अंदाज़ अपना अपना ‘एवरेज’ फिल्‍म की ‘कल्‍ट क्‍लासिक’ जर्नी

1994 में 04 नवंबर को रिलीज़ होने वाली फिल्‍म ‘अंदाज़ अपना अपना’ यूनिक कॉमेडी थी. रिलीज़ के बाद फिल्‍म ने बॉक्‍स ऑफिस पर एवरेज प्रदर्शन किया. लेकिन बाद के वर्षों में, इस फिल्‍म को दर्शकों का भरपूर प्‍यार मिला और फिल्‍म कल्‍ट क्‍लासिक कहलाई. कॉमेडी ज़ोनर में कल्‍ट क्‍लॉसिक की बात करें तो फिल्‍म ‘जाने भी दो यारों’ का नाम लिया जाता है. इसे स्‍वीकारने में कोई परहेज़ नहीं, लेकिन ‘अंदाज़ अपना अपना’ उससे पूरी तरह अलग थी और यह भी ‘कल्‍ट क्‍लासिक’ का तमगा पाने की अधिकारी है.

Source: News18Hindi Last updated on: November 5, 2021, 5:19 PM IST
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अंदाज़ अपना अपना ‘एवरेज’ फिल्‍म की ‘कल्‍ट क्‍लासिक’ जर्नी


फिल्‍म को डायरेक्‍टर का मीडिया कहा जाता है. दूसरी तरफ फिल्‍म सामूहिक भागीदारी के बिना नहीं बनती. फिल्‍म की अच्‍छी या बुरी मेकिंग जरूर बहुत कुछ निर्देशक के ऊपर निर्भर है, लेकिन फिल्‍म का हिट या फ्लॉप होना निर्देशक के हाथ में नहीं होता. फिल्‍म के हिट या फ्लॉप होने के बहुत सारे कारण होते हैं. फिल्‍म कब रिलीज़ हो रही है, उसके कंपटीशन में कितनी और कैसी फिल्‍में रिलीज़ हो रही हैं. स्‍टारकास्‍ट कैसी है और वितरक कौन है नया या अनुभवी. सबसे बड़ी बात फिल्‍म की पब्लिसिटी कैसी है और इसका बजट क्‍या है.


1994 में 04 नवंबर को रिलीज़ होने वाली फिल्‍म ‘अंदाज़ अपना अपना’ यूनिक कॉमेडी थी. रिलीज़ के बाद फिल्‍म ने बॉक्‍स ऑफिस पर एवरेज प्रदर्शन किया. लेकिन बाद के वर्षों में, इस फिल्‍म को दर्शकों का भरपूर प्‍यार मिला और फिल्‍म कल्‍ट क्‍लासिक कहलाई. कॉमेडी ज़ोनर में कल्‍ट क्‍लॉसिक की बात करें तो फिल्‍म ‘जाने भी दो यारों’ का नाम लिया जाता है. इसे स्‍वीकारने में कोई परहेज़ नहीं, लेकिन ‘अंदाज़ अपना अपना’ उससे पूरी तरह अलग थी और यह भी ‘कल्‍ट क्‍लासिक’ का तमगा पाने की अधिकारी है.


यह ‘टॉम एण्‍ड जेरी’ का मानवीय रूपांतरण है, उसका विशुद्ध भारतीय और देशी वर्जन. लेखक निर्देशक राजकुमार संतोषी खुद इस बात को मानते हैं और कहते भी हैं. फिल्‍म को आईएमबीडी पर 10 में से 8 अंक मिले. फिल्‍म के एवरेज प्रदर्शन को लेकर संतोषी का मानना था कि एक तो वितरक नया था दूसरे फिल्‍म की पब्लिसिटी ढंग से नहीं हुई. ग़ालिब ने कह गए हैं, शायर की गज़ल अगर कोठों पर गाई जाने लगे और आम लोगों की ज़बान पर चढ़ जाए तो समझलो शायर का गज़ल लिखना और पढ़ना कामयाब हो जाएगा.


गालिब की गज़लें इसी मेयार (स्‍टेंडर्ड) की गज़लें थीं. बता दें उस दौर में कोठे और कोठे वालियां गाने बजाने तक सीमित थीं, बदनामी भरे कामों से दूर . समाज में उन्‍हें अच्‍छी नज़रों से देखा जाता था. यही रूल प्रकारांतर से फिल्‍मों पर भी लागू होता है. जिस फिल्‍म के संवाद और केरेक्‍टर लोगों की ज़बान पर ऐसे चढ़ जाएं कि आम आदमी उसे मौके ब मौके दोहराता रहे तो समझ लीजिए वो फिल्‍म ब्‍लॉक बस्‍टर हिट की श्रेणी में शामिल है.


शोले के उदाहरण को सामने रखा जा सकता है.  ‘तेरा क्‍या होगा रे कालिया’ इसी श्रेणी का संवाद है. या फिर मिस्‍टर इंडिया का ‘मोगंबो खुश हुआ’. इसी तरह एक संवाद और लोगों की ज़बान पर चढ़ा हुआ है ‘क्राइम मास्‍टर गोगो’ फिल्‍मों के प्रेमी जैसे ही ये संवाद सुनते हैं झट से उनके दिमाग़ में शक्ति कपूर का चेहरा घूम जाता है. इसी तरह ‘मैं तेजा हूं, मार्क इधर है’ कहो तो परेश रावल का चेहरा सामने आ जाता है. यह दोनों संवाद और केरेक्‍टर ‘अंदाज़ अपना अपना’ के ही हैं.


लेकिन ये तो ऐसी फिल्‍म के संवाद हैं, जो ब्‍लॉक बस्‍टर तो छोड़िए एवरेज बिज़नेस करने वाली फिल्‍म थी. तो फिर नियम का क्‍या हुआ? जनाब नियम टूटते भी तो हैं, अपवाद इन्‍हें तोड़ते है. अगर ‘अंदाज़ अपना अपना’ ने ऐसा किया है तो वह कुछ ज्‍यादा ही तवज्‍जो की हकदार है. दुनिया का सबसे मुश्किल काम है हंसाना, और ‘अंदाज…’ तो पहले सीन से ही अपने काम पर लग जाती है. इसकी कॉमेडी में वेरायटी है. सिचुएशनल कामेडी भी है, तो संवादों के सहारे पैदा किया गया हास्‍य भी है. कलाकारों के अभिनय से गढ़ी गई कॉमेडी भी है.


खास बात ये है कि कहीं भी कुछ भी ओवर नहीं है, अतिरंजित नहीं है. राइटर-डायरेक्‍टर की क्‍लासिक कृति को आकार देने के लिए आमिर, सलमान, करिश्‍मा, रबीना, परेश (दोहरी भूमिका) , शक्ति कपूर, तो थे ही. रही सही कसर गोविंदा, जूही, मेहमूद, और जगदीप के कैमियो ने पूरी कर दी. लाख टके का सवाल ये है कि इतना सब होने के बाद भी फिल्‍म चली क्‍यों नहीं. दो कारण तो ऊपर बता ही दिए हैं, कमजोर पब्लिसिटी और अनुभवहीन वितरक. इसके साथ जिस फिल्‍म ने रिलीज़ शेयर की उस फिल्‍म की बेहतर पब्लिसिटी हुई थी.


एक फिल्‍म थी सुहाग, जिसमें अजय देवगन, अक्षय कुमार, करिश्‍मा और नग़मा थे. 1994 में जब यह फिल्‍म रिलीज़ हुई, उस साल सुपर हिट फिल्‍मों की कतार लगी हुई थीं. सबसे बड़ी रिलीज़ तो सलमान (माधुरी) की ही फिल्‍म थी. राजश्री प्रोडक्‍शन की आल टाइम ब्‍लॉक बस्‍टर मूवी ‘हम आपके हैं कौन’. सूरज बड़जात्‍या की महज सात करोड़ में बनी इस फिल्‍म ने 127.96 करोड़ (वर्ल्‍ड वाइड) का बिजनेस किया. वो एक अलग ज़ोनर की फिल्‍म थी और ये बिलकुल अलग.


दूसरी बात ये थी कि राजकुमार संतोषी की पहचान सनी देओल की घायल (1990) के कारण एक सीरियस निर्देशक की बन चुकी थी. जिसके चलते भी दर्शक उनके नाम पर कामेडी देखने नहीं पहुंचे. इस फिल्‍म के बाद दर्शकों ने उनके कॉमेडी ज्ञान को स्‍वीकारा भी. संतोषी ने बाद में रणवीर कपूर और कटरीना कैफ को लेकर हिट फिल्‍म ‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ बनाई, जिसमें सलमान खान ने कैमियो किया था.


इस साल की दूसरी सफल फिल्‍मों में ‘मोहरा’ (अक्षय, नसीर, रबीना, सुनील शेट्टी), नाना पाटेकर की ‘क्रांतिवीर’, गोविंदा, करिश्‍मा और शक्ति कपूर की डेविड धवन निर्देशित ‘राजा बाबू’ अक्षय और सैफ की ‘मै अनाड़ी तू खिलाड़ी’, अनिल- श्रीदेवी की ‘लाडला’ तथा विधु विनोद चौपड़ा की ‘1942 ए लव स्‍टोरी शामिल थीं. इस साल कॉमेडी के किंग कहे जाने वाले डेविड धवन की कुल तीन फिल्‍में आईं. जिसमें एक का तो टाइटल ही ‘अंदाज’ था.


संतोषी की पहली फिल्‍म घायल सफल हो चुकी थी. इस दौरान, उनसे प्रोड्यूसर विजय कुमार सिन्‍हा ने संपर्क किया. वे आमिर खान को लेकर एक सीरियस फिल्‍म बनाना चाहते थे. दूसरी ओर संतोषी सफल सीरियस मूवी बनाने के बावजूद कॉमेडी में हाथ आज़माना चाहते थे. उनके दिमाग़ में टॉम एण्‍ड जेरी का ह्यूमन वर्जन घूम रहा था, सदा एक दूसरे से लड़ने वाले दो झगड़ालू दोस्‍त. इस विषय पर उनका ड्राफ्ट रेडी था. बाद में संवाद में उनका साथ दिलीप शुक्‍ला ने दिया. कई संवाद तो संतोषी ने सेट पर ही लिखे. संतोषी ने ‘आर्ची कॉमिक्‍स’ के पात्रों की मॉडलिंग भी की.


बाद में विभिन्‍न भाषाओं में ‘अंदाज़ अपना अपना’ को केन्‍द्र में रखकर फिल्‍में बनीं. जिनमें तमिल फिल्‍म उल्‍लाथाई अल्लिथा (Ullathai Allitha 1996) Veedevadandi Babu1997) तेलगु मूवी वीदेवदन्‍दी बाबू (Vwwdwvadandi Babu 1997) और गेलेट अलियांडू ( Galate Aluyandru 2000)  शामिल हैं.


कॉमेडी में सबसे जरूरी चीज़ होती है टाइमिंग. इस मामले में सभी ने कमाल किया फिर चाहे वो स्‍क्रीनप्‍ले हो, निर्देशन या अभिनय. बाद में ही सही फिल्‍म को दर्शकों का भरपूर प्‍यार तो मिला ही समीक्षकों की सराहना भी मिली. किसी ने इसे ‘कलेक्‍शन ऑफ एक्‍सलेंट कॉमेडी’ कहा तो किसी ने ‘कार्नबाल क्‍लासिक’ की संज्ञा दी.


फिल्‍म के क्‍लाईमेक्‍स के सीन का डिज़ाइन विक्‍टोरिया नंबर 203 से बहुत कुछ मिलता है. उसमें भी हीरों की पोटली की छीना झपटी थी, गुंडों फौज थी और उसका अड्डा था. फर्क यह था कि वहां एक्‍शन सिक्‍वेंस और गंभीरता थी यहां एक्‍शन कॉमेडी थी. विक्‍टोरिया में अशोक कुमार और प्राण की जोड़ी थी, जिनके बीच आपस में तकरारनुमा प्‍यार था. पुराना विलेन अनवर, नवीन निश्‍चल और सायरा बानो ने उसमें अदाकारी की थी. वो एक तेजरफ्तार एक्‍शन फिल्‍म थी जिसकी स्‍टोरी और स्‍क्रीनप्‍ले  मशहूर राइटर के ए नारायण ने लिखी थी. निर्देशन ब्रज का था.


‘अंदाज़ अपना अपना’में  एक बेहद मधुर गीत था ‘ऐलो, एलो, एलो जी सनम हम आ गए आज फिर दिल लेके.’ इस गीत का फिल्‍मांकन घोड़े-तांगे पर किया गया था बैक ग्राउंड में दिलकश वादियां हैं. दिलचस्‍प संयोग यह था कि इसी से मिलती जुलती धुन पर एक गीत ‘होले होले साजना, धीरे धीरे बालमा,जरा होले होले चलो मेरे साजना हम भी पीछे हैं तुम्‍हारे.’ पहले भी सुना जा चुका है; यह गीत भी घोड़ा गाड़ी और खूबसूरत वादियों में शर्मीला टैगोर और मनोज कुमार पर फिल्‍माया गया था.


फिल्‍म थी शक्ति सावंत की 1966 की मूवी ‘सावन की घटा’. लो अब आप कहेंगे दोनों गानों के तो शुरूआती बोल भी मिलते-जुलते हैं. ‘ऐलो एलो’ और ‘होले होले’. सर अब मिलते हैं तो हम क्‍या कर सकते हैं. वैसे आप भी कुछ नहीं कर सकते. अरे अब इतना तो चलता है. फिल्‍म कमाल की है इंजॉय कीजिए.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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First published: November 5, 2021, 5:19 PM IST
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