महात्मा गांधी की राजनीतिक और सामाजिक सोच का आइना है उनकी किताब 'हिंद स्वराज'

चालीस साल की उम्र में मोहनदास करमचंद गांधी ने 'हिंद स्वराज' की रचना की. 1909 में लिखे गए इस बीजक में भारत के भविष्य को संवारने के सारे मंत्र निहित हैं. आज एक शताब्दी से अधिक वर्ष बाद भी यह किताब उतनी ही उपयोगी है जितना आजादी की लड़ाई के दौरान थी इसी किताब में महात्मा गांधी ने अपनी बाकी जिंदगी की योजना को सूत्र रूप में लिख दिया था.

Source: News18Hindi Last updated on: October 1, 2020, 11:24 AM IST
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महात्मा गांधी की राजनीतिक और सामाजिक सोच का आइना है उनकी किताब 'हिंद स्वराज'
महात्मा गांधी की राजनीतिक और सामाजिक सोच का आइना है उनकी किताब 'हिंद स्वराज'
20वीं सदी के उथल पुथल भरे भारत के इतिहास में जिन पांच किताबों ने राजनीति और समाज को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, उनमें महात्मा गांधी की किताब 'हिंद स्वराज' का नाम सरे-फेहरिस्त है. इसके अलावा जिन चार किताबों ने भारत के राजनीतिक सामाजिक चिंतन को प्रभावित किया उनके नाम हैं, भीमराव अंबेडकर की 'जाति का विनाश' मार्क्‍स और एंगेल्स की 'कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो', ज्योतिराव फुले की 'गुलामगिरी' और वीडी सावरकर की किताब 'हिंदुत्व'. अंबेडकर, मार्क्‍स और सावरकर के बारे में तो उनकी राजनीतिक विचारधारा के उत्तराधिकारियों की वजह से हिंदी क्षेत्रों में जानकारी है. क्योंकि मार्क्‍स का दर्शन कम्युनिस्ट पार्टी का, सावरकर का दर्शन बीजेपी का और अंबेडकर का दर्शन बहुजन समाज पार्टी का आधार है लेकिन 19 वीं सदी के क्रांतिकारी चितंक और वर्णव्यवस्था को गंभीर चुनौती देने वाले ज्योतिराव फुले के बारे में जानकारी की कमी है. हालांकि सच्चाई यह है कि डॉ आंबेडकर भी ज्योतिराव गोविंदराव फुले की क्रांतिकारी सोच से प्रभावित थे.

ज्योतिबा फुले का जन्म पुणे में हुआ था और उनके पिता पेशवा के राज्य में बहुत सम्माननीय व्यक्ति थे. लेकिन ज्योतिराव फुले अलग किस्म के इंसान थे. उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए जो काम किया उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती. महात्मा फुले हमेशा ही गरीबों के पक्षधर बने रहे. आज से डेढ़ सौर साल से अधिक समय पहले महात्मा गांधी का जन्म को सौराष्ट्र में हुआ था. परिवार की महत्वाकांक्षाएं वही थीं जो तत्कालीन गुजरात के संपन्न परिवारों में होती थीं. गांधी जी वकालत पढ़ने इंगलैंड गए और जब लौटकर आए तो अच्छे पैसे की उम्मीद में घर वालों ने दक्षिण अफ्रीका में बसे गुजराती व्यापारियों का मुकदमा लड़ने के लिए भेज दिया. दक्षिण अफ्रीका में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जिसकी वजह से सब कुछ बदल गया.

एटार्नी एम.के. गांधी की अजेय यात्रा की शुरुआत वहीं हुई और उनका पाथेय था सत्याग्रह. सत्याग्रह के इस महान योद्धा ने अकेले ही अपनी यात्रा शुरू की. लोग साथ जुड़ते गए और परिवर्तन के व्याकरण की रचना उनके हर काम से होती रही. इस यात्रा में उनके जीवन में बहुत सारे मुकाम आए. गांधीजी का हर पड़ाव भावी इतिहास को दिशा देने की क्षमता रखता है.


चालीस साल की उम्र में मोहनदास करमचंद गांधी ने 'हिंद स्वराज' की रचना की. 1909 में लिखे गए इस बीजक में भारत के भविष्य को संवारने के सारे मंत्र निहित हैं. आज एक शताब्दी से अधिक वर्ष बाद भी यह किताब उतनी ही उपयोगी है जितना आजादी की लड़ाई के दौरान थी इसी किताब में महात्मा गांधी ने अपनी बाकी जिंदगी की योजना को सूत्र रूप में लिख दिया था. उनका उद्देश्य सिर्फ देश की सेवा करने का और सत्य की खोज करने का था. उन्होंने भूमिका में ही लिख दिया था कि अगर उनके विचार गलत साबित हों, तो उन्हें पकड़ कर रखना जरूरी नहीं है. लेकिन अगर वे सच साबित हों तो दूसरे लोग भी उनके मुताबिक आचरण करें. उनकी भावना थी कि ऐसा करना देश के भले के लिए होगा.
अपने प्रकाशन के समय से ही हिंद स्वराज की देश निर्माण और सामाजिक उत्थान के कार्यकर्ताओं के लिए एक बीजक की तरह इस्तेमाल हो रही है. इसमें बताए गए सिद्धांतों को विकसित करके ही 1920 और 1930 के महात्मा गांधी के आंदोलनों का संचालन किया गया था. 1921 में यह सिद्धांत सफल नहीं हुए थे लेकिन 1930 में पूरी तरह सफल रहे. हिंद स्वराज के आलोचक भी बहुत सारे थे. उनमें सबसे बड़ा नाम तो गोपाल कृष्ण गोखले का ही है. गोखले जी 1912 में जब दक्षिण अफ्रीका गए तो उन्होंने मूल गुजराती किताब का अंग्रेजी अनुवाद देखा था. उन्हें उसका मजमून इतना अनगढ़ लगा कि उन्होंने भविष्यवाणी कर दी कि गांधी जी एक साल भारत में रहने के बाद खुद ही उस पुस्तक को नकार देंगे. महादेव भाई देसाई ने लिखा है कि गोखले जी की वह भविष्यवाणी सही नहीं निकली. 1921 में किताब फिर छपी और महात्मा गांधी ने पुस्तक के बारे में लिखा कि "वह द्वेष धर्म की जगह प्रेम धर्म सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती है, पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है. उसमें से मैंने सिर्फ एक शब्द रद्द किया है. उसे छोड़कर कुछ भी फेरबदल नहीं किया है.

यह किताब 1909 में लिखी गई थी. इसमें जो मैंने मान्यता प्रकट की है, वह आज पहले से ज्यादा मजबूत बनी है. "महादेव भाई देसाई ने किताब की 1938 की भूमिका में लिखा है कि 1938 में भी गांधी जी को कुछ जगहों पर भाषा बदलने के सिवा और कुछ फेरबदल करने जैसा नहीं लगा. हिंद स्वराज एक ऐसे ईमानदार व्यक्ति की शुरुआती रचना है, जिसे आगे चलकर भारत की आजादी को सुनिश्चित करना था और सत्य और अहिंसा जैसे दो औजार मानवता को देना था जो भविष्य की सभ्यताओं को संभाल सकेंगे. किताब की 1921 की प्रस्तावना में महात्मा गांधी ने साफ लिख दिया था कि ऐसा न मान लें कि इस किताब में जिस स्वराज की तस्वीर मैंने खड़ी की है, वैसा स्वराज्य कायम करने के लिए मेरी कोशिशें चल रही हैं, मैं जानता हूं कि अभी हिंदुस्तान उसके लिए तैयार नहीं है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि आज की मेरी सामूहिक प्रवृत्ति का ध्येय तो हिंदुस्तान की प्रजा की इच्छा के मुताबिक पालियामेंटरी ढंग का स्वराज्य पाना है.

इसका मतलब यह हुआ कि 1921 तक महात्मा गांधी इस बात के लिए मन बना चुके थे कि भारत को संसदीय ढंग का स्वराज्य हासिल करना है. इसमें दो राय नहीं कि 1909 वाली किताब में महात्मा गांधी ने ब्रिटेन की पार्लियामेंट की बांझ और बेसवा कहा था (हिंद स्वराज पृष्ठ 13). लेकिन यह संदर्भ ब्रिटेन की पार्लियामेंट के उस वक्त के नकारापन के हवाले से कहा गया था. बाद के पृष्ठों में पार्लियामेंट के असली कर्तव्य के बारे में बात करके महात्मा जी ने बात को सही परिप्रेक्ष्य में रख दिया था और 1921 में तो साफ कह दिया था कि उनका प्रयास संसदीय लोकतंत्र की तर्ज पर आजादी हासिल करने का है. यहां महात्मा गांधी के 30 अप्रैल 1933 के हरिजन बंधु के अंक में लिखे गए लेख का उल्लेख करना जरूरी है. लिखा है, सत्य की अपनी खोज में मैंने बहुत से विचारों को छोड़ा है और अनेक नई बातें सीखा भी हूं. उमर में भले ही मैं बूढ़ा हो गया हूं, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरा आतंरिक विकास होना बंद हो गया है. इसलिए जब किसी पाठक को मेरे दो लेखों में विरोध जैसा लगे, तब अगर उसे मेरी समझदारी में विश्वास हो तो वह एक ही विषय पर लिखे हुए दो लेखों में से मेरे बाद के लेख को प्रमाणभूत माने. इसका मतलब यह हुआ कि महात्मा जी ने अपने विचार में किसी सांचाबद्ध सोच को स्थान देने की सारी संभावनाओं को शुरू में ही समाप्त कर दिया था. उन्होंने सुनिश्चित कर लिया था कि उनका दर्शन एक सतत विकासमान विचार है और उसे हमेशा मानवता के हित में संदर्भ के साथ विकसित किया जाता रहेगा.
महात्मा गांधी के पूरे दर्शन में दो बातें महत्वपूर्ण हैं. सत्य के प्रति आग्रह और अहिंसा में पूर्ण विश्वास. चौरी चौरा की हिंसक घटनाओं के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन को समाप्त कर दिया था. इस फैसले का विरोध हर स्तर पर हुआ लेकिन गांधी जी किसी भी कीमत पर अपने आंदोलन को हिंसक नहीं होने देना चाहते थे. उनका कहना था कि अनुचित साधन का इस्तेमाल करके जो कुछ भी हासिल होगा, वह सही नहीं है.


महात्मा गांधी के दर्शन में साधन की पवित्रता को बहुत महत्व दिया गया है और यहां हिंद स्वराज का स्थाई भाव है. लिखते हैं कि अगर कोई यह कहता है कि साध्य और साधन के बीच में कोई संबंध नहीं है तो यह बहुत बड़ी भूल है. यह तो धतूरे का पौधा लगाकर मोगरे के फूल की इच्छा करने जैसा हुआ. हिंद स्वराज में लिखा है कि साधन बीज है और साध्य पेड़ है इसलिए जितना संबंध बीज और पेड़ के बीच में है, उतना ही साधन और साध्य के बीच में है. हिंद स्वराज में गांधी जी ने साधन की पवित्रता को बहुत ही विस्तार से समझाया है. उनका हर काम जीवन भर इसी बुनियादी सोच पर चलता रहा है और बिना खड्ग, बिना ढाल भारत की आजादी को सुनिश्चित करने में सफल रहे.

हिंद स्वराज में महात्मा गांधी ने भारत की भावी राजनीति की बुनियाद के रूप में हिंदू और मुसलमान की एकता को स्थापित कर दिया था. उन्होंने साफ कह दिया कि, अगर हिंदू मानें कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है. मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें तो उसे भी सपना ही समझिए. मुझे झगड़ा न करना हो, तो मुसलमान क्या करेगा? और मुसलमान को झगड़ा न करना हो, तो मैं क्या कर सकता हूं? हवा में हाथ उठाने वाले का हाथ उखड़ जाता है. सब अपने धर्म का स्वरूप समझकर उससे चिपके रहें और शास्त्रियों व मुल्लाओं को बीच में न आने दें, तो झगड़े का मुंह हमेशा के लिए काला रहेगा. (हिंद स्वराज, पृष्ठ 31 और 35) यानी अगर स्वार्थी तत्वों की बात न मानकर इस देश के हिंदू मुसलमान अपने धर्म की मूल भावनाओं को समझें और पालन करें तो आज भी देश में अमन चैन कायम रह सकता है और प्रगति का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है.

इस तरह हम देखते है कि आज से ठीक सौ वर्ष पहले राजनीतिक और सामाजिक आचरण का जो मंत्र महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज के रूप में लिखा था, वह आने वाली सभ्यताओं को अमन चैन की जिंदगी जीने की प्रेरणा देता रहेगा.
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First published: October 1, 2020, 11:24 AM IST
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