मेरे खाते में क्या आया? इस ग्रंथि से उबरें तो समझ आएगा पैकेज

प्रधानमंत्री मोदी की ओर से राष्ट्र के नाम संदेश में 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज के एलान ने आर्थिक जगत में नई ऊर्जा का संचार तो जरुर किया है. इस पैकेज के पहले चरण में 6 लाख करोड़ की दिशा तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बता चुकी हैं, अब अगले दो दिनों में दो प्रेस कांफ्रेंस के जरिए बाकी पैकेज की दिशा देश के सामने आएगी.

Source: News18Hindi Last updated on: May 14, 2020, 2:27 PM IST
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मेरे खाते में क्या आया? इस ग्रंथि से उबरें तो समझ आएगा पैकेज
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
कानूनी वजहों से कुछ इलाकों में कर्फ्यू या घटनाओं की वजह से भले एक-दो हफ्ते घरों में बंद रहना पड़ा हो. लेकिन मौजूदा पीढ़ी में शायद ही किसी ने कभी ऐसी आपदा देखी हो या फिर कभी घरों में लंबे समय तक बंद रहने की नौबत आई हो. कोरोना वायरस के इस हमले और जिंदगी-मौत के आंकड़ों के बीच हर तरफ लोग जिंदगी की जद्दोजहद कर रहे हैं. सब कुछ ठप सा दिख रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब पहली बार लॉकडाउन का ऐलान किया था तो स्पष्ट कहा था कि देश ही नहीं, हम और आप सभी को इस आपदा की कुछ न कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी. लेकिन लाॅकडाउन में अर्थव्यवस्था की थमती रफ्तार ने सरकार की सक्रियता को अब दूसरी तरफ भी लेकर जा रही है ताकि जब देश अपने पुराने ढर्रे पर लौटे तो समस्याएं न हो. प्रधानमंत्री की ओर से राष्ट्र के नाम संदेश में 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज के ऐलान ने आर्थिक जगत में नई ऊर्जा का संचार तो जरुर किया है. इस पैकेज के पहले चरण में 6 लाख करोड़ की दिशा तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बता चुकी हैं, अब अगले दो दिनों में दो प्रेस कांफ्रेंस के जरिए बाकी पैकेज की दिशा देश के सामने आएगी.

इस आर्थिक पैकेज में सरकार ने जिन बातों पर सबसे अधिक जोर दिया है, वह है- मांग आधारित बाजार तैयार करना. इसके लिए गरीबों को जनधन खाते, किसानों को प्रधानमंत्री किसान निधि के तहत अग्रिम राशि का भुगतान करना, प्रोविडेंट फंड से पैसे निकालने की छूट देना, टीडीएस रिफंड में तेजी लाना जैसे उपाय शामिल हैं. इसके अलावा आय कर दाखिल करने के मामले में छूट, जीएसटी आदि के जरिए सरकार लोगों के हाथों में पैसा पहुंचाने पर पूरा जोर दे रही है ताकि लोगों की क्रय शक्ति बढ़े और बढ़ती क्रय क्षमता बाजार में मांग पैदा करे. सूक्ष्मस लघु व मझोले उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है. जिसके लिए बड़े पैमाने पर कर्ज की व्यवस्था और जो एनपीए हो चुके हैं उन्हें भी फिर से खड़ा होने का मौका देना एक बहुत ही बड़ा कदम है क्योंकि सरकार ने मरे हुए उद्योग को मरने के लिए नहीं छोड़ा है बल्कि उसे वेंटीलेटर और दवाई के जरिए सेहतमंद बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है. इसी तरह सड़क निर्माण और अन्य क्षेत्र में कांट्रैक्टर्स की सुरक्षा जमा राशि को भी 70 फीसदी काम पूरा होते ही लौटाने का फैसला अहम है क्योंकि समय पर अपना पैसा वापस मिलने से वह उसका इस्तेमाल दूसरे प्रोजैक्ट के लिए कर सकते हैं और इसका फायदा होगा कि काम की गति बढ़ेगी जो आज के दौर में बेहद जरुरी है. किसी भी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने में में बड़े स्तर पर सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) की भूमिका होती है तो मध्यम स्तर पर एमएसएमई की और स्थानीय स्तर पर छोटे उद्योग की. सरकार की ओर से घोषित पैकेज ने खास तौर से एमएसएमई सेक्टर को एक साल तक के लिए पैसा पहुंचाने का काम किया है ताकि आर्थिक गतिविधि की रफ्तार बढ़ सके.

लेकिन सरकार की इस सोच की तरफ ध्यान देना होगा कि उसने सिर्फ पैकेज का एलान ही नहीं किया, बल्कि उसको जमीन पर उतारने का एक पूरा ढांचा तैयार कर लिया है. मुझे मिली सूचना के मुताबिक इस पैकेज के एलान से पहले सरकार ने स्वदेशी जागरण मंच के साथ कई दौर की बातचीत वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए की. इसमें एनबीएफसी के लोग भी शामिल थे जो छोटे स्तर पर वित्तीय संसाधन देने वाले संगठन के तौर पर काम करते हैं. लेकिन विरोध के लिए विरोध करने वालों का दायरा भी कम नहीं है. देश और दुनिया ने पहली बार ऐसी आपदा देखी हो, लेकिन विरोधियों की मानसिकता इस वक्त भी एक खास सिंड्रोम के तहत बनी हुई है जिसे मौजूदा दौर में बहुत सही नहीं कहा जा सकता. राजनीति में कई बार कहा जाता है- ‘निर्णय नहीं लेना भी एक बड़ा निर्णय है.’ लेकिन मौजूदा सरकार ने इस वैश्विक आपदा के समय भी लगातार आक्रामक फैसले लिए. औद्यिगिक संगठनों ने तो 15 लाख करोड़ के पैकेज की जरुरत बताई थी, लेकिन प्रधानमंत्री की ओर से आगे बढ़कर 20 लाख करोड़ के बड़े पैकेज का एलान करना निश्चित तौर से साहसिक निर्णय है जिसकी जरुरत इस समय अर्थव्यवस्था और आम आदमी को थी.

यह बात सही है कि आज बहुत से कामगार पैदल चलने को मजबूर हैं और भोजन के लिए भटक रहे हैं. लेकिन इसमें समाज के योगदान की भी जरुरत है क्योंकि भारत जैसे विशाल देश में सिर्फ साउथ ब्लॉक में बैठे प्रधानमंत्री से ही सारी समस्याओं का समाधान नहीं करवाया जा सकता. लेकिन देश में आज भी हमारे सोचने का तरीका बहुत हद तक नहीं बदला है. हम आज भी सरकार पर बहुत हद तक निर्भर हो जाते हैं. हम या समाज या राज्य की कोई भूमिका नहीं है. कहते हैं ना- पर उपदेश कुशल बहुतेरे. कोई सवाल उठाने से पहले अपने भीतर भी झांकना चाहिए. इस पैकेज के एलान के बाद भी वही सोच सामने आई- मेरे खाते में क्या आया? लेकिन इस पैकेज के पीछे की पूरी मंशा और ढांचा को समझे बिना आलोचकों ने कोसना भी शुरु कर दिया. क्या सबके खाते में पैसा पहुंच जाए तो अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो जाएगी? अगर उद्योग शुरु नहीं होंगे, उत्पादन नहीं होगा तो लोग पैसे का क्या करेंगे? जब मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ता है तो कैसे कालाबाजारी शुरु होती है, इसको भी समझने की जरुरत है. ऐसे में कुछ छोटे कदमों के जरिए लोगों को संसाधन और पैसे सरकार ने दिए हैं तो दूसरी तरफ उन पैसों को खर्च करने के लिए जरुरी उद्योग जगत को भी पैकेज के जरिए मजबूती देने की पहल की है.
लेकिन इस आपदा के समय आर्थिक पैकेज के जरिए आत्मनिर्भरता का जो संदेश उभरकर आया है उस पर वाकई ध्यान देने का वक्त आ गया है. विदेश ब्रांड की जगह देशी ब्रांड उपलब्ध हो तो उसे महत्व देकर अपनी अर्थव्यवस्था को योगदान दे सकते हैं. लेकिन इसका भी माखौल उड़ाया जा रहा कि गाड़ी, फोन आदि कौन से इस्तेमाल कर रहे हैं लोग? बात सही है, लेकिन जब जागो तभी सवेरा. स्वदेशी का मतलब यह नहीं है कि विदेश या दुनिया से भारत कट जाएगा. यह कतई संभव नहीं है. लेकिन आत्मनिर्भरता का मतलब है कि जितना ज्यादा हो सके हमें स्वदेशी को बढ़ावा देना चाहिए. अगर इसे राजनैतिक दृष्टिकोण से भी देखें तो प्रधानमंत्रीी नरेंद्र मोदी ने जनभावनाओं के अनुकूल एक बेहतरीन मौका दिया है. कोरोना वायरस की उत्पत्ति चीन से हुई है, इसको लेकर कोई संदेह नहीं है. यह वायरस प्राकृतिक नहीं होकर, प्रयोगशाला से उत्पन्न वायरस है यह भी बात सामने आ रही है. अगर हंसते-खेलते, जिंदगी जीने के लिए व्यसवसाय-रोजगार से जुड़े लोग आज घरों में बंद होकर मौत के आंकड़े गिन रहे हैं तो उसे मालूम है कि इसके लिए कहीं न कहीं चीन जिम्मेदारी है. इस भावना ने आज देश के हर व्यक्ति के जेहन में जगह जरुर बना ली है. जबकि एक तथ्य यह भी है कि भारत के बाजार में चीनी उत्पादों की घुसपैठ इस तरह बढ़ी की पारंपरिक चीजें लुप्त होने लगी और लोग भी रेडीमेड के चक्कर में दीया से लेकर खिलौने तक के लिए चीनी उत्पाद को तरजीह देने लगे थे. ऐसे में आत्मनिर्भरता या स्वदेशी की अपील करना प्रधानमंत्री मोदी का आक्रामक कदम है.

आर्थिक पैकेज भले देश की 135 करोड़ आबादी के व्यक्तिगत खाते में सीधे नहीं पहुंचे, लेकिन इसका फायदा तो अर्थव्यवस्था को गतिमान बनाने में होगा ही. ऐसे में मेरा मानना है कि विरोध हो या समर्थन, लेकिन कोरोना वायरस जैसी इस वैश्विक महामारी के समय जब लोग मिलकर जूझ रहे हैं तो समाज और देश को संवादी होना चाहिए, विश्वास होना चाहिए और संवाद के जरिए ही आगे बढ़ना चाहिए, ना कि मन में यह ग्रंथि पालें कि 20 लाख करोड़ के पैकेज में से मेरे बैंक खाते में कितना आया?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
संतोष कुमार

संतोष कुमार वरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। रामनाथ गोयनका, प्रेस काउंसिल समेत आधा दर्जन से ज़्यादा पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है। भाजपा-संघ और सरकार को कवर करते रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव पर भाजपा की जीत की इनसाइड स्टोरी पर आधारित पुस्तक "कैसे मोदीमय हुआ भारत" बेहद चर्चित रही है।

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First published: May 14, 2020, 1:36 PM IST
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