मास्‍क और फिल्‍में

पहले चेहरा छिपाना कानून तोड़ने का सूचक था. अब उल्‍टा है. अगर मास्‍क नहीं पहना (यानि चेहरा नहीं छिपाया) तो आप कानून तोड़ने के दोषी माने जा सकते हैं; जीने की स्‍टाइल में 360 डिग्री के इस बदलाव की इबारत करोना ने लिखी है, मास्‍क ने लिखी है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 17, 2021, 2:21 PM IST
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मास्‍क और फिल्‍में


पिछले दो साल से जबसे कोरोना वायरस हमारी जिंदगी में दाखिल हुआ है, जिंदगी जीने का हमारा अंदाज़ ही बदल गया है. याद करें कोरोना पूर्व के वो दिन जब मास्‍क पहनने पर पुलिस धर-पकड़ किया करती थी, चेहरा छिपाने वाले को सस्पीसियस माना जाता था. पहले बैकों के एटीएम सेंटर पर जाओ तो आपको अपने चेहरे पर नकाब या मास्‍क से ढंकने की परमीशन नहीं रहती थी. अब आप बेधड़क मास्‍क के पीछे अपना चेहरा छिपाकर एटीएम में दाखिल हो सकते हैं, पैसे निकाल सकते हैं.


यानि पहले चेहरा छिपाना कानून तोड़ने का सूचक था अब उल्‍टा है. अगर मास्‍क नहीं पहना (यानि चेहरा नहीं छिपाया) तो आप कानून तोड़ने के दोषी माने जा सकते हैं;  जीने की स्‍टाइल में 360 डिग्री के इस बदलाव की इबारत करोना ने लिखी है, मास्‍क ने लिखी है. अब अगर मास्‍क और फिल्‍मों की बात करें तो सबसे पहले हॉलीवुड की फिल्‍मों की याद आती है. हॉलीवुड में स्‍पाईडरमैन और अन्‍य  सुपरनेचुरल फिल्‍में बनाने का चलन ज्‍यादा है. बॉलीवुड में भी कुछ सुपरनेचुरल फिल्‍मों का निर्माण हुआ है. इसमें रितिक रोशन की कृष सीरीज़ का नाम सबसे ऊपर आता है.


सुपरनेचुरल फिल्‍मों में हॉरर और नॉन हॉरर दोनों ही ज़ोनर की फिल्‍में बनाई जाती रही हैं. संदर्भ निकला है तो याद करते चलें कि बॉलीवुड में हॉरर फिल्‍मों के ज़ोनर में बेहतर काम नहीं हुआ है. रामसे बंधुओं ने कुछ अधकचरी हॉरर फिल्‍में बनाई हैं. रामगोपाल वर्मा ने कौन, जरूर डरना मना है और डरना जरूरी है जैसी कुछ हॉरर फिल्‍में बनाई हैं जो अपेक्षाकृत बेहतर हैं. बात मास्‍क पर केंद्रित फिल्‍मों की करें तो हॉलीवुड की फिल्‍में ही ज्‍यादा याद आती हैं. इसमें भी दो केटेगरी हैं, हॉरर और नॅान हॉरर.


मास्‍क मूवीज़ की बात हो तो सबसे पहले ‘द मास्‍क’ की याद आती है. यह 1994 की सुपर हीरो कॉमेडी फिल्‍म है. चक रसेल द्वारा निर्देशित यह फिल्‍म एक कामिक्‍स कंपनी द्वारा प्रकाशित मास्‍क कामिक्‍स पर आधारित है. मास्‍क फ्रेंचाईजी की इस फिल्‍म में जिम कैरी, कैमेरॉन डिएज़, एमी यास्‍बेक और पीटर रीगर्ट ने निभाई है. यह एक सामान्‍य से नज़र आने वाले एक बैंक क्‍लर्क की कहानी है, उसके साथी उसका उपहास उड़ाया करते हैं. उसे नाटकीय तरीके से एक नदी में एक मास्‍क मिलता है.

चूंकि मास्‍क मिलने के बाद जिम यानि स्‍टेनली इपकिस लोगों को, पुलिस और प्रशासन को परेशान करता है, इसलिए निर्देशक चक रसेल बड़ी ही खूबसूरती से उसे पहले ही संवेदनशील और शरीफ इंसान के रूप में पेश कर देते हैं इसके लिए मास्‍क मिलने की घटना भी उसके साथ तब घटित होती है, जब वो ये सोचकर नदी की तरफ जाता है कि कोई मुसीबत में है और उसे मदद की जरूरत है. बाद में भी वह अपराध से लड़ने के लिए मास्‍क से मिली आलौकिक शक्तियों का इस्‍तेमाल करता है.


फिल्‍म ने बॉक्‍स ऑफिस पर बढ़िया पैसे कूटे और एक कमाउ फिल्‍म की केटेगरी में जगह बनाई. फिल्‍म ने कैरी की प्रतिष्‍ठा को मजूबूत किया और डियाज़ को एक फीमेल आर्टिस्‍ट के रूप में स्‍थापित किया. हॉलीवुड की प्रमुख नॉन हॉरर मास्‍क फिल्‍मों की बात करें तो कुछ फिल्‍मों के नाम लिए जा सकते हैं. बेन – द डार्क नाईट राइज़ेस (2012), द मास्‍क ऑफ ज़ोरो (1920), ऑयरन मास्‍क – द मेन इन ऑयरन मास्‍क (1998), रोरसेच वाचमेन ( 2009), मेक्सिमस – मेनमेट ग्‍लेडिएटर (2000), वी – वी फॅार वेनडेटा (2006, बेटमेन – बेटमेन फ्रेंचाईज़ी (1989), स्‍टॉर वार फ्रेंचाईज़ी (1977), द फेंटम (2004) आदि.


वैसे तो कोरोना काल का दौर खत्‍म होता दिख रहा है, तीसरी लहर का जो अल्‍टीमेटम मिला था, वह भी बीत गया है, उम्‍मीद करें कि तीसरी लहर नहीं आएगी. लेकिन चिकित्‍सीय विशेषज्ञ कह रहे हैं अब हमें कोरोना के साथ ही जीना है, अगर ऐसा है तो मास्‍क जरूरी है. मास्‍क मरीज के द्वारा फैलने वाले रोग पैदा करने वाले जीवाणुओं और विषाणुओं को हवा के माध्‍यम से फैलने से रोकता है. एक व्‍यक्ति को से दूसरे व्‍यक्ति तक जाने और उससे आने में भी रोकता है. इसलिए मास्‍क जरूरी है. इससे अभी मुंह मोड़ने का समय नहीं आया है.


मेडीसन कब बनेगी यह तो नहीं पता लेकिन मास्‍क आसानी से उपलब्‍ध और उतनी ही आसानी यूज़ की जाने वाली प्रभावी मेडीसन की तरह है. बहरहाल. फिल्‍मों के साथ-साथ थिएटर और रंगमंच की दुनिया में भी मास्‍क या मुखौटा एक महत्‍वपूर्ण प्राप की तरह यूज़ होता है. मूर्तिकला में भी मुखौटा खास महत्‍व रखता है. आदिवासी समाज में मुखौटा बनाना एक कला के रूप में सामने आता है.


सामने वाला अजनबी है, तो आपको कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्‍योंकि हम सीमित संख्‍या में ही लोगों को पहचानते हैं. लेकिन जब हमारे सामने कोई मुखौटा पहने आता है, तो उस शख्‍स विशेष को जानने की उत्‍कंठा हमारे दिल में पैदा हो जाती है. कौन है ये अजनबी या जानकार ? इसीलिए मास्‍क , मुखौटा या नकाब हमारे लिए हमेशा रहस्‍य से भरे आवरण और आकर्षण के रूप में सामने आता है. मास्‍क सुरक्षा के लिए, भेस बदलने, प्रदर्शन करने या मनोरंजन करने के लिए सामान्‍यत: उपयोग किया जाता है.


मास्‍क पर आधारित कुछ हॉरर फिल्‍मों पर भी बात कर लेते हैं. हॉलीवुड की इन फिल्‍मों में जैसन वूरहेस, माईकल मायर्स, लेदर फेस, घोस्‍ट फेस, हेनीबल लेक्‍टर, बेबी फेस किलर, द हेग, मिसेस ट्रेडोनी मास्‍क, पिग मास्‍क, बटन मास्‍क, यू ऑलरेडी हेव, व्‍हेयर इज़ माई माइंड, ग्रीन मास्‍क, एनीमल मास्‍क, वेक्‍स मास्‍क, द सर्जिकल मास्‍क, द ओल मास्‍क, फ्रेंकस्‍टीन आदि. हॉलीवुड निर्माता-निर्देशकों में मास्‍क लवर्स की अच्‍छी खासी संख्‍या है. लेखक भी इसमें शरीक किए जाने चाहिए क्‍योंकि मूल क्रिएशन तो वही करते हैं.


हाल ही में जेम्‍स बॉण्‍ड सीरीज़ की फिल्‍म रिलीज़ हुई है. भारत में यह बीते 30 सितंबर को थिएटर में रिलीज़ हुई है. इस फिल्‍म की शुरूआत बहुत रोचक और प्रभावी है. इसे इंटरेस्टिंग बनाने में बेहद दिलचस्‍प और आकर्षक डिज़ाइन वाले मास्‍क का उपयोग किया गया है. ‘नो टाईम टू डाई’ दूसरी फिल्‍मों की तरह बॉण्‍ड को पेश नहीं करती, लेकिन उसका दिलकश कैमरावर्क और फिल्‍मांकन इसके प्रशंसकों को बांधे रखता है. फिर चाहे वो कार चेसिंग हो या मोटरसाईकिल स्‍टंट सभी रोमांचक हैं.

इनमें मास्‍क की एंट्री फिल्‍म की शुरूआत को रहस्‍य की चाशनी में डूबो देती है, जो आगे भी कायम रहती है. हॉलीवुड हो या बालीवुड दौनां हर घटना पर फिल्‍म बनाने में माहिर है. उम्‍मीद की जाना चाहिए कि कोरोना पर भी वहां फिल्‍म बनेगी. ऐसे में जब भी कोरोना पर फिल्‍म आएगी तो मास्‍क भी उसमें जरूर शामिल होगा. फिल्‍मों में कलाकारों का खासा महत्‍व होता है, परदे वही दिखते और बिकते हैं. इसलिए देखना दिलचस्‍प होगा कि मास्‍क क्‍या और कैसा उपयोग फिल्‍मों में होता है, होता भी या नहीं. देखते हैं.



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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First published: October 17, 2021, 2:21 PM IST
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