स्मृति शेष: बेबाक और अवाम के शायर राहत इंदौरी

राहत इंदौरी (Rahat Indori) की शायरी और उनकी शख्सियत को अगर दो शब्दों में बयान करना हो तो कह सकते हैं कि वे बेबाक और अवाम के शायर थे. जनता जनार्दन से सीधा संवाद करने वाले जमीन से जुड़े शायर. यहां पढ़ें फिल्म लेखक, पत्रकार और फिल्म निर्देशक शकील खान का ब्लॉग

Source: News18Hindi Last updated on: August 12, 2020, 12:50 PM IST
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स्मृति शेष: बेबाक और अवाम के शायर राहत इंदौरी
राहत इंदौरी.
कहते हैं कि 'राहत' का है अंदाज़-ए-बयां और 'लहू से मेरी पेशानी पे हिंदोस्तान लिख देना' हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गा़लिब का है अंदाज़-ए-बयां और'

गालिब का ये मशहूर शेर गालिब के अलग और अनूठे अंदाज़ की किस्सा बयानी करता है. राहत इंदौरी के संदर्भ में अगर हम इस शेर का ज़िक्र करें तो ये ग़ालिब के साथ बहुत ज्यादती होगी क्योंकि राहत की ग़ालिब से तुलना बिलकुल बेमानी है. अगर राहत इस फानी दुनिया से बिदा नहीं हुए होते तो उन्हें खुद भी ये बात गवारा नहीं होती के उनकी तुलना ग़ालिब जैसे आला शायर से की जाए. लेकिन एक अलग अर्थ में ग़ालिब और राहत की तुलना फिर भी गैरवाजिब नहीं, क्योंकि अंदाज़ तो राहत का भी बिलकुल अलग, अनूठा और दूसरों से पूरी तरह जु़दा था. दिलचस्पी से भरे उनके इसी अंदाज़ ने उन्हें दुनिया भर में मशहूर किया, प्रसिद़धि दिलाई.

ये अलग बात है कि ग़ालिब जब अपने अंदाजे बयां की बात कर रहे हैं तो उनका आशय अपनी शायरी के लेखन से है ना कि सुनाने के अंदाज़ से. राहत के अंदाजे़ बयां की बात करें तो हम उनकी शायरी की बात नहीं कर रहे, बल्कि उनके सुनाने के अंदाज़ की बात कर रहे हैं.

उनका सुनाने का ये अंदाज़ ही उन्हें दूसरे शायरों और कवियों से ना सिर्फ अलग करता है बल्कि उनका यह अंदाज़-ए-बयां ही उन्हें मंच लूटने वाले शायर की बेशकीमती पदवी से भी नवाज़ता है. राहत इंदौरी मुशायरों और कवि सम्मेलनों की जान यूं ही नहीं थे. कुछ तो था जो उन्हें औरों से अलग करता था, प्रसिदिध के ऊंचे सिंहासन पर बिठाता था.
राहत इंदौरी की शायरी और उनकी शख्सियत को अगर दो शब्दों में बयान करना हो तो कह सकते हैं कि वे बेबाक और अवाम के शायर थे. जनता जनार्दन से सीधा संवाद करने वाले  जमीन से जुड़े शायर. उनकी शायरी की सबसे बड़ी विशेषता ये थी कि वो बहुत आसान शब्दों में बहुत गहरी बात बोलते थे और सीधे लोगों के दिल में उतर जाते थे. सरल शब्दों में गहरी बात कहना, सुनने में जितना सरल लगता है उतना ही मुश्किल होता है ये काम. यही खासियत राहत इंदौरी को अलग पहचान देती है.

उनका शायरी कहने के अनूठे अंदाज़ की विवेचना करें तो पाएंगे कि उनकी शायरी के शुरूआती लाइनें रहस्य के आवरण में ढंकी रहती थी सामान्य से शब्दों से शुरू हुई उनकी शायरी की शुरूआती लाईनें कलाम खत्म होने पर एक अलग अंदाज़ में सामने आती थी. अपनी शायरी की आरंभिक लाइनों को बार बार दोहरा कर जब वो अपनी बात खत्म करते थे, तो पूरी महफिल देर तक तालियों से गूंजती रहती थी.

मुलाहिज़ा फरमाएं –मैं जब मर जाउं तो मेरी अलग पहचान लिख देना
लहु से मेरी पेशानी हिंदोस्तान लिख देना

rahat indori

इंदौर में जन्में राहत इंदौरी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा इंदौर के नूतन स्कूल से की. इस्लामिया करीमिया कॉलेज इंदौर से 1973 में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की. 1975 में बरकत उल्लाह विश्वविद्यालय भोपाल से उर्दू साहित्य में एम ए किया.1985 में मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की. वे देवी अहिल्यादेवी विश्वविद्यालय इंदौर में उर्दू साहित्य के प्राध्यापक भी रहे.

शायरी की शौक उन्हें बचपन से ही था. राहत इंदौरी ने जब शायरी की शुरूआत की तो वह दौर तरन्नुम से गज़ल पढ़ने वालों का दौर था. तनन्नुम से गज़ल पढ़ना यानि गज़ल को गाकर सुनाना. यानि अच्छे शायर के लिए गला भी अच्छा चाहिए था और गायकी भी स्तरीय. उस दौर में कई मशहूर शायरों ने अपनी शायरी के साथ साथ अपनी आवाज के दम पर श्रोताओं को अपने मोहपाश में बांध रखा था. उनकी आवाज का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा था. ऐसे माहौल में एक ऐसे शायर का मुशायरों में दाखिल होना जो अपनी शायरी को तरन्नुम में नहीं सुनाता हो, बहुत मुश्किल था. लेकिन राहत ने इस काम को सहज ओर आसान बनाया.

उन्होंने ना सिर्फ बिना तरन्नुम के गज़ल सुनाना शुरू किया बल्कि मुशायरों में वाहवाही भी लूटना शुरू कर दिया. उन्होंने गायकी के बगैर शेर पढ़ने का नया लहज़ा और अनूठा अंदाज़ अपनाया जिसे श्रोताओं ने इतना पसंद किया के उन्हें सिर आंखों पर बिठा लिया. देखते ही देखते राहत इंदौरी मुशायरों के मकबूल शायर ही नहीं बल्कि मुशायरों और कवि सम्मेलनों की ज़रूरत भी बन गए.

ज़ुबाँ तो खोल, नज़र तो मिला, जवाब तो दे
मैं कितनी बार लुटा हूँ, मुझे हिसाब तो दे

शेर पढ़ने का उनका अंदाज़ इतना नया, इतना दिलचस्प और प्रभावशाली था कि वो सुनने वालों के दिलों पर जादू सा असर करता था. मौजूदा वक्त को कोई मुशायरा उनकी उपस्थिति के बिना बड़ा मुशायरा नहीं माना जाता था. पिछले चालीस-पचास सालों से वे ना सिर्फ मुशायरों के बेताज बादशाह थे बल्कि वो अपनी शर्तों पर मुशायरों में शिरकत करते थे.

बहुत गुरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाएं

राहत जनता के शायर थे, अवाम के शायर थे. अपनी शायरी में वो समाज की कुरीतियों पर, सिस्टम की कमियों पर नामामियों पर बेबाक, निडर और निर्भीक अंदाज़ में व्यंग्य करते थे. उनका यह अंदाज़ ही उन्हें श्रोताओं के दिलों पर राज करने वाला शायर बनाता था. सिर्फ हिंदोस्तान ही नहीं पूरी दुनिया के मुशायरों के आयोजकों के लिए राहत इंदौरी पहली पसंद थे. मुशायरे में उनकी मॉजूदगी मुशायरे की सफलता की गारंटी हुआ करती थी. आजकल मुशायरे और कवि सम्मेलन के मिले जुले रूप के आयोजनों का खासा चलन है. जिनमें हिंदी कवियों के साथ उर्दू शायर भी शिरकत करते हैं. राहत इन मिश्रित सम्मेलनों की भी जान थे. उनकी प्रसिद्धि ने मुशायरे और कवि सम्मेलन के इतिहास में नया अध्याय लिखा है. पूरी दुनिया में उनके प्रशंसकों की तगड़ी जमात है.

तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पे वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो

इंदिरा गांधी जब देश की प्रधान मंत्री थीं. बहुत ताकतवर प्रधानमंत्री थीं. उन दिनों हिंदी के मशहूर कवि भवानी प्रसाद मिश्र ने इंदिरा गांधी पर बेबाक अंदाज़ में कविता कही थी. उसकी दो लाईनें ठीक से याद तो नहीं हैं पर संभवत: कुछ यूं थीं. गलती हो तो प्रशंसक क्षमा करें.

इंदिरा तू इंदिरा है, गांधी नहीं है तू
इंदिरा तू हवा है, आंधी नहीं है तू

उस दौर में इंदिरा पर इस तरह की कविता कहना बहुत दिलेरी का काम था. राहत इंदौरी की शायरी की तुलना भवानी प्रसाद मिश्र की कविता से तो नहीं की जा सकती क्योंकि वो अलग ही मिज़ाज के कवि थे लेकिन राहत का बेबाक अंदाज़ में सिस्टम के खिलाफ शेर कहना इस वाकये की याद जरूर दिलाता है.

शाखों से टूट जाएं वो पत्ते नहीं हैं हम,
आंधी से कोई कह दे कि औकात में रहे.
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

लेखक, पत्रकार और फिल्म निर्देशक हैं. आपने कई शॉर्ट फिल्मों, विज्ञापनों में लेखन का कार्य किया है. साथ ही फिल्म और कला समीक्षक हैं.

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First published: August 12, 2020, 12:44 PM IST
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