आमिर खान ने 'लगान' की कहानी को शुरुआत में कर दिया था रिजेक्‍ट!

सबसे चर्चित और बॉक्‍स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़ने वाली फिल्‍म थी मदर इंडिया (Mother India). दो बीघा जमीन ने भी खूब प्रशंसा बटोरी. उपकार सुपर हिट तो थी ही मनोज कुमार की भारत कुमार की छवि इसी फिल्‍म ने गढ़ी थी. पीपली लाइव किसानों के अलावा, मीडिया की हर हाल में टीआरपी बटोरने जैसे मुद्दों पर भी बात करती है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 6, 2021, 12:46 PM IST
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आमिर खान ने 'लगान' की कहानी को शुरुआत में कर दिया था रिजेक्‍ट!
आमिर खान.
किसान आंदोलन जोरों पर है. ऐसे माहौल में किसानों पर बनी फिल्‍मों का याद आना स्‍वाभाविक है. यहां हम चर्चित किसान फिल्‍मों की बात जरूर करेंगे, लेकिन कुछ हटकर. दूसरी जरूरी बातों के साथ हम इनसे जुडे़ कुछ दिलचस्‍प किस्‍सों और रोचक तथ्‍यों पर भी बात करेंगे. बालीवुड में किसान पर बहुत कम फिल्‍में बनी हैं चर्चित और प्रशंसित फिल्‍मों की तलाश की जाए तो कुल जमा पांच फिल्‍में ही सामने आती हैं. इनमें दो बीघा जमीन (1953), मदर इंडिया (Mother India) (1957), उपकार (1967), लगान (Lagaan) (2001) और पीपली लाइव(2010).

सबसे चर्चित और बॉक्‍स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़ने वाली फिल्‍म थी मदर इंडिया. दो बीघा जमीन ने भी खूब प्रशंसा बटोरी. उपकार सुपर हिट तो थी ही मनोज कुमार (Manoj Kumar) की भारत कुमार की छवि इसी फिल्‍म ने गढ़ी थी. पीपली लाइव (Peepli Live) किसानों के अलावा, मीडिया की हर हाल में टीआरपी बटोरने जैसे मुद्दों पर भी बात करती है. किसान पर सबसे चर्चित फिल्‍म का दर्जा लगान को दिया जा सकता है. ये फिल्‍म आस्‍कर दरवाजे तक सीरियसली पहुंचने वाली फिल्‍म भी थी.

इसी फिल्‍म से जुड़़े एक दिलचस्‍प किस्‍से से शुरूआत करते हैं. यह कहानी आमिर से एक रूबरू सुनी है. आमिर के शब्‍दों में, ‘जब मैंने लगान की कहानी सुनी थी, पांच मिनिट नरेशन में आशुतोष की, मैंने रिजेक्‍ट कर दी थी. के भाई, उस वक्‍त की बात है, 1895 की, के बारिश नहीं हो रही है तो लोग (किसान) लगान नहीं दे पा रहे हैं, तो ये अंग्रेज के अगेन्‍स्‍ट क्रिकेट खेलते हैं, अपना लगान माफ कराने के लिए. तो मैंने कहा यार ये क्‍या बेज़ार थॅाट है. एण्ड आई टोल्‍ड, आशु, हम हमारी बिल्डिंग में नीचे बैठे हुए थे; मैंने कहा यार आशु तेरी एक फिल्‍म फ्लॉप हो गई, दूसरी मेरे साथ बनाई वो भी नहीं चली, अब तू तीसरी ये कहानी ले के आया है. प्‍लीज़ यार, ऐसा मत कर, कोई अच्‍छी कहानी ला, ये तो बहुत अजीब लगी मुझे. तो वो ग़ायब हो गया, मेरी जि़ंदगी से, ग़ायब हो गया आशुतोष.

तीन महीने बाद उसका फोन आया, यार मेरे पास एक फुल्‍ली डेवलप्‍ड स्क्रिप्‍ट है, मैं सुनाना चाह रहा हूं. आई सेड हां, मिलते हैं एक दो हफ्ते में, मैंने उसको वक्‍त दिया. फिर मुझे लगा ये वो ही कहानी को तो डेवलप्‍ड करके नहीं ले आया. मैंने उसको फोन किया यार आशु ये वोई कहानी तो नहीं है, क्रिकेट वाली, उसने बोला तू सुन तो ले, मैं बोला नहीं, अगर ये क्रिकेट वाली है तो मैं नहीं सुनने वाला, मैं नहीं सुनने वाला हूं. तो उसने कहा यार सुन ले तीन महीने की मेहनत है. तो मुझे इतनी इरिटेशन हुई, मैंने उसको बोला था, मत इसपे काम कर, खैर अब दोस्‍त है, उसने कहा कि मैंने तीन महीने काम किया है, तो मैंन कहा सुन लेते हैं. अब सुनके ना ही बोलना है, तो सुन लेते हैं.
जब मैंने उसकी स्‍क्रीनप्‍ले सुनी बाबा, आई वाज़ ब्‍लोन यार. पहले सीन से मै अंदर घुसा हूं उस फिल्‍म के, तोअअअअ.... मुझे रियलाइज़ हुआ... के कहानी और स्‍क्रीनप्‍ले में बहुत बड़ी जर्नी है. आप कहानी पे जज मत कीजिए. आपको अच्‍छी लगे या बुरी लगे, प्‍लीज़ उसको कहानी के लेबल पर जज मत कीजिए.’
लगान पर बाकी बातें आगे पहले किसान पर बनी पहली फिल्‍म्‍ दो बीघा जमीन. रवीन्‍द्र नाथ ठाकुर की कविता ‘दुई बीघा जोमी’ से शीर्षक लेकर 1953 में बिमल राय ने इस फिल्‍म का निर्माण और निर्देशन किया. यह पहला फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार पाने वाली फिल्‍म थी. इसे 1954 में दो पुरस्‍कार मिले सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म और सर्वश्रेष्‍ठ निर्देशक का. अलावा इसके यह पहला राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार पाने वाली फिल्‍म भी थी. ये दौनों ही पुरस्‍कार 1954 से शुरू हुए थे.

फिल्‍म बहुत मार्मिक थी और किसानों की दुर्दशा और बेबसी का सजीव चित्रण करने वाली. किसान के अलावा फिल्‍म रिक्‍सा चालकों के हालात पर भी मार्मिक बयानी करती है. फिल्‍म की कहानी के केन्‍द्र में शम्‍भू है जो एक गरीब किसान है और उसके पास परिवार को पालने के लिए महज दो बीघा जमीन है. उसके परिवार में पत्‍नी, बेटा, बूढ़ा पिता और एक आने वाली संतान है. गांव का जमींदार अपनी विशाल जमीन पर एक मिल खोलना चाहता है. समस्‍या यह है कि उसकी जमीन के बीच में शंभू की जमीन है. जमींदार चाहता है शंभू अपनी जमीन उसे बेच दे. शंभू तैयार नहीं होता तो वह उससे अपना कर्जा चुकाने को कहता है. शंभू अपना सब कुछ बेचकर भी कर्ज नहीं पटा पाता क्‍योंकि उसके कागजों में हेरफेर कर उसके कर्ज की राशि 65 रूपए से बढ़कर 235 रूपए हो चुकी है. फिल्‍म न्‍याय व्‍यवस्‍था पर भी कटाक्ष करती है. कोर्ट फैसला सुनाता है कि अगर शंभू ने तीन महीने में पैसे नहीं चुकाए तो उसकी जमीन बेचकर वसूली की जाएगी.थक हारकर शंभू कोलकाता जाकर रिक्शा चलाता है ताकि कर्ज चुकाने के लिए रकम जुटाई जा सके. लेकिन वहां से वो अपनी पूंजी भी गंवाकर गांव लौटता है तो देखता है कि उसकी जमीन पर मिल बन रही है. फिल्‍म में बलराज साहनी ओर निरूपाराय मुख्‍य भूमिका में थे. बलराज साहनी का जब भी जिक्र होता है फिल्‍म दो बीघा जमीन की बात जरूर होती है. यह रोल करने के पहले उन्‍होंने कोलकाता जाकर महीनों रिक्‍सा चलाया था ताकि केरेक्‍टर में जान डाल सकें.

एक महिला के कंधों पर किसान का हल. यह पहचान है मदर इंडिया फिल्‍म की. यह सिर्फ किसान की बात नहीं करती बल्कि महिलाओं की जाग्रति का अलख भी जगाती है. यह विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं की जीवटता की बात करती है. इससे जुड़ी दिलचस्‍प बातें. यह फिल्‍म मेहबूब खान की ही 1940 में बनी फिल्‍म औरत का रीमेक है. फिल्‍म में सुनील दत्‍त और राजेन्‍द्र कुमार ने नर्गिस के बेटों का रोल किया है. फिल्‍म के सेट पर लगी आग से सुनील दत्‍त ने नर्गिस को बचाया था, जिसके बाद दौनों ने विवाह कर लिया.

फिल्‍म का शीर्षक अमेरिकी लेखिका कैथरीन मायो द्वारा 1927 में लिखी गई पुस्‍तक ‘मदर इंडिया’ से लिया गया था. इस पुस्‍तक में मायो ने भारतीय समाज पर हमला किया था. उन्‍होंने भारतीय महिलाओं की दुर्दशा, छुआ छूत, धूल मिट्टी और राजनेताओं पर आपत्तिजनक टिप्‍पणी की थी जिसके कारण इस पुस्‍तक का देश भर में विरोध हुआ था, मायो की लानत-मलामत हुई थी ओर किताबों की प्रतियां जलाई गईं थीं.

1952 में जब मेहबूब खान ने फिल्‍म का शीर्षक यह रखा तो सरकार को लगा कि यह राष्‍ट्रीय हित के खिलाफ है. सरकार के कहने पर जब निर्माता ने कहानी सूचना और प्रोद्योगिकी विभाग को भेजी तो गलतफहमियां दूर हुईं. इस बारे में मेहबूब खान ने कहा था. ‘हमारी फिल्‍म और मायो की मदर इंडिया एक दूसरे से अलग ओर विपरीत हैं. हमने जानबूझकर ‘मदर इंडिया’ शीर्षक चुना है ताकि पुस्‍तक को चुनौती दे सकें और लोगों के दिमाग़ से मायो की बकवास को बाहर निकाल सकें.’

1957 में बनी यह फिल्‍म अनेक कारणों से चर्चा में रही है. मेहबूब खान द्वारा निर्मित, लिखी और निर्देशित की गई इस फिल्‍म ने बाक्‍स ऑफिस पर खूब घमाल मचाया था. 1958 में इसे सर्वश्रेष्‍ठ फीचर फिल्‍म के अवार्ड से सम्‍मानित किया गया था. मदर इंडिया मुगले आज़म और शोले के साथ उन चुनिंदा फिल्‍मों में शामिल की जाती है जिन्‍हें दर्शक आज भी देखना चाहता है. यह फिल्‍म भारत की ओर से पहली बार अकादमी पुरस्‍कारों के लिए भेजी गई थी.

किसानों की फिल्‍म की बात उपकार के बिना पूरी नहीं होती. उपकार का लेखन, निर्देशन मनोज कुमार ने किया था तथा भारत कुमार का मुख्‍य किरदार भी निभाया था. इसी फिल्‍म से मनोज कुमार की भारत कुमार की छवि बनी जो उनके बैनर की बाद की फिल्‍मों में भी लगातार नजर आई. बॉक्‍स आफिस के साथ समीक्षकों ने भी फिल्‍म को भरपूर सराहा. इस फिल्‍म को छ: फिल्‍म फेयर पुरस्‍कारों से नवाज़ा गया था.

फिल्‍म को सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म के अलावा मनोज कुमार को सर्वश्रेष्‍ठ निर्देशक, सर्वश्रेष्‍ठ कथा लेखक और सर्वश्रेष्‍ठ संवाद लेखन का पुरस्‍कार भी मिला था. यह फिल्‍म मनोज कुमार की सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍मों के रूप में जानी जाती है. मनोज कुमार के अलावा लंगड़े मलंग का रोल निभाने वाले प्राण ने भी खूब वाह वाही लूटी थी. इस फिल्‍म में प्राण ने खलनायक की परंपरागत छवि को तोड़कर पाजि़टिव रोल निभाया था जिसे दर्शकों ने सिर आंखों पर लिया था. उनका गाया एक गाना ‘कस्‍मे वादे प्‍यार वफा सब वादे हैं वादों का क्‍या’ खूब लोकप्रिय हुआ था.

‘पीपली लाइव’ से जुड़ा दिलचस्‍प किस्‍सा. किसान द्वारा आत्‍महत्‍या करने की घोषणा करने ओर उस पर इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के टूट पड़ने की जिस घटना को लेकर ये फिल्‍म बनी थी वह घटना सचमुच में पहले हो चुकी थी. मध्‍य प्रदेश के एक जिले बैतूल में एक किसान आत्‍महत्‍या की घोषणा करता है और जिसे इलैक्‍ट्रानिक मीडिया लपक लेता है.

इसके अलावा ‘मंहगाई डायन खाय जात है’ सांग के रिलीज़ की टाइमिंग भी कमाल की थी. देश में जिस दिन तत्‍कालीन विरोधी पार्टी भाजपा ने मंहगाई और अन्‍य मुद्दों को लेकर भारत बंद किया था. ठीक उसी दिन यह गाना चैनलों की शोभा बढ़ाने अवतरित हुआ और शाम तक ये हर आदमी की जुबां पर था.

पीपली लाइव, यह फिल्‍म किसानों की समस्‍या के साथ साथ इलेक्‍ट्रानिक मीडिया पर भी गहरा और पावरफुल कटाक्ष करती है. वर्तमान किसान आंदोलन के संदर्भ में देखें तो इस समय भी किसान आंदोलन ओर मीडिया में तनातनी चल रही है. आमिर खान द्वारा निर्मित इस फिल्‍म का लेखन और निर्देशन अनुषा रिज़वी ने किया है. मंहगाई डायन वाले लोकप्रिय गाने के अलावा हबीब तनवीर के नया थिएटर के कलाकार ओंकार दास माणिकपुरी के रोचक अभिनय के कारण भी फिल्‍म जानी जाती है.

फिल्‍म लगान के बारे में बहुत कुछ लिखा पढ़ा जा चुका है. आमिर खान अभिनीत ओर आशुतोष गोवारीकर द्वारा लिखित और निर्देशित यह कहानी रानी विक्‍टोरिया के शासन काल में किसानों की दुर्दशा की बात करती है. यह कठोर ब्रिटिश लगान की बेरहम वसूली और लगान चुकाने में असमर्थ लाचार किसानों की कहानी है. क्रिकेट इसमें नए और रोचक अंदाज़ से एंट्री करता है. एक मार्मिक और संदेश परक विषय को कैसे दिलचस्‍प तरीके से पेश किया जा सकता है यह फिल्‍म इसका सटीक उदाहरण है. फिल्‍म को अनेक पुरस्‍कारों से नवाज़ा गया.

(लेखक फिल्‍म और कला समीक्षक हैं. यह उनके निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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First published: February 6, 2021, 12:46 PM IST
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