स्‍मृति शेष: राजकुमार केसवानी के रिपोर्ट को गंभीरता से लिया जाता तो नहीं होता भोपाल गैस कांड

पुराने भोपाल में रहने वाले और भोपाली पटियों पर अपनी रातें गुज़ारने वाले राजकुमार पर भोपाल की किस्‍सागोई का गहरा असर था. वो सिनेमा की बातें किस्‍सों के रूप में ही सुनाया (लिखा) करते थे और इसी में वो धीर-गंभीर बातें कह जाया करते थे.

Source: News18Hindi Last updated on: May 22, 2021, 12:28 PM IST
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स्‍मृति शेष: राजकुमार केसवानी के रिपोर्ट को गंभीरता से लिया जाता तो नहीं होता भोपाल गैस कांड
वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार केसवानी का आज कोरोना से निधन हो गया.
आज का दिन राजकुमार केसवानी की स्‍मृतियों में उतरने का दिन है. पिछले अनेक दिनों से वो कोरोना से संक्रमित थे और इन दिनों भोपाल के एक अस्‍पताल में भरती थे. शुक्रवार की शाम उन्‍होंने अपनी देह को विश्राम दे दिया और परलोक में विलीन हो गए. एक दोस्‍त के किस्‍से से उनकी बात की शुरुआत करता हूं. रवि विलियम्‍स उन दिनों जनसंपर्क में फोटोग्राफर थे, वे ये किस्‍सा सुनाया करते थे. किस्‍सा उनके ही शब्‍दों में ‘ पुरानी बात है, मैं अपने चार दोस्‍तों के साथ भोपाल के छोला इलाके में था, रात का समय था दारू पार्टी चल रही थी. मेरे अलावा बाकी के चारों लोग छोला निवासी थे. उनका घर यूनियन कार्बाइड फैक्‍ट्री के बिलकुल नज़दीक था. बातचीत में यूनियन कार्बाईड की चर्चा निकली.वो यूं कि चंद दिन पहले ही पत्रकार राजकुमार केसवानी की एक रिपोर्ट किसी अखबार छपी थी, जिसमें उन्‍होंने चेताया था कि यूनियन कार्बाइड के कारण भोपाल ज्‍वालामुखी के मुहाने पर बैठा है. चार में से तीन लोगों को वो रिपोर्ट अतिरंजित लग रही थी. उनका मानना था कि राजकुमार रस्‍सी का सांप बना रहा है. चौथा उन तीनों से सहमत नहीं था. उसने बाकायदा अपना प्‍लान बताया कि अगर यूनियन कार्बाइड से गैस रिसती है तो वो क्‍या करेगा, कहां जाएगा और कैसे अपना बचाव करेगा. बात आई गई हो गई. दिन गुज़रे, महीने भी गुजर रहे थे कि एक रात केसवानी की आशंका सच हो गई.

2-3 दिसंबर 1984 की दरम्‍यानी रात भोपाल के इतिहास की सबसे काली रात बनकर सामने आई. यूनियन काबाईड से रिसी गैस ने भोपाल की एक बड़ी आबादी को अपने आगोश में ले लिया और उन्‍हें मौत की गहरी नींद में सुला दिया. इस किस्‍से में के तीन लोग जिन्‍होंने इस रिपोर्ट को हवा में उड़ा दिया था, उन तीनों की मौत हो गई और चौथा व्‍यक्ति जिसने गैस रिसने की भविष्‍यवाणी को सच मानते हुए अपने बचाव का प्‍लान पेश किया था वह बच गया. वो चौथा शख्‍स आज भोपाल के जनसंपर्क विभाग में अधिकारी है.’
किस्‍सा सच हो ना हो ये तो कहा ही जा सकता है कि दुनिया भर में भोपाल की पहचान बन चुकी इस भीषण गैस त्रासदी में कुछ जानें तो इस ‘रिपोर्ट’ ने जरूर ही बचाई होंगी. बाद में यह कहने वालों की भी कमी नहीं थी कि अगर केसवानी की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया जाता, तो संभव है इस त्रासदी को टाला जा सकता था.

गैस कांड के बाद राजकुमार केसवानी का नाम दुनिया के खोजी पत्रकारों की लिस्‍ट में बहुत ऊंचे पायदान पर दर्ज हो गया. केसवानी इससे खुश तो थे लेकिन बहुत ज्‍यादा नहीं, क्‍योंकि उनके सीने में धड़कने वाला दिल ना तो बहुत ज्‍यादा प्रोफेशनल था और ना ही सेल्फिश. वो अपनी प्रसिद्धि से खुश होने के बजाय लोगों की मौत से ज्‍यादा दुखी थे. ऐसे ‘पागलों’ की इस समय बहुत ज़रूरत है, इसलिए उनका जाना दुखी करता है.
राजकुमार केसवानी के चेहरे का ये एक हिस्‍सा है. उनका दूसरा चेहरे खोजी पत्रकार के इस चेहरे से बिलकुल भिन्‍न चेहरा है. इतनी विस्‍फोटक, सनसनीखेज, दुनिया को और महाशक्ति को हिला देने वाली इस रिपोर्ट के बाद भी केसवानी की कलम ने अलग राह पकड़ी, विविध रूप धरे. बाद के दिनों में उनकी पहचान फिल्‍म पर लिखने वाले लेखक, कवि और साहित्‍य संपादक की बनी. वो कहते हैं ना जीनियस जहां भी जाएगा अपनी अलग पहचान के साथ ही लोगों से रूबरू होगा. अपनी अनूठी लेखन शैली के चलते केसवानी ने फिल्‍म जैसे विषय को भी गंभीर लेखनी में प्रस्‍तुत किया. बावजूद इसके उनकी लेखनी में रवनागी थी, पेस था, रोचक और दिलचस्‍प जानकारियां की भरमार थी. उनकी लेखनी का ये कमाल था कि वो एक साथ फिल्‍मी लोगों, साहित्‍य के पुरोधाओं और आम लोगों द्वारा चाव से पढ़े जाते थे.

पुराने भोपाल में रहने वाले और भोपाली पटियों पर अपनी रातें गुज़ारने वाले राजकुमार पर भोपाल की किस्‍सागोई का गहरा असर था. वो सिनेमा की बातें किस्‍सों के रूप में ही सुनाया (लिखा) करते थे और इसी में वो धीर-गंभीर बातें कह जाया करते थे. उनकी लेखनी रूमानियत की खुशबू से भी सराबोर थी. 2008 में उन्‍होंने 13 वीं सदी के महान सूफी संत मौलाना जलालुद्दीन रूमी की फारसी कवितओं का ‘जहान-ए-रूमी’ के रूप में हिंदी में अनुवाद किया. बाद में उनकी लेखनी में रूमानी टच संभवत: इसी कारण आया. उनके चर्चित क‍विता संग्रहों में ‘बाकी बचें जो’ और ‘सातवां दरवाजा’ शामिल हैं. इसके अलावा उन्‍होंने कथाकार ज्ञानरंजन के साथ साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ का संपादन भी किया. वे चैनल्‍स में ब्‍यूरो प्रमुख और प्रतिष्ठित अखबारों के संपादक भी रहे. जून 2020 में केसवानी ने एक किताब ‘दास्‍तान-ए- मुगल-ए-आज़म’ भी लिखी जो अमेजा़न पर उपलब्‍ध है.

अपनी लंबी अखबारी यात्रा में उन्‍होंने कई महत्‍वपूर्ण पड़ाव पार किए. शुरूआत खुद के और भोपाल के छोटे-बड़े अखबारों से हुई. बाद में वे राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर के समाचार पत्रों जैसे, न्‍यूयार्क टाईम्‍स, द इलस्‍ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया, इकॉनामिक एण्‍ड पॉलिटिकल वीकली, सहित अनेक बड़े अखबारों से जुड़े. 1984 में हुई गैस त्रासदी पर राजकुमार ने ढाई तीन साल पहले से लिखना शुरू कर दिया था. उन्‍होंने चेतावनी देते हुए लेख लिखे थे.
आजकल बिना लिखे-पढ़े कोई पत्रकार नहीं बनता पर पहले कम पढ़े लिखे भी पत्रकार बन जाया करते थे. केसवानी इस पढ़ा लिखी से थोड़ा ऊपर थे. उनके दोस्‍त रज़ा मावल के अनुसार वे एक पढ़े लिखे पत्रकार थे. उन्‍होंने जब यूनियन कार्बाईड पर लिखा तो उन्‍हें गैस के बारे में गहराई से जानकारी थी. मसलन, गैस कौन सी है ? उसकी प्रापर्टीज़ क्‍या है ? और उससे क्‍या बनाया जाता है?


‘भोपाल द सर्च फॉर जस्टिस’ वह वृत्‍तचित्र हैं जिसमें केसवानी के काम को रेखांकित किया गया है. यह वृत्‍तचित्र केनेडियन ब्राडकास्टिंग कार्पोरेशनऔर व्‍हाइट पाईन पिक्‍चर्स द्वारा बनाया गया था. केसवानी जी को अनेक पुरस्‍कारों से भी नवाज़ा गया. जिनमें प्रतिष्ठित बी.डी.गोयनका और प्रेम भाटिया जर्नलिज्‍़म अवार्ड शामिल हैं. केसवानी जी संगीत के चलते-फिरते इंसाइक्‍लोपीडिया थे. उनके पास दुर्लभ जानकारी थी जो उनके संगीत केन्द्रित कालम ‘आपस की बात’ में सप्‍ताह दर सप्‍ताह पाठकों को रोमांचित और चकित करती रहती थी.

अपनी किताब ‘दास्‍तान-ए-मुग़ल-ए-आज़म’ में वो कहते हैं ‘पद्रह बरस लंबे सफर के बाद सांस फूलना लाजि़मी है, सो इस वक्‍त मेरी सांसें फूल रही हैं. बस सबसे ज्‍यादा खुशी इस बात की है कि मंजि़ल तक आ पहुंचा हूं. अब यह बयान करना कि कि यहां तक पहुंचने के लिए किन-किन मरहलों या मुश्किलों से गुज़रना हुआ, उस मुहब्‍बत की तौहीन होगी जिस मुहब्‍बत से यह काम किया है. सो, बस इतना भर कहूंगा कि यहां आपके सामने जो कुछ पेश कर रहा हूं, वह एक आशिक की अपने माशूक के लिए एक खिराज़-ए-अक़ीदत है. अब मुगले आज़म के संवादों पर ग़ौर करें, फिर इसे दोबारा पढ़ें. पाएंगे कि उनका यह अंदाज़-ए-बयां भी फिल्‍म के संवादों से बहुत मिलता-जुलता है. ये उनकी लेखनी की एक विशेषता बताती है, वो किस तरह अपने पाठकों को उस दुनिया में सहज ही ले जाया करते थे, जिस पर वो अपनी कलम चला रहे होते थे. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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First published: May 22, 2021, 12:28 PM IST
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