गांधी का संविधान – 3: किस तरह की राज्य व्यवस्था चाहते थे महात्मा गांधी?

महात्मा गांधी के निमित्त से प्रस्तुत किये गए संविधान में पंचायत, तालुका और जिला पंचायत की व्यवस्था के परिकल्पना की गयी थी

Source: News18Hindi Last updated on: August 3, 2020, 5:54 PM IST
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गांधी का संविधान – 3: किस तरह की राज्य व्यवस्था चाहते थे महात्मा गांधी?
(न्यूज 18 क्रिएटिव)-आनंद
यह जानना बहुत जरूरी है कि महात्मा गांधी आज़ाद भारत में किस तरह की राज्य व्यवस्था के होने का सपना देखते थे? उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि ग्राम पंचायतें कभी भी सरकार के नियंत्रण और निर्देशों से संचालित होंगी. जातिवादी और लैंगिक भेदभाव से भरा-पूरा समाज होने के बावजूद उन्हें पता नहीं यह विश्वास क्यों था कि भारत के गाँव और पंचायतें न्याय और समानता के मूल्यों के आधार पर अपनी भूमिका निभाएंगी? बहरहाल इस पहलू पर डा. भीमराव आंबेडकर बहुत स्पष्ट थे कि भारत के गाँव शोषण के केंद्र हैं, अतः इन्हें स्वतंत्र शक्ति नहीं दी जा सकती है. सपना चाहे गांधी का रहा हो या अम्बेडकर का, संविधान का वास्तविक लक्ष्य तभी हासिल होता, जब भारत “नागरिकता के निर्माण के कारखाने” स्थापित करता. आज़ादी के बाद यही सबसे बड़ी नाकामी है कि भारत की सरकारों और सामाजिक संस्थाओं ने भारतीयों को हिन्दू – मुसलमान तो बनाया, किन्तु ऐसा हिन्दुस्तानी नागरिक नहीं बनाया, जो अन्याय से लड़े और न्याय स्थापित करे, लोकतांत्रिक मूल्यों और बंधुता को अपना राष्ट्र धर्म माने.

महात्मा गांधी के निमित्त से प्रस्तुत किये गए संविधान में पंचायत, तालुका और जिला पंचायत की व्यवस्था के परिकल्पना की गयी थी. उनका सपना था कि गाँव के स्तर पर ही चुनाव हो, और वहां से चुने गए प्रतिनिधियों को तालुका, जिला और राज्य की सरकारों में स्थान मिले. भारत में जो संविधान लागू हुआ, उसे महात्मा गांधी के इस सपने को स्थान नहीं मिला, किन्तु यह एक ऐसा सपना तो है, जो साकार किया जा सकता है. वर्तमान परिस्थितियों में इतना तो साबित हो ही रहा है कि भारत की राजनीतिक व्यवस्था वस्तुतः शोषण और असत्य के मूल्यों को अपना रही है. इस परिस्थिति को शायद गांधी के सपने से ही बदला जा सकता है.

पंचायत, तालुका और जिला पंचायत - राज्य व्यवस्था की मूल इकाई पंचायत होगी. हर गांव अपनी पंचायत का गठन करेगा, जिसमें पांच से ग्यारह सदस्यों का चुनाव समुदाय द्वारा किया जाएगा. इसका कार्यकाल तीन वर्ष का होगा. कोई भी व्यक्ति अधिकतम तीन बार चुना जा सकेगा. पंचायत को ग्राम सेवकों, जैसे चौकीदार, पटवारी और पुलिस अधिकारियों को नियुक्त करने और उनके पद से हटाने का अधिकार होगा.

पंचायत ही स्कूल और शिक्षा व्यवस्था का संचालन करेगी. वह पुस्तकालय और पढ़ने-पढ़ाने ने के लिए कक्ष की व्यवस्था करेगी और प्रौढ़ लोगों के लिए रात्रिकालीन स्कूल चलाएगी.
पंचायत गांव में अखाड़े, व्यायामशाला और खेल के मैदान की व्यवस्था करेगी, स्थानीय खेलों, कला-शिल्प को प्रोत्साहित करेगी. सभी उत्सवों को मिलकर आयोजित करेगी और मेलों का आयोजन करेगी.

गांव की चोरी, अपराधों और जंगली पशुओं की सुरक्षा के लिए गांव संरक्षकों की व्यवस्था करेगी. सभी नागरिकों को सत्याग्रह और अहिंसक प्रतिरोध का प्रशिक्षण प्रदान करेगी. कृषि भूमि के लगान का निर्धारण और एकत्रीकरण करेगी, सहकारिता कृषि को प्रोत्साहित करेगी, सिंचाई के साधन बढ़ाएगी, अच्छे बीजों की व्यवस्था करेगी. यह सुनिश्चित करेगी कि गांव की जरूरत का खद्यान्न और खाद्य सामग्री का गांव में ही उत्पादन हो और वर्तमान वाणिज्यिक खेती को निरुत्साहित करेगी.

गांव में स्वच्छता रखना और जल निकास की व्यवस्था बनाए रखना, महामारी को फैलने से रोकना, पीने के साफ़ पानी की व्यवस्था करना, गांव में अस्पताल और प्रसूति गृह की स्थापना करना और उसका संचालन करना. यहां से सभी नागरिकों को मुफ्त उपचार हासिल होगा. इन स्वास्थ्य केन्द्रों में उपचार की पारंपरिक विधाओं को प्रोत्साहित किया जाएगा.खाड़ी का उत्पादन बढ़ाना, सहकारी ग्राम उद्योग, दूध उत्पादन, पशुपालन को व्यवस्थित करना. मृत पशुओं के चमड़े के इस्तेमाल के लिए कारखाना चलाना. कृषि और ग्राम उद्योग के उत्पादन का सहकारी विपणन, उपभोक्ता समितियों का संचालन, अतिशेष सामग्री का बाहर विक्रय या निर्यात, सहकारी भण्डार गृह की व्यवस्था और गांव के कारीगरों को सस्ती दर पर ऋण प्रदान करना. व्यवस्था चलाने के लिए कर जुटाना, श्रम का भण्डार बनाना, आय और व्यय के खातों को व्यवस्थित रखना.

तालुका पंचायत - गांवों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों में समन्वय स्थापित करने के लिए तालुका/तहसील स्तर की और जिला स्तर की पंचायत होगी. गांव पंचायत से ऊपर की इन पंचायतों की भूमिका और काम परामर्शी होंगे, न कि आदेशात्मक. तालुका और जिला पंचायत ग्राम पंचायत को अपने अधीन नहीं रखेंगी.

ग्राम पंचायतों के चुने हुए अध्यक्ष/प्रमुखों से मिलकर तालुका/तहसील पंचायत का गठन होगा. सामान्यतः 20 पंचायतों या 20 हज़ार की जनसंख्या पर यह पंचायत होगी. इसका कार्यकाल भी तीन साल का होगा. तालुका/तहसील पंचायत ग्राम पंचायतों का मार्गदर्शन करेगी और उनके खातों का अंकेक्षण करेगी.

उच्चतर माध्यमिक स्कूलों, बड़े अस्पतालों, संरक्षकों की व्यवस्था, तालुका स्तर की सहकारिता समितियों और बैंकों की व्यवस्था, गांवों के बीच सड़कों की निर्माण, खेलों को प्रोत्साहन और कृषि की बेहतरी के लिए सतत प्रयास करेगी.

जिला पंचायत - तालुका पंचायतों के अध्यक्षों/प्रमुखों से मिलकर जिला पंचायत का गठन होगा. जिला पंचायत के तहत 12 से ज्यादा तालुका पंचायतें नहीं आएंगी. जिला पंचायत तालुका पंचायतों का मार्गदर्शन करेगी और उनके खातों का अंकेक्षण करेगी. महाविद्यालयों, बड़े और विशेष अस्पतालों, जिला संरक्षकों की व्यवस्था, जिला स्तर की सहकारिता समितियों और बैंकों की व्यवस्था, सड़कों की निर्माण, खेलों को प्रोत्साहन और कृषि की बेहतरी के लिए सतत प्रयास करेगी. जिला पंचायत प्रांतीय सरकारों के साथ प्रत्यक्ष संवाद और संपर्क में रहेगी.

नगर परिषद

नगरों में वार्ड पंचायत और नगर परिषद होगी. इनके पास ठोस कार्यपालिक और विधायी शक्तियां होंगी. इनके काम लगभग उसी तरह के होंगे, जिस तरह के जिला पंचायतों के तय किये गए हैं. नगर परिषद परिवहन, विद्युत आपूर्ति, जल आपूर्ति आदि की व्यवस्था का काम करेंगी.

प्रांतीय सरकार

जिला पंचायतें और नगर परिषद् अपने अध्यक्षों/प्रमुखों को प्रांतीय पंचायत में भेजेंगी. यदि प्रांत छोटा होगा, तो जिला पंचायतें और नगर परिषद एक से अधिक प्रतिनिधि प्रांतीय पंचायत में भेज सकेगी. इसका कार्यकाल तीन साल का होगा और वर्ष में दो बार इसकी बैठकें होंगी.

  1. जिला पंचायत/नगर परिषदों का मार्गदर्शन करेगी और उनके खातों का अंकेक्षण करेगी.

  2. विश्वविद्यालयों का संचालन, तकनीकी शिक्षा और शोध प्रबंध, बड़े और विशेष अस्पतालों, राज्य संरक्षकों की व्यवस्था, जिला पंचायतों को सस्ती दर पर ऋण उपलब्ध करवाने के लिए प्रांतीय सहकारिता समितियों और बैंकों की व्यवस्था, परिवहन व्यवस्था, खेलों को प्रोत्साहन और सिंचाई-कृषि की बेहतरी के लिए सतत प्रयास करेगी.

  3. जिला पंचायत प्रांतीय सरकारों के साथ प्रत्यक्ष संवाद और संपर्क में रहेगी.


प्रान्तों की सीमाएं मुख्य रूप से भाषा के इलाके के आधार पर तय की जाएंगी. अब तक जो भी इलाके या सीमायें बनी हैं, वे ऐतिहासिक कारणों से बनी हैं. उनके पीछे कोई व्यवहारिक या सैद्धांतिक कारण नहीं रहा.

प्रांतीय पंचायत उस प्रांत की विधायिका की भूमिका में होगी. यह अपने अध्यक्ष का चुनाव करेंगी, जो कि प्रांत का अध्यक्ष होगा. प्रांत की भाषा में ही प्रांतीय पंचायत की कार्यवाही होगी.

प्रांतीय पंचायत कार्यपालिक कामों के लिए पांच से नौ मंत्रियों या आयुक्तों की नियुक्ति करेगी. ये नियुक्ति चुने हुए लोगों में से नहीं होगी. इनकी नियुक्ति दलीय या साम्प्रदायिक आधार पर नहीं होगी.

केन्द्रीय सरकार - सभी प्रांतीय पंचायतों के अध्यक्ष अखिल भारतीय पंचायत का गठन करेंगे. जो बड़े प्रांत हैं, वहां अध्यक्ष के अलावा एक अन्य सदस्य अखिल भारतीय पंचायत में प्रतिनिधित्व कर सकेगा. यह केन्द्रीय विधायिका भी होगी.

केन्द्रीय सरकार या अखिल भारतीय पंचायत विदेशी हमलों से देश की सुरक्षा करेगी. राष्ट्रीय संरक्षक समूह की व्यवस्था करेगी. आर्थिक विकास के लिए प्रांतीय सरकारों को कार्ययोजना बनाने में मदद करेगी. देश की जरूरतों के मुताबिक़ मुख्य उद्योगों का संचालन करेगी, मुद्रा, सीमा शुल्क और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का नियमन करेगी.

प्रशासन - अखिल भारतीय पंचायत मुख्य विधायी संस्था होगी और इसका अध्यक्ष राज्य का प्रमुख होगा. संघीय पंचायत विभिन्न विभागों के लिए मंत्री या आयुक्त नियुक्त करेगी. अखिल भारतीय पंचायत के सदस्य सरकार के मंत्री या आयुक्त नहीं होंगे. यानी विधायिका और कार्यपालिका का काम बिलकुल भिन्न-भिन्न होगा. मंत्रियों का कार्यकाल तीन वर्ष का होगा. सभी समुदायों और तबकों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाएगा.

न्यायपालिका - ब्रिटिश सरकार द्वारा नियोजित न्यायिक व्यवस्था ने भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को तहस नहस कर दिया है. एक समय पर भारत में पंचायतें दीवानी और आपराधिक मामलों में ही प्रकरणों की सुनवाई और निपटारा किया करती थी. वह व्यवस्था लोगों की पहुंच में और सस्ती भी थी. इसके उलट वर्तमान न्यायिक व्यवस्था बहुत महंगी है. इसमें कोई समयबद्धता नहीं है. वर्तमान जटिल न्यायिक व्यवस्था अंतहीन झूठ और बेईमानी का विस्तार करती है. ब्रिटिश गवर्नर सर मौरिस हैलेट ने लिखा है कि “भारत के सरकार ने प्रशासन के केन्द्रीयकरण की नीति को अपनाकर गलत राह अपना ली है”.

द गांधीयन कांस्टीट्यूशन ऑफ फ्री इंडिया में ग्राम पंचायत, जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है.

साथ ही यह भी कहा गया था कि भारत में लागू किये जा रहे दीवानी और फौजदारी क़ानून भी एक ख़ास मकसद से दूसरे देशों के लाकर थोपे गए हैं, ये जटिल और कठिन हैं इसलिए सभी कानूनों को परीक्षण के बाद उनमें आमूलचूल बदलाव के बाद ही भारत के संविधान में शामिल किया जाएगा.

चुनाव - द गांधीयन कांस्टीट्यूशन ऑफ फ्री इंडिया के अनुसार भारत में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनाव की व्यवस्था होगी. ग्राम पंचायत के प्रतिनिधि प्रत्यक्ष चुनाव के जरिये चुने जायेंगे, जबकि तालुका, जिला, प्रांतीय और अखिल भारतीय पंचायत का चुनाव अप्रत्यक्ष चुनावों के जरिये होगा.

इससे धन का अपव्यय नहीं होगा और लापरवाह गैर जरूरी राजनीतिक दलों की संख्या में भी बेतहाशा बढ़ोतरी नहीं होगी. इससे राजनीति और व्यवस्था का साम्प्रदायीकरण भी नहीं होगा.

सुरक्षा - द गांधीयन कांस्टीट्यूशन ऑफ फ्री इंडिया के अंतर्गत राष्ट्रीय पुलिस संगठन की भूमिका का उल्लेख किया गया. समाज के लिए अनुशासित, समझ संपन्न, शिक्षित पुलिस फ़ोर्स की कल्पना की गयी, जिसका मुख्य रूप से अहिंसा में विश्वास होगा और जो समाज की सेवक होगी, उनकी मालिक नहीं!

अल्पसंख्यक - इस दस्तावेज में पूरे तथ्यात्मक विश्लेषण के साथ भारत में अल्पसंख्यक समुदायों के सामने खड़ी समस्याओं के आधार पर प्रावधान किया गया कि भारत में ब्रिटिश शासन व्यवस्था ने ही साम्प्रदायिकता के बीज बोये और पृथक प्रतिनिधित्व/निर्वाचक मंडल की व्यवस्था के जरिये हिन्दू-मुसलमान के बीच गहरी खाई रच दी गयी.

श्री आगा खान के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल वायसराय लार्ड मिन्टो से मिला और मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग की. बहरहाल भारत के लिए ब्रिटिश सरकार के सचिव लार्ड मोरले ने लार्ड मिन्टो को लिखा कि मैं भारत में मुस्लिमों के सम्बन्ध में शुरू हुए विवाद पर फिर बात नहीं करूंगा, लेकिन मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि पृथक प्रतिनिधित्व की अतिरिक्त मांग आपके शुरुआती भाषण से ही स्थापित हुई. रामसे मेक्डोनाल्ड ने अवेकनिंग इंडिया में लिखा है कि ब्रिटिश अधिकारी ही भारत में साम्प्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व की मांग के बीज बो रहे थे. द गांधीयन कांस्टीट्यूशन ऑफ फ्री इंडिया के मुताबिक भारत का विभाजन या पाकिस्तान का निर्माण होने से मुस्लिम अल्पसंख्यकों की समस्या का निराकरण नहीं होगा. अल्पसंख्यकों के अधिकारों और प्रतिनिधित्व से सम्बंधित व्यवस्था बनाने के लिए संविधान सभा की एक समिति बनायी जा सकती है. हिन्दू और मुसलमानों की समस्याओं की बुनियाद में अति गरीबी है. स्वराज के माध्यम से इनकी आर्थिक बदहाली को ख़त्म किया जा सकता है.

विदेश नीति - भारत ने बहुत स्पष्ट रूप से अपनी विदेश नीति सामने रखना शुरू कर दिया है. भारत फासिस्ट नीतियों और व्यवहार के साथ खड़ा नहीं होगा. इसीलिए भारत ने म्यूनिख पैक्ट का विरोध किया. चीन में जापान के दखल का विरोध किया.

वित्त और कराधान - भारत में निजी संपत्ति को ख़त्म नहीं किया जाएगा, लेकिन समान वितरण के लिए व्यवस्था बनायी जायेगी.

शिक्षा - 14 साल तक के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य बुनियादी शिक्षा प्रदान की जायेगी. इसमें कला, शिल्प, बुनकारी और कृषि सरीखे कौशल अनिवार्य रूप से शामिल होंगे. किसी भी परिस्थिति में बच्चों को स्कूल में या शिक्षा संस्थानों में सज़ा या दंड नहीं दिया जाएगा. शिक्षा मातृ भाषा में प्रदान की जाएगी.

अपराध और सजाएं - हम अपराध करने वाले के प्रति निष्ठुर नहीं होंगे. हर व्यक्ति में सुधार की संभावना होती है. सभ्यता का यही पैमाना होना चाहिए कि हम अपराधी को और कठोर और स्थाई अपराधी बनाने वाली जेलें न बनाएं. विश्लेषण बताते हैं कि गरीबी, बेरोज़गारी, शिक्षा की कमी और परिवारों के झगड़ों के कारण व्यक्ति अपराधी बनता है. अपराध ख़त्म करने के लिए हमें समाज के वातावरण और परिस्थितियों में सुधार करना होगा.

यह जरूर कहा जा सकता है कि गांधी का संविधान एक सपना हो सकता है, वास्तविकता नहीं; लेकिन दुखद बात यह है कि गांधी के इस सपने को उनकी आँखों के अलावा किसी और ने अपनी आँखों में नहीं उतारा. इस बात से वे भी वाकिफ थे, क्योंकि परिस्थितियां बहुत जटिल थीं. उन्हें भी वास्तविकता अहसास था, इसलिए उन्होंने कहा भी था कि दुनिया में अगर कोई एकाध गांधीवादी है, तो वे खुद हैं! आज जब भारत और पूरा विश्व आर्थिक, सामाजिक, पारिस्थितिकीय और स्वास्थ्य के संकट से जूझ रहा है, तब गांधी की आँखों में जन्में इन सपनों को सक्रिय करने की पहल होना ही चाहिए.
ब्लॉगर के बारे में
सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

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First published: August 3, 2020, 5:54 PM IST
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