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    जन्मदिन विशेष: अमित शाह में है जिद और जुनून के साथ लक्ष्य साधने की कला

    जन्मदिन विशेष: गृह मंत्री अमित शाह ने संगठन के बाद सरकार में भी अपनी कौशल क्षमता का लोहा मनवाया तो जब भी संसदीय इतिहास में भारत के मोदीमय होने की गाथा का वर्णन होगा, उसमें ‘चाणक्य नीति’ की तरह ‘शाह नीति’ का जिक्र स्वाभाविक होगा.

    Source: News18Hindi Last updated on: October 22, 2020, 7:13 PM IST
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    जन्मदिन विशेष: अमित शाह में है जिद और जुनून के साथ लक्ष्य साधने की कला
    अमित शाह.
    बात लोकसभा चुनाव अभियान के समय की है. भाजपा ने 17 कमेटियां गठित की थी, जिसमें साहित्य निर्माण समिति का जिम्मा पार्टी की वरिष्ठतम नेता (दिवंगत) सुषमा स्वराज को दी गई थी. उन्होंने कई दौर की बैठक के बाद अलग-अलग विषयों पर चार-चार पन्ने का पंफलेट तैयार कराया. उसका कवर डिजाइन इस तरह था कि सबसे ऊपर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर थी और दाईं तरफ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की. पंफलेट की हेडलाइन और पार्टी का कमल निशान नीचे था. सभी पंफलेट अंतिम मंजूरी के लिए पूरी टीम की अमित शाह के साथ बैठक हुई. इस बैठक में शाह ने सभी पन्ने पलटे और आखिर में कवर डिजाइन पर थोड़े ठहरे. फिर अपनी तस्वीर की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘बाकी सब ठीक है, सिर्फ इसे हटा दो.’ सभी आश्चर्य में थे क्योंकि भाजपा संगठन में अध्यक्ष का पद सर्वोपरि होता है और इस नाते किसी भी समारोह या प्रचार सामग्री में या किसी भी सांगठनिक गतिविधि में अध्यक्ष की तस्वीर अमूमन अनिवार्य होती है. शाह के निर्देश के बाद पार्टी का चुनाव चिन्ह ‘कमल’ मोदी की तस्वीर के साथ बड़े आकार में आ गया.

    अमित शाह की यह रणनीति पार्टी नेताओं को भी तब समझ आई जब चुनाव के आधिकारिक पोस्टरों-बैनरों पर भी शाह की तस्वीर नजर नहीं आई. दरअसल यह पूरे चुनाव को मोदीमय करने की ‘शाह नीति’ थी. इसलिए शाह ने एक स्पष्ट निर्णय लिया कि प्रचार सामग्रियों पर सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही होंगे. आधुनिक राजनीति का चाणक्य कहें या फिर मोदी के भरोसेमंद सारथी, इसी खास सोच की वजह से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की यह अमिट पहचान बन चुकी है.

    2014 में भाजपा महासचिव के रुप में तो अब 2019 में अध्यक्ष के रुप में मोदी की जीत की बड़ी पटकथा लिखने वाले शाह की किस्मत नहीं, उनकी कार्यशैली ने उन्हें यह तमगा दिलाया है. जीवन और लक्ष्य को साधने की उनकी प्रवृत्ति ने उन्हें उस वक्त बड़ी ताकत दी थी जब सोहराबुद्दीन केस में उन्हें कुछ साल के लिए गुजरात से बाहर रहना पड़ा था. यही वह समय था जब शाह ने देश के अन्य हिस्सों में अपने राजनैतिक संपर्कों को आगे बढ़ाया और ऐसा नेटवर्क खड़ा कर लिया जो 2013 में महासचिव बनने के बाद उनके काम आया. चुनौतियों से जूझने की उनकी छवि ही उन्हें जुझारू और लक्ष्य के प्रति जुनूनी बनाती है. जिसकी सबसे बड़ी मिसाल उनका महज एक साल पुरानी राज्यसभा सीट को छोड़कर जनता से सीधे सरोकार रखने वाली लोकसभा के लिए मैदान में गांधीनगर सीट से चुनाव लड़ना था. शाह अंदरूनी बातचीत में साल भर से यह कहते थे कि राज्यसभा उनकी छवि के हिसाब से मुफीद नहीं है. शाह की छवि एक मजबूत और जुझारू नेता की है और वे ऐसे में वे खुद को लोकसभा में होने की बात साल भर से कर रहे थे. 2019 में मोदी को दोबारा सत्ता में वापस लाने की चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी के बावजूद शाह ने लालकृष्ण आडवाणी की जगह खुद गांधीनगर से उतरने का फैसला कर जीवटता दिखाई. इसके जरिए शाह ने 2024 की भी रणनीति अपने जेहन में बिठा ली है. मोदी के सबसे भरोसेमंद होने के बावजूद शाह की जिम्मेदारी सहज नहीं रही है, बल्कि बढ़ गई थी. 2019 उनके लिए बड़ी चुनौती थी, वह भी उस वक्त जब हाल ही में तीन राज्यों की सत्ता हाथ से गंवानी पड़ी थी.

    शाह ने 2019 के लिए पूरी तरह से मोदी के विकास एजेंडे को आगे बढ़ाने की रणनीति बनाई थी, लेकिन उन्हें झटका लगा जब 14 फरवरी को पुलवामा कांड हुआ. तीन दिन तक शाह किसी से मिले नहीं, भयंकर दबाव में शाह अपनी रणनीति को लेकर असमंजस में थे. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की ओर से लगातार रैलियों और देश को दिए गए भरोसे के बाद शाह ने अपना अभियान फिर तेज कर दिया. बालाकोट के बाद 26 फरवरी को शाह फिर पुराने रुप में लौट आए और बीजेपी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. शाह ने पूरे अभियान को गांव में पहुंचा दिया जबकि विपक्षी दलों का प्रचार शहरी-अर्ध शहरी क्षेत्रों तक ही था. शाह ने प्रचार अभियान की रणनीति इस तरह बनाई कि प्रचार के केंद्र में मोदी ही छाएं.
    प्रचार के अभियान को इस तरह से डिजाइन किया गया कि इसमें ताजगी बनी रहे. सबसे पहले मोदी फैक्टर से उम्मीदवार की प्रासंगिकता को खत्म कर मोदी केंद्रित कर दिया गया. इसमें शाह ने थ्योरी ऑफ डिमेंशिया दी थी, यानी प्रचार मैटेरियल को वोटिंग से ठीक तीन दिन पहले क्षेत्र में उतारने की रणनीति बनाई थी. पूरे अभियान में भाजपा ने चरणवार चुनाव अभियान को अंजाम दिया. सबसे पहले चौकीदार चोर बनाम मैं भी चौकीदार अभियान सामने आया. शाह ने राष्ट्रवाद को सर्वोपरि रखा तो ‘काम रुके ना, देश झुके ना’ के नारे के साथ विकास को भी उसमें जोड़ा. अगले चरण में भाजपा ने रणनीतिक तौर से साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से उम्मीदवार बनाने का दांव खेला. आतंक के आरोप में जेल से बेल पर निकलीं प्रज्ञा को उम्मीदवार बनाना जोखिम भरा कदम था. संघ से मशविरा कर शाह ने उन्हें उतारा जिसे शाह खुद सत्याग्रह का नाम दिया था. इस कार्ड से भाजपा ने देश के बांकी हिस्सों में हिंदुत्व का कार्ड खेला, तो बालाकोट के नाम पर राष्ट्रवाद का. हालांकि विकास का मुद्दा पीछे छूटने की आलोचना हुई तो शाह ने तत्काल रणनीति में बलाव किया और ‘काम रुके ना, देश झुके ना’ का नारा दिया.

    शाह ने अपनी रणनीति को बेहद चतुराई से अंजाम दिया. 2004 में विकास के नारे के बावजूद मिली करारी हार से सबक लेते हुए शाह ने 2014 में जीते 106 चेहरों को मौका नहीं दिया जिसमें 75 प्लस, पार्टी छोड़ने वाले और उपचुनाव में हारने वाले भी शामिल थे.

    अमित शाह कैसे भाजपा की राजनीति के शहंशाह बने, उसे समझने के लिए पहले उनके व्यक्तित्व को समझना होगा. 2014 के चुनाव नतीजों से पहले जब नरेंद्र मोदी ने संघ के सामने अध्यक्ष के रुप में अमित शाह का नाम बढ़ा दिया था, तो संघ परिवार भी हिचकिचाहट में था. आखिर कैसे गुजरात से आने वाले दो शख्स सरकार और संगठन की कमान संभाले. लेकिन उत्तर प्रदेश में 80 में से 73 सीट एनडीए की झोली में लाने और मोदी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की पटकथा लिखने वाले शाह ने न सिर्फ भाजपा अध्यक्ष की कमान संभाली, पिछले पांच साल में ऐसी इबारत लिख दी है कि कोई अब उनका उत्तराधिकारी उनकी नकल करने की कोशिश कर सकता है, लेकिन शायद ही बड़ी लकीर खींच पाए. शाह की चुनौतियां महासचिव के रुप में 2014 में ही शुरु हो गई थी, जब उन्होंने वाराणसी से भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी की सीट बदलकर मोदी को वहां से उतारने की रणनीति बनाई. जोशी सीट छोड़ने को राजी नहीं थे, लेकिन शाह की पूर्वांचल में मोदी लहर पैदा करने की रणनीति ने संघ को भी मजबूर कर दिया जिसकी दखल के बाद जोशी कानपुर चले गए. शाह के समय भाजपा में एक बार फिर से ‘अध्यक्ष जी’ की परंपरा स्थापित हुई जो अध्यक्षों के नाम तक आ चुकी थी. शाह के बारे में कहा जाता है कि वे दो मिनट की बातचीत में यह भांप लेते हैं कि सामने वाला व्यक्ति सरकार के काम का है या संगठन के काम का. शाह ने एक और अहम बदलाव किया कि पार्टी मे पहले जो परंपरा थी कि अफवाहों के आधार पर कोई गपशप होती थी, वह बंद हो गई. उन्होंने फीडबैक के मैकेनिज्म को ऐसा बनाया कि सामने वाले को बातचीत में व्यक्ति नहीं तो कम से कम किस क्षेत्र के व्यक्तियों के बीच चर्चा हो रही थी, उसे जानना चाहते हैं. इसके आधार पर वह काम भी करते हैं.शाह की कार्यशैली में सबसे अहम है कि किसी चीज को पहले से भांपने की. कश्मीर से 370 हटाने का मामला हो या फिर किसी चुनावी रणनीति की तैयारी, उन्हें अंदाजा हो जाता है कि किस मोहरे को कहां बिठाना है. इसी का असर है कि अनुच्छेद 370 हटाने के साल भर बाद भी कश्मीर में शांति है तो अयोध्या जैसे सदियों के विवाद का अंत शांतिपूर्ण तरीके से हो गया. उनकी अलग कार्यशैली की झलक अध्यक्ष बनने के बाद से ही पार्टी को दिखने लगी थी. जब शाह अध्यक्ष बने तो उन्हें पहला झटका उत्तराखंड की तीन सीटों पर हुए विधानसभा उपचुनावों में लगा था. शाह ने तत्काल वहां के वरिष्ठ नेताओं की बैठक बुलाई. जिसमें स्थानीय नेताओं ने हार की वजह की कुछ वजहें बताई तो शाह ने कड़ी फटकार लगाते हुए तत्काल आंकड़े मांग लिए. दरअसल यह शाह की कार्यशैली का अहम हिस्सा है. वे बिना तथ्य या आंकड़ों के किसी रणनीति पर बात नहीं करते. शाह की कार्यशैली नई नहीं है, वे जब 1983 में भाजपा से जुड़े और गुजरात के नारणपुरा के वार्ड नंबर 2 के बूथ प्रभारी बने तो उन्होंने सदस्यता अभियान, दस्तावेजों को एकत्रित करके और निरंतर गतिविधि चलाकर बूथ को सक्रिय रखते थे. उनकी इसी शैली से वे तब राज्य में संगठन महासचिव नरेंद्र मोदी के संपर्क में आए.

    अध्यक्ष बनने के बाद शाह ने सबसे पहला लक्ष्य लिया- भाजपा की सदस्यता को 10 करोड़ तक ले जाना. उनके इस लक्ष्य का पार्टी और विरोधियों ने माखौल उड़ाया. लेकिन मिस्ड कॉल के जरिए इस अभियान को नई तकनीक से जोड़कर शाह ने भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बना दिया. शाह के इस अभियान को देखने में कोई खास नहीं लगता हो, लेकिन वह पं. दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांतों पर समर्थकों को कार्यकर्ता में बदलने की सीख को आगे ले जाना था. शाह ने 10 करोड़ का लक्ष्य वैज्ञानिक आधार पर लिया था. दरअसल इसके पीछे 2014 के मोदी लहर वाले चुनाव में राज्यों में मिले वोट और वहां पार्टी के कार्यकर्ता की संख्या का मिलान करके एक लक्ष्य निर्धारित किया था. इस अभियान में शाह ने बाद में महासंपर्क और प्रशिक्षण अभियान को जोड़ा. प्रशिक्षण को उन्होंने पार्टी का निरंतर हिस्सा बना दिया.

    भाजपा संगठन को मजबूत आधार दिलाने वाले शाह की सबसे बड़ी कामयाबी यह रही कि उन्होंने पूरे पांच साल संगठन और सरकार के इतने कार्यक्रम चलाए कि कार्यकर्ताओं को सत्ता में होने का अहसास नहीं होने दिया. जबकि वाजपेयी सरकार के समय कार्यकर्ता सत्ता का लाभ लेने के लिए दिल्ली पहुंचते थे और काम नहीं होने पर निराश होकर घर बैठ जाते थे. इस बार ऐसा नहीं होने दिया.


    शाह की कार्यशैली ऐसी है कि जब कोई काम हाथ में लेते हैं तो स्पष्ट लक्ष्य सामने होता है और उसके हिसाब से रणनीति पर काम करते हैं. भले नतीजे पक्ष में आए या खिलाफ, इसकी परवाह नहीं करते. उनका विजन स्पष्ट रहता है और नतीजों के बजाए काम करने पर फोकस रहता है. इसलिए मोदी-शाह की जोड़ी हर चुनाव को युद्ध के रुप में लड़ने के लिए जानी जाती है. शाह का मानना है कि संगठन को हमेशा 24 घंटे 365 दिन गतिशील रखना चाहिए. यह काम वे 1982-83 से वार्ड के बूथ प्रभारी के तौर से करते रहे हैं. गीत-संगीत के शौकीन शाह निदा फाजली के प्रशंसकों में से हैं. खाने-पीने के शौकीन जरुर हैं, लेकिन संयमित और अनुशासित भोजन ही लेते हैं जब वे गुजरात से बाहर रहने को मजबूर थे तो हरियाणा के सोनीपत के ढाबों का खाना उन्हें बेहद पसंद था.

    भाजपा संगठन को गतिमान बनाने में शाह ने खुद को झोंक दिया. उन्होंने 2.47 करोड़ सदस्यों वाली पार्टी को 11 करोड़ तक पहुंचाया तो पहली बार 11 लाख सक्रिय कार्यकर्ता को राजनैतिक और विचारधारा के रुप में प्रशिक्षित किया गया. बतौर अध्यक्ष हर प्रदेश का चक्रीय प्रवास, क्षेत्रीय बैठकों, कोर ग्रुप की नियमित बैठक, कार्यकारिणी बैठक को निरंतरता दी. शाह के राजनैतिक प्रवास का औसत 524 किमी प्रति दिन का रहा है. शाह ने पहली बार देश के हर जिलों में अपनी स्वामित्व वाली जमीन पर दफ्तर होने का अभियान हाथ में लिया और आज 78 फीसदी जगहों पर पार्टी का अपना दफ्तर है. जबकि पुराने दफ्तरों का अधुनिकीकरण का भी काम आगे बढ़ाया. राजनीति में पठन-पाठन को बढ़ाने के लिए शाह ने देश भर में पार्टी दफ्तरों में पुस्तकालय को अनिवार्य किया.

    अध्यक्ष के रुप में शाह ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा, असम, झारखंड, हरियाणा, महाराष्ट्र, त्रिपुरा, गुजरात जैसे राज्यों में जीत दिलाई तो बिहार, दिल्ली और हाल ही में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में हार का भी सामना करना पड़ा. हालांकि इन राज्यों में बीजेपी का वोट शेयर बढ़ाया था. पार्टी का आधार बढ़ाने के लिए शाह ने 120 सीटों का प्रोजैक्ट हाथ में लिया ताकि 2014 के मुकाबले भाजपा की सीटें बढ़ सके. इसमें खास तौर से भारतीय प्रायद्वीप के दक्षिणी पूर्वी तटवर्ती क्षेत्र जिसे कोरोमंडल कहा जाता है की सीटें थी. शाह की रणनीति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अध्यक्ष बनने के बाद सदस्यता अभियान चलाया तो खुद ओडिशा से ही सक्रिय सदस्य बने. ओडिशा के साथ आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल को मिलाकर लोकसभा की कुल 105 सीटें आती है, जिसमें मोदी लहर के बावजूद 2014 में भाजपा को महज 6 सीटें मिली थी. लेकिन अमित शाह की रणनीति इन इलाकों से 80 सीटें जीतने की थी. अकेले बंगाल में उन्होंने 23 सीटों का लक्ष्य रखा था. शाह ने इन चारों राज्यों की हर लोकसभा सीटों का बारीकी से विश्लेषण कराया.

    संगठन के बाद अब सरकार में अपनी क्षमता का लोहा मनवा चुके शाह ने अनुच्छेद 370 को हटाकर छह दशक के फासले को छह साल में ही पूरा कर अपनी क्षमता साबित की. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
    ब्लॉगर के बारे में
    संतोष कुमार

    संतोष कुमार वरिष्ठ पत्रकार

    लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। रामनाथ गोयनका, प्रेस काउंसिल समेत आधा दर्जन से ज़्यादा पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है। भाजपा-संघ और सरकार को कवर करते रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव पर भाजपा की जीत की इनसाइड स्टोरी पर आधारित पुस्तक "कैसे मोदीमय हुआ भारत" बेहद चर्चित रही है।

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    First published: October 22, 2020, 7:13 PM IST
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