टोक्यो ओलंपिक: दम दिखाने को हैं तैयार भारतीय एथलीट

भारत की 65 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम उम्र के नौजवानों की है. क्या हिंदुस्तान खेल की दुनिया में अपना नाम रोशन नहीं कर सकता? भारत के आगे बढ़ने का मतलब सिर्फ सैन्य शक्ति या आर्थिक महासत्ता बनने तक सीमित होना नहीं है. इसी सोच को ध्यान में रखते हुए खेल सुधारों को लेकर हुई पहल का नतीजा है कि अब तक का सबसे बड़ा दल टोक्यो ओलंपिक में हिस्सा ले रहा है और खेल समाज जीवन और राष्ट्र जीवन का अहम हिस्सा बन रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 22, 2021, 11:08 AM IST
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टोक्यो ओलंपिक: दम दिखाने को हैं तैयार भारतीय एथलीट
गर देखना है मेरी उड़ान को, थोड़ा और ऊंचा कर दो इस आसमान को. टोक्यो ओलंपिक में भारत का मान बढ़ाने पहुंच चुके खिलाड़ियों पर यह वाक्य बिलकुल सटीक लगता है. उत्तर प्रदेश के मेरठ के कलीना गांव का सौरभ कुमार चौधरी हो या फिर फिटनेस के लिए जिम ज्वाइन करने वाले नीरज चोपड़ा का ओलंपिक का सफर, 19 साल की मनु भाकर की उड़ान हो या फिर अन्य खिलाड़ी-एथलीट. टोक्यो ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए पहुंचे ज्यादातर खिलाड़ी छोटे शहरों, कस्बों, गांवों से निकल कर आए हैं और सबकी कहानी समाज और राष्ट्र के लिए एक प्रेरणा है.

महाराष्ट्र के सतारा के एक गांव के रहने वाले मजदूर मांप-बाप के बेटे प्रवीण जाधव तीरंदाजी में पहला ओलंपिक खेलने जा रहे हैं, तो महिला हॉकी टीम की सदस्य नेहा गोयल की मां और बहनें साइकिल की फैक्ट्री में काम करके परिवार का खर्च जुटाती हैं. इसी तरह, दीपिका कुमारी का जीवन भी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. दीपिका के पिता ऑटो रिक्शा चलाते हैं और मां नर्स हैं. कभी विश्व की नंबर एक तीरंदाज रहीं दीपिका ओलंपिक में भारत की तरफ से एकमात्र महिला तीरंदाज हैं.

हरियाणा के किसान परिवार के मनीष की कहानी भी खेल के प्रति समाज की भावना को अब बदल रही है. बचपन में खेतों में काम करते-करते मनीष को बॉक्सिंग का शौक हो गया और यही शौक आज मनीष को टोक्यो ओलंपिक तक लेकर पहुंच गया. चेन्नई की रहने वाली सी.ए. भवानी पहली भारतीय फेंसर हैं, जिन्होंने ओलंपिक में अपना स्थान पक्का किया है. तलवारबाजी में माहिर भवानी के प्रशिक्षण पर असर नहीं पड़े, इसके लिए उनकी मां ने अपने गहने तक गिरवी रख दिए थे.

पारंपरिक खेल को भी बढ़ावा मिल रहा है, जिसकी बानगी बनारस के रहने वाले शिवपाल सिंह का पूरा परिवार है, जो भाला फेंकने में अव्वल है. अब परिवार की यही परंपरा नई पीढ़ी को ओलंपिक तक लेकर जा रही है. शिवपाल के पिता, चाचा और भाई सभी जैवलिन थ्रो (भाला फेंक) में माहिर हैं.
ओलंपिक के लिए राष्ट्र का गौरव बनने वाला खिलाड़ी ऐसे ही तैयार नहीं हो जाता है. इन खिलाड़ियों की प्रतिभा, समर्पण, दृढ़ निश्चय और खेल भावना में जब राष्ट्र जुड़ता है, तब जाकर कोई चैंपियन बनता है. खेल की भावना पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्र जीवन में खुलापन के साथ दूसरों को स्वीकार करने का सामर्थ्य देता है. खेल जीवन के अंदर ऐसे गुणों का विकास करता है,जो जीवन भर जूझने का सामर्थ्य देता है, खिलाड़ी कभी हार नहीं मानता है. इसलिए खेल का सामाजिक जीवन और राष्ट्र के जीवन में महत्व होना चाहिए.


केंद्र सरकार की खेल को लेकर बनी नई सोच के साथ भारत में अब खेल आंदोलन की शुरुआत हो चुकी है और “खेलोगे-कूदोगे बनोगे लाजवाब” नए भारत की खेल प्रतिभाओं का नया मंत्र बन गया है.

खेल को संस्कृति बनाने की कवायदअंग्रेजों ने क्रिकेट को मानसिकता में डाल दिया और यह माना जाने लगा कि जो क्रिकेट खेलता है, वह करोड़पति बन जाता है. लेकिन, जो अन्य खेल में मैडल जीत के लाते हैं, उसे सरकार शुरुआत में कुछ पैसे तो दे देती है, लेकिन बाद में अन्य कोई ध्यान नहीं रखता. लेकिन, अब यह परिस्थिति बदल रही है. प्रतिभाओं की पहचान करना हो या फिर उसे महत्व देकर आगे बढ़ाना या परिवार-समाज को जागरूक बनाकर खेल को हर किसी के जीवन का हिस्सा बनाना... भारत ने अब खेल की परिभाषा बदल दी है.

खेल का बेहतरीन इतिहास वाला दुनिया का सबसे युवा देश जहां प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, फिर भी खेल कभी संस्कृति नहीं बन सकी थी. लेकिन, बीते चंद वर्षों में ही केंद्र सरकार ने खेल को संस्कृति बनाकर न सिर्फ खेल की नई परिभाषा गढ़ी, बल्कि ऐसी पहल की है कि खिलाड़ी और एथलीट सिर्फ अपने श्रेष्ठ प्रदर्शन पर ध्यान लगाएं, बाकी की चिंता देश करेगा.

खेलो इंडिया से लेकर ओलंपिक पोडियम योजना तक, समग्र सोच और दृष्टिकोण के साथ भारत में खेल को जन आंदोलन बनाने की मुहिम छेड़ दी. जमीनी स्तर से प्रतिभाओं की पहचान कर उसको सबसे बड़े मंच तक पहुंचाने और टीम चयन में पारदर्शिता को प्राथमिकता दी, तो जीवन भर देश का मान बढ़ाने वाले खिलाड़ियों को मान-सम्मान बढ़ाने और उनके अनुभवों से नई प्रतिभाओं को संवारना सुनिश्चित किया. लेकिन ,कोविड महामारी के दौर में टोक्यो ओलंपिक की तैयारी आसान नहीं थी.


जब पिछले साल मार्च में ही ओलंपिक को एक साल के लिए स्थगित कर दिया गया. फिर भी, शुरुआती दो महीने एथलीट के लिए सहज नहीं था, क्योंकि वे प्रशिक्षण सुविधा से दूर नहीं रह सकते थे. ऐसे में सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए प्रोटोकॉल तैयार किया गया. जिसके आधार पर चरणबद्ध तरीके से प्रशिक्षण, जिन राज्यों में सुविधाएं हैं, वहां राज्य सरकार की अनुमति से प्रशिक्षण शुरू करना, स्वास्थ्य प्रोटोकॉल की निरंतर निगरानी और प्रबंधन के अलावा सरकारी दिशानिर्देशों का पालन.

लेकिन, इस महामारी ने एक साल पीछे धकेल दिया था. खिलाड़ी चूंकि प्राथमिकता सूची में नहीं आते हैं. लेकिन, प्रधानमंत्री ने टोक्यो ओलंपिक दल को इसमें शामिल कर कोविड वैक्सीनेशन में प्राथमिकता दिलाई. अभी तक 99 फीसदी एथलीट पहली डोज लगवा चुके हैं, तो 75 फीसदी दोनों डोज ले चुके हैं. कई खिलाड़ियों का टीकाकरण विदेश में भी किया गया. दूसरी डोज के लिए बाकी बचे खिलाड़ियों को टीका अब टोक्यो में लगाया जाएगा.

दीर्घकालिक रणनीति के तहत 2028 के लॉस एंजेल्स ओलंपिक पर निगाह
अगर आज टोक्यो ओलंपिक में हिस्सा ले रहे भारतीय खिलाड़ियों का जीवन संघर्ष प्रेरणा बन रही है और 2028 के लास एंजेल्स ओलंपिक में भारत को शीर्ष 10 देशों की कतार में लाकर खड़ा करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है, तो उसकी वजह है खेल को लेकर दूरगामी सोच. भारत में खेल के बुनियादी ढांचे, खेल सुविधाओं और ओलंपिक में प्रदर्शन को सुधारने के लिए कैसे माहौल दिया जाए, इसकी पहल हो रही है.

अगस्त 2016 में प्रधानमंत्री मोदी ने ऐलान किया कि 2020, 2024 और 2028 में होने वाले अगले तीन ओलंपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों की प्रभावी भागीदारी के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार होगी, जिसके लिए एक टास्क फोर्स गठित होगी. इस टास्क फोर्स को खेलकूद के लिए सुविधाओं, प्रशिक्षण और चयन प्रक्रिया सहित अन्य मामलों के लिए संपूर्ण रणनीति तैयार करने का निर्देश दिया गया.


इस टास्क फोर्स में देश और विदेश के विशेषज्ञ शामिल किए गए. ओलंपिक के लिए खेल का बजट जो पहले 15-20 करोड़ हुआ करता था, उसे बढ़ाकर सवा सौ करोड़ के पार पहुंचाया गया है.

खेल भारत की प्राचीन संस्कृति का हिस्सा
खेल के लिए प्रतिभा खेल के मैदान से ही उभरती है. यह बात मोहनजोदड़ों संस्कृति में भी दिखती है. गुजरात के धौलांविरा में जब पुरातत्वविदों ने इस जगह को खोजा था तब पांच हजार साल पहले भी धौलांविरा में हजारों लोगों के बैठने वाला बड़ा खेल स्टेडियम मिला था. यानी खेल कोई नई परंपरा नहीं है, बल्कि नए सिरे से वैश्विक परिवेश में, आधुनिक संसाधनों और ईको-सिस्टम के साथ खेल की दुनिया में खुद को फिर से स्थापित करना है. ऐसे में खेल के लिए सामाजिक वातावरण तैयार करने के साथ-साथ केंद्र सरकार ने बीते सात साल में खेल के लिए आधारभूत ढांचाओं के निर्माण पर अधिक जोर दिया है.

खेलो इंडिया. फिड इंडिया, खेल प्रतिभा खोज पोर्टल, राष्ट्रीय खेल विकास कोष, महिला खिलाड़ियों के लिए उच्च स्तरीय समिति, समग्र शिक्षा योजना, लक्ष्य ओलंपिक पोडियम योजना (टॉप्स) जैसी दर्जनों योजनाएं अब खिलाड़यों को भरोसा दिला रही है. राष्ट्रीय खेलों में पुरस्कार की राशि बढ़ाई गई है तो उच्च शिक्षण संस्थानों में भी खेल कोटा बढ़ा दिया गया है. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी खेल को बहुत ज्यादा महत्व दिया गया है. पहले इसे एक अतिरिक्त गतिविधि माना जाता था, लेकिन अब इसे पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है.


इसे शिक्षा और सफलता में अन्य विषयों के अंक की तरह ही गिना जाएगा. देश में अब खेल के लिए उच्च शिक्षण संस्थान, खेल विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं ताकि खेल विज्ञान और खेल प्रबंधन को जड़ों तक ले जाकर उसे सींचा जा सके. अगर, आज अब तक का सबसे बड़ा दल टोक्यो ओलंपिक पहुंचा है और 130 करोड़ भारतीयों की ओलंपिक की आशा बने हैं, तो हमें यह भी नहीं भूलना होगा कि खेल के क्षेत्र में भारत को विश्व की महत्वपूर्ण शक्ति बनाने की पूरी संभावना हमारे युवाओं में है.

इसके लिए खेल को न सिर्फ जीवन में महत्व देना होगा, बल्कि खेल को अपने समाज में एक संस्कार के रूप में स्थापित करना होगा. क्योंकि, इस संस्कार के बिना समाज का विकास नहीं हो सकता. राष्ट्र के रूप में केंद्र सरकार खेल को समाज और राष्ट्र का जीवन बनाने को प्रयासरत है, आम जन को भी इसे आंदोलन बनाना होगा और हमें ऐसी संस्कृति अपनानी होगी जिसमें खेल की सराहना की जाती हो और इसके लिए परिवार के साथ-साथ हर किसी का सहयोग मिलता हो.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
संतोष कुमार

संतोष कुमार वरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। रामनाथ गोयनका, प्रेस काउंसिल समेत आधा दर्जन से ज़्यादा पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है। भाजपा-संघ और सरकार को कवर करते रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव पर भाजपा की जीत की इनसाइड स्टोरी पर आधारित पुस्तक "कैसे मोदीमय हुआ भारत" बेहद चर्चित रही है।

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First published: July 22, 2021, 11:08 AM IST
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