्रांसिस्को में हुए एक सम्मेलन में विश्व शान्ति के लिए एक घोषणा पत्र जारी किया गया, लेकिन यह साफ़ हो गया कि दुनिया के तीन बड़े देश – अमेरिका, सोवियत यूनियन और ब्रिटेन दुनिया पर अंतर्राष्ट्रीय शान्ति सेना के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से अपना नियंत्रण बनाए रखने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

“स्वतंत्र भारत का गांधीवादी संविधान” में लिखा गया है कि “यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि दुनिया में हर युद्ध का बुनियादी कारण आर्थिक शोषण और विश्व बाज़ार पर नियंत्रण पाने का भयंकर लालच है. अब युद्धों में विनाश का सामना करने के बाद ये बड़े देश अपने यहां के उत्पादों का निर्यात बढ़ाकर अपनी विलासिता को भोगते रहना चाहते हैं. उपनिवेश बनाए रखने की यह प्रवृत्ति दुनिया में दुर्भावना और हिंसा को बरकरार रखेगी. जो देश विश्व शान्ति बनाने की मंशा रखते हैं, उन्हें अपने यहां  स्थानीय और विकेन्द्रीकृत उद्योग स्थापित करना चाहिए. देशों के भीतर समान वितरण की व्यवस्था स्थापित किये बिना कोई भी देश विश्व शान्ति की कल्पना नहीं कर सकता. यदि उपनिवेशवाद और आर्थिक नियंत्रण की भावना को नियंत्रित किया जा सके, तो विश्व शान्ति स्थापित हो सकती है.


रेल-परिवहन की मशीनें

गांधी जी के जिन विचारों और सोच पर सबसे ज्यादा बहस होती है, उनमें से एक है परिवहन व्यवस्था का मशीनीकरण और विशेष रूप से रेलों के जरिये परिवहन की व्यवस्था. प्रगति में विश्वास रखने वाले मानते हैं कि परिवहन की व्यवस्था बनने से उन्नति हुई है. गांधी जी हिन्द स्वराज में लिखते हैं कि “रेल से अकाल बढ़े हैं, क्योंकि रेल गाड़ी की सुविधा के कारण लोग अपना अनाज बेंच डालते हैं. जहां महंगाई हो, वहां अनाज खिंच जाता है, लोग लापरवाह बनते हैं और उससे अकाल का दुख बढ़ता है. लोग सोचते हैं कि रेल है तो आज हिन्दुस्तान में एक राष्ट्र का जोश देखने में आता है. गांधी जी कहते हैं कि यह आपकी भूल ही है. आपको अंग्रेजों के सिखाया है कि आप एक-राष्ट्र नहीं थे और एक राष्ट्र बनने में आपको सैकड़ों बरस लगेंगे. यह बात बिलकुल बेबुनियाद है. जब अंग्रेज हिन्दुस्तान में नहीं थे, तब हम एक राष्ट्र थे, हमारे विचार एक थे; तभी तो अंग्रेजों ने यहां एक राज्य कायम किया. भेद तो हमारे बीच बाद में उन्होंने पैदा किये. एक राष्ट्र का अर्थ यह नहीं है कि हमारे बीच कोई मतभेद नहीं थे. लेकिन हमारे मुख्य लोग पैदल या बैलगाड़ी से हिंदुस्तान का सफर करते थे, वे एक दूसरे की भाषा सीखते थे और उनके बीच कोई अंतर नहीं था. लोग देशाटन करते थे, वे घर में या अपने राज्य की सीमा में ही दिन भी बिता सकते थे, पर उन्होंने अलग-अलग स्थानों की यात्रा करके एकता का विचार स्थापित किया.”

अगर इतिहास का ठीक-ठीक ढंग से अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में रेलों के जाल की बुनावट इस विश्लेषण के आधार पर की गई कि भारत के कौन-कौन से कोनों में लोहा, कोयला, नील या इमारती लकड़ी की प्रचुर उपलब्धता है. प्राथमिक रूप से उन स्थानों तक पहुंचने और वहां से प्राकृतिक संसाधनों को ब्रिटेन ले जाने के लिए रेल का जाल बुना गया. शायद यह बिंदु केवल इस बात तक सीमित नहीं रह सकता है कि भारत में रेलें होना चाहिए या नहीं. सवाल यह है कि जब हम अपनी सुविधा के लिए कोई भी आविष्कार करते हैं और उसका उपयोग करते हैं, तब क्या उसके साथ जुड़े हुए नैतिक और अनैतिक पहलुओं का विश्लेषण करते हैं या नहीं?

उद्योग और रोज़गार

73 साल के आज़ाद भारत में सबसे प्रचलित शब्द बन गया है विकास. भारत का हर नागरिक विकास चाहता है. नागरिकों के लिए विकास का मतलब है बेहतर, सुखमय, शांतिपूर्ण और भय मुक्त जीवन; लेकिन नीतिनिर्माताओं के लिए विकास का मतलब है संसाधनों पर एकाधिकार, पूँजी का केन्द्रीयकरण और समाज को सत्ता का उपनिवेश बना देना. वक्त आने पर इस विरोधाभास का मटका जरूर फूटेगा और विकास के भ्रम से भारत बाहर जरूर आएगा.

गांधी जी का मानना था कि “बड़े पैमाने पर होने वाला उत्पादन ही दुनिया की मौजूदा संकटमय स्थिति के लिए जिम्मेदार है. बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण का अनिवार्य परिणाम यह होगा कि ज्यों-ज्यों प्रतिस्पर्धा और बाज़ार के समस्याएं कड़ी होंगी, त्यों-त्यों गांवों का प्रगट या अप्रगट शोषण होगा. इसलिए हमें अपनी सारी शक्ति इसी प्रयत्न में केन्द्रित करना चाहिए कि गांव स्वयंपूर्ण बनें और वस्तुओं का निर्माण और उत्पादन अपने उपयोग के लिए करें. यदि उत्पादन की यह पद्धति स्वीकार कर ली जाए तो फिर गांव वाले ऐसे आधुनिक यंत्रों और औजारों का, जिन्हें वे बना सकते हों और जिनका उपयोग उन्हें आर्थिक दृष्टि से पुसा सकता हो, उसका उपयोग ख़ुशी से करें. उस पर आपत्ति नहीं की जा सकती. अलबत्ता, उनका उपयोग दूसरों के शोषण करने के लिए नहीं होना चाहिए.”

हिन्दुस्तान की सभ्यता पश्चिम से निराली है. जहां जमीन ज्यादा हो और लोग कम और जहां जमीन कम हो और लोग ज्यादा, उसमें तो फर्क होना ही चाहिए. मशीनें या यंत्र उन अमेरिका वालों के लिये जरूरी होंगी, जहां लोग कम हैं और काम ज्यादा है. किन्तु हिन्दुस्तान में जहां एक काम के लिए अनेकों लोग खाली हैं, मशीनरी की जरूरत नहीं और न इस प्रकार भूखों मरकर समय बचाना ठीक नहीं है.


न्याय और साम्प्रदायिकता

जब देश आज़ाद होता है, तब वह खुदमुख्तार व्यवस्था बनता है. खुद यह लक्ष्य तय करता है कि उसके नागरिक, वहां के जंगल, पहाड़, नदियाँ, खेत, किसान, मजदूर, बच्चे, महिलाए, आदिवासी, गरीबों का जीवन कैसे बेहतर होगा? यदि सरकारों और नीति निर्माताओं का न्याय में विश्वास न हो और नीतियां अन्याय के सिद्धांत पर बनाई जाती हों, वह देश न तो आज़ाद माना  माना जा सकता है, न ही सभ्य. पूरी संभावना है कि हमारे देश में बहुत सारी कुरीतियाँ होंगी, बुरी बातें होंगीं, लेकिन उन्हें सुधाने के लिए ही तो हमने आज़ादी का सपना देखा था और संविधान बनाने की जिम्मेदारी ली थी. अब हम उस जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते हैं.

सभ्य भारत में वर्तमान न्याय व्यवस्था या न्यायपालिका की व्यवस्था और उसका स्वरूप ब्रिटेन से ही लिया गया है. गांधी जी ने हिन्द स्वराज में लिखा है कि यह माना जाता है कि भारत में मुसलामानों, ईसाइयों, पारसियों के आने से यह एक राष्ट्र नहीं रहा. गांधी जी लिखते हैं कि “हिन्दुस्तान में चाहे जिस धर्म का आदमी रह सकता हैं. उससे वह एक राष्ट्र मिटने वाला नहीं है. दुनिया के किसी भी हिस्से में एक राष्ट्र का अर्थ एक धर्म नहीं किया गया है. हिन्दुस्तान में तो ऐसा था ही नहीं. हिंदू और मुसलमान के झगड़े तो अंग्रेजों ने शुरू करवाए. “मियां और महादेव की नहीं बनती” जैसी कहावतें हमेशा के लिए नुकसान पहुंचाती हैं. ऐसी कहावतें तो शैवों और वैष्णवों में भी चलती हैं, पर इससे कोई यह नहीं कहेगा कि वे एक राष्ट्र नहीं हैं. वेद धर्मियों और जैनों के बीच बहुत फर्क माना जाता है, फिर भी इससे वे अलग राष्ट्र नहीं बन जाते. हुआ यूँ कि हम गुलाम बन गए. इसलिए अपने झगड़े हम तीसरे के पास ले गए. ज्यों ज्यों ज्ञान बढ़ेगा, त्यों-त्यों हम समझते जायेंगे कि हमें पसंद न आने वाला धर्म दूसरा आदमी पालता हो, तो भी उससे बैर-भाव रखना हमारे लिए ठीक नहीं है. हम उस पर जबरदस्ती न करें. सब अपने अपने धर्म का स्वरूप समझकर उससे चिपके रहें और शास्त्रियों और मुल्लाओं को बीच में न आने दें, तो झगड़े का मुंह हमेशा के लिए काला ही रहेगा.”

गांधी जी कहते हैं कि “मेरी राय है कि वकीलों ने हिन्दुस्तान को गुलाम बनाया है, हिंदू–मुसलमानों के झगड़े बढ़ाए हैं और अंग्रेजी हुकूमत को यहां मज़बूत किया है. हिंदू-मुसलमान आपस में लड़े हैं तो तटस्थ आदमी उनसे कहेगा कि आप गई-बीती को भूल जाएं; इसमें दोनों का कसूर रहा होगा. अब दोनों मिलकर रहिये. लेकिन वकील के पास जाते हैं तो वकील का फ़र्ज़ हो जाता है कि वह मुवक्किल की ओर से जोर लगाए. मुवक्किल के ख़याल में भी न हों, ऐसी दलीलें मुवक्किल की ओर से ढूंढना वकील का काम है. वकीलों से बड़े से बड़ा नुकसान तो यह हुआ कि अंग्रेजों का जुआ हमारी गर्दन पर मज़बूत जम गया. आप सोचिये, क्या आप मानते हैं कि अंग्रेजी अदालतें यहां नहीं होतीं तो वे हमारे देश में राज कर सकते थे? ये अदालतें लोगों के भले के लिए नहीं हैं. जिन्हें अपनी सत्ता कायम रखनी है, वे अदालतों के जरिये लोगों को वश में रखते हैं. लोग अगर खुद अपने झगड़े निबटा लें, तो तीसरा आदमी उन पर अपनी सत्ता नहीं जमा सकता. सचमुच जब लोग खुद मार-पीट करके या रिश्तेदारों को पंच बनाकर अपना झगड़ा निबटा लेते थे, तब वे बहादुर थे. अदालतें आयीं और वे कायर बन गए. लोग आपस में लड़कर झगड़े मिटाएं, यह जंगली माना जाता था. अब तीसरा आदमी झगड़ा मिटाता है, यह क्या कम जंगलीपन है? हकीकत तो यही दिखानी है कि अंग्रेजों ने अदालतों के जरिये हम पर अंकुश लगाया है और अगर हम वकील न बनें तो ये अदालतें चल ही नहीं सकती. अगर अंग्रेज ही जज होते, अंग्रेज ही वकील होते और अंग्रेज ही सिपाही होते, तो सिर्फ अंग्रेज़ों पर ही राज करते.”

22 जून 1945 को द हिन्दू में गांधी जी ने नई सभ्यता को परिभाषित करते हुए लिखा “इसे पृथ्वी पर नियंता/ईश्वर/खुदा के राज के रूप में अनुवादित किया जा सकता है. राजनीतिक सन्दर्भों में यह कहा जाए कि एक माकूल प्रजातंत्र वह होता है, जिसमें किसी अधिकार/कब्ज़े/ संपत्ति के उपलब्धता या अनुपलब्धता, रंग, नस्ल, पंथ, लिंग के आधार पर जमने वाली सभी किस्मों की असमानताएं समाप्त हो जाएं. इसमें भूमि और राज्य लोगों से सम्बंधित हों, न्याय त्वरित, उचित और सस्ता हो, जहां प्रार्थना करने, अपनी बात कहने यानी अभिव्यक्ति की और प्रेस की स्वतंत्रता हो. यह सब नैतिक संयम के आत्म नियंत्रण के लिए बनाए गए विधान से ही संभव है. ऐसा राज्य और उसकी व्यवस्था सत्य और अहिंसा पर आधारित होना चाहिए. इसमें सम्पन्न, सुखी और आत्म-निर्भर गांव और गांव समाज होना चाहिए.”


वास्तव में समाज और राष्ट्र निर्माण एक सतही प्रक्रिया नहीं है. विभिन्न किस्मों की विविधता के बीच एक ऐसी व्यवस्था निर्मित करना, जिसमें सभी को बेहतर जीवन हासिल हो; इसके लिए नियमों से पहले मूल्य और सिद्धांत चाहिए होते हैं. महात्मा गांधी ने कुछ प्रयोग करने के जोखिम उठाये हैं, उनके परिणाम हमारे जीवन को सही पगडण्डी पर लाने में मदद कर सकते हैं. गांधी जी के रहते हुए ही यह कहा जाने लगा था कि वे आदर्श की बात कर रहे हैं, व्यावहारिकता की नहीं. लेकिन श्रीमन नारायण अग्रवाल ने लिखा है कि गांधी विचार से ही आर्थिक बेहतरी लायी जा सकती है, राष्ट्र के भीतर और विश्व पटल पर शान्ति स्थापित की जा सकती है और भविष्य को बेहतर बनाया जा सकता है. द प्राइस ऑफ पीस में लिखा गया है कि “हमें आदर्श लोक की स्थापना के लिए ईमानदार कोशिशों या नरक/दोजख में से किसी एक विकल्प का चुनाव करना है.”
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: July 28, 2020, 1:58 PM IST
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