गिरिराज किशोर: खरा-खरा कहने वाला वो लेखक, जो साहित्य से लेकर फेसबुक तक मुखर था

हिन्दी के जाने-माने और विलक्षण साहित्यकार गिरिराज किशोर नहीं रहे. यूं तो उन्होंने अपने जीवन में 32 से ज्यादा साहित्य की तमाम विधाओं में किताबें लिखीं लेकिन उनके दो एकदम अलग तरह के उपन्यासों बा और आंजनेय जयते की कम चर्चा हुई, जो लेखक के तौर पर उनके अथाह विस्तार और व्यापक सीमाओं को जाहिर करता है

Source: News18Hindi Last updated on: February 10, 2020, 7:14 PM IST
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गिरिराज किशोर: खरा-खरा कहने वाला वो लेखक, जो साहित्य से लेकर फेसबुक तक मुखर था
हिंदी के जाने-माने साहित्कार गिरिराज किशोर
फेसबुक पर गिरिराज किशोर का पेज बेशक आफिशियल वेरिफाइड नहीं हो लेकिन उनके निधन के एक दिन बाद अगर आप इस पेज पर आइए तो फेसबुक ने खासतौर पर रिमेंमबरिंग गिरिराज किशोर लिखकर श्रृद्धांजलि दी है. साथ ही लोगों से अनुरोध किया हुआ है कि अगर वो यहां उनके बारे में कुछ लिखना चाहे, उनकी यादों को फिर याद करना चाहें तो कृपया उन बातों को यहां शेयर करें.
आमतौर पर फेसबुक ऐसा नहीं करता. उसका ये प्रयास अच्छा लगा कि चलो फेसबुक ने एक ऐसा काम किया, जो वाकई किया जाना चाहिए था. सोशल साइट्स पर जारी ट्रोलिंग, आरोपों-प्रत्यारोपों और विवादों के बीच एक कुछ अलग है.
हालांकि बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन कुछ लोगों ने जरूर यहां पर हिन्दी के इस जाने माने साहित्यकार को याद किया है. कई तरह के कमेंट हैं. उन्हें गांधीवादी कहा गया है. ज्यादातर लोगों ने लिखा पहला गिरमिटिया उनका कालजयी उपन्यास है, जिसने उन्हें साहित्य जगत में एक जगह दिला दी. सुरेंद्र बंसल नाम के शख्स ने टिप्पणी की, साहित्य के गिरिराज का स्थिर हो जाना, विनम्र श्रृद्धांजलि. ..और भी लोगों ने उन्हें अपने तरीके से याद किया है.

फेसबुक पर गिरिराज हमेशा मुखर रहने वाले साहित्यकार थे. जनभावनाओं को महसूस करने वाले. सही और गलत को खरा-खरा कहने वाले. उनकी लिखी बातें पढ़ने में अच्छा लगता था. कभी वो सिस्टम पर चोट करते थे. कभी सियासत पर तो कभी साहित्यजगत की बात करते. उन्हें ट्रोल करने वाले भी कम नहीं थे. उनकी आखिरी फेसबुक पोस्ट 19 अगस्त 2019 को पब्लिश हुई. ईद का दिन था. उन्हें अफसोस था कि जम्म-कश्मीर के लोगों के लिए इस बार ईद वैसी नहीं होगी. इसके बाद वो शायद बीमार हो गए. बीमारी लंबी चली.
फेसबुक द्वारा उनके अकाउंट पर दी गई खास श्रृद्धांजलि और याद


फिर 83 वर्ष की उम्र में वो दुनिया से कूच कर गए. इसमें कोई शक नहीं कि वो मुखर साहित्यकार थे. दबावों में नहीं आते थे. अपनी बात बेबाकी से कहते या लिखते थे. प्रचुर मात्रा में उन्होंने तमाम पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखा.

राष्ट्रपति कलाम से पद्मश्री अवार्ड लेते हुए साहित्यकार गिरिराज किशोर
अगर उनके प्रसिद्ध उपन्यासों की बात करें तो लोग तुरंत ढाई घर और पहला गिरमिटिया का नाम लेते हैं. ढाई घर के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. उन्हें पद्मश्री समेत कई अवार्ड मिले.

उनके आखिरी दो उपन्यास, जिन पर कम बात हुई
इस दौरान मुझको बस एक बात खटकी कि आखिर लोगों के बीच उनके आखिरी दो ऐतिहासिक उपन्यासों "बा" और "आंजनेय जयते" की चर्चा क्यों नहीं हो सकी. जिसमें उन्होंने कुछ वैसा ही शोधपरक काम किया है, जिसकी परंपरा पाश्चात्य देशों के मशहूर लेखकों में रही है. "बा" का मतलब कस्तूरबा गांधी. आमतौर बा के बारे में बहुत कम लिखा गया है. गिरिराज जी की "बा" रिसर्च, तथ्यों और लेखन के साथ स्त्री के नजरिये से गांधी को देखने महसूस करने का गजब का काम था. हिंदी में ऐसा काम बहुत ही कम हुआ है.

इसके बाद गिरिराज जी ने हनुमान को केंद्रीत करते हुए आखिरी उपन्यास लिखा-"आंजनये जयते". मैं इस समय उनके इन्हीं दोनों आखिरी उपन्यासों का जिक्र करुंगा. जिसे पढ़ने का अवसर मुझे मिला. पढ़कर मैं उनके लेखन की गहराई और उसके विस्तार का कायल ही हुआ. हो गया. खैर पहले बात "बा" उपन्यास की

अगर आपने "पहला गिरमिटिया" जैसा चर्चित उपन्यास पढ़ा है तो कह सकते हैं कि "बा" पर उपन्यास लिखकर उन्होंने गिरमिटिया को पूर्णता देने की कोशिश की. इस उपन्यास को लिखने के सिलसिले में लेखक ने दक्षिण अफ्रीका से लेकर पोरबंदर तक की यात्राएं कीं. बा की सबसे बड़ी समस्या थी, उनका और बच्चों का थोड़े थोड़े अंतराल के बाद एक जगह से दूसरी जगह विस्थापित होते रहना. पहले वह देश में थीं, फिर विदेश गईं, वहां की जेलों में. तमाम लोगों से मिले.

गिरिराज किशोर के आखिरी दो उपन्यासों में एक था "बा", जो गहन शोध, तमाम यात्राओं के साथ लिखा गया उपन्यास था, जिसके जरिए उन्होंने गांधी की बा को जिया


वो उपन्यास जो बा का जीवन जीता है
ये उपन्यास उस स्त्री के बारे में बताता है जो बापू के बापू बनने की प्रक्रिया में हमेशा एक खामोश ईंट की तरह नींव बनी रहीं. उनका व्यक्तित्व ऐसा भी था, जिसने घर और देश की जिम्मेदारियों को एक धुरी पर साधा. बा- बापू से स्वतंत्र भी थीं और बापू में भी थीं. जरूरत पड़ी तो अनुगामी बनीं और आवश्यकता हुई तो स्वतंत्र फैसले भी लिए. बा के जीवन में कई बार ऐसे मौके आए जब उन्होंने अपने अधिकारों का बेझिझक इस्तेमाल किया। साथ ही पत्नी का धर्म भी पूरी निष्ठा और सहजता के साथ निभाया.
बा के बारे में किसी ने हिंदी में कभी कलम नहीं चलाई. जब गिरिराज जी ने भी लोगों से इस योजना का जिक्र किया तो कुछ ने हैरानी भी जाहिर की कि इस चरित्र में कितने लोगों की दिलचस्पी होगी. बा के जीवन में तमाम सवाल थे. इस सवालों के साथ उपन्यास को जीना आसान नहीं था.

गांधी हठी और जिद्दी थे. अक्सर उनका परिवार उनके हठ का शिकार होता था. इसे लेकर बा और बापू के बीच वादविवाद भी होता था. हमेशा ही बा के तर्कों के आगे बापू निरुत्तर हो जाते थे. ये बात अलग थी कि अमूमन असहमति के बाद भी बा ने बापू की बातों को माना. एक बार बापू ने सुशीला नैयर से बा के बारे में कहा, उसमें अदभुत अंत:शक्ति है, जिसके बल पर वह तुम लोगों में से किसी से भी अधिक तनाव सहन कर सकती है. मैने सहिष्णुता उससे ही सीखी है.
ये किताब पढने लायक ही नहीं है बल्कि जरूर पढनी चाहिए. शायद ये किताब उन लोगों को जवाब भी है, जो अक्सर बा के जीवन को लेकर बापू पर तमाम आरोप लगाते रहे हैं.

आंजनेय यानि हनुमान जो वनवासी है वानर नहीं
अब उनके आखिरी उपन्यास "आंजनये जयते" की ओर चलते हैं. जो ये गिरिराज के उस विस्तार और बड़े आयामों को दिखाता है कि एक तरफ वो बा के जीवन और मनोविज्ञान में डूबकर लेखनी चलाते हैं तो अगले ही उपन्यास में हनुमान के चरित्र की ओर मुड़ जाते हैं. हालांकि ये भी शोधपरक मजेदार उपन्यास है, जो कई मिथकों और गढ़ी हुई बातों को तोड़ता है.

गिरिराज जी का आखिरी उपन्यास एक धार्मिक चरित्र हनुमान पर लिखा गया था, जिसे उन्होंने पूरे उपन्यास में कहीं भी हनुमान नहीं बल्कि आंजनेय लिखा. ये भी कहा कि आंजनेय वानर नहीं बल्कि वनवासी था, ये अपने आपमें विलक्षण और दिलचस्प रचना है


हनुमान को जिन नामों से पुकारा जाता है, उन्हीं में एक आंजनेय है यानि अंजनी पुत्र. उपन्यास रामकथा के जरिए उस आंजनेय की कहानी कहता है जो वनवासी हैं लेकिन वानर नहीं बल्कि वानर वंश से है. आत्मकथात्मक शैली के उपन्यास में आंजनेय अपना परिचय देते हैं, " मैं न मरकट हूं, न बंदर. वानर वंश का अवश्य हूं. जाम्बवान भी रीक्ष नहीं हैं. उनका जातीय समाज....जैसे मैं वानर गोत्र से हूं, वैसे ही वो भी रक्ष हैं. वनवासी होने के कारण पशु-पक्षियों के नाम पर पूर्वजों ने अपने वंश के नाम रखे थे. वनवासियों में तब ऋषि मुनि नहीं होते थे. वाल्मिकी आदिकवि ने ये बात स्पष्ट नहीं की कि हम वनवासी भी मनुष्य हैं, केवल पहचान के लिए पशु-पक्षियों के नाम धारण कर लिये. बाद में वंशों के नाम से जोड़कर सब लोगों ने हमारी शक्लें भी वही बना दीं."

गिरिराज ने इसकी प्रस्तावना में लिखा, "हनुमान नाम का मैने इसलिए उपयोग नहीं किया, क्योंकि उससे वही वानर आकृति सामने आएगी, जो परंपरागत रूप से हमारे मस्तिष्कों में जमी हुई है." रामचरितमानस से लेकर आजतक हनुमान को क्यों वानर माना जाता रहा, इस पर उनकी प्रस्तावना सवाल उठाती है, तर्क रखती है, संदर्भ देती है, शोध करती है और वाल्मिकी रामायण के उद्धरण प्रस्तुत करती है.
उन्होंने पूरे उपन्यास में आंजनेय यानि हनुमान की निष्ठा, समर्पण, मित्रता और भक्तिभाव का विलक्षण चित्र खींचा है. उपन्यास काफी रोचक और बांधने वाला है. हममे से हर किसी ने रामकथा बार बार पढी होगी लेकिन इस उपन्यास को पढना शुरू करते ही इसका हर पन्ना बांधता है, उत्सुकता जगाता है, कहानी से जोड़ता है.
उनके ये दो आखिरी उपन्यासों से लगता था कि वो फिर किसी बड़े कथानक की तैयारी कर रहे हैं. वैसा करना उनके जैसे लेखक के लिए मुश्किल भी नहीं होता. उनकी फेसबुक पोस्ट उनकी बैचेनी बयां करती थीं तो मुखरता और उस दौर में दो-टूक कहने का साहस भी, जब हर कोई बहुत फासले से चलने और बोलने की सतर्कता बरतने लगा है. नमन गिरिराज जी, आप हमारे दौर के बहुत बड़े साहित्यकार और शख्सियत थे. आपकी अभी बहुत जरूरत थी.

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First published: February 10, 2020, 7:02 PM IST
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