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श्रद्धांजलि : विजय आनंद- एक था गोल्‍डी

बेहतरीन प्रोड्यूसर, राइटर, डायरेक्‍टर, एडीटर और फिल्‍म निर्माण के सभी पक्षों की गहरी समझ रखने वाले हरफनमौला विजय आनंद उर्फ गोल्‍डी को आज या‍द किया जाना एक जरूरी उपक्रम है. फिल्‍म तो वो कमाल की बनाते ही थे, सॉन्‍ग पिक्‍चराइजेशन में उन्हें कमाल हासिल था. संगीत की भी उन्‍हें गहरी समझ थी.

Source: News18Hindi Last updated on: February 23, 2021, 4:08 PM IST
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श्रद्धांजलि : विजय आनंद- एक था गोल्‍डी
फ‍िल्‍ममेकर और एक्‍टर व‍िजय आनंद. (फोटो- @VVA__/Twitter)
बडे़ भाई चेतन आनंद 1997 में दुनिया छोड़ चुके थे. दुखी छोटे भाईयों विजय आनंद और देवानंद ने उनकी याद में एक फिल्‍म निर्माण का फैसला किया. फिल्‍म का नाम था, जाना न दिल से दूर. शूटिंग के दौरान एक दिन इमोशनल होकर देव ने विजय आनंद से कहा ‘ गोल्‍डी जल्‍दी-जल्‍दी शूटिंग पूरी कर ले, ऐसा ना हो मैं भी चला जाउं और तेरी फिल्‍म अधूरी रह जाए.’ लेकिन होनी को कुछ और ही मंज़ूर था. देवानंद को तो कुछ नहीं हुआ. अच्‍छे भले शूटिंग करते विजय आनंद को हार्ट अटैक आया और वे इस फानी दुनिया से विदा हो गए. वह मनहूस तारीख थी 23 फरवरी 2004.

बेहतरीन प्रोड्यूसर, राइटर, डायरेक्‍टर, एडीटर और फिल्‍म निर्माण के सभी पक्षों की गहरी समझ रखने वाले हरफनमौला विजय आनंद उर्फ गोल्‍डी को आज या‍द किया जाना एक जरूरी उपक्रम है. उनकी पत्‍नी का नाम सुषमा और उनका एक बेटा वैभव आनंद है. फिल्‍म तो वो कमाल की बनाते ही थे, सॉन्‍ग पिक्‍चराइजेशन में उन्हें कमाल हासिल था. संगीत की भी उन्‍हें गहरी समझ थी. गाने के फिल्‍मांकन के दौरान वो कोरियोग्राफर के साथ हमेशा मौजूद रहते थे, सब कुछ उस पर नहीं छोड़ते थे.

‘जानी मेरा नाम’ में एक गीत था ‘पल भर के लिए कोई हमें प्‍यार कर ले’. हेमा मालिनी ओर देवानंद पर पिक्‍चराइज इस गीत में खिड़कियों का अद्भुत इस्‍तेमाल किया गया. ‘ज्‍वेल थीफ’ याद है. हेड लगाए और सूनी सड़क पर हाथ में मछली मारने का कांटा लिए तनूजा और सहेलियों की कार को दिलकश अंदाज में रोक कर परेशान करते और मस्‍ती में ‘ये दिल ना होता आवारा’ गाते हुए देवानंद आपको याद है.

देव, वहीदा पर फिल्‍माया गया ‘गाइड’ का गाना 'आज फिर जीने की तमन्‍ना है...' मस्‍ती भरे संगीत और लो एंगल ट्रेकिंग शॅाट्स के लिए आज भी याद किया जाता है. गोल्‍डी ने कुतुबमीनार जैसी जगह में खूबसूरत गीत फिल्‍माया ‘दिल का भंवर करे पुकार, प्‍यार का राग सुनो रे’. तेरे घर के सामने फिल्‍म के इस गीत में नूतन और देवानंद थे. जानी मेरा नाम में हेमा, देव पर पिक्‍चराइज गाना 'ओ मेरे राजा' तो अद्भुत ही था. कोई सोच नहीं सकता वहां रोमांटिक मूड का गीत फिल्‍माया गया था. जहां यह फिल्‍माया गया वो जगह थी -नालंदा के प्राचीन विश्‍वविद्यालय के खंडहर. यह जगह बिहार में जहां कोई शूटिंग के लिए उस वक्‍त बिलकुल नहीं जाता था.
गानों के साथ संवादों की खूबसूरत जुगलबंदी भी गोल्‍डी की खास पहचान रही है. इस खूबसूरत गीत में इसे देखा जा सकता है. ‘ज‍िंदगी भी एक नशा है दोस्‍त जब चढ़ता है तो पूछो मत क्‍या आलम रहता है, लेकिन.... जब उतरता है... संवाद खत्‍म होता है और एक आलाप के साथ शुरू होता है. ‘आ..आ.. आ... दिन ढल जाए हाय रात न जाए तू तो न आए तेरी याद सताए....’ ऐसे प्रयोग गोल्‍डी ने खूब किए हैं, ढेर सारे खूबसूरत मधुर और मनभावन गानों के साथ. उनके खूबसूरत गानों की लिस्‍ट में होठों पे ऐसी बात (ज्‍वैल थीफ), ओ मेरे सोना (तीसरी मंजि़ल) और तेरे मेरे सपने (गाइ्रड – सिर्फ तीन दृश्‍यों मे पूरा गाना) जैसे सांग शामिल हैं.
गोल्‍डी को वो मुकाम, वो हैसियत नहीं मिल पाई जिसके वो वास्‍तव में हकदार थे. उनके जीनियस होने की चुगली उनकी उम्र ने 16-17 साल में ही कर दी थी. गोल्‍डी शायद इकलौते ऐसे फिल्‍म राइटर हैं जिन्‍होंने किशोर वय में ही एक फिल्‍म टैक्‍सी ड्राइवर की स्क्रिप्‍ट लिख डाल. जो बाद में केतन आनंद के डायरेक्शन और देवानंद के नवकेतन के बैनर तले बनी. इसके बाद उन्‍होंने फिर एक अद्भुत रिकार्ड बनाया. महज तेईस साल की उम्र में नौ दो ग्‍यारह का पहली बार निर्देशन किया. नवकेतन की इस फिल्‍म में देवानंद ओर कल्‍पना कार्तिक थे.

फिल्‍मी दुनिया को दूर से जानने वाले कह सकते हैं कि विजय आनंद को काम पाने के लिए स्‍ट्रगल नहीं करना पड़ा. लेकिन ये पूरा सच नहीं है. फिल्‍मी दुनिया बहुत क्रूर है. यहां फिल्‍मी बैकग्राउंड के चलते काम तो मिल सकता है लेकिन यहां टिकता वही है जो अपने आपको साबित करता है. विजय आनंद ने अपने आपको न सिर्फ साबित किया बल्कि बताया कि वो इस फील्‍ड के असली ‘मास्‍टर’ हैं. उनकी क्षमता अद्भुत और असीमित है, इसे साबित करने करती फिल्‍म गाइड. गाइड बताती है गोल्‍डी अपने समय से आगे की सोच रखने वाले स्‍क्रीन राइटर ओर निर्देशक हैं. आप कल्‍पना कीजिए एक 28-29 साल के नौजवान की जो समय से आगे जाकर ‘लिव इन रिलेशन’ जैसे बोल्‍ड विषय पर बेहद संजीदा, बेहद खूबसूरत और बाक्‍स आफिस पर धमाल मचाने वाली फिल्‍म की रचना करता है. पति को छोड़कर प्रेमी के साथ लिव इन में रहने वाली हीरोइन और हीरो के प्रति भारतीय दर्शकों की सुहानुभूति हासिल करना आसान काम नहीं था. लेकिन गोल्‍डी ने इसे पूरी योजना के साथ सहज बनाया.मालूम हो कि यह फिल्‍म आर. के. नारायण के उपन्‍यास पर बनी थी. शुरूआत में इस फिल्‍म का इसके बोल्‍ड विषय के चलते आलोचना भी झेलना पड़ी थी. लेकिन इसके प्रोडक्‍शन कंट्रोलर यश जौहर की दृढ़ता के चलते ना सिर्फ रिलीज हुई बल्कि इसने व्‍यावसायिक सफलता भी हासिल की. गोल्‍डी ने न सिर्फ उपन्‍यास का अंत बदला बल्कि इसमें अनेक परिवर्तन किए ताकि इसे भारतीय दर्शक के लिए ग्राह्य बनाया जा सके.

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देव आनंद और राजकपूर केे साथ व‍िजय आनंद. (Photo- @BombayBasanti/Twitter)


दिलचस्‍प यह भी है कि गाइड दो चरणों में बनाई गई. एक Pearl S. Buck द्वारा लिखित और Tad Denielwsky द्वारा निर्देशित अंग्रेजी में बनी दूसरी गोल्डी के निर्देशन में. अंग्रेजी फिल्‍म और हिंदी फिल्‍म दोनों के कलाकार एक ही थे. निर्देशन के लिए यह फिल्‍म गोल्‍डी को रिबाउंड होकर मिली. पहले इसे गोल्‍डी निर्देशित करने वाले थे, बाद में बड़े भाई केतन मेहता का नाम आया, लेकिन हकीकत फिल्‍म में बिजी होने के कारण वो हट गए. बाद में राज खोसला का नाम चला. लेकिन अंतत: फिल्‍म दोबारा गोल्‍डी के हिस्‍से में आई. गोल्‍डी ने भी इसे अनिच्‍छा से ही बनाना शुरू किया. लेकिन वो कहते हैं न अच्‍छा काम करने वाला अच्‍छा ही करेगा. अनिच्‍छा से शुरू हुई ‘गाइड’ गोल्‍डी की श्रेष्‍ठ और सफल फिल्‍म साबित हुई.

फिल्‍म के सभी गीतों ने लोकप्रियता के रिकार्ड भी तोड़े. एस.डी.बर्मन द्वारा रचा गया दिलचस्‍प संगीत भी इस फिल्‍म को अलग मुकाम देता है. ये अलग बात है कि इसके संगीत को लोकप्रिय होने के बाद भी साल का फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार नहीं मिला. गाइड के बाद विजय आनंद बॉलीवुड में एक बड़ी आशा बनकर उभरे उनकी पहचान एक ऐसे लेखक निर्देशक की बन गई जो गंभीर ओर उत्‍तेजक फिल्‍में बनाने में तो माहिर है ही, वो बाक्‍स ऑफिस पर पैसे बरसवाने में भी सक्षम है. पैसे फिल्‍मी दुनिया की सबसे कमजोर कड़ी है, होना भी चाहिए, करोड़ों की लागत जो लगती है. इसीलिए हम इसे यहां दोहरा सकते हैं कि गोल्‍डी को अपने भाईयों से सहयोग यूं ही नहीं मिला था बल्कि उनकी काबिलियत के कारण मिला था.

इसका एक और सबूत अगले साल ही सामने आया. जब 1966 में गोल्‍डी ने ‘तीसरी मंजि़ल’ का निर्देशन किया. यह फिल्‍म उन्‍हें नासिर हुसैन ने दी. उस नासिर हुसैन जो खुद एक बढि़या निर्माता, निर्देशक और लेखक थे. गाइड जैसी संवेदनशील फिल्‍म के बाद सस्‍पेंस-थ्रिलर वाली फार्मूला फिल्‍म. गाइड से बिलकुल उलट. गोल्‍डी ने अपने आपको यहां भी साबित किया और बताया कि फिल्‍म बनाना एक अलग तरह का आर्ट है जिसमें उनका मुकाबला नहीं किया जा सकता. ‘तीसरी मंजि़ल’ के गाने और उनका छायांकन भी कमाल का था. याद कीजिए ‘ ओ हसीना ज़ुल्‍फों वाली जाने जहां’. इस फिल्‍म से राहुल देव बर्मन को अलग पहचान मिली थी. इस फिल्‍म को नासिर हुसैन ने लिखा था.

1970 में आई जॉनी मेरा नाम. यह भी तीसरी मंजिल की तरह नवकेतन की नहीं बाहर की फिल्‍म थी, जिसे विजय आनंद ने निर्देशित किया था. इस सुपर डुपर हिट में विजय आनंद ने एडीटिंग भी की थी और एडिटिंग का फिल्‍मफेयर का अवार्ड भी जीता था. फिल्‍म के निर्माता गुलशन कुमार थे. दो भाईयों के बिछड़ने, उनमें से एक के बुरा और एक के अच्‍छा बनने, जैसे साधारण विषय पर बनी इस फिल्‍म के स्‍क्रीनप्‍ले ने इसे रोचक और मनोरंजन से भरपूर बनाया. जिसे विजय आनंद ने के.आर.नारायण के साथ मिलकल लिखा था.

यह जानना रोचक होगा कि इसी साल राजकपूर की फिल्‍म मेरा नाम जोकर भी रिलीज़ हुई थी. उनके दिल से नज़दीकी रिश्‍ता रखने वाली यह फिल्‍म बाक्‍स आफिस पर नहीं चली. इससे जुड़ा एक मजेदार किस्‍सा है. मेरा नाम जोकर और जॉनी मेरा नाम मिलते जुलते शीर्षक थे. जानी चली, जोकर नहीं. फिर 1973 में राजकपूर ने बनाई ‘बॉबी’ ओर नवकेतन ने बनाई ‘छुपा रूस्‍तम’. बिजनेस ‘रूस्‍तम’ ने भी ठीक किया पर ‘बॉबी’ सुपर डुपर हिट हुई. इसी दौरान एक पार्टी में देवानंद या विजय आनंद किसी एक से राजकपूर मिले. पैग लगाने के बाद राजकपूर उनके पास पहुंचे और बोले ‘जोकर के सामने जॉनी बनाई थी, इस बार बॉबी के सामने टॅाबी क्‍यों नहीं बनाई. ये किस्‍सा सुना हुआ है इसे हल्‍के फुल्‍के अंदाज़ में ही ग्रहण करें प्‍लीज़. तेरे घर के सामने, काला बाजार, नौ दो ग्‍यारह भी गोल्‍डी के खाते की बढि़या फिल्‍मों में शुमार होती हैं. तेरे घर के सामने लाजवाब फिल्‍म थी.

ज्‍वैल थीफ तो कमाल की फिल्‍म थी ही. सस्‍पेंस थ्रिलर फिल्‍म की दुनिया में इतने बरस बीतने के बाद भी ‘ज्‍वैल थीफ’ का नाम बहुत आदर से लिया जाता है. जबकि इस दौर में इस ज़ोनर में भरपूर ओर अच्‍छा काम हो रहा है. इसे गोल्‍डी और नारायण की जोड़ी ने लिखा और विजय आनंद ने निर्देशित किया. देवानंद के साथ वैजयंती माला, तनूजा और अशोक कुमार की सुंदर जुगलबंदी थी. अशोक कुमार ने इसमें बिलकुल अलग तरह का किरदार निभाया.

हरफनमौला गोल्‍डी ने फिल्‍मों के अभिनेता के रूप में भी हाथ साफ किए हैं. केतन आनंद की हकीकत में उनका महत्‍वपूर्ण रोल था. ‘कोरा कागज’ में उन्‍होंने जया बच्‍चन के साथ काम किया और ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ में नूतन और आशा के साथ अभिनय किया. विडंबना है कि गोल्‍डी की इन दौनों अभिनेत्रियों जया और नूतन को फिल्‍म फेयर अवार्ड मिले. जबकि लेखक निर्देशक और संपादक के लिए अनेक अवार्ड जीतने वाले गोल्‍डी को अभिनेता के रूप में प्रशंसा नहीं मिल पाई.

विजय आनंद ने डीडी नेशनल के लिए बने एक सीरियल तहकीकात में जासूस सैम डिसिल्‍वा का रोल निभाया. उनके सहायक गोपीचंद का पात्र सौरभ शुक्‍ला ने अदा किया था. इसका निर्देशन विजय आनंद, शेखर कपूर और करण राजदान ने किया था. 1994-95 में रिलीज यह सीरियल बहुत पसंद किया गया था.

तो ये थी जीनियस और फिल्‍मी फील्‍ड के हर फन में माहिर निर्माता, निर्देशक, लेखक, एडीटर, और एक्‍टर विजय आनंद उर्फ गोल्‍डी की बेहद संक्षिप्‍त जीवन यात्रा. किसी एक आलेख में उनके काम को समेटा जाए, मुश्किल है, बहुत ही मुश्किल. किताब के पन्‍ने भी कम पड़ेंगे उनके लिए. अलविदा गोल्‍डी.

 (डिसक्लेमर: ये लेखक के न‍िजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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First published: February 23, 2021, 4:08 PM IST
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