श्रद्धांजलि मोहम्‍मद रफी: ‘तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे

रफी साहब ने पंचम दा से नाराज़ होकर बोले ‘पंचम, क्‍यों किसी नए कलाकार की जिंदगी मेरे हाथों बरबाद करते हो.’ उसके बाद पंचम दा ने रफी साहब से बहुत आग्रह किया कि आप ही गाना पूरा करें, लेकिन रफी साहब नहीं माने और रिकार्डिंग बीच में छोड़कर चले गए.

Source: News18Hindi Last updated on: July 31, 2021, 9:15 AM IST
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श्रद्धांजलि मोहम्‍मद रफी: ‘तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे


एक किस्‍से से मोहम्‍मद रफी को समझने की कोशिश करते हैं. 1981 में एक फिल्‍म आई थी ‘कुदरत’. फिल्‍म के सभी गाने किशोर कुमार ने गाए थे. निर्देशक चेतन आनंद चाहते थे कि एक गाना रफी साहब गाएं. उनका मानना था कि इस गाने के साथ सिर्फ रफी साहब ही न्‍याय कर सकते हैं. जबकि, आरडी बर्मन इसे एक नए गायक से गंवाना चाहते थे. आरडी बरमन दो कारणों से रफी साहब से ऐसा चाहते थे. एक फिल्‍म के बाकी सभी गीत किशोर कुमार ने गाए थे, इसलिए सिर्फ एक गाने के लिए रफी साहब को बुलाने में उन्‍हें संकोच था. दूसरा वे नए गायक को चांस देना चाह रहे थे.


आरडी के बहुत आग्रह पर चेतन आनंद ने नए गायक को सुना और उसकी आवाज में गाना रिकार्ड करने की परमीशन दे दी. गाना रिकार्ड हो गया और सबको पसंद भी आया. चेतन आनंद फिर भी बोले ‘गाना रफी साहब की आवाज़ में ही रिकार्ड करें.’ कोई चारा नहीं था, इसलिए आरडी ने रफी साहब से अनुरोध किया. रफी साहब ने आसानी से स्‍वीकृति देकर आरडी का राहत दे दी. गाना रिकार्ड हुआ. तीसरा अंतरा रिकार्ड हो चुका था. टी ब्रेक में पता नहीं कैसे रफी साहब के माइक्रोफोन में नए गायक का रिकार्ड किया हुआ गाना सुनाई दे गया. रफी साहब ने टेक्‍नीशियन को बुलाया और पूछा ‘क्‍या ये गाना पहले भी किसी ने गाया है.’


रफी ने कहा- क्‍यों किसी नए कलाकार की जिंदगी मेरे हाथों बरबाद करते हो?

टेक्‍नीशियन ने रफी साहब से कहा- हां, वो कोने में जो दाढ़ी वाला बैठा है ना, उसने गाया है, अच्‍छा गायक है. रफी साहब बोले ‘क्‍या कमाल का गाया है.’ फिर रफी साहब ने पंचम दा को सिंगर केबिन में बुलाया और कहा, ‘पंचम, सच बताना ये गाना पहले किसी और से रिकार्ड कराया है.’  रफी साहब का गुस्‍सा देख पंचम दा ने ईमानदारी से किस्‍सा बयान कर दिया. तब रफी साहब नाराज़ होकर बोले ‘पंचम, क्‍यों किसी नए कलाकार की जिंदगी मेरे हाथों बरबाद करते हो.’ उसके बाद पंचम दा ने रफी साहब से बहुत आग्रह किया कि आप ही गाना पूरा करें, लेकिन रफी साहब नहीं माने और रिकार्डिंग बीच में छोड़कर चले गए.



इस तरह, एक नए और प्रतिभाशाली गायक की गायकी बरबाद होने से बच गई. बाद में मजबूरी में चौथा अंतरा उस नए गायक की आवाज़ में जारी किया गया. तीन अंतरे रफी साहब की आवाज में उपलब्‍ध थे ही. बाद में वो गायक मराठी फिल्‍म इंडस्‍ट्री का बहुत बड़ा गायक बना. उसका नाम था चन्‍द्रशेखर गाडगिल. रफी के प्रति आदरभाव जताते और भावुक होते चन्‍द्रशेखर कहते हैं ‘आणि चौथा अंतरा गायला नाहीं, चौथा अंतरा मैं गाता नहीं, बोले’. इस तरह रफी साहब के साथ एक अंतरा गाकर चन्‍द्रशेखर मराठी इंडस्‍ट्री में बड़ा नाम बने.


कतील शि‍फाई का लिखा वो गीत था ‘सुख-दुख की हरेक माला कुदरत ही पिरोती है. तो ऐसा किरदार था मोहम्‍मद रफी साहब का. निहायत शरीफ, सीधा, दयालू और किसी का हक नहीं मारने वाला. वो गायक तो महान थे ही इंसान उससे ज्‍यादा अच्‍छे थे.


आज भी उत्‍तर भारत की हर शादी में बजता है रफी का यह गीत

उत्‍तर भारत में कोई बारात नागिन डांस के बिना नहीं निकलती. लेकिन ये भी सच है कि बारात में ‘आज मेरे यार की शादी है’ भी अनिवार्य रूप से गाया जाता है. ‘आदमी सड़क का’ फिल्‍म का यह गीत रफी साहब ने गाया है. उनका एक और गीत जात-पात और धर्म का भेद किए बिना बारातों में खूब गाया जाता है. यह गाना दोस्‍तों की तरफ से नए दूल्‍हे की शान में कसीदे पढ़ने के अंदाज़ में गाया जाता है‘ ये देश है वीर जवानों का अलबेलों का मस्‍ताना का….’ इस देशभक्ति के गीत का इस्‍तेमाल जिसने भी दूल्‍हे के लिए पहली बार किया था, उसे सौ तोपों की सलामी.


एक और किस्‍सा. अमिताभ से सुनिए ‘दो दिन का कार्यक्रम था. पहले दिन रफी साहब गा चुके थे. दूसरे दिन सुबह हमें पता चला कि आज जिन गायक का प्रोग्राम है वो नहीं आ रहे हैं. रफी साहब एयरपोर्ट जा चुके थे. हम लोगों ने एयरपोर्ट की ओर दौड़ लगाई. प्‍लेन बस उड़ने ही वाला था. एयरपोर्ट अथारिटी से निवेदन करके प्‍लेन में पहुंचे और रफी साहब को समस्‍या बताई. रफी साहब बिना कुछ कहे तत्‍काल हमारे साथ नीचे उतर आए. इस तरह हम परेशानी में फंसने से बच गए.’  बता दें रफी साहब को अमिताभ की दीवार बहुत पसंद थी.


दिलचस्‍प है यह जानना कि रफी साहब अपने बचपन में भी कार्यक्रम के आयोजकों को इसी तरह की उलझन से निजात दिला चुके हैं. बात पुरानी है. रफी तब बच्‍चे थे. अविभाजित भारत के लाहौर में केएल सहगल का एक कंसर्ट था. उस कार्यक्रम को सुनने तेरह साल का बालक रफी भी अपने भाई के साथ वहां पहुंचा था. कार्यक्रम शुरू होने वाला था, कि लाइट चली गई. अब ऐसे हालात में बिना माइक के तो सहगल गा नहीं सकते थे, सो वो होटल में ही रूक गए.


बचपन में गुस्‍साई जनता का रफी ने कुछ यूं जीता दिल

उतावली और व्‍यग्र जनता की भीड़ को कैसे शांत करें, आयोजकों को समझ में नहीं आ रहा था. तब रफी के बड़े भाई हमीद और उनके संगीत गुरू अब्‍दुल वाहिद खान ने आयोजकों से निवेदन किया कि बालक रफी को स्‍टेज पर गाने का मौका दें. आयोजकों के पास कोई चारा तो था नहीं, सो बालक मंच पर गाने पहुंच गया. बालक रफी ने ऐसा शमां बांधा कि लोग वाह-वाही करने लगे. यहीं प्रेक्षकों में उस जमाने के मशहूर संगीतकार श्‍याम सुंदर जी भी बैठे थे. उन्‍होंने रफी को सुना और उसकी प्रतिभा के ना सिर्फ कायल हुए बल्कि उसे गाने का मौका भी दिया.


आप सोच रहे होंगे कि एक तेरह साल के बालक पर आयोजकों ने भरोसा कैसे कर लिया. इसके पीछे एक दिलचस्‍प कहानी है.



रफी साहब के भाई की दूकान के पास सुबह-सुबह एक फकीर गुज़रा करता था. वो बहुत ही मधुर स्‍वर में गीत गाता था. जहां वो जाता, रफी साहब उसके पीछे-पीछे जाते और जब तक वो इलाका छोड़ नहीं देता, उसके पीछे घूमते रहते. वे उसका गाना भी बहुत ही लगन से सुना करते. लौटकर दूकान पर आकर ठीक वैसी ही मधुर आवाज़ में वो गीत को हूबहू दोहरा देते. यह रोज का किस्‍सा था. उनके इस अद्भुत गुण ओर उनकी आवाज की मधुरता की गूंज दूर तक फैलने लगी.


तब उनके बड़े भाई ने उस्‍ताद अब्‍दुल वहीद खान के पास संगीत सीखने भेज दिया. रफी की चर्चा पूरे लाहौर में होने लगी. इसी के चलते उन्‍हें सहगल वाले आयोजन में गाने का अवसर मिला.


नौशाद की सिगरेट से चिठ ने रफी को बनाया स्‍टार





बाद में वो मुंबई आ गए. ये आज़ादी के पहले की बात है. आज़ादी के बाद उन्‍होंने भारत में ही रहने का निर्णय लिया और उनका पूरा परिवार मुंबई में शिफ्ट हो गया. रफी साहब पहले ही 1946 में मुंबई पहुंचे थे. यहां उन्‍हें नौशाद ने पहला मौका दिया और ‘पहले आप’ फिल्‍म के गीत गवाए. इससे पहले मो. रफी को श्‍याम सुंदर के संगीत निर्देशन में पंजाबी फिल्‍म ‘गुल बलोच’ के लिए एक गीत 1944 में गा चुके थे. नौशाद का ही स्‍वरबद्ध किया अनमोल घड़ी का गीत ‘खिलौना टूटा’ ने उन्‍हें फिल्‍म जगत में पहचान दी. फिर शहीद, मेला और दुलारी फिल्‍मों में गाए उनके गाने बहुत म‍कबूल हुए.


मो. रफी पार्श्‍व गायक बन गए. पहचान भी हो गई. लेकिन अभी उनकी पहचान जनता को दीवाना बना दे, ऐसे गायक की नहीं थी. यह मौका उन्‍हें संयोग से मिला. हुआ यूं कि फिल्‍म ‘बेजु बावरा’ बन रही थी. संगीतकार नौशाद फिल्‍म के गाने तलत मेहमूद से गवाने वाले थे. लेकिन एक दिन उन्‍होंने तलत मेहमूद को सिगरेट पीते देख लिया. एक गायक सिगरेट पिए उन्‍हें ये पसंद नहीं था. सो उन्‍होंने रफी साहब को मौका दिया. ‘बेजु बावरा’ के गीतों ने इतना तहलका मचाया कि मो. रफी रातों रात लोगों के चहेते गायक बन गए.


वो एक वर्सटाईल सिंगर तो थे ही, उनके पास रेंज ऑफ वाइस भी थी. सो ‘बेजु बावरा’ के गीत सुनने के बाद उन्‍हें कौन रौकने वाला था. यहां से उनकी जो संगीत यात्रा शुरू हुई तो वो उनके देहावसान के बाद 31 जुलाई 1980 को ही थी. बताते चलें उनका जन्‍म 24 दिसंबर 1924 को हुआ था.


बातें शंकर-जयकिशन और मोहम्‍मद रफी की

मुख्‍य धारा में शामिल होने के बाद नौशाद ने उनको कई गीत गाने के मौके दिए. ये शंकर जय किशन के उदय का भी दौर था. रफी साहब जल्‍द ही उनके भी पसंदीदा गायक बन गए. रफी साहब जहां शंकर-जयकिशन के पसंदीदा गायक थे, तो वहीं शंकर-जयकिशन राजकपूर के पसंदीदा संगीतकार थे. लेकिन, वो पार्श्‍व गायक के रूप में मुकेश को पसंद करते थे. इसलिए उनकी फिल्‍मों में मुकेश गाते थे. फिर भी अनेक गाने रफी साहब ने राजकपूर के लिए भी गाए. बाद में रफी साहब ने एसडी बर्मन, ओपी नैयर सहित रवि, मदन मोहन, गुलाम हैदर, जयदेव, सलिल चौधरी, चित्रगुप्‍त के अलावा सभी प्रमुख संगीतकारों के साथ गाने गाए.



क्‍लासिक संयोग है कि लक्ष्‍मीकांत प्‍यारे लाल का पहला गाना रफी ने गाया तो, रफी का आखिरी गाना लक्ष्‍मी प्‍यारे के संगीत निर्देशन में ही रिकार्ड किया गया. एसडी बर्मन के संगीत निर्देशन में गाया उनका गाईड का गीत ‘दिन ढल जाए मगर रात ना जाए’ लोगों द्वारा पसंद किया जाने वाला अद्भुत गीत है. ओपी के लिए उन्‍होंने आशा के साथ जोड़ी बनाई. लता के साथ नहीं गाने के दौर में रफी और आशा ने खूब गीत गाए-‘उड़ें जब-जब ज़ुल्‍फें तेरी.’ इसी दौर में सुमन कल्‍याणपुर के साथ भी रफी की जोड़ी बनी. मेरी सूरत तेरी आंखें का गीत ‘ये किसने गीत छेड़ा बहुत खूबसूरत गीत था.


ओपी नैयर और रफी साहब की जोड़ी की बात करें तो सबसे पहले बहारें फिर भी आएंगी का दिलकश गीत याद आता है ‘आपके हसीन रूख पे आज नया नूर है, मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्‍या कसूर है.


जब किशोर कुमार को रफी ने दी अपनी आवाज

उन्‍होंने हर बड़े संगीतकार के साथ सुर मिलाए. अपने दौर के हर बड़े-छोटे कलाकारों के लिए परदे के पीछे से आवाज दी. उनकी आवाज़ में वेरायटी थी, मधुरता थी ही, इसके अलावा उन्‍हें पार्श्‍वगायन की तकनीक की गहरी समझ थी. इसी के चलते, वो कलाकार की आवाज़ के हिसाब से अपनी आवाज़ को माड्यूल कर लेते थे. उनका गाना सुनने भर से पता चल जाता था कि परदे पर कौन कलाकार इसे साकार कर रहा है. हीरो की आवाज़ से आवाज़ मिलाने में उनका कोई सानी नहीं था. रफी साहब के नायकों की लिस्‍ट में एक दर्जन से अधिक सुपर स्‍टारों के नाम शामिल हैं.


इनमें गुरूदत्‍त, दिलीप कुमार, देवानंद, भारत भूषण, जानी वॉकर, जॉय मुखर्जी, शम्‍मी कपूर, राजेंद्र कुमार, राजेश खन्‍ना, अमिताभ बच्‍चन, धर्मेंद्र, जितेंद्र और ऋषि कपूर सहित लगभग सभी शामिल थे. इस लिस्‍ट का सबसे रोचक नाम है किशोर कुमार का. रफी ने किशोर के लिए भी गाया है. प्रतिद्वंदी होने के बावजूद दोनों एक का आदर करते थे. दोनों ने ही इसका इज़हार भी किया है. रफी साहब ढोलक हो, ड्रम हो या फिर गिटार हो, हर साज के साथ सहज थे और सर्वश्रेष्‍ठ देने में सक्षम भी. ‘नया दौर’ का दीवाना बनाने वाला गीत ‘उड़ें जब-जब जुल्‍फें तेरी’ मुख्‍य रूप से ढोलक की रिदम पर है.


तीसरी मंजि़ल का गीत ‘ओ हसीना ज़ुल्‍फों वाली’ में ड्रम का कमाल है. हम किसी से कम नहीं में ‘चांद मेरा दिल, चांदनी हो तुम’ में गिटार की रिदम है. रफी को वर्सटाईल सिंगर ऐसे ही नहीं कहा जाता. पद्मश्री से नवाजे गए मोहम्‍मद रफी को अनेक बार फिल्‍म  फेयर अवार्ड मिले. उनके गानों की लिस्‍ट देना, यहां संभव नहीं. उन्‍होंने 26 हजार से ज्‍यादा गीत गाए हैं. सोलो भी और ड्वेट भी.


बताते चलें लता से उनका विवाद व्‍यक्तिगत नहीं था. लता चाहती थीं, गायकों को रॉयल्‍टी मिले, जबकि रफी ऐसा नहीं चाहते थे. उन्‍होंने मुख्‍य धारा के गीतों के अलावा गज़ल, भजन, देशभक्ति, शास्‍त्रीय गीत और कव्‍वालियां भी गाई हैं. वर्ष 2017 में गूगल ने उनके जन्‍मदिन पर गूगल डूडल बनाकर उन्‍हें सम्‍मानित किया था. वे शराब के गीत गाते थे तो लगता था कोई नशे में डूब कर गा रहा है और भजन गाएं तो लगता था मानो कोई धर्मप्रेमी सज्‍जन की आवाज है. शास्‍त्रीय संगीत से ओतप्रोत गीत गाते तो लगता शास्‍त्रीय संगीत का पुरोधा गा रहा है.


फिल्‍म दीदारे यार से जुड़ा रफी साहब का एक और किस्‍साएक किस्‍सा और. एक फिल्‍म थी दीदारे यार, जीतेंद्र और ऋषि की फिल्‍म. रफी साहब को इस फिल्‍म में प्रति गाना चार हजार रूपए देना तय हुआ. फिल्‍म लेट हो गई और आखिरी गाना लगभग साढ़े चार बाद रिकार्ड हुआ. जितेन्‍द्र बताते हैं इसमें किशोर कुमार भी गा रहे थे. रिर्काडिंग होने के बाद प्रोडक्‍शन वाला आया और मुझसे बोला रफी साहब को कितना अमाउंट देना है. मैंने कहा उतना ही दो, जितना किशोर को दे रहे हैं. किशोर को बीस हजार देना था, सो उन्‍हें भी बीस हजार दिया गया. थोड़ी देर बाद उनके ब्रदर-इन-लॉ, जो उनके सेकेट्री भी थे, मेरे घर आए.


बोले- रफी साहब आपसे नाराज़ हैं. तत्‍काल फोन मिलाया, पूछा क्‍या बात है. रफी साहब नाराज़ी से पंजाबी में बोले ‘ओए जीते, बहुत पैसे वाला हो गया है.’ उन्‍होंने चार हजार रखे और सोलह हजार वापस कर दिए. ‘ऐसे थे हमारे रफी साहब.’ उनकी गायकी के बारे में जीतेन्‍द्र कहते हैं, कुछ लोग गले से गाते हैं, कुछ दिल से गाते हैं, रफी साहब रूह से गाते थे. मोहम्‍मद रफी संगीत की यूनिवर्सिटी थे जिनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है. उनके जाने के बाद उनकी तरह कई लोगों ने गाने की कोशिश की. रफी भले ही वो ना बन पाए लेकिन उनमें से कुछ ने एक मुकाम जरूर हासिल किया. इनमें मुख्‍य रूप से सोनू निगम, मोहम्‍मद अज़ीज़ और उदित नारायण शामिल हैं.


बकौल धर्मेंन्‍द्र ‘मैं चाहता था ‘बेताब’ के गाने रफी साहब गाएं. लेकिन वो तो जा चुके थे. फिर हमने वैसी ही आवाज़ तलाश की. शब्‍बीर से गवाया, अच्छा गाते हैं.  लेकिन वो क्‍या है .. रफी साहब तो दोबारा पैदा नहीं होंगे.’ कोरोना के चलते इस साल शहर ओर कस्‍बों में वो बैनर नहीं दिख रहे हैं जो हर साल 30 और 31 जुलाई को दिखा करते थे. जिन पर लिखा रहता था ‘एक शाम रफी के नाम.’ कोइ नहीं ये दौर भी गुज़र जाएगा. उनकी बरसी पर उनके गीतों की महफिल हुज़ूम के साथ फिर सजेगी.  यहां रफी साहब की आवाज़ का जादू जगाता गीत भी सुनाई देगा जो पिछले अनेक सालों से हमारे दिलों पर दस्‍तक दे रहा है ‘तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे, तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे.



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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First published: July 31, 2021, 9:15 AM IST
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