जन्मदिन विशेष: आखिर संकटों के बीच भी लोकप्रियता बढ़ने का क्या है ‘मोदी मंत्र’

Happy Birthday PM Narendra Modi: लेकिन मोदी की ऐसी क्या खासियत है कि विरोधी उन्हें घेर नहीं पाते? अगर इसका जवाब जानना-समझना हो तो उसके लिए नरेंद्र मोदी की कार्यशैली की बारीकियों को जानना होगा. उनकी सोचने के तरीके को समझना होगा. दरअसल मोदी किसी भी काम की योजना के बारे में सोचते हैं तो उसकी शुरुआत नतीजों से होती है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 17, 2020, 5:53 AM IST
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जन्मदिन विशेष: आखिर संकटों के बीच भी लोकप्रियता बढ़ने का क्या है ‘मोदी मंत्र’
हर कोई नरेंद्र मोदी की पारिवारिक पृष्ठभूमि से वाकिफ है कि कैसे समाज के कमजोर तबके से निकले मोदी को दो वक्त का भोजन जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ता था. (File Photo)
बड़े फैसले लेना और उसे अंजाम तक पहुंचाना आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शख्सियत का पर्याय बन गया है, लेकिन वे किस तरह से सोचते हैं और फिर उसे साकार करते हैं. किस तरह का मॉडल शासन के लिए उपयुक्त मानते हैं. 70वें जन्म दिन पर प्रधानमंत्री के जीवन और कार्यशैली पर एक नजर:

नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे और तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीता था. तब राजधानी गांधीनगर से दिल्ली तक विरोधी भी यह कहने लगे थे- “मोदी को कैसे हराना है, यह मोदी से ही पूछना चाहिए.” आखिर उनकी कार्यशैली में ऐसा क्या है जो उनके विरोधी भी ऐसा कहने को मजबूर हो जाते हैं. गुरुवार को यानी 17 सितंबर 2020 को जब प्रधानमंत्री मोदी 70 साल के हो रहे हैं तो बतौर प्रधानमंत्री ही नहीं, उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली पर भी नजर डालनी चाहिए. पिछले दिनों टोरंटो से मुझे एक फोन आया. उन्होंने 2019 के चुनाव पर लिखी गई मेरी किताब पढ़ी थी और एक साक्षात्कार देखा था. टोरंटो में राजनैतिक दल से जुड़े वे व्यक्ति भारत में नरेंद्र मोदी की राजनैतिक सफलता के सूत्र को लेकर चर्चा करना चाह रहे थे. लेकिन उन्होंने सबसे अहम जो बात कही वह थी- “मैंने आपकी पुस्तक में लिखे हुए भाजपा के बूथ के 22 फॉर्मूले में से एक को छोड़कर बाकी सबको अपनाकर काम शुरू कर दिया है. भाजपा की संगठन चलाने की रणनीति का ब्यौरा किसी भी दल के लिए एक सूत्र की तरह है.”

हर कोई नरेंद्र मोदी की पारिवारिक पृष्ठभूमि से वाकिफ है कि कैसे समाज के कमजोर तबके से निकले मोदी को दो वक्त का भोजन जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ता था. वडनगर के लगभग 40×12 फुट के आकार के कमरे में बचपन गुजारने वाले मोदी के पिता स्थानीय रेलवे स्टेशन पर चाय बेचते थे. प्रारंभिक वर्षों में नरेन्द्र मोदी भी इस चाय की दुकान पर अपने पिता का हाथ बंटाते थे. शुरुआती वर्ष के संघर्षों ने मोदी के मन पर एक मजबूत छाप छोड़ी. जीवन के आगे के चरणों में स्वामी विवेकानंद के विचारों ने उन्हें अध्यात्म की ओर ले जाना शुरू किया. फिर संघ और भाजपा के उनके सफर की कहानी सबको मालूम है.

तीखे हमलों से भी नहीं पड़े कमजोर
गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने विकास का अलग मॉडल बनाने की दिशा में काम शुरू किया, जिसके लिए खास तौर से स्कूली शिक्षा पर फोकस किया. लेकिन इसी बीच गुजरात दंगे की वजह से विरोधियों को उनके खिलाफ मोर्चा खोलने का मौका मिल गया. लेकिन मोदी इन तीक्ष्ण हमलों से कमजोर नहीं पड़े, बल्कि मजबूती के साथ काम करते रहे. नतीजा होता था कि हर बार विरोधी पस्त पड़ जाते थे. लेकिन मोदी की ऐसी क्या खासियत है कि विरोधी उन्हें घेर नहीं पाते? अगर इसका जवाब जानना-समझना हो तो उसके लिए नरेंद्र मोदी की कार्यशैली की बारीकियों को जानना होगा. उनकी सोचने के तरीके को समझना होगा. दरअसल मोदी किसी भी काम की योजना के बारे में सोचते हैं तो उसकी शुरुआत नतीजों से होती है. यानी किस नीति, कथन और योजना का असर क्या होगा उसे जमीन पर क्रियान्वयन से सोचना शुरू करते हैं. उनके सोचने का अलग अंदाज ही उन्हें बाकी राजनेताओं से अलग करता है.

उनकी इस सोच का नतीजा यह निकलता है कि प्रधानमंत्री मोदी किसी भी योजना को तब बाहर लेकर आते हैं जब उसे जमीन पर उतारने की पूरी तैयारी हो जाती है. अगर हाल ही में प्रधानमंत्री के लाल किले की प्राचीर से सातवीं बार के संबोधन के कुछ एलान पर गौर करें तो यह साफ हो जाएगा कि उनकी कार्यशैली कैसी है. मसलन, लाल किले से नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन का एलान हुआ तो उसी दिन 6 केंद्र शासित प्रदेशों में इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू भी कर दिया गया. इसी तरह देश के 173 सीमावर्ती जिलों में एनसीसी के कैडेट तैयार करने और उन्हें सैन्य प्रशिक्षण का एलान हुआ तो अगले दिन यानी 16 अगस्त को ही रक्षा मंत्रालय ने युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा करने वाली इस विस्तार योजना के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. इस 173 जिलों में एक तिहाई कैडेट महिला कैडेट होंगी. सीमावर्ती एवं तटीय जिलों में से 1,000 से अधिक विद्यालयों एवं महाविद्यालयों की पहचान भी कर ली गई जहां एनसीसी लागू किया जायेगा. इसी तरह प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट एलीफैंट की सफलता के बाद इस बार जैव विविधता के लिए नदियों-समुद्र में रहने वाली दोनों तरह की डॉल्फिन पर फोकस करने का एलान किया तो पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने लाल किले की इस घोषणा के लिए 17 अगस्त को एलान कर दिया कि अगले 15 दिनों में संरक्षण के लिए संपूर्णता के साथ प्रोजेक्ट डॉल्फिन का खाका तैयार हो जाएगा. लाल किले से मोदी ने अब तक जितनी योजनाओं का एलान किया है, शत-प्रतिशत उसे मोदी की सोच के अनुरुप साकार किया जा चुका है.

कागजों पर चल रही योजनाओं को जमीन पर लाने का किया कामलेकिन सरकार को इस ढर्रे पर लाना आसान नहीं था. मोदी जब दिल्ली की राजनीति में प्रधानमंत्री बनकर आए तो उन्हें नया खिलाड़ी माना जा रहा था. शुरुआत में ही उन्होंने नौकरशाही के साथ सीधा संवाद किया था. लेकिन फिर भी पहले साल में सरकार को भूमि अधिग्रहण जैसे मसले पर कदम पीछे भी खींचने पड़े थे. पुरानी सरकार के समय के कुछ अधूरे काम को आगे बढ़ाने में मुश्किलें साफ दिख रही थी क्योंकि उसकी योजनाएं उस तरह से नहीं बनाई गई थी. ऐसे में मोदी ने जनवरी 2016 में नौकरशाही के सामने अपनी स्पष्ट सोच बता दी. जनवरी 2016 में ग्रुप ऑफ सेक्रेट्रीज की बैठक में नया सिद्धांत अपनाने का निर्देश दिया गया था कि भविष्य में उन्हीं योजनाओं को अमल में मानने का दृष्टिकोण अपनाया जाए जिसकी गतिविधि जमीन पर शुरू हो जाए. प्रधानमंत्री के इस सिद्धांत का संदेश था कि कागजों पर चल रही योजनाएं तब तक क्रियान्वित नहीं मानी जाएगी, जब तक उस योजना को लेकर गतिविधि जमीन पर नहीं दिखने लगे. दरअसल शुरुआत से ही केंद्र सरकार लगातार जनहित में कदम उठा रही थी. प्रधानमंत्री मोदी की हर योजना पर सीधी निगाह बनी हुई थी. मोदी की नीति के पीछे उनकी एक स्पष्ट सोच रही है जिसका जिक्र उन्होंने 2013-14 में किया था. उनका कहना था- “सरकारें लोगों को नये अधिकार देने का बहुत शोर मचाती हैं, लेकिन हमारे संविधान ने हमें पहले से ही बहुत सारे अधिकार प्रदान किए हैं . हमें और अधिक एक्ट्स की नहीं, बल्कि एक्शन की ज़रूरत है .’’

अपनी इस नीति की वजह से ही मोदी का वह संबोधन कई मंचों से गूगल करके सुन सकते हैं जिसका जिक्र उन्होंने चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी समारोह पर बिहार की धरती से किया था- “मेरी सरकार के काम करने का तरीका है. अब अटकाने, लटकाने और भटकाने वाला काम नहीं होता, अब फाइलों को दबाने की संस्‍कृति खत्‍म कर दी गई है. सरकार अपने हर मिशन, हर संकल्‍प को जनता के सहयोग से पूरा कर रही है. लेकिन इससे दिक्‍कत उन लोगों को होने लगी है जो इस बदलाव को स्‍वीकार नहीं कर पा रहे हैं. वो गरीब का सशक्‍त होते नहीं देख पा रहे हैं. उन्‍हें लगता है कि गरीब अगर मजबूत हो गया तो झूठ नहीं बोल पाएंगे, उसे बहका नहीं पाएंगे. इसलिए सड़क से लेकर संसद तक सरकार के काम के अंदर रोड़े अटकाए जा रहे हैं. आपके सामने एक ऐसी सरकार है जो जन-मन को जोड़ने के लिए काम कर रही है. वहीं कुछ विरोधी जन-जन को तोड़ने के लिए काम कर रहे हैं.”

मोदी की अपनी एक अलग शैली
दरअसल मोदी की कार्यशैली में माइंड मैपिंग सबसे अहम है. उनका फीडबैक मैकेनिज्म पूरी तरह से कॉरपोरेट गवर्नेंस के मॉडल पर आधारित है और वे सरकार या राजनीति में भी कोई निर्णय लेने से पहले सीधे लोगों की सोच के साथ जुड़ने की कोशिश करते हैं. जब इस तरह का अध्ययन पूरा हो जाता है तभी वे आगे की रणनीति पर काम कर उसे साकार करते हैं. अगर हाल ही के कुछ उदाहरणों को देखें तो कोरोना काल में उन्होंने आत्मनिर्भरता की ऐसी मुहिम छेड़ी जो लोगों के दिलो-दिमाग पर छा गई क्योंकि लोग लॉकडाउन की वजह से घरों में बंद थे और ऐसे समय में हर व्यक्ति अपने सीमित संसाधनों में जिंदगी को कैसे आगे बढ़ा सकता है इसी को ध्यान में रखते हुए कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहा था. प्रवासी मजदूरों के मसले पर हल्ला तो खूब मचा, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि 25 मार्च से लॉकडाउन शुरू हुआ और 26 मार्च को 1.7 लाख करोड़ रु. की गरीब कल्याण योजना शुरू कर दी गई. यानी मुकम्मल रणनीति और सोच के साथ काम करने की मोदी की अपनी एक अलग शैली है. इसे उपलब्धि के तौर पर नहीं बल्कि कोरोना काल में एक जरुरत के तौर पर देखना चाहिए. इसका सही मायने में कितना लाभ हुआ तो गांवों में जाकर वहां के गरीबों से पूछना चाहिए. जिनके लिए जन धन के खाते हों, या 8 महीने तक मिलने वाला मुफ्त अनाज, गैस सिलिंडर और अन्य सहूलियतें कोरोना काल में सहारा बनी है.

एक देश एक परीक्षा का फैसला या फिर एक देश एक राशन कार्ड का और अब नौकरशाही के लिए ‘मिशन कर्मयोगी’. निरंतर सुधार और समयबद्ध डिलिवरीका बेहतरीन नमूना है. कैसे लोगों के मन को टच करना है, मोदी और परदे के पीछे की उनकी टीम बखूबी जानती है. सरकारें हमेशा प्रतिबद्ध नौकरशाही चाहती है ताकि उसके राजनैतिक हित पूरे हो सके. लेकिन मोदी की सोच उसी नौकरशाही को कुशल और जवाबदेह बनाने की है ताकि हर योजना को समयबद्ध तरीके से साकार किया जा सके.

बचपन में सेना में भर्ती होना चाहते थे नरेंद्र मोदी
बचपन में मन में पले सपने पूरे नहीं हो पाते हैं और व्यक्ति कुछ और क्षेत्र में बड़े मुकाम पर पहुंचता है तो उस अधूरे सपने के प्रति एक अलग ही प्रेम होता है. शायद नरेंद्र मोदी की भी यही खासियत है कि सीमा सुरक्षा के मामले में भारत आज पड़ोसी देश चीन को भी माकूल जवाब देने में सक्षम है. दरअसल नरेंद्र मोदी का बचपन में सपना था कि वे सेना में भर्ती हों, लेकिन भाग्य ने उनके लिए कुछ अलग सोच रखा था. इसलिए वे कई पर्व-त्योहार सेना के जवानों के साथ मनाते रहे हैं.

प्रधानमंत्री मोदी के जन्म दिन की बात हो तो उनके जीवन के कुछ अहम पहलुओं को भी जानना चाहिए. मोदी कुर्ता लोगों में बहुत अधिक लोकप्रिय है, लेकिन आमतौर पर इसे एक ऐसा ‘स्टाइल स्टेटमेंट’ माना जाता है, जिसकी शुरुआत के मूल में अत्यधिक सादगी है. खुद मोदी ने इसके बारे में कहा था- “आरएसएस और भाजपा में काम का मतलब सिर्फ अत्यधिक यात्राएं ही नहीं, बल्कि अनिश्चित और कठिन परिस्थितियों वाले कार्यक्रम भी है. और मैं तो अपने कपड़े हमेशा खुद ही धोता था, मैं सोचा कि पूरी बांह का कुर्ता धोना अधिक कठिन था और ज्यादा समय लेता था तो मैंने अपने कुर्ते को काटकर आधी बांह का कर देने का फैसला किया.” इस तरह मोदी कुर्ता की शुरुआत हुई! ये पूछना स्वाभाविक है कि – भारत के प्रधानमंत्री खाने में क्या पसंद करते हैं? क्या उन्हें मसालेदार खाना पसंद है? इस ओर कुछ इशारा नरेंद्र मोदी स्वयं करते हैं, वो कहते हैं- “जो लोग सार्वजनिक जीवन में काम करते हैं, उनका जीवन बहुत ही अनियमित होता है. इसलिए यदि कोई सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होना चाहता है, तो उसका पेट मजबूत होना चाहिए. चार दशक से विभिन्न संगठनात्मक पदों पर काम करते हुए मुझे पूरे देश का भ्रमण करना पड़ा. मुझे भोजन मांगना पड़ा और जो मिला उसे खाया. मैंने कभी लोगों से अपने लिए कोई खास खाना बनाने के लिए नहीं कहा. मुझे खिचड़ी बहुत पसंद है. लेकिन मुझे जो भी मिले, मैं खा लेता हूं.” मोदी ने सार्वजनिक मंच से कई बार कहा भी है- “मैं चाहता हूं कि मेरी सेहत ऐसी हो कि वो देश के लिए बोझ न बने. अपनी अंतिम सांस तक मैं एक स्वस्थ व्यक्ति के रूप में जीना चाहता हूं.” प्रधानमंत्री को ऊर्जा कहां से मिलती है, इस सवाल का भी जवाब उन्होंने विभिन्न मंचों से दिया है. उनका मानना है कि थकान किसी मिशन की प्राप्ति के लिए की गई मेहनत से नहीं होती बल्कि बच गए अधूरे कार्य के बारे में सोचकर होने वाली मानसिक चिंता से होती है.

देश को आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम को जन आंदोलन का रुप दे चुके प्रधानमंत्री मोदी के बारे में उनके विरोधी भी मानते हैं कि अवसर तो वे कतई नहीं चूकते, बल्कि देश के समक्ष आने वाली चुनौतियों को भी अवसर में बदलने का जबरदस्त माद्दा रखते हैं. ऐसे में आत्मनिर्भरता के लिए आत्मविश्वास से लबरेज मोदी ने भविष्य के भारत की दिशा में कदम बढ़ाया है तो इस बदलाव का साक्षी बन रहा वर्तमान सुनहरा इतिहास जरुर लिखेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
संतोष कुमार

संतोष कुमार वरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। रामनाथ गोयनका, प्रेस काउंसिल समेत आधा दर्जन से ज़्यादा पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है। भाजपा-संघ और सरकार को कवर करते रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव पर भाजपा की जीत की इनसाइड स्टोरी पर आधारित पुस्तक "कैसे मोदीमय हुआ भारत" बेहद चर्चित रही है।

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First published: September 17, 2020, 5:53 AM IST
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