महानगरों से रिवर्स पलायन: अब स्वयं पर शासन ही कोरोना से बचाव का मंत्र

कोरोना अब तेजी से महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात से निकलकर बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, उत्तराखंड को अपना अगला पड़ाव बना रहा है, जहां पिछले एक सप्ताह में कोरोना संक्रमण की दर महानगरों के मुकाबले तेजी से बढ़ी है. लेकिन शहरों को संवारने वाले गांव के लिए अब एक स्वास्थ्य अनुशासन के जरिए इसे मात देकर नई मिसाल पेश करने का वक्त है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 29, 2020, 10:05 AM IST
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महानगरों से रिवर्स पलायन: अब स्वयं पर शासन ही कोरोना से बचाव का मंत्र
कोरोना को रोकने के लिए खुद पर लगानी होगी रोक
कोरोना का खौफ कब खत्म होगा? यह सवाल इतने बड़े लॉकडाउन के बाद हर व्यक्ति के जेहन में उठ रहा होगा. विश्व स्वास्थ्य संगठन हो या भारत सरकार ने जोर देकर कहना शुरु कर दिया है कि कोरोना वाली जीवन शैली में ही अभी रहना होगा. यानी जब तक वैक्सीन या कोई ठोस दवाई सामने नहीं आ जाती, खौफ तो बना रहेगा. लेकिन भारत के लिए राहत की बात है कि इस लॉकडाउन में स्वास्थ्य का ढांचा इतना मजबूत कर लिया गया कि इस महामारी से निपटने में सहज महसूस कर सके. इस लॉकडाउन ने यह भी फायदा दिलाया कि जहां विकसित देश इस आपदा से त्रस्त है, भारत में उसकी दर विश्व के मुकाबले काफी कम है. स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों पर भरोसा करें तो भारत में एक लाख में करीब 8 व्यक्ति इस संक्रमण की चपेट में है तो दुनिया में 62 व्यक्ति.

अच्छा संकेत यह भी है कि भारत में अभी करीबन 60:40 का औसत है. यानी 60 फीसदी सक्रिय कोरोना केस हैं तो 40 फीसदी ठीक भी हुए हैं. अगर लॉकडाउन के चारों चरणों को देखा जाए तो पहले में रिकवरी की दर जहां 7 फीसदी थी, दूसरे लॉकडाउन में 11.42 फीसदी, तीसरे लॉकडाउन के बाद 26.5 फीसदी और चौथे चरण में यह दर करीब 40 फीसदी तक पहुंच गई है. लेकिन अब जबकि चौथे लॉकडाउन में ज्यादातर चीजें खुल गई है और रिवर्स पलायन यानी शहरों से गांवों की ओर लोग काफी संख्या में लौट चुके हैं, ऐसे में लोगों का सतर्क रहना बेहद जरुरी है.

इस पलायन को लेकर भले राजनीति भी खूब हो रही है, लेकिन इस आरोप-प्रत्यारोप में हम-आपको खुद संभलना होगा. अनुशासन यानी खुद पर होने वाला शासन. अगर अपने ऊपर से नियंत्रण खोया तो आप उसी तरह अलग-थलग पड़ जाएंगे जैसे अनुशासन तोड़ने वाला होता है. स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का पालन सख्ती से हर व्यक्ति को करना चाहिए. कोई भी सरकार हो, आपको साधन दे सकती है, सुरक्षा की चिंता तो हम-आपको स्वयं ही करनी होगी. रिवर्स पलायन ने पिछले एक सप्ताह में कोरोना की दर को बेहद तेजी से बदला है.

आंकड़ों को समग्रता में देखने पर भले दिल्ली, मुंबई, चेन्नई जैसे महानगर कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित दिख रहे हैं. लेकिन सच्चाई इससे अलग है. अगर 21 मई से 27 मई तक कोरोना मरीजों की औसत बढ़ोतरी दर को कुछ राज्यों में देखें तो अंदाजा लगेगा कि किस तरह कोरोना तेजी से अपना ठिकाना बदल रहा है. कोरोना का समग्र आंकड़ा देने वाली वेबसाइट के मुताबिक इसमें सर्वाधिक प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड है जहां बड़े पैमाने पर शहरों से लोग अपने घरों की ओर लौटे हैं तो कर्नाटक जैसा राज्य भी है जहां से लोग उस अनुपात में वापस नहीं आ पाए तो वहां की वृद्धि दर ज्यादा है.
इस बीते सप्ताह के आंकड़ों के लिहाज से कोरोना संक्रमितों की वृद्धि दर में उत्तराखंड 32 फीसदी और छत्तीसगढ़ 26 फीसदी के साथ सबसे अागे है, जहां उत्तराखंड में प्रति 10 लाख में 2152 तो छत्तीसगढ़ में 2065 की जांच हुई. जबकि बिहार जहां पहले मरीज बेहद कम थे अब वहां यह दर 8-9 फीसदी पर पहुंच गई है. ओडिशा में यह दर 6 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 4-5 फीसदी और कर्नाटक में 7 फीसदी है. जबकि दिल्ली में मरीजों की बढ़ती संख्या के बावजूद इसकी वृद्धि दर घटकर 4 फीसदी पर आ गई है. महाराष्ट्र में 5 फीसदी तो तमिलनाडु में 5, राजस्थान में 5 और गुजरात में 3 फीसदी कुछ राज्यों में देखें तो अंदाजा लगेगा कि किस तरह कोरोना तेजी से अपना ठिकाना बदल रहा है. कोरोना का समग्र आंकड़ा देने वाली वेबसाइट के मुताबिक इसमें सर्वाधिक प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड है जहां बड़े पैमाने पर शहरों से लोग अपने घरों की ओर लौटे हैं तो कर्नाटक जैसा राज्य भी है जहां से लोग उस अनुपात में वापस नहीं आ पाए तो वहां की वृद्धि दर ज्यादा है.

इस बीते सप्ताह के आंकड़ों के लिहाज से कोरोना संक्रमितों की वृद्धि दर में उत्तराखंड 32 फीसदी और छत्तीसगढ़ 26 फीसदी के साथ सबसे अागे है, जहां उत्तराखंड में प्रति 10 लाख में 2152 तो छत्तीसगढ़ में 2065 की जांच हुई. जबकि बिहार जहां पहले मरीज बेहद कम थे अब वहां यह दर 8-9 फीसदी पर पहुंच गई है. ओडिशा में यह दर 6 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 4-5 फीसदी और कर्नाटक में 7 फीसदी है. जबकि दिल्ली में मरीजों की बढ़ती संख्या के बावजूद इसकी वृद्धि दर घटकर 4 फीसदी पर आ गई है. महाराष्ट्र में 5 फीसदी तो तमिलनाडु में 5, राजस्थान में 5 और गुजरात में 3 फीसदी हो गई है. केरल में भी इसकी दर 6 फीसदी और पंजाब में 1 फीसदी पर आ चुकी है. अगर जांच के हिसाब से देखें तो दिल्ली में औसतन प्रति 10 लाख में 9305 लोगों का जांच हुई है. जबकि बिहार में जांच की संख्या प्रति 10 लाख में महज 571 है, उत्तर प्रदेश में जांच की दर 1069 है.

यानी बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश जैसे सूबे में कोरोना के बढ़ते संक्रमण दर को रोकना बड़ी चुनौती है. जिसके लिए पूरी तरह से सरकारी मशीनरी जिम्मेदार है जो प्रवासियों को पहले लाॅकडाउन के बाद से ही मुकम्मल व्यवस्था के साथ नहीं रोक पाई. मजबूरी और ह्रदय विदारक दृश्यों से जो बातें निकलकर आई उसमें सबने यही शिकायत की, खाने और रहने की मुकम्मल व्यवस्था नहीं थी. जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना के प्रभाव को देखते हुए पहले लॉकडाउन के वक्त ही किसी भी तरह के आवागमन को सख्ती से रोकने का निर्देश दिया था. साथ ही राज्यों को विशेष तौर से फंड भी दिए गए थे जिसका जिक्र हाल ही में वित्त मंत्री ने भी किया था. ऐसे में प्रवासियों को रोकने में किसकी अक्षमता रही, यह तो आने वाले समय में निश्चित तौर से जांच का विषय होगा. जिसका मकसद भले किसी सरकार पर आरोप लगाना नहीं हो, लेकिन भविष्य के लिए सबक लेना जरुरी है.ऐसे में अब सरकार से ज्यादा आम नागरिक को स्वास्थ्य अनुशासन यानी कोरोना से बचाव के प्रोटोकॉल का खुद पर सख्ती से पालन करना होगा. स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वैश्विक ट्रेंड से यहां एक और तथ्य अहम निकलकर सामने आ रहा है कि कोरोना से प्रभावितों के मामले में करीबन 20 फीसदी ही ऐसे मामले आ रहे हैं जिन्हें सही मायने में अस्पताल में भर्ती करने की जरुरत पड़ रही है. जबकि 80 फीसदी के करीब प्रभावित लोग क्वारंटीन और कोरोना प्रोटोकॉल के जरिए खुद को ठीक कर पा रहे हैं. शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के मामले में तो अपने गांव के लोगों का कोई मुकाबला भी नहीं हो सकता. गांव के मेहनतकश लोगों की जीवन शैली हर रोग से लड़ने में मजबूत होती है. लेकिन इस फैलने वाली महामारी को देखते हुए गांव के लोगों को ‘स्वास्थ्य अनुशासन’ के जरिए न सिर्फ खुद को सुरक्षित रखना होगा, बल्कि ऐसा कर वे अपने गांव और समाज को भी सुरक्षित रख पाएंगे. निश्चित तौर से महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों से निकलकर कोरोना अपना अगला पड़ाव बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों को बनाने जा रहा है. लेकिन शहरों को संवारने वाले गांव को

अब अपना बचाव कर एक मिसाल पेश करनी ही होगी तभी कोरोना के कहर से बचना मुमकिन हो पाएगा. खास तौर से बिहार के क्वारंटीन सेंटर से जो खबरें आ रही हैं, वह डराने वाली है. क्वारंटीन में रह रहे लोग खुले तौर पर घूम रहे हैं तो दुकानों पर जाकर अन्य लोगों के लिए भी खतरा पैदा कर रहे हैं. ऐसी घटनाएं और भी कई जगह होंगी, लेकिन जिस तरह की स्थिति है उसमें अनुशासन यानी स्वयं पर शासन ही इस कोरोना महामारी से बचाव का मूलमंत्र है.
ब्लॉगर के बारे में
संतोष कुमार

संतोष कुमार वरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। रामनाथ गोयनका, प्रेस काउंसिल समेत आधा दर्जन से ज़्यादा पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है। भाजपा-संघ और सरकार को कवर करते रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव पर भाजपा की जीत की इनसाइड स्टोरी पर आधारित पुस्तक "कैसे मोदीमय हुआ भारत" बेहद चर्चित रही है।

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First published: May 28, 2020, 1:23 PM IST
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