पाकिस्तान: चीनी प्रभुत्व के समक्ष समर्पण

60 के दशक के प्रारंभ में सैन्य तानाशाह जनरल अयूब खान द्वारा चीन से एक समझौता किया गया जिसके द्वारा उसे ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट जिसे शक्स्गम घाटी भी कहा जाता है का अंतरण चीन को कर दिया गया. यह वह उस क्षेत्र का एक हिस्सा था जिसपर 1948 से पाकिस्तान अवैध कब्जा जमाये हुए है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 29, 2020, 9:45 AM IST
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पाकिस्तान: चीनी प्रभुत्व के समक्ष समर्पण
असामान्य जन्म ने पाकिस्तान को एक विकलांगता की स्थिति भी दी जिससे वह आजादी और विभाजन के 73 साल बाद भी उबर नहीं पाया है
पाकिस्तान का जन्म एक असमान्य और अप्राकृतिक घटना थी जिसमे औपनेवेशिक शासकों के कुछ गूढ़ निहित स्वार्थ सम्मिलित थे और इनका जन्म जिन्ना द्वारा ब्रिटेन स्थित इन औपनेवेशिक आकाओं की खुशामद और हठधर्मिता और इसके प्रति शासकों के आवश्यकता से अधिक उदारता के प्रदर्शन ने इसे वास्तविकता में उतारने में सहयोग प्रदान किया. इस असामान्य जन्म ने पाकिस्तान को एक विकलांगता की स्थिति भी दी जिससे वह आजादी और विभाजन के 73 साल बाद भी उबर नहीं पाया है और अपने पैरों पर खड़ा होना पाकिस्तान के लिए केवल एक अवधारणा बनी हुई है. जहां पहली पाकिस्तान की पहली पीढ़ी ब्रिटेन की मोहताज बनी रही वहीं दूसरी पीढ़ी हाथ पसारे अमेरिका के दरवाजे पर खड़ी पाई गई. और वर्तमान में यह भूमिका चीन अदा कर रहा है.

60 के दशक के प्रारंभ में सैन्य तानाशाह जनरल अयूब खान द्वारा चीन से एक समझौता किया गया जिसके द्वारा उसे ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट जिसे शक्स्गम घाटी भी कहा जाता है का अंतरण चीन को कर दिया गया. यह वह उस क्षेत्र का एक हिस्सा था जिसपर 1948 से पाकिस्तान अवैध कब्जा जमाये हुए है. 1962 के भारत चीन युद्ध के बाद पाकिस्तान सामरिक रूप से चीन के नजदीक आना प्रारंभ हुआ और भुट्टो के शासन काल में इसे बल मिला. जिया उल हक के काल में मुजाहिदीन युद्ध के कारण जहां एक ओर पाकिस्तान और अमेरिका की घनिष्ठता बढ़ी वहीं पूर्ववर्ती अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके विदेश सचिव हेनरी किसिंग़र के प्रयासों से अमेरिका और चीन के बीच कटु संबंधों में सुधार आने लगा था जिससे पाकिस्तान को भी चीन के साथ अपने समानांतर संबंध बनाने में सहूलियत हुई.

9/11 के आतंकवादी हमले और उसके प्रत्युत्तर में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश द्वारा तालिबान शासन के उन्मूलन हेतु चलाये गए अमेरिका और नाटो के संयुक्त अभियान “ऑपरेशन एन्ड्योरिंग फ्रीडम” में जनरल मुशर्रफ के नेतृत्व वाले पाकिस्तान को शामिल होना पड़ा. परन्तु यह पाकिस्तान के लिए कड़वा घूंट पीने के समान था क्योंकि तालिबान उन्हीं के द्वारा पाल पोस कर बड़ा किया गया और उन्हीं के संरक्षण में सत्ता प्राप्त कर सका. परन्तु पाकिस्तान की वैश्विक इस्लामी आतंकवाद में गहन संलग्नता, आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में उसे एक उदासीन सहयोगी ही बना सकी और जिसका परिणाम यह हुआ कि वह अपनी सौदेबाजी की क्षमता को खोता चला गया जिसके कारण उसे मिलने वाली आर्थिक और सामरिक सुविधाओं में कड़ी कटौती की गई. स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान ने अब एक नए स्वामी को खोज लिया और 2014 से पाकिस्तान के कायाकल्प के नाम पर एक नए प्रकार की भिक्षावृत्ति में संलग्न हो गया.

चीन की कूटरचना
चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) एक ऐसी परियोजना है जो मुख्यत: चीन के काशगर से बलूचिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक एक सड़क और इसके साथ ही साथ पाकिस्तान में सड़कों और रेल नेटवर्क के विस्तार के साथ बड़े पैमाने पर विद्युत् उत्पादन परियोजनाओं से जुड़ा हुआ है. जिसकी आरंभिक लागत 46 अरब डॉलर थी जो अब बढ़कर 60 अरब डॉलर के पार पहुंच गई है. इसने पाकिस्तान को न केवल दिवालियेपन की कगार पर ला कर खड़ा कर दिया है बल्कि उसकी संप्रभुता पर गंभीर संकट आ खड़ा हुआ है. और अब पाकिस्तान के ही एक प्रसिद्ध पत्रकार अली सलमान अंदानी ने पाकिस्तान पर मंडरा रहे गहन संकट के विषय में आगाह किया है. एशिया टाइम्स में प्रकाशित अंदानी के एक लेख के अनुसार, सैन्य प्रतिष्ठान की एक कठपुतली बन चुके प्रधानमंत्री खान चीन के हितों के लिए पाकिस्तान के शासन तंत्र को गहन नुकसान पहुंचाया है.

उल्लेखनीय है कि 2014 में सीपीईसी के आने के बाद, 2016 से ही चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) से जुड़े समस्त मामलों के लिए एक सीपीईसी प्राधिकरण की स्थापना के लिए जोर देना प्रारंभ कर दिया था जो पाकिस्तान के बुनियादी ढांचे और बिजली उत्पादन परियोजनाओं को उनके सीधे नियंत्रण में ला देता. हालांकि इस प्रस्ताव को नवाज शरीफ सरकार ने खारिज कर दिया था, लेकिन अंततः सेना की पसंद और उसके द्वारा चुने गये प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया.

शासन तंत्र का विघटन अंदानी का मानना है कि पाकिस्तान के प्लानिंग डेवलपमेंट और स्पेशल इनिशिएटिव के मंत्रालय में जो कि पाकिस्तान के सबसे महत्वपूर्ण राज्य संस्थानों में से एक है, और जिसके वरिष्ठ नौकरशाह शी की घातक सीपीईसी योजना की स्पष्ट रूप से जांच कर सकते हैं और इसके बुरे प्रभावों का विरोध कर सकते हैं, क्योंकि उनके पास समझौते से जुड़े सभी गुप्त दस्तावेजों तक पहुंच थी और सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल थे. और जब तक इस परियोजना की बागडोर सिविल सेवकों और जनप्रतिनिधियों के नेतृत्व में नागरिक संस्थानों के नियंत्रण में रहती तब तक शी का मास्टर प्लान का पूर्ण रूप से अमल में आना संभव नहीं था. इसलिए इस प्रकार के नागरिक संस्थानों को पूरी तरह से हटाने से ही शी को अपने खतरनाक योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में सहूलियत होती. इस समझौते में गोपनीयता का यह हाल था कि पाकिस्तान के समुद्री मामलों के सचिव ने, वित्त पर सीनेट की स्थायी समिति को इसे दिखाने से इनकार कर दिया था. इस बात से स्पष्ट अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह समझौता किस तरह का होना चाहिए.

सीपीईसी अथॉरिटी: चीन के नियंत्रण का एजेंट!
सीपीईसी अथॉरिटी की स्थापना पिछले साल अक्टूबर में संसद की मंजूरी के बिना, केवल राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश का उपयोग करके की गई थी और फिर उसे चार महीने का और विस्तार दिया गया था. लेकिन शी स्थायी नियंत्रण चाहते हैं. और अब पाकिस्तान का प्रधानमंत्री जो सेना और इस तरह से चीन का कठपुतली बना हुआ है, वह अनेकों अनैतिक हथकंडों को अपना कर संसद के द्वारा इस प्राधिकरण को अधिक शक्तिशाली और संवैधानिक निकाय का रूप देने में लगा हुआ है. यह आश्चर्य की बात नहीं जब से प्राधिकरण अस्तित्व में आया है, इसके अध्यक्ष सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट-जनरल रहे हैं. लेफ्टिनेंट जनरल असीम सलीम बाजवा को सेनाध्यक्ष का नजदीकी माना जाता है. यह दिखाता है कि शी जिनपिंग बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव या इसके किसी भी घटक को, पाकिस्तान के किसी भी जनता के प्रति उत्तरदायी निकाय के अधीन नहीं रखना चाहेंगे.

अंदानी का मानना है कि “2050 तक दुनिया के अधिकांश लोगों को मुक्त करने” का शी जिनपिंग का चीनी सपना पूरा नहीं होगा, यदि बीआरआई द्वारा पीड़ित देशों के लोग उनके वायदे और उनकी भावी पीढ़ियों को नष्ट करने की उनकी रणनीति के बारे में जागरूक हो गए. यथार्थ में चीन इन लुभावनी योजनाओं का लालच दिखा कर उन देशों को कर्ज के जाल में फंसा रहा है, जबकि वे पहले से ही गहन आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. शी धीरे-धीरे विदेशी मुद्रा भंडार की अत्यधिक कमी पैदा करके पाकिस्तान और उस जैसी अन्य गरीब अर्थव्यवस्थाओं को विनाश की कगार पर पहुंचा देगा जहां अंत में, इन देशों को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा अपनी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के अतिक्रमण को स्वीकार करना ही होगा. असल में यह मुक्ति उनकी चीनी दासता की भूमिका है.

एक संविधानेतर निकाय!
इस लेख में अंदानी जिस खतरनाक स्थिति के बारे में बताते हैं वह यह है कि जिस तरह से इस सीपीईसी अथॉरिटी को शक्तिशाली बनाया जा रहा है निकट भविष्य में यह एक संविधानेतर निकाय बन जाएगा और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अनुषंगी संगठन के रूप में पाकिस्तान में काम करेगा और सीपीईसी से संबंधित सभी गतिविधियों को संचालित करने, लागू करने, विस्तार, लागू करने, नियंत्रित करने, समन्वय, निगरानी, मूल्यांकन और संचालन करने के लिए ज़िम्मेदार होगा. यह इतनी शक्तिशाली हो जाएगा कि पाकिस्तान के किसी भी सार्वजनिक कार्यालय धारक (जिसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी शामिल हैं) या किसी अन्य व्यक्ति जो सीपीईसी से संबंधित गतिविधियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संलग्न हैं, यदि वह सीपीईसी अथॉरिटी के निर्देश या निर्दिष्ट आदेश का विरोध करेंगे, उनके खिलाफ जांच शुरू करने और दंड लगाने की संवैधानिक शक्ति भी इसके पास होगी. यहां तक कि प्रधानमंत्री की शक्तियां सीपीईसी अथॉरिटी विधेयक 2020 में निर्दिष्ट की गई शक्तियों तक ही सीमित होंगी, इसलिए उसे भी शी की आज्ञाओं का अनुवर्ती होना ही होगा.

चीन में न केवल लोकतंत्र का अभाव है उससे अधिक वह लोकतंत्र का शत्रु है. और पाकिस्तान जहां लोकतंत्र का अत्यंत ही ख़राब रिकॉर्ड रहा है अब एक बार फिर शी जिनपिंग, पाकिस्तान के लोगों के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रतिनिधियों और सिविल सेवकों को दरकिनार करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं ताकि देश की राजनीतिक और आर्थिक प्रक्रियाओं पर चीन के सीधे प्रभाव का विस्तार किया जा सके. यह एक नई प्रक्रिया जो पाकिस्तान के चीन के साथ तथाकथित “मधुर संबंधों” के निहितार्थ को दर्शाती है. साथ ही साथ यह ईरान जैसे देशों के लिए भी सीख लेने का विषय है कि जो चीन के बिछाए जाल के नया शिकार है और चीनी सहयोग से ईरान के कायाकल्प के स्वप्न देख रहे हैं.

(लेखक कश्मीर मामलों के जानकार हैं और जम्मू-कश्मीर स्टडी सेंटर से जुड़े हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
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First published: July 29, 2020, 9:45 AM IST
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