World Tourism Day 2022: जो दिखता है, वो बिकता है

बॉलीवुड का मूल मंत्र ही ये है 'जो दिखता है, वो बिकता है.' पहले स्‍टार बिकते थे, फिर कंटेंट भी बिकना शुरू हुआ और अब लोकेशंस भी. 'लोकेशंस' बिक तो पहले से रही है और फिल्‍मकार इस सच से पहले भी वाकिफ थे. सरकार के ध्‍यान में भी ये बात थी, लेकिन इसको बेहतर तरीके से भुनाने का खयाल 'सरकारों' को जरा देर से आया, अब तो उनका यह 'शौक' चरम पर है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 27, 2022, 10:45 am IST
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World Tourism Day 2022: जो दिखता है, वो बिकता है
हिंदी फिल्‍मों ने बताए हैं देश दुनिया की बेहतरीन टूरिस्‍ट प्‍लेस

पति और बच्‍चे अपना बैग पैक करके घूमने जाने को तैयार बैठे हैं. लेकिन ‘परिवार की हाईकमान’ लाख रूपए के सवाल का जवाब तलाशने में उलझी हुई है ‘इस बार कहां जाएं?’ ऐसी मम्मियों और बीवियों के लिए फिल्‍में बड़ा सहारा हैं. कैसे? खूबसूरत डेस्‍टीनेशन हंट करने का जिम्‍मा अब फिल्‍म मेकर ने अपने कंधों पर ले लिया है. ‘लोकेशंस’ अब फिल्‍म की स्‍टार कास्‍ट और कंटेंट की तरह फिल्‍म के हिट होने का नुस्‍खा बन गई हैं. इसके चलते फिल्‍में न सिर्फ घूमने के शौकीन पेरेंट्स को टूरिस्‍ट डेस्टिनेशन का पता बताती हैं, बल्कि उन बीवियों को घूमने के लिए उकसाती भी हैं, जिनके पति अलग-अलग कारणों से ‘बाहर घूमने’ जाने से कतराते हैं. ऐसी फिल्‍मों को सबूत के तौर पर हम आगे पेश करेंगे.


पहले ‘वर्ल्‍ड टूरिज्‍म डे’ पर ‘फिल्‍म टूरिज्‍म’ को लेकर कुछ जरूरी बातें. फिल्‍म निर्माताओं का खूबसूरत लोकेशंस पर शूटिंग का शौक नया नहीं है. क्‍योंकि ग्‍लैमर से भरी हुई ये दुनिया दिखावे की बहुत शौकीन है. यहां का मूल मंत्र ही ये है ‘जो दिखता है, वो बिकता है.’ पहले स्‍टार बिकते थे, फिर कंटेंट भी बिकना शुरू हुआ और अब लोकेशंस भी. ‘लोकेशंस’ बिक तो पहले से रही है और फिल्‍मकार इस सच से पहले भी वाकिफ थे. सरकार के ध्‍यान में भी ये बात थी, लेकिन इसको बेहतर तरीके से भुनाने का ख्‍याल ‘सरकारों’ को जरा देर से आया, अब तो उनका यह ‘शौक’ चरम पर है.


‘फिल्‍म टूरिज्‍म’ की महत्‍ता को इस बात से समझा जा सकता है कि राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कारों की सूची में ‘मोस्‍ट फिल्‍म फ्रेंडली स्‍टेट’ जैसे अवार्ड भी शामिल हो चुके हैं. 68 वें नेशनल फिल्‍म अवार्ड में साल 2020 का यह पुरस्‍कार मध्‍य प्रदेश को मिला है. 2017 में भी मिला था. सो यहां की बात करना तो बनता है. मध्‍य प्रदेश और खासतौर पर भोपाल तथा इसके आसपास का इलाका शूटिंग के लिए बॉलीवुड के साथ-साथ हॉलीवुड को भी खूब लुभा रहा है. कारण ढ़ेर सारे हैं. भोपाल की खूबसूरती तो बेमिसाल है ही पूरे प्रदेश में सुंदर लोकेशन प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं. केंद्र में स्थित प्रांत होने के कारण पूरे भारत से हवाई, ट्रेन और सड़क मार्ग की उत्‍कृष्‍ट कनेक्‍टिविटी है.


भोपाल की ही बात करें. किसी आर्टिस्‍ट को अगर मुंबई से भोपाल आना है तो वो अलसुबह मुंबई से रवाना होकर आठ बजे यहां पहुंच सकता है. अपना काम निपटाकर, रात दस बजे उड़कर, अगली तारीख लगने से पहले मुंबई वापस पहुंच सकता है. इसके अलावा यह प्रदेश थिएटर हब है सो लोकल में अच्‍छे एक्‍टर भी मिल जाते हैं. शासन का सहयोगी रवैया भी मध्‍य प्रदेश को मोस्‍ट फिल्‍म फ्रेंडली स्‍टेट बनाता है.

डिपार्टमेंट ऑफ टूरिज्‍म और कल्‍चर के प्रिंसिपल सेक्रेटरी तथा मध्‍य प्रदेश टूरिज्म बोर्ड के मेनेजिंग डायरेक्‍टर शिव शेखर शुक्‍ला कहते हैं ‘मध्‍य प्रदेश देश का ऐसा पहला राज्‍य है जिसने फिल्‍म नीति के अंतर्गत दिए जाने वाले अनुदान में ओटीटी परियोजनाओं, टीवी सीरियल्‍स और डॉक्‍यूमेंट्रीज़ को भी शामिल किया है. यह पहला ऐसा स्‍टेट है जहां शूटिंग की परमिशन लोक सेवा गारंटी योजना के अंतर्गत लाई गई है. कलेक्‍टर को शूटिंग की परमिशन के आवेदन का निराकरण पंद्रह दिन के अंदर करना पड़ता है.’


फिल्‍मों की लोकेशंस पर लौटते हैं. ऋत्विक रोशन, फरहान खान, अभय देओल, कैटरीना कैफ और कल्कि कोचलिन की मूवी ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’ अन्‍य कारणों के अलावा अपने खूबसूरत लोकेशंस के चलते भी याद की जाती है. फिल्‍म स्‍पेन के खूबसूरत शहरों की सैर कराती है और वहां के टमाटर वाले ‘लॉ टोमाटिना फेस्‍टीवल’ का एक्‍सपीरियंस भी करवाती है. स्‍पेन की यह जर्नी तीनों दोस्‍तों की लाइफ को चेंज कर देती है. कंगना रनौत को ‘क्‍वीन’ का संबोधन इसी नाम वाली फिल्‍म से मिला. वह शादी टूटने के बाद हनीमून के लिए अकेले ही विदेश यात्रा पर निकल पड़ती है. वो रोमांटिक सिटी पेरिस और अमस्‍टेरडम की जर्नी करती है. ‘चलो दिल्‍ली’ मुंबई से दिल्‍ली की सुंदर यात्रा का अनुभव कराती है. ‘ये जवानी है दीवानी’ रणबीर कपूर-दीपिका की मूवी है, जो मनाली, पेरिस और उदयपुर की खूबसूरत वादियों की सैर करवाती है. ‘जब वी मेट’ की कहानी एक रेल यात्रा से शुरू होती है. बाद में शिमला की खूबसूरत लोकेशंस और पंजाब की सुंदरता से दो चार करवाती है. करीना-शाहिद की जोड़ी वाली ये फिल्‍म खूबसूरती से फिल्‍माए मधुर गानों के लिए भी याद की जाती है. ‘पीकू’ दिल्‍ली से कोलकाता की रोड ट्रिप का एक्‍सपीरियंस कराती है. मूवी कोलकाता के लोकेशंस को भी एक्‍सप्‍लोर करती है.



‘दिल चाहता है’, ‘जिंदगी..’ की ही तरह तीन दोस्‍तों की कहानी है जो ‘गोवा’ की खूबसूरती को अलग अंदाज़ में सामने लाती है. इसने फिर से गोवा की मार्केट वैल्‍यू बढ़ाई. ‘तमाशा’ (दीपिका-रणबीर कपूर) अनयूज़ुअल डेस्‍टीनेशन की ब्‍यूटी को एक्‍सप्‍लोर करती है. जिनमें कोस्‍टारिका का नाम ऊपर है. इसे शिमला, दिल्ली, गुरगांव और टोक्‍यों में भी फिल्‍माया गया था. शाहरूख-काजोल की ‘दिलवाले दु‍लहनिया ले जाएंगे’ (1995) को स्विटज़रलैंड, इंगलैंड के कई शहरों में फिल्‍माया गया था. ‘हो गया है तुझको’ सांग स्विटज़रलैंड में ही फिल्‍माया गया.


याद कीजिए पुराने दिन. उन दिनों फिल्‍म वालों को लोकेशंस के नाम पर स्विटज़रलैंण्‍ड और कश्‍मीर ही याद आते थे. वैसे कश्‍मीर की वादियों में बहुत सारी फिल्‍में शूट हुई हैं. ‘कश्‍मीर की कली’ से लेकर और भी ढेर सारी. ‘बचना ए हसीनों’ (रणबीर कपूर, दीपिका) की शूटिंग भी खूबसूरत फॉरेन लोकेशंस पर हुई. इसमें कुछ हिस्‍से ‘दु‍लहनिया’ से प्रेरित थे. जिन्‍हें अमृतसर और स्विटज़रलैंड के समान स्‍थानों पर फिल्‍माया गया. इस फिल्‍म के ‘खुदा जाने’ सांग में इटली के अलग-अलग शहरों के बहुत ही खूबसूरत नज़ारे हैं. जिनमें वेनिस, अलबेरोबेलो, सांता सेसारिया टर्म, मैटिनाटा, अपुलिया, नेपल्‍स और कैपरी शामिल थे. इस गाने के पिक्‍चराईज़ेशन में कैमरा वर्क भी कमाल का था. इस गाने में रणबीर ने सफेद कास्‍ट्यूम पहनी है कुछ जगह पीछे का बैकग्राउंड पथरीला भूरे रंग का है. जो कंट्रास नहीं होने के बावजूद खूबसूरत लगता है.


अब तो डिजि़टलाइज़ कैमरों का दौर है लेकिन पहले (खुदा जाने से भी पहले) पुराने कैमरों में व्‍हाईट बै‍लेंसिंग करना पड़ती थी. कैमरे का जि़क्र इसलिए क्‍योंकि खूबसूरत लोकेशंस दर्शकों के कान में कैमरामेन के बेहतरीन होने की चुगली जरूर करती हैं. जबकि कई बार वास्‍तव में ऐसा होता नहीं है. खूबसूरत लोकेशंस कमजोर कैमरामेन के भी श्रेष्‍ठ होने का भ्रम पैदा कर देती हैं. जैसे कुछ कैमरामेन लोकेशंस के सहारे ‘अच्‍छा’ होने का भ्रम पैदा करने में सफल होते हैं वैसे ही इसका रिवर्स भी होता है. कुछ कैमरामेन अपने कैमरा वर्क से ठीक-ठाक लोकेशंस को बहुत ज्‍यादा खूबसूरत दिखाने में सफल होते हैं. इसका सटीक उदाहरण तो नहीं है लेकिन ‘दिल तो पागल है’ का माधुरी-शाहरूख का गाना ‘ढोलना’ सांग यहां याद आता है.


सुंदर लोकेशंस और उससे भी शानदार कैमरावर्क के लिए याद किया जाने वाला एक सांग है. ‘तू छरेरी धूप है…. तू ही जुनून’, धूम 3 का यह गीत आमिर और कटरीना पर फिल्‍माया गया था. ‘कारवां’ (1971) की आशा पारेख-जितेन्‍द्र की मूवी थी. जो मुंबई से बंगलौर की यात्रा दिखाने वाली थ्रिलर थी. जबकि नई ‘कारवां’ (2018) कोची, ऊटी, और बैंगलौर की सुंदर लोकेशंस पर फिल्‍माई गई थी. ‘चैन्‍नई एक्‍सप्रेस’ शाहरूख-दीपिका की फिल्‍म है, जिसमें शाहरूख गलती से एक डॉन की बेटी दीपिका के साथ मुंबई रामेश्‍वरम की यात्रा करता है.


पर्यटन की, टूरिज्‍म की बात हो तो एक ही शेर याद आता है. इसका यूज़ बार-बार, हजार बार यूज हो चुका है लेकिन फिर भी नया ही लगता है. ख्‍वाजा मीर दर्द कहते हैं –


सैर कर दुनिया की ग़ाफिल जिंदगानी फिर कहां,

जि़ंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहां.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
शकील खान

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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First published: September 27, 2022, 10:45 am IST
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