अफगान पर फिल्‍में , ‘रेम्‍बो 3’ की बातें

भारतीय सिनेमा की बात करें तो वो एक्‍शन के बजाए भावनाओं पर ज्‍यादा फोकस करता है. अफगान पर बनी हॉलीवुड फिल्‍मों के मुकाबले काबुलीवाला एक पिता और पुत्री के संबंधों की मार्मिक व्‍याख्‍या करने वाली बेहद संवेदनशील और खूबसूरत फिल्‍म है. कह सकते हैं यह फिल्‍म अफगानियों को अपने दिल के करीब लगेगी.

Source: News18Hindi Last updated on: August 31, 2021, 3:49 PM IST
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अफगान पर फिल्‍में , ‘रेम्‍बो 3’ की बातें

अफगानिस्‍तान का जिक्र आते ही भारतीय फिल्‍म प्रेमियों के दिमाग में हिंदी की दो फिल्‍में कौंध जाती हैं एक अमिताभ की ‘खुदा गवाह’ और दूसरी बलराज साहनी अभिनीत ‘काबुलीवाला’. 1992 की खुदागवाह जहां एपिक ड्रामा और मारधाड़ से भरपूर एक्‍शन मूवी थी, तो वहीं 1961 की काबुलीवाला भावनाओं से ओतप्रोत संवेदनशील मूवी थी. काबुलीवाला रवींद्रनाथ नाथ टैगोर की इसी शीर्षक वाली कहानी पर आधारित फिल्‍म थी. ये तो हुई बॉलीवुड की बात.


अफगानिस्‍तान हॉलीवुड का भी प्रिय विषय रहा है. इस विषय पर जेम्‍स बॉण्‍ड की ‘द लिविंग डे लाइट्स’ और ‘रेम्‍बो III’  को याद किया जा सकता है. भारतीय फिल्‍में अलग मूड और तेवर की फिल्‍में ,थीं तो हॉलीवुड मूवीज़ रियलिटी के धरातल पर गढ़ी गईं थीं. इसीलिए हम खासतौर पर रेम्‍बो 3 पर फोकस करेंगे. जो सीधे-सीधे मूल विषय को छूती है – रूस, अमेरिका, अफगानिस्‍तान, पाक और मुज़ाहिदीन.


ये बहस बहुत पुरानी है कि समाज में जो घटता है, वही फिल्‍म में दिखाया जाता है या फिर फिल्‍मों में जो बुरा दिखाया जाता है वो समाज ग्रहण करता है, खासकर हिंसा और सेक्‍स. जो विशेषकर युवाओं को गलत ट्रेक पर ले जाता है. पुरानी बहस है और इसके निष्‍कर्ष पर पहुंचना आसान नहीं. इसलिए इसे यहीं छोड़ें. लेकिन यह तो कह ही सकते हैं कि कल्‍पना सच से ही उपजती है. इसका सटीक प्रमाण है हॉलीवुड की ये और इसी तरह की दूसरी फिल्‍में.


अफगानिस्‍तान में सत्‍तर के दशक में जो हुआ और जो हो रहा है, उसके राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ भले ही कुछ रहे हों. हॉलीवुड को अपनी तरह की मसाला फिल्‍में बनाने का मसाला जरूर अफगान ने दे दिया. कहावत है Truth is stranger than fiction यानि सत्‍य कल्‍पना से भी अधिक विस्‍मयकारी होता है. और फिल्‍में तो कल्‍पना की ही उपज हैं.

जेम्‍स बाण्‍ड के जिम्‍मे हमेशा से एक ही काम रहा है, अमेरिका के दुश्‍मन देशों में घुसकर जासूसी करना और उन्‍हें तबाह करना. अफगानिस्‍तान में रूस की एंट्री हो और उसे हार मानकर एक्जि़ट करना पड़े, तो जेम्‍स बॉण्‍ड इसे भुनाने में पीछे कैसे रह सकता है. सो Eon Productions का 1987 में ‘द लिविंग डेलाइट’ मूवी लेकर आना स्‍वाभाविक ही कहा जाएगा. इधर रेम्‍बो भी अपने वियतनाम युद्ध के अनुभवों को ताजा करना चाहता था, इसलिए अफगान के मैदान में सिल्‍वेस्‍टर स्‍टेलॉन भी उतर पड़े. पीटर मैकडोनाल्‍ड के निर्देशन में एक्‍सन फिल्‍म रेम्‍बो III. रेम्‍बो 3, 1988 में दर्शकों से रूबरू हुई.


रेम्‍बो वास्‍तविकता से कितने करीब की फिल्‍म है, ये पता चलता है कुछ टिप्‍पणीकारों की इस टिप्‍पणी से. मूल फिल्‍म अफगानिस्‍तान राष्‍ट्र का महिमामंडन करती है. पहले फिल्‍म  इस वाक्‍यांश के साथ समाप्‍त होती है ‘यह फिल्‍म अफगानिस्‍तान के बहादुर मुज़ाहिदनीन सेनानियों को समर्पित है’. 09/11 के हमलों के बाद इस लाइन को बदलकर ‘यह फिल्‍म अफगानिस्‍तान के वीर लोगों को समर्पित है’ कर दिया गया.


अफगानिस्‍तान में राजशाही 1973 तक चली. आखिरी राजा थे मोहम्‍बर ज़हीर शाह. जब वो इलाज कराने के लिए इटली गए, तो उनके सेनापति दाउद खान ने तख्‍तापलट कर सत्‍ता पर कब्‍जा कर लिया और खुद को प्राइम मिनिस्‍टर घोषित कर दिया. लोकतंत्र के नाम पर अफगानी जनता को लुभाने वाले दाउद ने जब लोकतंत्र के नाम पर खुद का तंत्र स्‍थापित करना शुरू किया, तो जन विद्रोह हुआ और जन नेता के रूप में नूर मोहम्‍मद तारिकी सामने आए और 1978 में देश के पहले राष्‍ट्रपति बने.


सोवियत संघ के प्रति झुकाव और कम्‍युनिस्‍ट विचारधारा के चलते अमेरिका की एंट्री हुई. सीआईए ने अपना मोहरे बिठाए और अंतत: तारिकी मारे गए. जवाब में 1979 में रूस ने अफगानिस्‍तान पर कब्‍जा किया. रूस को अफगा‍न से भगाने के लिए अमेरिका ने धार्मिक कट्टरता का कार्ड खेला और लोगों को समझाया कि रूस अफगान से इस्‍लाम को और यहां की पहचान को खत्‍म कर देगा. तब अमेरिका की मदद से पाकिस्‍तान की जमीन पर मुज़ाहिदीनों को ट्रेनिंग दी गई.

अमेरिका की पहल पर ओसामा बिन लादेन को अफगानिस्‍तान भेजा गया. अंतत: रूस को अफगान छोड़ना पड़ा. और बाद के वर्षों में तालिबान की सरकार बनी, जिसे 09/11 के हमलों के बाद अमेरिका ने बलपूर्वक हटा दिया और नई सरकार कायम कर दी. अमेरिका के वापस जाने के फैसले के साथ अंतत: वर्तमान परिदृश्‍य सामने आया.


बात मूवी रैम्‍बो 3 की. रैम्‍बो का दोस्‍त कर्नल सैम ट्रौटमैन सीआईए के प्रायोजित मिशन के तहत अफगानिस्‍तान में सोवियत सेना के खिलाफ काम कर रहा है. यहां उसने मुज़ाहिदीन औन अन्‍य अफगानियों को अपने साथ लिया हुआ है. एक हमले में सोवियत सेना ट्रौटमैन को बंदी बना लेती है. अमेरिका चूंकि सीधे दखल नहीं देना चाहता सो रैम्‍बो पर जिम्‍मेवारी आयद होती है कि वह अपने दोस्‍त ट्रोटमैन को सोवियत सेना के चंगुल से बचाए. रैम्‍बो पेशावर, पाकिस्‍तान के लिए उड़ान भरता है, जहां हथियारों के सौदागर मौसा गनी से उसकी मुलाकात होती है. खोस्‍त जहां ट्रोटमैन को बंदी बनाया गया है, उस गांव के मुजाहिदीन सरदार मसूद के नेतृत्‍व में रैम्‍बो की मदद करते हैं.


अंतत: भारी मारधाड़, खून-खराबे, हिंसक झड़पों और लंबे एक्‍शन सिक्‍वेंस के बाद रैम्‍बो अपने मिशन में सफल होता है.  आखिर में रेम्‍बो और टौटमैन मुजाहिदीन और अफगान को अलविदा कहते हैं.


इस फिल्‍म को सिनेमाई युद्द की संज्ञा दिया जाना उचित होगा. 1990 में द गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकार्ड्स ने रेम्‍बो 3 को उस समय की सबसे हिंसक फिल्‍म का दर्जा दिया था. फिल्‍म में 221 हिंसा दृश्‍य, 70 विस्‍फोट थे और इसके 108 से अधिक पात्र मारे गए थे. फिल्‍म में मुजाहिदीन कमांडर का नाम अहमद शाह मसूद के नाम पर रखा गया था जिन्‍होंने रूस के खिलाफ युद्ध लड़ा था. बाद में वे तालिबान खिलाफ भी लड़े. फिल्‍म की शूटिंग इज़राइल, थाईलैण्‍ड और एरिज़ोना में की गई थी. समीक्षकों से फिल्‍म को बहुत अधिक सराहना नहीं मिली थी. इसे 100 में से 36 रेटिंग मिली थी जिसे अच्‍छा नहीं कहा जा सकता.

बात ‘द लिविंग डे लाइट्स’ की. निर्देशक जॉन ग्‍लेन रोज़र मूर की जगह टिमोथी डाल्‍टन ने जेम्‍स बॉण्‍ड बनाया था. इस परिवर्तन को समीक्षकों की सराहना भी मिली. द वासिंगटन पोस्‍ट में समीक्षा करते हुए रीटा केम्‍पली लिखती हैं – ‘अब तक का सबसे अच्‍छा बॉण्‍ड. जेनेट मसलिन, द न्‍यूयार्क टाइम्‍स नए बॉण्‍ड की तारीफ के पुल बांधते हुए कहते हैं  ‘सही डेबोनियर लुक और उस तरह की ऊर्जा है, जिसकी कमी हाल ही में बॉण्‍ड श्रंखला में रही है.’ लेकिन रीज़र एबर्ट (शिकागो सन टाइम्‍स) को इसमें कमी दिखती है. ‘ महान बॉण्‍ड खलनायकों में से एक नहीं. वह एक कुटिल नकली जनरल है, जो खिलौना सैनिकों के साथ खेलता है और कभी भी शैतानी नहीं लगता है.’ डाल्‍टन के पूर्ववर्ती रोज़र मूर ने 2012 में इस पर‍ टिप्‍पणी की और कहा ‘ ब्‍लडी गुड मूवी.’


अफगान की बात खुदा गवाह के बिना इसलिए पूरी नहीं होती, क्‍योंकि यह अपेक्षाकृत बाद की, 1992 की फिल्‍म है और इसमें अमिताभ बच्‍चन और श्रीदेवी हैं. इनसे नई पीढ़ी ज्‍यादा कनेक्‍ट करती है. फिल्‍म में बादशाह खान अपनी प्रेयसी के पिता के हत्‍यारे को खोज में अफगानिस्‍तान से भारत आता है, ताकि वो उसे (प्रेयसी को) प्रभावित कर सके.  यहां आकर वो एक हत्‍या के आरोप में फंस जाता है. मुकुल एस; आनंद निर्देशित यह फिल्‍म बाक्‍स आफिस पर सफल रही थी. फिल्‍म की शूटिंग अफगानिस्‍तान के कंधार और मज़ारे ए शरीफ में हुई थी. इन दौनों स्‍थानों की इन दिनों खूब चर्चा है. कंधार भारतीय विमान अपहरण के लिए भी जाना जाता है. तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति मोहम्‍मद नजीबुल्‍लाह ने फिल्‍म यूनिट को सुरक्षा मुहैया कराई थी.


बहरहाल, हॉलीवुड के लिए रूस की हार पर फिल्‍म बनाना तो सहज और आसान था, देखना दिलचस्‍प होगा अब अमेरिका के अफगान से बिना जीते जाने के बाद हॉलीवुड कैसे रिएक्‍ट करता है.


भावनाएं हमेशा हिंसा से ऊपर रहती हैं. खासकर भारतीय सिनेमा की बात करें तो वो एक्‍शन के बजाए भावनाओं पर ज्‍यादा फोकस करता है, (करता था भी कह सकते हैं). अफगान पर बनी हॉलीवुड फिल्‍मों के मुकाबले काबुलीवाला एक पिता और पुत्री के संबंधों की मार्मिक व्‍याख्‍या करने वाली बेहद संवेदनशील और खूबसूरत फिल्‍म है. कह सकते हैं यह फिल्‍म अफगानियों को अपने दिल के करीब लगेगी. इसमें मन्‍नाडे द्वारा गाया गया एक गाना वर्तमान हालातों में अफगानी जरूर गुनगुनाना चाहेंगे – ऐ मेरे प्‍यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझपे दिल कुरबान… तूही मेरी आरजू़ तू ही मेरी आबरू, तू ही मेरी जान…



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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First published: August 31, 2021, 3:49 PM IST
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