AMRISH PURI BIRTHDAY SPECIAL: ‘मोगेंबो’ आज ही के दिन ‘खुश’ हुआ था!

जुरासिक पार्क वाले स्टीवन स्‍पिलबर्ग 1984 में जब ‘इंडियाना जोन्‍स एण्‍ड टेंपल ऑफ डूम’ बना रहे थे, तब उन्‍होंने अमरीश पुरी को लेना चाहा और उन्‍हें संदेश भिजवाया कि वे स्‍क्रीन टेस्‍ट देने अमेरिका आ जाएं. जवाब में अमरीश पुरी ने कहा ‘आपको टेस्‍ट लेना है तो आप यहां आ जाईए.’

Source: News18Hindi Last updated on: June 22, 2021, 10:58 AM IST
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AMRISH PURI BIRTHDAY SPECIAL: ‘मोगेंबो’ आज ही के दिन ‘खुश’ हुआ था!
अमरीश पुरी का जन्‍म पंजाब के नवांशहर में 22 जून 1932 में हुआ था.
हिंदी फिल्‍म और बॉलीवुड की दुनिया एक अलग ही तरह की दुनिया है, टिपिकल और नाटकीयता से सराबोर. इसकी खास विशेषताओं में से एक है – फिल्‍मों के डॉयलाग्‍स. यहां कलाकारों के नाम के मुकाबले उनके केरेक्‍टर ज्‍यादा पापुलर हैं, उससे भी ज्‍यादा पापुलर हैं उनके संवाद. मसलन ‘तेरा क्‍या होगा रे कालिया’ जैसे ही हमें सुनाई देता है, तो हमारे दिमाग में खुद-ब-खुद गब्‍बर सिंह (अमज़द खान) का अक्स उभर आता है. इसी तरह, ‘रिश्‍ते में हम तुम्‍हारे बाप लगते हैं’ सुनते ही हम ‘शहंशाह’ के अमिताभ से कनेक्‍ट हो जाते हैं.

‘क...क....किरण’ सुनते ही तत्‍काल ‘डर’ के हकलाते शाहरूख की तस्‍वीर दिमाग़ में कौंध जाती है. ऐसे ही जब कोई कहे कि ‘मोगेंबो’ खुश हुआ तो हम सीधे ‘मि. इंडिया’ के अमरीश पुरी तक पहुंच जाते हैं. सो 22 जून 1932 को जन्‍मे अमरीश पुरी के बारे में हम ये तो कह ही सकते हैं कि ‘मोगेंबो’ आज ही के दिन खुश हुआ था. ‘जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी’ सुनते ही ‘दिलवाले दु‍लहनिया ले जाएंगे’ के चौधरी बलदेव सिंह का चेहरा हमारे सामने घूम जाता है. अधिकांश हिंदी कलाकारों के नाम के साथ एक संवाद चस्‍पा है.

ऐसे कलाकार कम हैं जिनकी पहचान एक से ज्‍यादा संवादों से सहज हो जाती है. अमरीश इनमें अव्‍वल नंबर पर हैं. ‘मोगेंबो’ एक कू्र और देश विरोधी खलनायक है, तो दूसरी ओर चौधरी बलदेव सिंह एक भावुक पिता है. ये एक उदाहरण भर काफी है ये बताने के लिए कि अमरीश पुरी कितने वर्सटाईल अभिनेता हैं. लगभग यही कहानी अमरीश की दूसरी फिल्‍मों की भी है, एकाधिक फिल्‍मों की है.


उनकी पहली फिल्‍म ‘हम पांच’ में उनका किरदार एक लंपट, परस्‍त्रीगामी पुरूष का है, जिसे देखकर दर्शक घृणा से मुंह मोड़ लेता है, तो दूसरी तरफ ‘घातक’ का केंसर पीडि़त पिता है जो किसी के भी मन में अपने लिए सुहानूभूति भरी चिंता पैदा कर देता है. इन विपरीत चरित्रों के बीच चाची 420 के अमरीश को याद कीजिए और कामेडी पर दिल खोल कर ताली बजाईए.
काल्‍पनिक दुनिया के कलाकारों के लिए प्रेरक हैं अमरीश पुरी
अमरीश पुरी का जीवन ना सिर्फ फिल्‍म की का‍ल्‍पनिक दुनिया के कलाकारों के लिए प्रेरक हैं बल्कि निज़ी जिंदगी में भी उनका जीवन आम लोगों के लिए भी प्रेरणा का स्‍त्रोत है. जो लोग उम्र का रोना रोते हैं उनके लिए ये जानना जरूरी है कि चालीस साल की उम्र हो जाने के बाद अमरीश पुरी को पहली फिल्‍म मिली थी. इस उम्र के बाद कलाकार रिटायरमेंट की ओर कदम बढ़ाने लगते हैं. स्‍ट्रगलर ये जानकर तसल्‍ली कर सकते हैं कि अमरीश पुरी अपने पहले स्‍क्रीन टेस्‍ट के बाद रिजेक्‍ट कर दिए गए थे.

शौकिया थिएटर करने वाले एक नाटक के बाद, निर्देशक बन जाते हैं और निर्देशक बनने के तुरंत बाद बालीवुड का रूख कर लेते हैं. ऐसे उतावले रंगकर्मियों को अमरीश पुरी से पेशेंस रखने का सबक सीखना चाहिए जिन्‍होंने रंगकर्म को पूरे दस साल दिए. तब जाकर उन्‍हें फिल्‍मों में काम मिला और वे अपने आपको साबित कर पाए. जुरासिक पार्क वाले Steven Spielberg कहते हैं ‘ Amrish is my favorite villain. The best the world has ever produced and ever will. (अमरीश मेरे पसंदीदा खलनायक थे. वे दुनिया में सबसे बेहतरीन थे और हमेशा रहेंगे.)
अमरीश पुरी की फिल्‍मों में एंट्री की कहानी किसी दिलचस्‍प फिल्‍म से कम रोचक नहीं है. इसमें तमाम तरह के उतार-चढ़ाव और फिल्‍मी लटके-झटके मौजूद हैं. अमरीश पंजाब के नवांशहर में पैदा हुए थे. उनके पिता का नाम लाला निहालचंद और माता का नाम वेद कौर था. के.एल. सहगल उनके कजि़न थे. सहगल की शराब पीने की आदत के कारण अमरीश पुरी के पिता को फिल्‍मी दुनिया नापसंद थी. वे कतई नहीं चाहते थे कि उनके बेटे फिल्‍मों में काम करें.


लेकिन कमाल देखिए उनके तीनों बेटों चमन पुरी, मदन पुरी और बाद में अमरीश पुरी ने फिल्‍मी दुनिया में ही अपना केरियर बनाया. दो बड़े भाई फिल्‍मों में पहले से थे. मदन पुरी तो स्‍थापित खलनायक थे. सो माना जा सकता है कि अमरीश पुरी को फिल्‍मों में आसानी से एंट्री मिल जाएगी. पर हुआ इसके ठीक उलट. लंबी जद्दोज़हद के बाद अमरीश पुरी मुंबई पहुंचे और भाई मदनपुरी के यहां डेरा जमा लिया. मदनपुरी ने घर में जगह तो दी लेकिन साफ कह दिया ‘अपना केरियर खुद बनाओ.’ यहां लोगों की एक गलतफहमी भी दूर करते चलें, ओम पुरी का अमरीश पुरी से या उनके खानदान से कोई नाता नहीं है.

स्‍क्रीन टेस्‍ट में रिजेक्‍ट कर दिए गए थे अमरीश पुरी
बहरहाल जैसा ऊपर बताया, अमरीश को पहले स्‍क्रीन टेस्‍ट में रिजेक्‍ट कर दिया गया था. रिजेक्‍ट तक तो ठीक, टेस्‍ट लेने वाले ने साफ-साफ कह दिया था कि अमरीश हीरो बन ही नहीं सकते. विलेन के लिए ट्राई करें. उन दिनों खलनायक की बहुत हैसियत नहीं हुआ करती थी. सो अमरीश निराश हो गए. लगातार कोशिशों के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ तो उन्‍होंने इस लाइन को ही अलविदा कह दिया और विपरीत लाइन पकड़कर एक सरकारी नौकरी ज्‍वाइन कर ली.

अब वे श्रम ओर रोजगार मंत्रालय के अधीन कर्मचारी राज्‍य बीमा निगम के एक मुलाजि़म थे. बीवी बच्‍चे वाले गृहस्‍थ भी बन गए. कहानी में फिर ट्विस्‍ट आया. वे एक दिन शीर्षस्‍थ नाटककार और नेशनल स्‍कूल ऑफ ड्रामा के निदेशक इब्राहीम अल्‍काजी से टकरा गए. उन्‍होंने सलाह दी ‘थिएटर करो. अभिनय का कीड़ा तो था ही, सो थिएटर की एक और बड़ी हस्‍ती विलक्षण रंगकर्मी सत्‍यदेव दुबे के पास पहुंच गए और रंगकर्म शुरू कर दिया. अब मुंबई का पृथ्‍वी थिएटर उनका नया अड्डा था.

अमरीश पुरी के बडे़ भाई चमन पुरी, मदन पुरी का नाम बॉलीवुड के स्‍थापित कलाकारों में लिया जाता है.
अमरीश पुरी के बडे़ भाई चमन पुरी और मदन पुरी का नाम बॉलीवुड के स्‍थापित कलाकारों में लिया जाता है.


अभिनय प्रतिभा तो उनमें थी ही, लगाव भी खूब था. उस पर सत्‍यदेव दुबे जैसी तराशने वाली हस्‍ती का साथ, सोने में सुहागा होना ही था. अपने रंगमंचीय कौशल का उन्‍होंने ऐसा सिक्‍का जमाया कि वे रंगकर्म की दुनिया के स्‍टार बन गए. इसी के चलते, उन्‍हें 1979 में संगीत नाटक अकादमी अवार्ड जैसे प्रतिष्ठित पुरस्‍कार से नवाज़ा गया. अब तक, उनकी उम्र चालीस साल बरस पार कर चुकी थी. फिल्‍मी दुनिया की उम्‍मीद खत्‍म हो चुकी थी. लेकिन किस्‍मत ने फिर पलटा खाया और वे वहां पहुंच गए, जहां के लिए वे मुंबई आए थे.


1980 में उन्‍हें बोनी कपूर की पहली फिल्‍म ‘हम पांच’ में मुख्‍य खलनायक का रोल मिल गया. इसके पहले वे छिटपुट काम कर चुके थे. परदे पर एक बार फुल फ्लेश रोल में आने के बाद किसकी हिम्‍मत थी कि उन्‍हें इग्‍नोर करता. 1982 में उन्‍हें शो मेन सुभाष घई की सुपरहिट फिल्‍म ‘विधाता’ में खलनायक की भूमिका मिली. इस फिल्‍म में दिलीप कुमार, शम्‍मी कपूर, संजीव कुमार, संजय दत्‍त आदि थे. बाद में दिलीप और अमिताभ बच्‍चन की बहुचर्चित फिल्‍म ‘शक्ति’ में भी वे मुख्‍य खलनायक बने.

‘आवाज़ के जादूगर’ के नाम से जाने जाते रहे अमरीश पुरी
आवाज़ के जादूगर के रूप में जाने जाने वाले अमरीश पुरी अपने अनूठे गेट अप, दिलचस्‍प हाव-भाव के सहारे दर्शकों के मन में पैठ बनाते चले गए. बोलती बड़ी-बड़ी आंखें, दमदार जोशीली और कर्कश आवाज के साथ बेहतरीन संवाद अदायगी ने अमरीश पुरी को दर्शकों का चहेता विलेन बना दिया था. शुद्ध फार्मूला फिल्‍में करने के साथ-साथ उन्‍होंने निशांत, मंथन, भूमिका, आक्रोश और सूरज का सातवां घोड़ा जैसी लीक से हटकर चलने वाला समानंतर सिनेमा भी भरपूर किया.

वे ऐसे विलक्षण अभिनेता थे, जो फार्मूला फिल्‍में बनाने वाले शोमेन सुभाष घई के चहेते तो थे ही. धीर गंभीर और ऑफ बीट सिनेमा के लिए काम करने वाले निर्देशक श्‍याम बेनेगल के भी पसंदीदा एक्‍टर थे. कमर्शियल टच के साथ क्‍लासिक फिल्‍मों के लिए मशहूर शेखर कपूर ने जब ‘मिस्‍टर इंडिया’ के ‘मोगेंबो’ के लिए अभिनेता की तलाश शुरू की, तो यह तलाश अमरीश पुरी पर जाकर खत्‍म हुई. शेखर कपूर की इस कमर्शियल फिल्‍म के दूसरे कलाकार आप भले ही भूल जाएं लेकिन ‘मोगेंबो’ को भूलना आपके वश में नहीं है.

1967 से 2005 के बीच के लंबे अरसे में उन्‍होंने साढ़े तीन सौ से ज्‍यादा फिल्‍में की. एक दौर तो ऐसा भी आया जब अमरीश पुरी फिल्‍म हिट होने की गारंटी वाले अभिनेता बन गए थे. उन्‍होंने हिंदी के अलावा तेलगु, कन्‍नड़, तमिल, मलयालम और मराठी भाषी फिल्‍में भी कीं.


हॉलीवुड में उनकी उपस्थिति दर्शाने वाली महत्‍वपूर्ण फिल्‍म रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ थी. जुरासिक पार्क वाले स्टीवन स्‍पिलबर्ग 1984 में जब ‘इंडियाना जोन्‍स एण्‍ड टेंपल ऑफ डूम’ बना रहे थे, तब उन्‍होंने अमरीश पुरी को लेना चाहा और उन्‍हें संदेश भिजवाया कि वे स्‍क्रीन टेस्‍ट देने अमेरिका आ जाएं. जवाब में अमरीश पुरी ने कहा ‘आपको टेस्‍ट लेना है तो आप यहां आ जाईए.’ स्‍पिलबर्ग टेस्‍ट लेने भारत आए और इस तरह अमरीश उनकी फिल्‍म का हिस्‍सा बने.

गूगल ने कुछ इस तरह किया अमरीश पुरी को सम्‍मानित
अपने फिल्‍मी केरियर के दौरान उन्‍हें अपने दर्शकों का प्‍यार तो‍ मिला ही उन्‍हें फिल्‍म फेयर सहित ढेर सारे राष्‍ट्रीय ओर अंतर्राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार भी मिले. फिल्‍मों की और पुरस्‍कारों की भी लंबी लिस्‍ट है. 12 जनवरी 2005 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया. उन्‍हें एक दुर्लभ प्रकार ब्‍लड केंसर डायग्‍नोस हुआ था. दो बरस पहले (22 जून 2019 को) उनके जन्‍म दिवस के मोके पर गूगल ने अमरीश पुरी को गूगल-डूडल से सम्‍मानित किया था. साथ में लिखे पाठ का भावार्थ यूं है-

‘अगर आप पहली बार में सफल नहीं होते हैं, तो ट्राई करें, फिर ट्राई करें. और आप भारतीय फिल्‍म अभिनेता अमरीश पुरी की तरह हो सकते हैं, जिन्‍होंने बड़े परदे के अपने सपनों को पूरा करने के लिए शुरूआती झटकों को पार कर लिया. अपनी आवाज़ पर वे लगातार काम करते थे और नियमित रियाज़ करते थे. इंडियाना जोन्‍स के लिए उन्‍होंने अपना सिर मुंडाया था. बाद में उन्‍होंने इस स्‍टाईल को ही अपना लिया और जरूरत पड़ने पर विग से काम चलाया. उनकी फिल्‍मों के संवाद भारतीय दर्शकों को बहुत लुभाते रहे हैं. फिल्‍म ‘तहलका’ में ‘डांग’ (अमरीश पुरी) कहता है ‘डांग, कभी रांग नहीं होता’. आप क्‍या कहते हैं ?
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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First published: June 22, 2021, 10:58 AM IST
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