फिल्‍मी गीतों की रिकार्डिंग तब और अब

गीत लिखना सिखाया जा सकता है, सिंगिंग की ट्रेनिंग दी जा सकती है, इसके लिए तो भारत में बरसों से गुरू-शिष्‍य परंपरा का रिवाज़ चल ही रहा है. साज़ बजाना भी सिखाया जा सकता है. लेकिन कम्‍पोज़र के लिए कोई स्‍कूल हो जहां कम्‍पोजी़शन की शिक्षा दी जाती हो ऐसा सुनने में नहीं आता.

Source: News18Hindi Last updated on: June 18, 2021, 1:02 PM IST
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फिल्‍मी गीतों की रिकार्डिंग तब और अब
म सभी ने शहरों में होने वाले आर्केस्‍ट्रा प्रोग्राम जरूर देखे होंगे. इन कार्यक्रमों में खासतौर पर फिल्‍मी गाने सुनाए जाते थे. फिल्‍मी गाने अगर गाना हो तो संगीत का पूरा तामझाम जरूरी है. एक बड़े से स्‍टेज पर संगीत की पूरी मंडली जमाई जाती थी. बहुत सारे साज या इंस्‍ट्रूमेंट्स होते थे इन्‍हें प्‍ले करने वाले सिद्धहस्‍त कलाकार यानि साजिंदे होते थे. बढि़या साउंड सिस्‍टम होता था. तब जाकर गायक अपनी आवाज का जादू श्रोताओं तक पहुंचा पाता था. अगर गायक या गायिका अच्‍छी आवाज का मालिक है तो भी वह अपने हुनर से श्रोताओं और दर्शकों को तभी लुभाने में सफल हो पाता था जब आर्केस्‍ट्रा यानि वादकों का समूह उच्‍चकोटि का हो.

आर्केस्‍ट्रा तो बड़ी बात हो गई अगर गायक को मित्र मंडली के साथ मिलकर कोई छोटा मोटा लेकिन ढंग का प्रोग्राम भी करना हो, तब भी आपको वाद्य और वादकों की जरूरत पड़ती थी. जो आसान नहीं होता था. समय बीता, वक्‍त बदला साइंस ने तरक्‍की की. विकास की इस दस्‍तक ने मनोरंजन की दुनिया को भी थपथपाया और कहा उठो, जागो नया दौर आ गया है. संगीत की दुनिया में  क्रांतिकारी बदलाव आ गया है.

आपके हाथ में एक स्‍मार्ट फोन है. आप इसे लेकर माइक थामे स्‍टेज पर खड़े हैं. स्‍टेज पर ना तो कोई साजिंदा है ना कोई इंस्‍ट्रुमेंट. आप दर्शकों से इज़ाज़त लेकर कोई फिल्‍मी गाना शुरू करते हैं. गीत के संगीत की हूबहू स्‍वरलहरियां वातावरण में तैरती हैं गायक गाना शुरू करता है. उसकी  आवाज़ में दम है तो महफिल पर छा भी जाता है. यह गायन की नई तकनीक कराओके का कमाल है. यही हाल आर्केस्‍ट्रा प्रोग्राम्‍स का भी हो गया है. तकनीक ने अधिकांश साज़ और साजिंदों को संगीत की म‍हफिलों से रूख्सत कर दिया है. अपवादस्‍वरूप कहीं कहीं ये दिख जाते हैं.

मोबाइल ने कुछ यूं बदली संगीत की दुनिया
ऊपर वर्णित दौनों कंट्रास दृश्‍यों को अपने दिमाग़ में चस्‍पा कीजिए और फिल्‍मी गीतों की संगीत रचना की कल्‍पना कीजिए. यहां भी ऐसा ही नज़ारा है पहले बड़ा तामझाम होता था, अब छोटे से कमरे में बिना भीड़ इकट्ठा किए रिकार्डिंग हो जाती है. और तो और अब तो अनेक मोबाईल एप आ गए हैं जिनकी मदद से कोई भी संगीतप्रेमी घर बैठे संगीत रच सकता है, रचे जा रहे हैं.

पहले एक गीत की रिकार्डिंग के लिए ढेर सारे वादक लगते थे, नाना प्रकार के संगीत वाद्यों की ज़रूरत पड़ती थी. संगीतकार मौजूद रहता था, अरेंजर की मौजूदगी जरूरी होती थी. आवश्‍यकता के अनुरूप कोरस भी उपस्थित रहते थे. तब जाकर एक साउंडप्रूफ कांच के केबिन में बैठकर गायक गीत गा पाता था. सोलो सांग में एक और ड्वेट सांग में दो गायक मौजूद रहते थे. इतना सारा तामझाम होता था पुराने दौर में एक गीत की रिकार्डिंग के लिए. उस दौर में रिटेक की गुंजाइश नहीं होती थी. ढेर सारे छोटे बड़े साजिंदों में से एक ने भी जरा सी गलती कर दी तो पूरी रिकार्डिंग फिर से करना पड़ती थी. नई तकनीक ने अब, टुकड़ों में रिकार्डिंग संभव बना दी है.

पहले गीत लिखा जाता था फिर उसे संगीतबद्ध किया जाता था. फिल्‍म के सीन की सिचुएशन के हिसाब से गीत लिखे जाते थे. रोमांटिक और सेड सांग ज्‍यादा डिमांड में रहते थे, अभी भी हैं. गीतों का रोमांटिक और सेड मूड सदाबहार मूड है. कुछ गीत कामेडी से भरपूर होते थे, तो कुछ फलसफा बयान करते थे. सूफी सांग और भक्ति गीत भी फिल्‍मों की परंपरा का अंग रहे हैं.
राष्‍ट्रभक्ति से ओतप्रोत गाने भी खूब चलते थे. शुरूआती दौर में गीत पहले लिखे जाते थे और संगीतबद्ध बाद में किए जाते थे. बाद में धुनें पहले बनाई जाने लगीं और बाद में उस पर शब्‍द चस्‍पा किए जाने लगे. गाने में शब्‍दों ओर धुन के अलावा रिदम या बीट भी महत्‍वपूर्ण होती है. लोगों को आमतौर पर ऐसा लगता है कि पहले धुन और बाद में बोल लिखने से गीत कमजोर हो जाता है लेकिन ऐसा है नहीं. अगर शायर या गीतकार अच्‍छा और स्‍तरीय है तो वो बेहतर ही रचेगा.

संगीत की रचना और संगीतकार की धुन
संगीत की रचना प्रक्रिया में पहले कम्‍पोजर या संगीतकार धुन की रचना करता था. फिर उसे अरेंजर को बताता था. प्री प्रोडक्‍शन का लंबा दौर चलता था. गायकों के साथ बैठकें होती थीं, रिहर्सल होती थीं. बड़े से बड़े गायकों के लिए रिहर्सल जरूरी होती थी, अपवादों को छोड़कर. तब कहीं जाकर गीत को रिकार्ड किया जाता था. उस दौर में अरेंजर की भूमिका बहुत महत्‍वपूर्ण होती है. पुराने दौर का अरेंजर इन दिनों प्रोग्रामर या प्रोड्यूसर कहा जाता है.

पहले कंपोज़र सांग की थीम या मूड के हिसाब से उसकी धुन रचता है. धुन बनाने के बाद वह उसे प्रोग्रामर या प्रोड्यूसर को दे देता है. प्रोग्रामर या प्रोड्यूसर का काम होता है उस धुन के आसपास संगीत की रचना करना. लेकिन ए आर रहमान जैसे कुछ कंपोज़र प्रोग्रामिंग भी खुद करते हैं. और भी हैं. यहां तक तो सब लगभग एक जैसा ही है. रिहर्सल को छोड़कर, अब रिहर्सल उस तरह नहीं होती. लेकिन जैसे ही रिकार्डिंग की बारी आती है नए दौर में सब कुछ बदल जाता है. गीत की रिकार्डिंग हो या बेकग्राउंड म्‍युजिक तकनीक की दृष्टि से चीजें बहुत आसान हो गई हैं.

अब स्‍टुडियो में न तो साजिंदों की भीड़ रहती है ना ही बहुत सारे वाद्ययंत्रों की मौजूदगी. टाइपराइटर के की बोर्ड की तरह एक बहुत बड़े आकार का बोर्ड होता है, ‘की बोर्ड’. इस ‘की बोर्ड’ में हर इंस्‍ट्रूमेंट मिल जाता है. जिस साज की चाहें,  धुन इससे निकाल लें. संगीत के हर वाद्य को इस कीबोर्ड के सहारे बजाया जा सकता है. इस गागर में संगीत का पूरा सागर समाया हुआ है. संगीत रचने के लिए वर्तमान दौर में साफ्टवेयर का इस्‍तेमाल भी होता है.


गीत के ट्रेक की रिकार्डिग एक बेहद तकनीकी और काम्‍पलीकेटेड प्रक्रिया है जो इस फील्‍ड के लोगों के ही पल्‍ले पड़ती है. फिर भी हम सरल भाषा में समझने की कोशिश करेंगे कि इन दिनों गीत की  रिकार्डिंग कैसे की जाती है. रिकार्डिग स्‍टूडियो में रिकार्डिंग के लिए मुख्‍य रूप से दो रूम होते हैं. पहले कमरे में सिस्‍टम, मानीटर, स्‍पीकर्स, मिक्‍सर आदि रखे जाते हैं. पास में सिंगर के गाने के लिए एक साउंड प्रूफ छोटा सा रूम होता है, जिसमें बैठकर वो गाना गाता है. इस रूम में एक एक मिरर लगा रहता है. इस कमरे की साउंडप्रूफ क्‍वालिटी उच्‍चकोटि की होती है और इससे न तो अंदर की आवाज बाहर नहीं जा सकती है और ना ही बाहर की आवाज़ अंदर नहीं आ सकती है. परिणामस्‍वरूप जो म्‍युजि़क ट्रेक या प्रोडक्‍ट तैयार होकर निकलता है वो साउंड के नज़रिए से पूरी तरह क्रिस्‍टल क्लियर होता है.

पहले रूम में जहां सिस्‍टम वगैरा रखा रहता है वहां म्‍युजिक डायरेक्‍र, गीतकार आदि बैठते हैं. प्रोग्रामर और साउंड इं‍जीनियर आदि भी यहीं बैठते हैं. सिंगरर रूम का जो कांच होता है उसके माध्‍यम से  सिंगर को इंस्‍ट्रक्‍शन दी जाती है और इसी के अनुरूप सिंगर गाना गाता है. पहले सिस्‍टम पर ऑडियो ट्रेक बनाया जाता है. ट्रेक को प्‍ले करके रिकार्ड किया जाता है, इस दौरान वोकल ट्रेक को म्‍यूट कर दिया जाता है. बाद में कम्‍पलीट ट्रेक रिकार्ड किया जाता है. फिर इसमें इफेक्‍ट डाले जाते हैं.  और फिर आवश्‍यकता के अनुसार कम्‍प्रेसर, रिवार्व, डिले और लिमिटर आदि डाले जाते हैं.

बहरहाल, गीत लिखना सिखाया जा सकता है, सिंगिंग की ट्रेनिंग दी जा सकती है, इसके लिए तो भारत में बरसों से गुरू-शिष्‍य परंपरा का रिवाज़ चल ही रहा है. साज़ बजाना भी सिखाया जा सकता है. लेकिन कम्‍पोज़र के लिए कोई स्‍कूल हो जहां कम्‍पोजी़शन की शिक्षा दी जाती हो ऐसा सुनने में नहीं आता. कहा जाता है यह तो ईश्‍वर प्रदत्‍त वरदान है जो हर किसी को नहीं मिलता. अच्‍छा म्‍युजि़शियन बनने के लिए अच्‍छे कान होना जरूरी है. अच्‍छे कान से आशय अच्‍छा सुनने, समझने और उसे ग्रास्‍प करने की क्षमता होना है. जो अच्‍छे संगीत को अपने दिल और दिमाग़ में उतारकर सकता है वही खूबसूरत, कर्णप्रिय और मधुर संगीत की रचना कर सकता है.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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First published: June 18, 2021, 1:01 PM IST
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