राजस्थान में मध्यप्रदेश जैसा करिश्मा नहीं हुआ, सचिन पायलट की राजनीति की दिशा तय नहीं

अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) के भारी पड़ने के बाद सचिन पायलट (Sachin Pilot) को कमजोर करने के लिए कांग्रेस ने सारे घोड़े खोल दिए हैं. सचिन पायलट को उम्मीद थी कि कांग्रेस के नेताओं से उनको समर्थन मिलेगा, लेकिन कोई ख़ास नेता उनके साथ नहीं आया.

Source: News18Hindi Last updated on: July 15, 2020, 5:38 PM IST
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राजस्थान में मध्यप्रदेश जैसा करिश्मा नहीं हुआ, सचिन पायलट की राजनीति की दिशा तय नहीं
बीजेपी में उनकी सम्मानजनक पोजीशन बनने की संभावना बहुत कम थी. अगर वे ज्योतिरादित्य सिंधिया की बराबरी कर रहे थे तो गलत कर रहे थे. (फाइल फोटो)
राजस्थान (Rajasthan) की राजनीति में अनिश्चित्तता का दौर जारी है. अभी तक की स्थिति यह है कि बागी नेता, सचिन पायलट को अपनी टीम को संभालकर रखना ख़ासा कठिन काम लग रहा है. बीजेपी (BJP) से उनको कोई ख़ास मदद नहीं मिल रही है. बीजेपी ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है कि उसके दरवाजे सबके लिए खुले हैं. यानी अगर कोई भी पार्टी में भर्ती होना चाहे तो उसका स्वागत है. कोई भी राजनीतिक पार्टी किसी का भी अपनी पार्टी में स्वागत करती रहती है, क्योंकि जनता के समर्थन के बल पर सत्ता में आने वाली पार्टी को यह दावा तो करना ही पड़ेगा. लगता है कि बीजेपी के आला नेताओं की समझ में बात आ गयी है कि राजस्थान की सरकार को गिरा पाना सचिन पायलट (Sachin Pilot) के बूते की बात नहीं है. इसलिए उनको साथ लेकर वे कुछ ख़ास हासिल करने वाले नहीं हैं.

यह अलग बात है कि अशोक गहलोत और सचिन पायलट के झगड़े में बीजेपी को बड़ा फायदा हुआ है. सचिन पायलट के पांच साल के परिश्रम के बाद कांग्रेस वहां इतनी मज़बूत हो गयी थी कि राज्य की बीजेपी की सरकार को हरा दिया था. उस जीत को सचिन पायलट के दोस्तों ने केवल उनकी जीत के रूप में पेश करना शुरू कर दिया लेकिन सच्ची बात यह है कि वह जीत उनके कठिन परिश्रम के साथ- साथ कांग्रेस पार्टी के संगठन और वसुंधरा सरकार की दस साल की कमियों के कारण भी हुयी थी. कांग्रेस में रिवाज़ है कि जब पार्टी कहीं चुनाव हार जाती है तो उसका ज़िम्मा स्थानीय पार्टी को दिया जाता है और जीत का सेहरा इंदिरा गांधी के परिवार को मिलता है. उसी फार्मूले के तहत राजस्थान में पार्टी की जीत का श्रेय राहुल गांधी ने लिया और सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने के अपने वायदे को लागू करने की कोशिश शुरू कर दी. लेकिन सोनिया गांधी और दिल्ली में उनके आसपास रहने वाले कांग्रेसी नेताओं ने दखल दिया और अपने पुराने जांचे परखे साथी अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनवा दिया. उसी दिन दोनों नेताओं में झगड़े के बीज बो दिए गए थे. आज उस झगड़े का फल पब्लिक डोमेन में आया है. डेढ़ साल बाद सचिन पायलट की नाराजगी ऐसी बगावत का रूप ले चुकी है जिससे कांग्रेस को राजस्थान में भारी नुकसान हो सकता है.

शायद यही सोच सचिन पायलट की भी थी
मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार के पतन में पूर्व कांग्रेसी ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका और बीजेपी से जो लाभ उनको मिला है, वह कांग्रेस से नाराज़ किसी भी ताकतवर नेता के लिए बहुत ही उत्साहवर्धक माना जा रहा है. ज्योतिरादित्य सिंधिया को बीजेपी में शामिल होने से बहुत ही अधिक फायदा हुआ है. वे लोकसभा की अपनी सीट हार चुके थे, आज राज्यसभा में हैं. तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ उनको हाशिये पर डाल चुके थे. सरकार के किसी भी फैसले को प्रभावित कर पाने की उनकी कोई हैसियत नहीं रह गयी थी. आज बीजेपी की शिवराज सिंह चौहान सरकार में वे एक ताक़तवर केन्द्रीय नेता हैं. सरकार में अपने ख़ास लोगों को न केवल जगह दिलवाई, बल्कि अपने लोगों को महत्वपूर्ण विभाग भी दिलवा दिया. शायद यही सोच सचिन पायलट की भी थी.
बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने सचिन पायलट से मिलना ठीक नहीं समझा
अशोक गहलोत से नाराज़ होकर जब सचिन पायलट दिल्ली आये तो उनकी ज्योतिरादित्य सिंधिया से हुई मुलाक़ात से सत्ता के गालियारों में यह अंदाज़ तो लग गया था कि सिंधिया उनकी मदद कर रहे हैं लेकिन बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने सचिन पायलट से मिलना ठीक नहीं समझा. बड़े नेताओं में उनकी मुलाकात केवल ओम माथुर से ही हो पाई. लेकिन उनके साथ जो 25 विधायक थे उनको उम्मीद थी कि सचिन पायलट बीजेपी की मदद से राजस्थान में सत्ता पलट देंगे और उन लोगों को राजस्थान और कर्नाटक के बागियों की तरह ही मंत्री पद मिल जाएगा. लेकिन यह एक मुश्किल संभावना थी. कर्नाटक और मध्य प्रदेश में जो लोग पार्टी छोड़ रहे थे वे मंत्री पद ही छोड़ रहे थे और मंत्री बने रहना ही उनका मकसद था. बीजेपी ने उन सबको बीएस येदुरप्पा और शिवराज सिंह चौहान की सरकारों में मंत्री बना दिया. जो उनके पास था वही या उससे भी बेहतर विभाग भी मिल गया . मध्यप्रदेश में उनके नेता, सिंधिया जो किसी भी सदन में नहीं थे, उनको राज्यसभा की सदस्यता मिल गयी. लेकिन राजस्थान में मामला थोड़ा अलग था.

सचिन पायलट उप मुख्यमंत्री और पार्टी के अध्यक्ष पहले से ही थेवहां तो बगावत के नेता सचिन पायलट उप मुख्यमंत्री और पार्टी के अध्यक्ष पहले से ही थे . उनको तो मुख्यमंत्री की कुर्सी चाहिए थी. यह असंभव था. पूर्वोत्तर राज्यों की बात छोड़ दें तो जहां बीजेपी के प्रभाव वाले राज्य हैं, वहां पार्टी बाहर से आये लोगों को साथ तो ले लेती है, लेकिन उनको राज्य की सरकार की कमान कभी नहीं सौंपती. इसका मतलब यह हुआ कि अगर सचिन पायलट जोड़-तोड़ करके गहलोत सरकार को अपदस्थ भी कर लेते तो उनको बीजेपी की तरफ से मुख्यमंत्री बनाये जाने की कोई संभावना नहीं थी. वसुंधरा राजे वहां हैं ही. पार्टी गजेंद्र सिंह शेखावत को भी बड़ी ज़िम्मेदारी के लिए तैयार कर रही है. दूसरी बात यह थी कि सचिन पायलट की विश्वसनीयता भी बीजेपी की नजर में अभी इतनी नहीं है कि उनको बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी दी जा सके. पार्टी में यह भी विचार किया जा रहा है कि जिस कांग्रेस में उनके परिवार को इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी की विशेष कृपा थी उसी पार्टी को वे तोड़ने के लिए उद्यत हैं तो उनको बीजेपी जैसी अनुशासन वाली पार्टी में असुविधा हो सकती थी.

इंदिरा गांधी ने सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट को लोकसभा का टिकट दिया. राजीव गांधी ने मंत्री बनाया. जब पीवी नरसिम्हाराव की सरकार बनी तो सोनिया गांधी ने उनको कैबिनेट मंत्री बनवाया. डॉ मनमोहन सिंह की सरकार में राहुल गांधी और सोनिया गांधी की कृपा से सचिन पायलट भी मंत्री रहे. एक राज्य का पूरा ज़िम्मा उनको दे दिया. उपमुख्यमंत्री बनवाया. जब वे उस परिवार को छोड़ सकते हैं तो बीजेपी से तो उनका रिश्ता एक विरोधी का ही रहा है. राजस्थान विधानसभा के चुनावों में उन्होंने बीजेपी पर बहुत भी ज़बर्दस्त हमला किया था. राज्य के बहुत सारे नेता मानते हैं कि सचिन पायलट के कारण ही उनको विधानसभा में हार का मुंह देखना पडा था.

उनकी सम्मानजनक पोजीशन बनने की संभावना बहुत कम थी
इसलिए बीजेपी में उनकी सम्मानजनक पोजीशन बनने की संभावना बहुत कम थी. अगर वे ज्योतिरादित्य सिंधिया की बराबरी कर रहे थे तो गलत कर रहे थे. सिंधिया परिवार से बीजेपी, जनसंघ और आरएसएस का बहुत ही प्रगाढ़ रिश्ता रहा है. 1949 से लेकर अब तक उनका परिवार संघ के बड़े नेताओं से जुड़ा रहा है. जबकि सचिन पायलट के पिता और स्वयं वे आरएसएस/बीजेपी के घोर विरोधी रहे हैं. ऐसी हालत में बीजेपी में उनको वह मुकाम नहीं मिल सकता जो उनको कांग्रेस में मिला हुआ है .

अशोक गहलोत के भारी पड़ने के बाद सचिन पायलट को कमजोर करने के लिए कांग्रेस ने सारे घोड़े खोल दिए हैं. सचिन पायलट को उम्मीद थी कि कांग्रेस के नेताओं से उनको समर्थन मिलेगा लेकिन कोई ख़ास नेता उनके साथ नहीं आया. प्रिया दत्त, संजय झा और संजय निरुपम ने उनके पक्ष में ट्वीट तो किया लेकिन उनकी अपनी ही हैसियत कांग्रेस में फिलहाल कुछ नहीं है. कांग्रेस के ताक़तवर लोग उनके खिलाफ हैं . राजस्थान विधानसभा के स्पीकर सीपी जोशी ने उनके साथियों से जवाब तलब कर लिया है. अब उनके साथियों में भी यह डर समा गया है कि कहीं विधानसभा की सदस्यता ही न ख़त्म हो जाए. क्योंकि अगर सदस्यता ख़तम हुई तो उपचुनाव जीतना बिलकुल आसान नहीं होगा, क्योंकि बीजेपी में शामिल होने की संभावना भी शून्य के बराबर हो गयी है.

मैं बीजेपी में शामिल नहीं हो रहा हूं
सचिन पायलट ने खुद ही पीटी आई को बता दिया है कि “ राजस्थान के कुछ नेता इस बात को हवा दे रहे हैं कि मैं बीजेपी में शामिल हो रहा हूं. लेकिन मैं बीजेपी में नहीं जा रहा हूं. मैंने राजस्थान में कांग्रेस को सत्ता वापस में लाने के लिए कठिन परिश्रम किया है “ इस बयान से ऐसा लगता है कि अभी उनको कांग्रेस से उम्मीद बची हुई है. लेकिन एक बात तो तय है कि उनको कांग्रेस में वह मुकाम नहीं मिलने वाला है जो पहले था. दूसरी पार्टी बनाने की बात सचिन पायलट ने कभी नहीं की है, लेकिन दिल्ली में बैठे राजनीतिक विश्लेषक इस संभावना की बात भी कर रहे हैं. अगर ऐसी नौबत आई तो जो विधायक उनके साथ हैं उनमें से ज्यादातर को गहलोत वापस कर लेंगे क्योंकि नई पार्टी के बल पर चुनाव जीत पाना बहुत ही मुश्किल है.

बीजेपी में सम्मानजनक तरीके से व्यवस्थित हो गए
ऐसी हालत में राजस्थान की तस्वीर अभी साफ तो बिलकुल नहीं कही जा सकती, लेकिन एक बात भरोसे के साथ कही जा सकती है कि राजस्थान में वह नहीं हो सका जो मध्यप्रदेश में संभव हो गया था. मध्य प्रदेश में कांग्रेस को डुबोने वाले नेता तो बीजेपी में सम्मानजनक तरीके से व्यवस्थित हो गए, लेकिन राजस्थान में कांग्रेस की सरकार को अपदस्थ करने की मुहिम में जुटे पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और कांग्रेस विधायक अभी अधर में हैं, उनके राजनीतिक जीवन में अस्थिरता का राज है .
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First published: July 15, 2020, 2:14 PM IST
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