मिलिए सचमुच के सूरमा भोपाली से

पांच फीट हाइट के नाहर मामा का गुस्‍सा हमेशा उनकी नाक पर रहता था इसलिए उन्‍हें सूरमा भोपाली का खिताब मिला. इस बारे में उनके दोस्‍त और क्राइम एडवोकेट मोहम्‍मद अली का कहना है कि नाहर मामा गुस्‍से के बहुत तेज थे.

Source: News18Hindi Last updated on: July 10, 2020, 7:14 PM IST
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मिलिए सचमुच के सूरमा भोपाली से
नाहर सिंह बघेल उर्फ सूरमा भोपाली.
फिल्‍म अभिनेता जगदीप नहीं रहे.  सूचनाओं के इस विस्‍फोटक संसार में उनके बारे में बहुत कुछ लिखने पढ़ने को मिल रहा है लेकिन फिर भी कुछ ऐसा है जो ज्‍यादा लोग नहीं जानते, कुछ हैं जो अचर्चित है. हम उसी पर बात करेंगे.

सूरमा भोपली के रचयिता जावेद अख्‍तर (सलीम-जावेद) ने पहली बार यह स्‍वीकरोक्ति 2017 में भोपाल में से एक मंच से की थी  और कहा था कि, मैंने ये चरित्र एक जीवित व्यक्ति से इंस्पायर होकर गढ़ा था. हम आपको उसी शख्सियत से मिलवाने जा रहे हैं. उनका नाम था नाहर सिंह बघेल. वो जावेद अख्‍तर के कालेज के दिनों के मित्र थे. शोले की रिलीज़ के बाद स्‍वर्गीय नाहर सिंह ने जावेद पर केस भी किया था. शायद इसे लेकर जावेद को कुछ कड़वाहट भी रही.  2017 के पहले एक बड़े मीडिया ग्रुप के लिए इस विषय पर खाकसार ने एक स्‍टोरी थी. उस समय जावेदजी ने इस विषय पर बात करना टाल दिया था.

केरेक्‍टर भले ही जावेद अख्‍तर ने कहीं से लिया हो सूरमा भोपाली अमर उन्‍होंने और सलीम साहब ने ही बनाया. वैसे शोले के तो हर केरेक्‍टर अमर हैं. नाहर सिंहजी की भतीजी प्रोफेसर मंजु सिंह कहती हैं “हमारे ताउ को जब शोले से जोड़ा जाता है तो हमें बहुत गर्व होता है."

बहरहाल, एक्‍टर जगदीप की जब भी बात होती है, दिमाग़ में तत्‍काल शोले का सूरमा भोपाली कौंधता है, ये डायलाग भी-  “हमारा नाम भी सूरमा भोपाली ऐसेई नईं है” और ”ना जाने कां कां से आ जाते हैं”
साठ के दशक के मध्‍य की बात है. भोपाल में एक शख्‍स रहा करते थे जिनका नाम था नाहर सिंह बघेल. लोग उन्‍हें नाहर मामा और काले मामा कहकर भी बुलाते थे. बाद में वे सूरमा भोपाली के नाम से जाने जाने लगे. वे भोपाल म्‍युनिसिपल्‍टी में नाकेदार के पद पर पदस्‍थ थे. भोपाल के पॉश इलाके प्रोफेसर कॉलोनी में उनका बंगला था जहां आज भी उनके परिवार के लोग रहते हैं. उनकी पत्‍नी का नाम गुलाब था जिनका देहांत पिछले बरस नवंबर में हुआ है.

नाहर सिंह बघेल की तस्वीर के साथ प्रोफेसर मंजू सिंह.


पांच फीट हाइट के नाहर मामा का गुस्‍सा हमेशा उनकी नाक पर रहता था इसलिए उन्‍हें सूरमा भोपाली का खिताब मिला. इस बारे में उनके दोस्‍त और क्राइम एडवोकेट मोहम्‍मद अली का कहना है कि नाहर मामा गुस्‍से के बहुत तेज थे. इस कारण किसी से भी उलझ जाते थे. इसके चलते उनके दोस्‍तों की टोली को विरोधियों की पिटाई करना पड़ती थी. कई बार दोस्‍त झल्‍लाकर कहते थे बड़े सूरमा बने फिरते हो. मोहम्‍मद अली के अनुसार इसी के बाद उनका नाम सूरमा भोपाली पड़ गया. मोहम्‍मद अली ही वो वकील थे जिन्‍होंने शोले की रिलीज़ के बाद नाहर सिंह की तरफ से जावेद अख्‍तर पर केस किया था. उनके दोस्‍तों की टोली में मतीन साहब, शाहिद कमाल पाशा, सरवर अली खान उर्फ भूरे मियां, मोहम्‍मद अली एडवोकेट और पूर्व सांसद गुफराने आज़म शामिल थे. शाहिद कमाल अभिनेता रज़ा मुराद के सगे मामा थे. इसी के चलते रज़ा मुराद नाहर सिंह को नाहर मामा कहते थे. अनेक बार वो उनके घर प्रोफेसर कॉलोनी में आकर रूके तथा नाहर मामा जब भी मुंबई जाते रज़ा मुराद के घर ही रूकते थे.सूरमा भोपाली को लेकर एक और किस्‍सा नाहर सिंह की भतीजी मंजू सिंह ने नसीर कमाल के माध्‍यम से शेयर किया है. एक बार सेफिया कालेज भोपाल की हाकी टीम ग्‍वालियर में सिंधिया गोल्‍ड कप हाकी टूर्नामेंट में ग्‍वालियर की टीम से मैच खेल रही थी. इस टूर्नामेंट में ओलंपियन इनाम उर रहमान भोपाल का प्रतिनिधि‍त्‍व कर रहे थे. मैच लोकल टीम के अगेंस्‍ट जा रहा था. ऐसे में वहां के लोगों ने भोपाल टीम के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी. "पाकिस्‍तानी हैं, मारो". तब नाहर सिंह तैश में आ गए और जोर से चिल्‍लाए – तुम लोग महासभाई हो, मेरे भोपाल के मुस्लिम भाईयों के बारे में कोई ऐसा नहीं बोल सकता. कम आन, कम आन, आई केन टेक यू आन, आई एम सूरमा भोपाली. इसके बाद तो नाहर मामा हीरो बन गए और सूरमा भोपाली का खिताब उनसे हमेशा के लिए जुड़ गया. मंजू सिंह राजीव गांधी प्रोद्योगिकी विश्‍वविद्यालय में केमेस्‍ट्री की प्रोफेसर हैं और उसी बंगले में रहती हैं जहां नाहर सिंह रहा करते थे. वे बताती हैं, मेरे पापा के कहने पर ही ताउ यानि नाहर सिंह ने जावेद अख्‍तर के खिलाफ केस वापस लिया था. नाहर सिंह तीन भाई थे. नाहर सिंह का जन्‍म 1935 में हुआ था. मृत्‍यु 19 नवम्‍बर 1979 को एक एक्‍सीडेंट में हुई थी जब वो बजाज स्‍कूटर से गांव से शहर आ रहे थे.

प्रोफेसर मंजू सिंह अपने ताउ को बाबा कहती थीं.  वे कहती हैं  “हमारे बाबा और उनके दोस्‍त भोपाल की गंगा ज़मुनी तहज़ीब के सच्‍चे और जीवंत उदाहरण थे."

मैं आज जो कुछ हूं नाहर मामा की बदौलत हूँरज़ा मुराद

अभिनेता रज़ा मुराद उनके बारे में बहुकत भावुक होकर कहते हैं “मैं आज जो कुछ भी हूं, नाहर मामा के कारण हूं. वे बहुत अच्‍छे गायक थे और आकशवाणी में केजु़अल आर्टिस्‍ट भी. उस जमाने में मैं हायर सेकेन्‍ड्री में पढ़ता था. वे मुझे लेकर आकाशवाणी गए, मेरा फार्म भरवाया और इस तरह मैंने नाटकों में अपनी आवाज़ देना शुरू की. जिसके चलते आज इस मुकाम पर हूं. वे हमारे परिवार की तरह थे. जरा जरा सी बात पर गुस्‍सा करते थे इसीलिए लोग उन्‍हें सूरमा भोपाली कहते थे. हम उन्‍हें काले मामा भी कहते थे. बहुत भावुक, भोले, मासूम और दिल के साफ आदमी थे. जब भी मुंबई आते हमारे घर ही रूकते और लंबा रूकते. उनका आना और लंबा रूकना हमें कभी बोझ नहीं लगा, बल्कि हमेशा खुशी ही हुई. मैं भी कई बार प्रोफेसर कॉलोनी में उनके घर पर रुकता था."
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

शकील खान लेखक, पत्रकार और फिल्म निर्देशक हैं. आपने कई शॉर्ट फिल्मों, विज्ञापनों में लेखन का कार्य किया है. साथ ही फिल्म और कला समीक्षक हैं.

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First published: July 10, 2020, 7:12 PM IST
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