विश्व पटल पर बढ़ता भारत का मान

2014 में जब नरेंद्र मोदी को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के रूप में चुना गया, तो दुनिया इस उम्मीद में देखती रही कि उनकी विदेश नीति कैसी होगी? लेकिन उन्होंने दुनिया भर में नए दोस्त बनाने के साथ-साथ पुराने दोस्तों के साथ संबंधों को मजबूत करते हुए नए सिरे से भारत की विदेश नीति में नया जोश भरा. 21वीं सदी में ‘इंडिया फर्स्ट’के सिद्धांतों को सर्वोपरि रख उन्होंने जो नीति अपनाई जिसे ‘एक्टिंग ईस्ट’ और ‘लुकिंग वेस्ट’ की नीति के तौर पर मिली पहचान. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब कोविड काल में पहली बार अमेरिका की यात्रा पर हैं, यह जानना जरूरी है कि भारत की विदेश नीति ने बीते सात साल में किस तरह दुनिया में अलग पहचान बनाई है…

Source: News18Hindi Last updated on: September 23, 2021, 7:56 PM IST
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विश्व पटल पर बढ़ता भारत का मान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के दौरे पर हैं. 2014 के बाद से यह उनकी 7वीं अमेरिका यात्रा है तो कोविड काल में यह उनकी पहली अमेरिका यात्रा है. ऐसे में स्वाभाविक तौर से देश-दुनिया की निगाह इस यात्रा पर है. क्वाड नेताओं से बैठक, संयुक्त राष्ट्र में संबोधन जैसे उनके महत्वपूर्ण कार्यक्रम हैं. लेकिन जब बात नए भारत की हो रही है तो इस संदर्भ में यह समझना जरूरी है की भारत की विदेश नीति किस तरह की है.


हर किसी भी राष्ट्र के लिए यह महत्पूर्ण हो जाता है कि वे न सिर्फ अपने दोस्तों का सावधानी के साथ चयन करें, बल्कि उन घटनाओं को ध्यान में रखते हुए रिश्तों को बनाए रखें जिनका दुनिया भर में प्रभाव है. इसी सोच के साथ पड़ोसियों के साथ बेहतर रिश्तों के लिए ‘पड़ोसी प्रथम’और सुदूर देशों के साथ संबंधों को आयाम देने की दिशा में ‘विस्तारित पड़ोसवाद (Extended Neighbourhood)’ की नीति 2014 के बाद देश की विदेश नीति का आधार बना.


शीर्ष नेतृत्व की नई सोच से भारत के प्रति दुनिया की सकुचाहट भी दूर होने लगी और कोरोना काल में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना के साथ दुनिया में एक बेहतरीन नेतृत्व के तौर पर भारत उभरा है. 15वें प्रवासी दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया की नजर में बदलती भारत की छवि पर कहा था, “पहले लोग कहते थे कि भारत बदल नहीं सकता. उनकी सरकार ने इस सोच को ही बदल डाला है. दुनिया आज भारत की बात और सुझावों को पूरी गंभीरता से सुन भी रही है और समझ भी रही है.”


भारत की विदेश नीति का उदाहरण प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के पहले और दूसरे शपथ ग्रहण समारोह में भी साफ तौर पर दिखी. पहली बार में सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाकर भारत ने संदेश दे दिया था कि वह पड़ोसी देशों के साथ शांति और सहयोग के साथ आगे बढ़ना चाहता है. जबकि दूसरे शपथ ग्रहण में बिम्सटेक यानी बांग्लादेश, म्यानमार, श्रीलंका, थाईलैंड, भूटान और नेपाल के राष्ट्रध्यक्षों को बुलाया. भारत की विदेश नीति सिर्फ ‘नीति’ नहीं, बल्कि सुनामी, भूकंप, कोरोना और अन्य प्राकृतिक आपदाओं में दूसरे देशों को सहयोग में सबसे आगे खड़े रहने का रहा है.

कोरोना काल में जब सबकुछ ठहर गया तो प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर ही वैश्विक वर्चुअल सम्मेलनों की शुरुआत हुई. प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय नेताओं के साथ कोरोना काल में बातचीत कर विश्व का नेतृत्व किया. अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, खाड़ी देशों, पश्चिमी एशिया के देशों के साथ आपसी सहयोग को मजबूत किया तो जी-20, गुट निरपेक्ष (एनएएम) देशों के सम्मेलन में हिस्सा लिया. कोरोना काल में ही बांग्लादेश की यात्रा को संबंधों को चिरंजीवी बनाने की दिशा में पहल की और बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस समारोह को संबोधित किया.


मालदीव की विदेश यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को वहां के सर्वोच्च नागरिक सम्मान- ‘ऑर्डर ऑफ निशानइजुद्दीन’ दिया गया. सत्ता में आने के तत्काल बाद इजराइल, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका और दक्षिण कोरिया के साथ भारत के संबंधों को मजबूत किया है और पश्चिम एशिया (ईरान, सऊदी अरब, इजरायल) और न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के साथ रिश्तों की शुरुआत और निर्माण भी किया. ईरान के साथ ऐतिहासिक चाबहार समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के दौरान ईरान के साथ भारत के संबंध एक अवधारणात्मक बदलाव से गुज़रे.


पाकिस्तान को एफएटीएफ में ब्लैक लिस्ट कराने के लिए एक और कदम बढ़ाया. एशिया पैसिफिक सब ग्रुप ने भी पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट किया. अंतराष्ट्रीय न्यायलय ने कुलभूषण जाधव मामले में भारत के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला किया और पाकिस्तान को काउंसलर एक्सेस देने के लिए मजबूर किया. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में न्यूनतम समर्थन भी नहीं मिलने से पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दा उठाने का मौका तक नहीं मिल पाया.

इन सफलताओं के साथ भारद सदैव दुनिया में अपने बसे लोगों के लिए सबसे पहले मददगार के तौर खड़ा दिखता है तो उसकी वजह भारत की बन रही अलग वैश्विक पहचान है. कोरोना काल में भी एक जिम्मेदार राष्ट्र के नाते भारत ने दुनिया के देशों से अपने नागरिकों को लाने के लिए सफलतापूर्वक वंदे भारत मिशन और ऑपरेशन समुद्र सेतु अभियान चलाया. 2015 में यमन से भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए ऑपरेशन राहत चलाया गया.


नेपाल में 25 अप्रैल 2015 को भूकंप आया तो विशेष विमान से राहत सामग्री दी और 67 मिलियन डॉलर की सहायता दी. इंडोनेशिया गणराज्य में भूकंप और सुनामी में शिकार लोगों के लिए ऑपरेशन समुद्र मैत्री चलाया. मोजाम्बिक में 2019 के तूफान के दौरान भारत ने मानवीय सहायता और आपदा राहत प्रदान की.


आरसीईपी के संबंधों में मजबूती से रखी बात

क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी), आसियान के 10 सदस्य देशों और आस्ट्रेलिया, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड जैसे पांच देशों द्वारा अपनाया गया एक मुक्त व्यापार समझौता है. लेकिन विश्व के दबाव में आए बिना प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि हम पारस्परिक सहयोग की भावना से कार्य करते हैं, लेकिन अपने हितों का त्याग नहीं कर सकते. भारत ने मजबूती के साथ बता दिया कि आरसीईपी देशों के साथ हमारा व्यापार घाटा बढ़ा है और 2004 में 7 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ जो 2014 में बढ़कर 78 बिलियन डॉलर हो गया. आरसीईपी को नकार कर प्रधानमंत्री मोदी ने गरीबों, किसानों, जेयरी और एमएसएमई के हितों को प्राथमिकता दी.


अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन

अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) की शुरुआत सौर संसाधन संपन्न देशों की विशेष ऊर्जा जरुरतों को पूरा करने के लिए की गई पहल है. जिसा नेतृत्व भारत और फ्रांस के हाथ में है. इस अंतरराष्ट्रीय संस्था का मुख्यालय भारत में है.


अंतरराष्ट्रीय योग दिवस

भारत की योग की प्राचीन, समृद्ध परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाई और दुनिया ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के तौर पर स्वीकारा.


वैक्सीन मैत्री






सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया..इस मूल मंत्र के साथ कोरोना के खिलाफ टीकाकरण की शुरुआत हुई और भारत ने दो वैक्सीन का ईजाद किया तो देश ने दुनिया को भी सहारा दिया. दुनिया के देशों को कोरोना काल में दवाईयों और अन्य जरूरतों की चीजों की सप्लाई की गई, जिसके लिए कुछ देशों ने भारत को रामायण के हनुमान की भी उपाधि दी. अब वैक्सीन मैत्री के तहत दुनिया के सैकड़ों देशों को करोड़ों डोज वैक्सीन भारत ने मदद के तौर पर भी दी.


वैश्विक संबंधों में बदल रही भारत की छवि की वजह है- देश की साख बढ़ाने, सुरक्षा बढ़ाने के साथ ही देश के लोगों के जीवन को आसान बनाने का लगातार प्रयास. इसका एक उदाहरण है- पासपोर्ट. पासपोर्ट और वीजा जैसी सुविधाएं. बीते कुछ वर्षों में देश में 300 से भी ज्यादा नए पासपोर्ट केंद्रों की भी स्थापना की गई है. प्रधानमंत्री कहते हैं, “भारत के पासपोर्ट की ताकत बढ़ी है जो भी दुनिया के किसी देश में जाता होगा, दुनिया के किसी भी देश में जब वो अपना हिंदुस्तान का पासपोर्ट दिखाता है तो सामने वाला हाथ पकड़ता है तो छोड़ता नहीं है. हिंदुस्तानी के प्रति गर्व से देखा जाता है.”


वर्ष 2014 के पहले देश में जहां सिर्फ 77 पासपोर्ट सेवा केंद्र चालू थे, वहीं अब 424 पोस्ट ऑफिस पासपोर्ट सेवा के साथ 517 पासपोर्ट सेवा केंद्र मौजूद हैं. दुनिया के 16 देशों में जाने के लिए भारत के नागरिकों को वीजा की जरूरत नहीं पड़ती है. इन देशों में जाने के लिए भारतीय पासपोर्ट ही काफी है. ईरान, इंडोनेशिया और म्यांमार सहित दुनिया के कुल 43 देशों ने भारतीय पासपोर्ट धारकों को वीजा-ऑन-अराइवल की सुविधा दे रखी है. इस सुविधा के तहत भारत के नागरिकों को उस देश पहुंचकर एयरपोर्ट इमिग्रेशन से वीजा प्राप्त करना होता है.


भारत की बढ़ती शक्ति और वैश्विक स्वीकार्यता का ही परिणाम है कि पुलवामा में कायरतापूर्ण आतंकवादी हमले और उसके बाद भारत द्वारा किए गए हवाई हमलों के बाद, सभी प्रमुख वैश्विक नेता भारत के साथ एकजुटता में खड़े थे. विश्व के देशों के साथ भारत के रणनीतिक हितों को सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर प्रधानंमत्री मोदी ने पुरानी बातों से आगे जाकर काम किया. आर्थिक, रक्षा और रणनीतिक डोमेन में मजबूत रिश्तों के साथ भारत की सॉफ्ट पॉवर ने देश को एक ताकत के रूप में उभरने में मदद की है.

अपने वृहद् भौगोलिक और जनसांख्यिकीय स्वरूप के साथ व्यापक विविधता वाले भारत के पास वैश्विक एजेंडा को आकार देने का एक अनूठा अवसर है. इस दिशा में एक निर्णायक नेतृत्व और प्रभावी ग्लोबल प्रोफाइल के साथ भारत अवसर को अपने हाथों में लेने की ओर तेजी से बढ़ रहा है.


निश्चित तौर से प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया के देशों के साथ संबंधों में एक बेहतर संतुलन बिठाया है जो दीर्घकालिक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साबित होगा. 21वीं सदी में ‘भारत प्रथम’ की सोच के साथ सक्रिय, महत्वाकांक्षी और इनोवेटिव कूटनीति भारत की विशेषता के तौर पर उभरती दिख रही है.



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
संतोष कुमार

संतोष कुमार वरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। रामनाथ गोयनका, प्रेस काउंसिल समेत आधा दर्जन से ज़्यादा पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है। भाजपा-संघ और सरकार को कवर करते रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव पर भाजपा की जीत की इनसाइड स्टोरी पर आधारित पुस्तक "कैसे मोदीमय हुआ भारत" बेहद चर्चित रही है।

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First published: September 23, 2021, 7:56 PM IST
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