Bhupinder Singh Death: ये 'चांद' अब बीते जमाने का आईना हो गया

खनकती और रूहानी आवाज़ के गायक भूपिंदर सिंह हमारे बीच नहीं रहे. याद तो भूपिंदर सिंह तुम हमेशा ही रहोगे, जब तक ये कायनात है तुम्‍हारे नग्‍में, तुम्‍हारी ये रूहानी आवाज कानों में यूं ही रस घोलती रहेगी. जब भी दिल को फुरसत के रात दिन ढूंढने की 'फुरसत' मिलेगी होठों पे तुम्‍हारा गाया गीत ही जगह बनाएगा.

Source: News18Hindi Last updated on: July 19, 2022, 11:47 am IST
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Bhupinder Singh Death: ये 'चांद' अब बीते जमाने का आईना हो गया
भूपिंदर सिंह का निधन

शुरुआत में संगीत से नफरत करने वाले और अंतत: उसी में डूबकर अपनी जिंदगी बिताने वाले, खनकती और रूहानी आवाज़ के गायक भूपिंदर सिंह हमारे बीच नहीं रहे. 18 जुलाई को 83 साल की उम्र में उन्‍होंने इस फानी दुनिया को मुंबई में अलविदा कह दिया. याद आती हैं ‘बाज़ार’ फिल्‍म के गीत की लाईनें ‘करोगे याद तो हर बात याद आएगी, गुजरते वक्‍़त की हर मौज ठहर जाएगी.. ये चांद बीते जमाने का आईना होगा…’


आज जब वो हमारे बीच नहीं रहे तो गुलज़ार की एक नज़्म का एक टुकड़ा भी जेहन में गूंजता है ‘कल सुना है जमीन से उठ गया है वो’ . इस नज्‍़म को ‘वो जो शायर था’ शीर्षक के तहत जारी एलबम में भूपिंदर ने अपनी आवाज दी है, थोड़े से फेरबदल के साथ. उनका लता मंगेशकर के साथ गाया फिल्‍म ‘किनारा’ का एक और गीत भूलने वाला नहीं है ‘नाम गुम जाएगा चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज ही पहचान है, गर याद रहे.’ याद तो भूपिंदर सिंह तुम हमेशा ही रहोगे, जब तक ये कायनात है तुम्‍हारे नग्‍मे, तुम्‍हारी ये रूहानी आवाज कानों में यूं ही रस घोलती रहेगी. जब भी दिल को फुरसत के रात दिन ढूंढने की ‘फुरसत’ मिलेगी होठों पे तुम्‍हारा गाया गीत ही जगह बनाएगा.


पंजाब की पटियाला रियासत में जन्‍म लेने वाले भूपिंदर को संगीत से प्‍यार था, ये तो ठीक है, लेकिन कभी बहुत नफरत भी हुआ करती थी, क्‍यूं ? तब जबकि उनके पंजाबी-सिख पिता प्रोफेसर नत्‍था सिंह खुद एक अच्‍छे संगीतकार थे, सख्‍त उस्‍ताद थे. दरअसल, पिता की इस सख्‍त उस्‍तादी ने ही भूपिंदर सिंह के मन में संगीत के प्रति नफरत भर दी थी. लेकिन उस दौर को गुजरना था, सो गुजर भी गया. और जब उनकी आवाज के जादू ने संगीत की दुनिया में दस्‍तक दी तो लम्‍हा ठहर गया और ‘आंखें कानों पे रखके…गूंगी खामोशियों की आवाजे’ सुनने लगा.


भूपिंदर को एक महफिल में जब संगीतकार मदन मोहन ने सुना तो उन्‍हें मुंबई आने को कह दिया और फिल्‍म ‘हकीकत’ (1964) के मशहूर गीत गाने का मौका हाथ के हाथ दे दिया – ‘होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा’. इस गीत में इंडस्‍ट्री के दिग्‍गज गायक मोहम्‍मद रफी, मन्‍ना डे, तलत मेहमूद की आवाजें भी थीं. सो ,भूपिंदर को इससे कोई खास पहचान नहीं मिली और वो अपने मूल की ओर लौट गए यानि गज़ल गायिकी की ओर रूख कर लिया. साथ में हाथों में गिटार थाम लिया, जो उन्‍होंने शुरुआती दौर में सीखा था. गिटारिस्‍ट की इस खूबी के बारे में संगीतकार नौशाद कहा करते थे, ‘जहां गिटार की बात आती है वहां भूपिंदर के आसपास कोई पहुंच ही नहीं सकता है.’ गिटारिस्‍ट के रूप में उनके गीतों की सूची में कई खूबसूरत नगमे हैं. ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ (यादों की बारात),  ‘चलते-चलते’ (चलते-चलते), ‘मेहबूबा.. मेहबूबा’ (शोले), ‘तुम जो मिल गए हो’ (हंसते जख्‍़म) और ‘दम मारो दम’ (हरे रामा हरे कृष्‍णा) आदि.


उनके कॅरियर की शुरुआत आकाशवाणी से हुई जहां उन्‍होंने गजलें गाना शुरू किया. बाद में दूरदर्शन का दिल्‍ली केन्‍द्र उनकी गायिकी का पसंदीदा ठीया बन गया. यही वो समय था जब उन्‍होंने वायलिन और गिटार सीखा. पार्श्‍व गायिकी की फील्‍ड में मनचाहा मुकाम नहीं बना पाने वाले इस गायक को ये पता था कि जिस दौर में उन्‍होंने बॉलीवुड में एंट्री ली,  वो दौर मोहम्‍मद रफी, किशोर कुमार, मुकेश, मन्‍ना डे और महेन्‍द्र कपूर जैसे महान गायकों का दौर था.


गजल की दुनिया में पत्‍नी के साथ जोडि़यां बहुत मशहूर रही हैं. भूपिंदर-मिताली की जोड़ी ने भी गजल की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई. इसके चलते उन्‍हें नाम भी मिला और दाम भी. बांग्‍लादेशी गायिका मिताली मुखर्जी जो स्‍वयं एक गायिका थीं,  उनके साथ 1980 के दशक के मध्‍य में भूपिंदर ने ब्‍याह रचाया. गजलों के अनेक कंसर्ट में दोनों ने साथ-साथ गाया भी. निहाल सिह नाम का उनका एक संगीतकार बेटा भी है. ‘एक आरजू’, ‘चांदनी रात’, ‘गुलमोहर’, ‘गजल के फूल’, मिताली के साथ के नंबर हैं. ‘याद ए मेहबूब’ में उन्‍होंने जगजीत सिंह और चित्रा के साथ भी गाया.


उनके गाए गीतों की फेहरिस्‍त बहुत ज्‍यादा लंबी तो नहीं है लेकिन जितनी है कमाल की है. मदन मोहन रचित ‘होके मजबूर मुझे’ के बाद रफी के ही साथ उन्‍हें दोबारा मौका मिला और फिल्‍म ‘जीने की राह’  में ‘आने से उसके आए बहार’ जैसा लोकप्रिय गीत उन्‍होंने गाया. आशा भोंसले के साथ उनकी गजल भी बहुत सुनी गई आज भी पॉपुलर है ‘किसी नज़र को तेरा इंतजार आज भी है’ आरडी बर्मन ने उन्‍हें ज्‍यादा मौके दिए. ‘नाम गुम जाएगा’ (किनारा), ‘हुज़ूर इस कदर भी न इतरा के चलिए’ (मासूम), महबूबा (शोले), बीती न बिताई रैना (परिचय), जैसे गीत उनके और आरडी के खाते में हैं. खय्याम के साथ बाजा़र का गीत ‘करोगे याद’, जयदेव के साथ ‘जिंदगी मेरे घर आना’ (दूरियां), भी उनके खूब सुने जाने वाले सांग्‍स हैं. एक अकेला इस शहर में रात में और दोपहर में आबोदाना ढूंढता है…. घरोंदा फिल्‍म का ये गीत और ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन’ भूपिंदर की पहचान हैं.


अपनी अलग आवाज के बावजूद भूपिंदर सिंह फिल्‍मी दुनिया में टॉप पर भले ही विराजमान न हुए हों, लेकिन उन्‍होंने अपना अलग मुकाम जरूर बनाया. फिल्‍म ‘आहिस्‍ता-आहिस्‍ता’ के गीत के सहारे वो खुद ही अपनी जिंदगी का फलसफा बयान करते हैं:


‘कभी किसी को मुकम्‍मल जहां नहीं मिलता, कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता.’

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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First published: July 19, 2022, 11:47 am IST
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