Analysis: पाकिस्तान में गहराता कोरोना संकट और सेना द्वारा सरकार का विस्थापन

पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति दिनों दिन गिरती ही जा रही है साथ ही साथ इमरान खान के सेना की सहायता से सत्ता में आने के बाद, सेना के शासन पर प्रभाव और उसकी शक्ति में अत्याधिक वृद्धि कर दी है और जिसका प्रभाव सत्ता पर स्पष्ट दखल के रूप में अनेकों अवसरों पर देखा जाता रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: April 29, 2020, 12:50 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
Analysis: पाकिस्तान में गहराता कोरोना संकट और सेना द्वारा सरकार का विस्थापन
वैश्विक महामारी के प्रसार के काल में पाकिस्तान के अन्दर एक बार फिर सत्ता के लिए संघर्ष
पाकिस्तान की नीति निर्माण और उसके कार्यपालन में हमेशा से एक द्वैध देखने में आता रहा है. पाकिस्तान की सरकार और सेना के बीच प्रधानता को लेकर सतत चलने वाले संघर्ष में अक्सर इस देश की जनता के हितों को दरकिनार होते देखा गया है. कोरोना वायरस एक वैश्विक आपदा है इससे दुनिया के साधनहीन देशों से लेकर सर्वाधिक सम्पन्न और शक्तिशाली राष्ट्र समान रूप से जूझ रहे हैं, इनमें से एक पाकिस्तान भी है. विगत वर्षों में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति दिनों दिन गिरती ही जा रही है साथ ही साथ इमरान खान के सेना की सहायता से सत्ता में आने के बाद, सेना के शासन पर प्रभाव और उसकी शक्ति में अत्याधिक वृद्धि कर दी है और जिसका प्रभाव सत्ता पर स्पष्ट दखल के रूप में अनेकों अवसरों पर देखा जाता रहा है. और इस वैश्विक महामारी के प्रसार के काल में पाकिस्तान के अन्दर एक बार फिर सत्ता के लिए संघर्ष में तेजी आ गई है.

कोरोना वायरस संकट पर निर्णायक कार्रवाई करने और इसके बढ़ते मामलों के प्रसार को रोकने के प्रयासों के तहत लाये गए लॉकडाउन के बाद प्रधानमंत्री इमरान खान और उनकी सरकार को पाकिस्तान की शक्तिशाली सेना द्वारा दरकिनार कर दिया गया है. उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री खान लम्बे समय तक इसी ऊहापोह की स्थिति में रहे कि लॉकडाउन लाया जाना चाहिए या नहीं. पिछले महीने की 22 मार्च को, प्रधानमंत्री खान ने देश के नाम संबोधन में स्पष्ट कर दिया कि उनकी सरकार एक व्यापक लॉकडाउन नहीं करेगी, जिसके पीछे यह तर्क दिया गया कि ऐसा करने से देश की आबादी रोजगार से वंचित हो जायेगी, और पहले ही गरीबी से संघर्ष कर रहे परिवारों के सामने अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो जाएगा.

ये भी पढ़ें: इमरान खान के करीबी सहयोगी और दक्षिणी सिंध के गवर्नर पाए गए कोरोना पॉजिटिव

परन्तु प्रधानमंत्री की इस घोषणा के 24 घंटे से भी कम समय में , सैन्य प्रवक्ता इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशंस के प्रमुख मेजर जनरल बाबर इफ्तिखार ने घोषणा की कि सेना, पाकिस्तान को जो दुनिया का पांचवां सबसे अधिक आबादी वाला देश है , में संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए एक व्यापक लॉकडाउन की की देखरेख करेगी. और इस घोषणा के साथ ही सेना द्वारा पूरे पाकिस्तान में सैनिकों को तैनात कर दिया है और राष्ट्रीय कोर समिति के माध्यम से कोरोनोवायरस के मामलों पर लगातार निगरानी बनाये गुए है जो संघीय और प्रांतीय सरकारों के बीच समन्वय स्थापित करता है.
कोरोना वायरस का प्रसार जिस तेजी से हो रहा है और साथ ही साथ यह सोशल डिस्टेंसिंग और लॉक डाउन जैसे उपायों के चलते विश्व भर में एक बड़ी आबादी के सामने जीवन का संकट उत्पन्न कर दिया है. नए आ रहे अनुमानों के अनुसार कोरोना से होने वाली मौतों से अधिक इस आपदा के कारण रोजगार की कमी के चलते भूख से मरने वालों की संख्या कहीं अधिक होगी. ऐसी स्थिति में विश्व की अधिकांश देशों की सरकारों के सम्मुख एक विश्वास का संकट खडा होने जा रहा है कि वह इस आपदा से निपटने के लिए कारगर उपाय कर पाई या नहीं. और यह स्थिति स्वाभाविक रूप से तृतीय विश्व के देशों में कहीं अधिक भयंकर होने वाली है. पाकिस्तान इसका एक प्रतिनिधि देश है और जो आसन्न संकट के लिए पूर्णत: खुला हुआ है. परन्तु यहाँ इस मुश्किल दौर में लड़खड़ाते लोकतंत्र के सामने सेना ने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है.

ये भी पढ़ें: पाकिस्‍तान : अब नहीं दिखते रमजान में ढोल बजा कर सहरी के लिए जगाने वाले

कोविड -19 का संकट जो सरकार को अपनी क्षमता साबित करने के लिए एक अवसर प्रदान कर सकता था, सेना ने इसकी अक्षमता का लाभ उठाते हुए इसे झपट लिया है. सरकार द्वारा इस महामारी से निपटने के लिए किये गए उपायों और उनकी वास्तविक मांग के बीच एक बड़ा अंतर बना हुआ था, और सेना ने उस अंतर को भरने की कोशिश की है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस महामारी के विरुद्ध राहत उपायों का सैन्य अधिग्रहण इमरान खान और उनकी सरकार के लिए नीतिगत विफलता का परिचायक है. इससे पहले उनका शासनकाल अनेकों बड़ी असफलताओं के दौर से गुजरा है. भारत में अनुच्छेद 370 को लेकर उठाये गए क़दमों से लेकर पाकिस्तान के आतंकवाद के प्रति रवैय्ये और उसकी लगातार जर्जर अर्थव्यवस्था जिसने देश की बहुलांश जनता के जीवन और अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिए हैं, ने उन्हें पाकिस्तान के सर्वाधिक अयोग्य शासकों की श्रेणीं में धकेलने का ही काम किया है.पाकिस्तान में लोकतान्त्रिक सरकारों की विफलता सदैव ही एक कठोर सैन्य शासन की आकांक्षा का बीज बोती रही है. उल्लेखनीय है 2010 के मानसून के सीजन में पाकिस्तान को विशेषकर इसके उत्तरी क्षेत्रों को बाढ़ की भीषण विभीषिका का सामना करना पड़ा था. और तब पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ जरदारी अपने युवा पुत्र और पार्टी अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी के साथ यूरोप के भ्रमण में व्यस्त थे. प्रधानमन्त्री युसूफ रजा गिलानी जो राजनीतिक रूप से अपरिपक्व थे और कोई भी कदम उठाने में सक्षम नहीं थे. उस समय सरकार को ताक पर रख कर सेना ने बाढ़ राहत, सामग्री और जनशक्ति को सबसे गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचाने और नागरिक शक्ति की सहायता के लिए और देश भर में अभियान चलाने में सर्वप्रमुख भूमिका निभाई थी. इसके साथ ही साथ इसके बेहतरीन प्रदर्शन ने नागरिक अधिकारियों के राहत प्रयासों की गति और दक्षता के सापेक्ष खराब प्रदर्शन की पोल जनता के सामने खोल कर रख दी. यही कारण था कि सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक परवेज़ कयानी नवम्बर 2010 में एक सेवा विस्तार लेने में सफल हुए और उनके इस पूरे कार्यकाल के दौरान सैन्य तख्तापलट की ख़बरें सरगर्म रहीं.

ये भी पढ़ें: PAK: डॉक्टर्स के बाद 51 पुलिसवाले भी कोरोना पॉजिटिव, PPE-मास्क की किल्लत जारी

इस समय इमरान खान एक साथ अनेकों मोर्चों पर जूझ रहे हैं. और हर वह क्षेत्र जहाँ वह असफल साबित होते हैं सेना के लिए बढ़त हासिल करने का जरिया बन जाता है. पाकिस्तान के धार्मिक कट्टरपंथी सरकार की मानने को तैयार नहीं. पाकिस्तान में कोरोना के प्रसार में इसी वर्ग का सबसे बड़ा योगदान रहा है. पाकिस्तान में मार्च की शुरुआत में कोरोना के मामलों में वृद्धि हुई, जब संक्रमित तीर्थयात्रियों और श्रमिकों ने ईरान के धार्मिक शहर कोम से जो एक भयंकर वायरस हॉटस्पॉट बना हुआ था से तफ्तान सीमा पार कर पाकिस्तान में प्रवेश किया.

इसके कुछ हफ़्तों बाद ही पाकिस्तान ने सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए. लेकिन यह तेजी से बढ़ने वाले मामलों पर अंकुश लगाने के लिए पर्याप्त नहीं थे क्योंकि अब इन्हें पाकिस्तान के कट्टरपंथी मौलानाओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा था. सरकार की तमाम अपीलों के बावजूद हर हफ्ते शुक्रवार की नमाज़ के दौरान, हज़ारों की तादाद में मुस्लिम श्रृद्धालु, सोशल डिस्टेंसिंग की अपीलों और आदेशों की धज्जियाँ उड़ाते रहे और ऐसे आदेशों की अवहेलना करते हैं, जो पाँच या अधिक लोगों की धार्मिक सभाओं को प्रतिबंधित करते हैं और अब रमजान शुरू हो चुका है.

सरकार पहले ही घुटने टेक चुकी है और इसके शुरू होने के पहले ही मस्जिदों को रमजान के लिए खुले रहने की अनुमति देने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमे लोगों को एक दूसरे से 6 फीट की दूरी बनाए रखने सहित 20 ऐसे हवाई नियमों का पालन करना आवश्यक बनाया गया जिनका अनुपालन सरकार ही सुनिश्चित नहीं कर सकती. यह लम्बे समय से देखा जा रहा है कि पाकिस्तान का धार्मिक कट्टरपंथी वर्ग सेना के साथ इंटर सर्विस इंटेलिजेंस के माध्यम से गहन संपर्क में रहा है. सरकार के उपायों को विफल करना इस वर्ग की सेना के साथ दुरभिसंधियों का परिणाम भी हो सकता है. अगर यह सत्य है तो सेना अब स्थिति पर तुलनात्मक आसानी से नियंत्रण स्थापित कर सकती है.

पाकिस्तान में अब तक कोविड -19 के 14,000 से अधिक मामलों की जानकारी मिली है और इससे 312 मौतें रिपोर्ट की जा चुकी हैं. परन्तु पाकिस्तान में लाखों लोग गरीबी और जीर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था में रहते हैं, इनमे इस वायरस का प्रभाव और प्रसार विनाशकारी हो सकता है. और लगातार गहराता स्वास्थ्य संकट पहले से ही गंभीर दुरावस्था में पड़ी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को और भी बर्बाद कर रहा है. आईएमएफ के अनुसार, इस महामारी जनित प्रभावों के चलते सकल घरेलू उत्पाद 2020 में 1.5 प्रतिशत सिकुड़ने की संभावना है. अब ऐसी स्थिति में तथाकथित लोकतांत्रिक सरकार का शासन पर से नियंत्रण खोना, और सेना द्वारा कृत्रिम रूप से निर्मित इस निर्वात को भरने की कोशिशें, पाकिस्तान में एक बार फिर सैन्य शासन की आमद की संभावनाओं को प्रबल करती प्रतीत हो रही हैं. मुश्किलों से भरे इस समय में डीप स्टेट के हाथों में सीधे शासन सूत्रों का आना पाकिस्तान समेत पूरे क्षेत्र पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है.

ये भी पढ़ें: PAK : लेखक खलील उर रहमान बोले, 'लिफाफा पत्रकार' कुत्ते की मौत मरें'
facebook Twitter whatsapp
First published: April 29, 2020, 12:25 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर