तीन कृषि कानून होंगे वापस, PM मोदी का राष्ट्रहित में भरोसेमंद निर्णय

गुरुपर्व के मौके पर साहसिक निर्णय लेते हुए प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में भरोसा दिलाया कि संसद के शीतकालीन सत्र में उन कानूनों को वापस लिया जाएगा. इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि किसानों के नाम पर हो रहे आंदोलन अब खत्म होंगे. अब केंद्र सरकार ने जीरो बजट खेती यानि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए एक कमेटी का गठन भी किया है.

Source: News18Hindi Last updated on: November 20, 2021, 7:00 AM IST
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तीन कृषि कानून होंगे वापस, PM मोदी का राष्ट्रहित में भरोसेमंद निर्णय
पीएम नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को किया कृषि कानून वापस लेने का ऐलान.


बीते वर्ष 17 सितंबर 2020 को भारत के किसानों को ऐसी सौगात मिली थी, जिसका इंतजार कई दशकों से था. कृषि को उद्योग की तरह ढांचा देने और किसानों को बिचौलियों से मुक्त कर अपनी फसल को अपनी मनमर्जी से बेचने की छूट देने की दिशा में कृषि सुधारों से जुड़े कानूनों का कवच मिला था, ताकि किसान खुशहाल हो और आत्मनिर्भर कृषि आत्मनिर्भर भारत का अहम हिस्सा बने.


कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) और कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक संसद से पारित हुआ, जो देश के कृषि क्षेत्र में अभी तक का सबसे बड़ा सुधार था. लेकिन, उसके विरोध ने देश भर में एक भ्रम का माहौल बनाया. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी जिम्मेवारी को महसूस किया और उन सुधारों को वापस लेने का एलान कर दिया है.


गुरुपर्व के मौके पर साहसिक निर्णय लेते हुए प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में भरोसा दिलाया कि संसद के शीतकालीन सत्र में उन कानूनों को वापस लिया जाएगा. इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि किसानों के नाम पर हो रहे आंदोलन अब खत्म होंगे. अब केंद्र सरकार ने जीरो बजट खेती यानि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए एक कमेटी का गठन भी किया है.


यह कमेटी देश की बदलती आवश्यताओं के अनुसार क्रॉप पैटर्न को बदलने, एमएसपी को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने का काम करेंगी. कमेटी में, केंद्र सरकार, राज्य सरकारों के प्रतिनिधि होंगे, किसान होंगे, कृषि वैज्ञानिक होंगे, कृषि अर्थशास्त्री होंगे. यानी अब कृषि के मुद्दे पर सर्वसम्मत फैसले की दिशा में मोदी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है, ताकि भविष्य में कभी किसानों को बरगलाने की ऐसी कोशिशें ना हो.


राजनीति में कई बार ऐसे मौके भी आते हैं कि सरकार को कड़वे फैसले भी करने पड़ते हैं. लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब भावनाओं का भी आदर करते हुए मोदी सरकार ने फैसले लिए हैं. इससे पहले, भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर भी सरकार ने जन भावनाओं का सम्मान किया था.


जनभागीदारी पर आधारित है प्रधानमंत्री की सोच

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी की सोच-सबका प्रयास यानी जनभागीदारी पर आधारित है. ऐसे में किसी समूह विशेष की भावनाओं का भी आदर करना उनकी राष्ट्रनीति का हिस्सा है. संभवतया प्रधानमंत्री यह जरूर महसूस कर रहे थे कि कृषि सुधारों का ऐतिहासिक कदम, कुछ लोगों की राजनीति का हथियार बन गया है जो लाभान्वित होने वाले 80 फीसदी किसानों को भी बरगला सकते हैं.


प्रधानमंत्री ने गुरुपर्व के मौके पर अपनी भावना का इजहार करते हुए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान कर दिया. लेकिन यह समझना जरूरी है कि कृषि सुधारों का ही परिणाम रहा है कि आज भारत कृषि निर्यात के मामले में पहली बार दुनिया के टॉप-10 देशों में पहुंचा है. कोरोना काल में ही देश ने कृषि निर्यात के नए रिकॉर्ड बनाए हैं. आज भारत की पहचान एक बड़े कृषि निर्यातक देश की बन रही है.


भारत में जो कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर, कनेक्टिविटी का इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है या फिर जो बड़े-बड़े फूड पार्क लग रहे हैं, इनका बहुत बड़ा लाभ छोटे किसानों को ही हो रहा है. इंफ्रास्ट्रक्चर फंड हो या फिर 10 हज़ार किसान उत्पादक संघों का निर्माण, कोशिश यही है कि छोटे किसानों की ताकत को बढ़ाया जाए. छोटे किसानों की बाज़ार तक पहुंच भी अधिक हो और बाजार में मोलभाव करने की उनकी क्षमता में भी वृद्धि हो.


इन किसान उत्पादक संघों के साथ जब सैकड़ों छोटे किसान एकजुट होंगे, तो उनकी ताकत सैकड़ों गुना बढ़ जायेगी. इससे फूड प्रोसेसिंग हो या फिर निर्यात, इसमें किसानों की दूसरों पर निर्भरता कम होगी. देश के 80 प्रतिशत से ज्यादा किसान ऐसे हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन है. पहले जो देश में नीतियां बनीं, उनमें इन छोटे किसानों पर जितना ध्यान केंद्रित करना चाहिए था, उतना नहीं हुआ.


लेकिन, अब इन्हीं छोटे किसानों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिए जा रहे हैं. आने वाले वर्षों में देश के छोटे किसानों की सामूहिक शक्ति को और बढ़ाना होगा. उन्हें नई सुविधाएं देनी होंगी. इसी भावना के साथ आने वाले 25 साल के एक संकल्पों को सिद्ध करना है. छोटा किसान बने देश की शान, ये नए भारत सपना है.


 नये भारत का सफर, खुशहाल होता किसान

आजादी के शताब्दी वर्ष के दृढ़ संकल्प के साथ इस 15 अगस्त को हिंदुस्तान अपनी आजादी के 75 में साल में प्रवेश कर चुका है, तब भारत का किसान यानी अन्नदाता भी देश की विकास यात्रा का सहभागी बन चुका है. 1947 में जब आजादी मिली तब देश के सामने सबसे बडे संकटों में से एक था कि कैसे पूरे देश का पेट भरा जाये और इतना खाद्यान्न कहां से लाये कि लोगों को भूखे पेट न सोना पड़े. लेकिन, हरित क्रांति के सहारे देश के अन्नदाताओं ने यह संभव कर दिखाया.


बावजूद इसके, आजादी के 7 दशक बाद भी किसानों की समस्याएं कम नही हुई. ऐसे में मोदी सरकार ने बीते 7 वर्षो में किसानों की आय दोगुनी करने के लिये तमाम योजनाएं बनाई. किसानों को लागत से डेढ़ गुनी कीमत दिलाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाना हो या फिर 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य हो. किसान सम्मान निधि के तहत 10 साल में किसानों के खाते में सीधे 7 लाख करोड़ रु. देना हो, किसानों के प्रति नरेंद्र मोदी सरकार की सिर्फ यह सोच नहीं, बल्कि संकल्प है.


अब कृषि को उद्योग की तरह ढांचा देने और किसानों को बिचौलियों से मुक्त कर अपनी फसल को अपनी मर्जी से बेचने की छूट देने की दिशा में किसानों को कानूनी कवच मिल चुका है, ताकि किसान खुशहाल हो और कृषि बने आत्मनिर्भर भारत का अहम हिस्सा. इसके लिए केंद्र सरकार ने 2014 से ही किसानों के कल्याण की दिशा में अनेक महत्वपूर्ण फैसले लेने शुरू कर दिए थे. सरकार की पहल एक राष्ट्र-एक बाजार की सोच के तहत थी, जिसका एलान प्रधानमंत्री ने 2016 में लाल किले के प्राचीर से किया था.


यह एक ऐसा सुधार था जिसका आजादी के बाद से ही किसानों को इंतजार था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच समूचे राष्ट्र के किसानों का संतुलित और समुचित विकास करना है क्योंकि अभी तक मुट्‌ठी भर समृद्ध किसानों को ही इसका लाभ मिल रहा था और लगभग 86 फीसदी छोटे और सीमांत किसान इससे वंचित थे. लेकिन बीते सात साल में कृषि क्षेत्र में चरणबद्ध तरीके यानी बुवाई से पहले, बुवाई के दौरान और बुवाई के बाद की योजनाओं पर जिस तरह से काम हुआ है उससे देश के किसान सबल और सशक्त हो रहे हैं.


कृषि क्षेत्र में आमूल-चूल परिवर्तन करते हुए केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया है. अगर उदाहरणों में देखें तो सरकार ने खरीफ हो या रबी सीजन, एमएसपी पर अब तक की सबसे बड़ी खरीद की है. इससे, धान किसानों के खाते में लगभग 1 लाख 70 हजार करोड़ रुपए और गेहूं किसानों के खाते में लगभग 85 हजार करोड़ रुपए सीधे पहुंचे हैं. किसान और सरकार की इसी साझेदारी के कारण आज भारत के अन्न भंडार भरे हुए हैं.


पहली बार दुनिया के टॉप-10 देशों में पहुंचा भारत

इस साल अब तक की सबसे बड़ी और सर्वाधिक खरीद का रिकॉर्ड साबित करता है कि एमएसपी खत्म करने की बात बेमानी है. कृषि सुधारों से किसानों को मंडी टैक्स से आजादी मिल गई है. पहले जब किसान मंडी जाता था तो उसे 2 फीसदी से 8.5 फीसदी तक मंडी टैक्स का बोझ भी उठाना पड़ता था. लेकिन मंडी के बाहर भी अपनी फसल को बेचने की छूट मिलने से करोड़ों किसानों को इस टैक्स के बोझ से मुक्ति मिली है और फसल की अच्छी कीमत मिलने की कहानियां भी देखने को मिल रही है.


आज भारत कृषि निर्यात के मामले में पहली बार दुनिया के टॉप-10 देशों में पहुंचा है. कोरोना काल में ही देश ने कृषि निर्यात के नए रिकॉर्ड बनाए हैं. देश के 80 प्रतिशत से अधिक किसानों के पास 2 हेक्टेयर तक ही जमीन है. आने वाले 25 साल में देश की कृषि को समृद्ध करने में इन छोटे किसानों की बहुत बड़ी भूमिका रहने वाली है. इसलिए अब देश की कृषि नीतियों में इन छोटे किसानों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है. इसी भावना के साथ बीते सालों में छोटे किसानों को सुविधा और सुरक्षा देने का एक गंभीर प्रयास किया जा रहा है.


पीएम किसान सम्मान निधि के तहत अब तक 1 लाख 60 हजार करोड़ रुपए किसानों को दिए गए हैं. इसमें लगभग 1 लाख करोड़ रुपए तो कोरोना के मुश्किल समय में ही छोटे किसानों तक पहुंचे हैं. यही नहीं, कोरोना काल में ही 2 करोड़ से ज्यादा किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए गए हैं, जिनमें से अधिकतर छोटे किसान हैं. इनके माध्यम से किसानों ने हजारों करोड़ रुपए का ऋण भी लिया है. कल्पना कीजिए, अगर ये मदद छोटे किसानों को ना मिलती तो, 100 वर्ष की इस सबसे बड़ी आपदा में उनकी क्या स्थिति होती? उन्हें छोटी-छोटी जरूरतों के लिए कहां-कहां नहीं भटकना पड़ता?


इंफ्रास्ट्रक्चर फंड हो या फिर 10 हजार किसान उत्पादक संघों का निर्माण, कोशिश यही है कि छोटे किसानों की ताकत को बढ़ाया जाए. छोटे किसानों की बाजार तक पहुंच भी अधिक हो और बाजार में मोलभाव करने की उनकी क्षमता में भी वृद्धि हो. इसके माध्यम से, सहकारी तंत्र से, सैकड़ों छोटे किसान एकजुट होंगे, तो उनकी ताकत सैकड़ों गुना बढ़ जायेगी. इससे फूड प्रोसेसिंग हो या फिर निर्यात, इसमें किसानों की दूसरों पर निर्भरता कम होगी. वो स्वयं भी सीधे विदेशी बाजार में अपना उत्पाद बेचने के लिए स्वतंत्र होंगे.


बंधनों से मुक्त होकर ही देश के किसान और तेजी से आगे बढ़ सकेंगे. मोदी सरकार का प्रयास देश के किसान को उद्यमी बनाना है जिसके लिए बीज से लेकर बाजार की यात्रा को किसानों के लिए सुलभ, सहज और सजग बनाया जा रहा है.,मोदी सरकार ने खेती के अलावा भी किसानों के लिये कई रास्ते खोले गये है और उनमें मदद कर रही है. पशुपालन से लेकर मधुमक्खी पालन या फिर मछली पालन से लेकर आर्गेनिक खेती, केन्द्र सरकार ने इन तमाम मोर्चो पर किसानों को एक नई राह दिखाई है. किसान रेल की शुरुआत हो या फिर राष्ट्रीय बांस मिशन, किसानों की तकदीर और तस्वीर बदलने का काम भी जारी है.


अब भारत उस स्थिति की तरफ बढ़ रहा है जब गांव के पास ही ऐसे क्लस्टर बनेंगे जहां, फूड प्रोसेसिंग से जुड़े उद्योग भी लगेंगे और पास ही उससे जुड़े रिसर्च सेंटर भी होंगे. यानी एक तरह से हम कह सकते हैं- जय किसान, जय विज्ञान और जय अनुसंधान. इन तीनों की ताकत जब एकजुट होकर काम करेगी, तब देश के किसानों के जीवन में बहुत बड़े बदलाव होने तय हैं. भले तीनों कानून वापस लेने का फैसला हो गया है लेकिन अन्नदाता किसानों के हित में सरकार की प्रतिबद्धता जारी रहेगी, इसका भी भरोसा प्रधानमंत्री ने दे दिया है.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
संतोष कुमार

संतोष कुमार वरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। रामनाथ गोयनका, प्रेस काउंसिल समेत आधा दर्जन से ज़्यादा पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है। भाजपा-संघ और सरकार को कवर करते रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव पर भाजपा की जीत की इनसाइड स्टोरी पर आधारित पुस्तक "कैसे मोदीमय हुआ भारत" बेहद चर्चित रही है।

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First published: November 20, 2021, 7:00 AM IST
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