OPINION: तालिबान का वार्ता से पीछे हटना: पाकिस्तान पर प्रभाव

तालिबान और अफगान सरकार के बीच होने वाली यह शान्ति वार्ता, फरवरी में तालिबान और अमेरिकी सरकार के बीच हुए समझौते का अगला चरण मानी जा रही थी.

Source: News18Hindi Last updated on: April 7, 2020, 9:28 PM IST
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OPINION: तालिबान का वार्ता से पीछे हटना: पाकिस्तान पर प्रभाव
पाकिस्तान सालों से फिराक में है कि अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका और अंतर्राष्ट्रीय सेनाओं की वापसी हो तथा तालिबान की सहायता से वह अपना प्रभाव इस क्षेत्र में बढ़ा सके. File Photo AP
दुर्दांत आतंकी संगठन तालिबान ने आज एक बयान जारी कर कहा है कि उसने अफगान सरकार के साथ वार्ता को तोड़ दिया है. उल्लेखनीय है अफगान सरकार और तालिबान के बीच यह गतिरोध कैदियों की रिहाई के प्रश्न पर उपस्थित हुआ. उल्लेखनीय है कि तालिबान और अफगान सरकार के बीच होने वाली यह शान्ति वार्ता, फरवरी में तालिबान और अमेरिकी सरकार के बीच हुए समझौते का अगला चरण मानी जा रही थी. तालिबान ने इस सबके लिए अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और उनके प्रशासन को दोषी ठहराया है. तालिबान के अनुसार सरकार लगातार बहाने बनाकर तालिबानी कैदियों की रिहाई में अडचने पैदा कर रही थी. वहींं दूसरी ओर काबुल में अफगान नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के एक प्रवक्ता जाविद फैसल ने इस सबके लिए तालिबान को उत्तरदायी ठहराया और तालिबान से "बहाने बनाकर इस प्रक्रिया को बाधित नहीं करने" का आह्वान किया.

कैदी विनिमय प्रक्रिया शुरू करने के लिए तालिबान की तीन सदस्यीय टीम पिछले महीने काबुल पहुंची थी. और अफगान अधिकारियों ने बताया था कि वे 100 ऐसे तालिबानी कैदियों को रिहा करेंगे जो 50 वर्ष से अधिक उम्र के थे. बदले में, तालिबान से अफगान सुरक्षा बलों के 20 सदस्यों को मुक्त करने की उम्मीद थी। परन्तु अफगान सैन्य अधिकारियों का कहना है कि तालिबान हाल के वर्षों में कुछ सबसे हिंसक हमलों में शामिल वरिष्ठ तालिबानी कमांडरों की रिहाई की मांग कर रहा था. जो कि अफ़ग़ानिस्तान की सरकार के लिए स्वीकार करना व्यवहारिक नहीं कहा जा सकता.

इस वार्ता के निलंबन से इस क्षेत्र में एक बार फिर हिंसा बढ़ने का ख़तरा मंडराने लगा है और अगर ऐसा होता है तो 29 फरवरी को संयुक्त राज्य अमेरिका और तालिबान द्वारा कतरी राजधानी, दोहा में हस्ताक्षर किए गए एक समझौते के तहत अमेरिकी सैनिकों को वापस लेने की योजना को खतरे में पड़ सकती है. उल्लेखनीय है कि अमेरिका और तालिबान के मध्य हुए इस समझौते में 18 साल से जारी इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए विश्वास-निर्माण उपायों के तहत अफगानिस्तान सरकार से 5000 तालिबानी लड़कों को रिहा करने कि लिए अपील की गई थी. वहींं दूसरी ओर तालिबान ने अपने कब्जे में लिए गए 1,000 से अधिक अफगान सरकारी सैनिकों और असैन्य श्रमिकों को रिहा करने की वचन दिया था.

उल्लेखनीय है कि अमेरिकी नेतृत्व वाली अंतर्राष्ट्रीय सेनाएं तालिबान द्वारा सुरक्षा गारंटी दिए जाने के बाद स्वदेश वापस करने जा रही हैं, लेकिन अफगान सरकार और आतंकवादियों के बीच वार्ता के खटाई में पड़ने से यह वापसी भी अधर में लटक सकती है. अब ऐसे में एक बार फिर पाकिस्तान की भूमिका और उस पर पड़ने वाला प्रभाव महत्वपूर्ण हो जाता है . तालिबान के पीछे पाकिस्तान का नैतिक राजनैतिक और सामरिक समर्थन सदैव रहा है. एक प्रकार से तालिबान, अफ़ग़ानिस्तान को पाकिस्तान के प्रभाव क्षेत्र में लाने का महत्वपूर्ण जरिया है. साथ ही साथ अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी और अंतर्राष्ट्रीय सेनाओं के हटने के कारण उसपर काफी मात्रा में दवाब हटने की संभावना थी. इसलिए अमेरिकी सरकार और तालिबान के बीच हुए समझौते के कारण पाकिस्तान एक अत्यंत लाभदायक स्थिति में आ सकता था जिसका हर्षोल्लास उनके नेताओं के बयानों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था.
9/11 के आतंकवादी हमलो के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने अमेरिकी दवाब के आगे झुकते हुए अपने देश के कत्त्र्पंथियों के प्रचंड विरोध का सामना करते हुए, अमेरिका को समर्थन देने की घोषणा की. हालांकि इसके पीछे गहन अंतर्राष्ट्रीय दबाव थे परन्तु यह मुशर्रफ को पाकिस्तान की पीड़ा व्यक्त करने से नहीं रोक पाए. अभी हाल ही में डि क्लासिफाइड किये गए एक कूटनीतिक सन्देश के अनुसार परवेज मुशर्रफ ने इस्लामाबाद में अमेरिकी राजदूत से कहा था कि उनका देश तालिबान के खिलाफ युद्ध में संयुक्त राज्य अमेरिका की सहायता करेगा, जो लंबे समय पाकिस्तान के संरक्षण में रहा है. उन्होंने कहा, उन्हें उम्मीद है कि युद्ध छोटा और सीमित दायरे में होगा, और पाकिस्तान के लिए शत्रुतापूर्ण पड़ोसी पैदा नहीं करेगा. मुशर्रफ ने आगे कहा कि “आप यहाँ आतंकवादियों को मारने के लिए हैं, दुश्मन बनाने के लिए नहीं. ” इस केबल के अनुसार मुशर्रफ ने अफगानिस्तान में पाकिस्तान के प्रति एक मित्रतापूर्ण सरकार की स्थापना पर बल दिया था. लेकिन यह युद्ध लगातार जारी है और पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी तालिबान को लगातार धन और संसाधन उपलब्ध कराती आ रही हैं जिसके कारण इस क्षेत्र की शांति खतरे में पड़ी हुई है.

लेकिन अमेरिका और तालिबान के इस समझौते से पाकिस्तान की उम्मीदे बढ़ गईं थी वो तालिबान से कहीं अधिक उल्लास में था. परन्तु आज हुई यह घटना पाकिस्तान के लिए एक बड़े आघात से कम नहीं है . दरकती अर्थव्यवस्था और कोरोना जैसी महामारी के प्रसार से घिरे पाकिस्तान के लिए बड़ा आघात है. पाकिस्तान जो सालों से इस फिराक में है कि अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका और अंतर्राष्ट्रीय सेनाओं की वापसी हो तथा तालिबान की सहायता से वह अपना प्रभाव इस क्षेत्र में बढ़ा सके. उसका सबसे बड़ा भय भारत का अफगानिस्तान की सरकारों , पहले हामिद करजई और अब अशरफ गनी के काल में अफगानिस्तान से गहरी मित्रता के चलते अपना गहरा प्रभाव स्थापित करने में कामयाब हो गया है. साथ ही साथ वह पाकिस्तान के पश्चिम में अफगानिस्तान और ईरान के साथ मिलकर, पाकिस्तान और चीन की क्षेत्रीय प्रभुता स्थापित करने की योजनाओं को छिन्न भिन्न कर सकता है. उल्लेखनीय है कि चाबहार परियोजना के माध्यम से भारत ने लैंड लॉक अफगानिस्तान को ईरान के जरिये एक सुविधाजनक व्यापारिक मार्ग प्रदान किया है. वहींं दूसरी ओर कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकी संगठन तालिबान और पाकिस्तान को, अफगानिस्तान सरकार की बहुलतावादी विचारधारा से जो अफ़ग़ानिस्तान के बहुसंख्यक नृजातीय समूह पख्तून के साथ साथ अल्पसंख्यक ताजिक, हजारा, उज़बेक, अल्माक, तुर्कमान और बलोच जैसे समुदायों के साथ सत्ता में सहभागिता को प्रोत्साहित करती है, से सदैव ही परेशानी रही है.

तालिबान सदैव से अत्यधिक अविश्वसनीय और गैर जिम्मेदार संगठन रहा है. और एक आतंकी संगठन से विश्वास की अपेक्षा अमेरिका की विवशता को दिखाता है. अमेरिका के लिए यह चुनावों का वर्ष है और डोनाल्ड ट्रम्प की राजनैतिक आवश्यकताएं ही हैं जो अमेरिका इस स्थिति में आकर तालिबान से शान्ति का प्रार्थी बनने की दशा में आ गया है. परन्तु तालिबान के प्रपंचों के आगे अमेरिका कब तक अपना धैर्य नहीं खोता यह महत्वपूर्ण प्रश्न है. अभी 5 अप्रैल को, तालिबान ने दावा किया कि उन्होंने पिछले साल की तुलना में अपने हमलों को कम कर दिया है और साथ ही चेतावनी दी कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा दोहा सौदे की शर्तों का उल्लंघन किया जा रहा है और अगर यह जारी रहा तो इससे समझौते को गहरा नुकसान हो सकता है. हालाँकि अमेरिकी सेना के एक प्रवक्ता ने उग्रवादियों के आरोपों को "निराधार" कहकर खारिज कर दिया परन्तु इस समझौते पर खतरे का साया मंडराने लगा है. जहाँ एक ओर इसके गहन प्रभाव अफगानिस्तान पर तो पड़ेंगे ही वहीँ दूसरी ओर काफी हद तक यह पाकिस्तान की राजनीति और उसकी उत्तर पश्चिमी सीमा पर कहीं अधिक स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होंगें. कुल मिलाकर इस समझौते की उपयोगिता जिसे हम पाकिस्तान के दृष्टिकोण से अलग हट कर देखें तभी तक है जब अफ़ग़ानिस्तान की धरती पर शान्ति स्थापित करने में सफल हो सके.(ये लेखक के निजी विचार हैं. लेखक पाकिस्तान सम्बन्धी मामलो के विशेषज्ञ हैं )
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First published: April 7, 2020, 9:13 PM IST
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