हमें एक देश के रूप में 26/11 के गुनहगारों को कभी नहीं भूलना चाहिए

आईएसआई ने आतंक फ़ैलाने वालों के कई गिरोह बना रखे हैं. उनमें से जैश-ए-मुहम्मद और लश्करे तय्यबा प्रमुख हैं. ये दोनों ही संगठन संयुक्त राष्ट्र और स्वयं पाकिस्तान सहित कई देशों की उस सूची में दर्ज हैं जहां वैश्विक आतंकवादी संगठनों के नाम हैं. पाकिस्तान इन्हीं संगठनों के सहारे भारत में आतंकी हमले करता रहता है.

Source: News18Hindi Last updated on: November 26, 2020, 12:28 PM IST
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हमें एक देश के रूप में 26/11 के गुनहगारों को कभी नहीं भूलना चाहिए
26 नवंबर 2008 को मुंबई आतंकी हमले में करीब 166 लोग मारे गए थे.
इस बात में कोई दो राय नहीं है कि पाकिस्तान एक नाकाम राष्ट्र है. उसकी सारी संस्थाएं तबाह हो चुकी हैं, नीति निर्धारण का सारा काम फ़ौज की एक शाखा,आईएसआई के हवाले कर दिया गया है. आईएसआई के पास इतना फ़ौजी साजो-सामान नहीं है कि वह सैनिक तरीके से किसी देश को अर्दब में ले सके. उस कमी को पूरा करने के लिए पाकिस्तानी डीप स्टेट ने धार्मिक तरीकों के सहारे पड़ोसी देश की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश शुरू कर दी है. आईएसआई ने आतंक फ़ैलाने वालों के कई गिरोह बना रखे हैं. उनमें से जैश-ए-मुहम्मद और लश्करे तय्यबा प्रमुख हैं. ये दोनों ही संगठन संयुक्त राष्ट्र और स्वयं पाकिस्तान सहित कई  देशों की उस सूची में दर्ज हैं जहां वैश्विक आतंकवादी संगठनों के नाम हैं. इन्हीं संगठनों के सहारे वह भारत में अक्सर आतंकी हमले करता रहता है.

जैश-ए-मुहम्मद का सरगना मसूद अज़हर और लश्करे तय्यबा का करता धरता हाफ़िज़ सईद है. जब पाकिस्तान मजबूरी वश इनके संगठनों को कागजी तौर पर प्रतिबंधित कर देता है तो ये लोग अपने आतंक के तामझाम का कोई और नाम रख लेते हैं लेकिन धंधा वही चलता रहता है. आतंक के इसी सरंजाम के अगुवा हाफ़िज़ सईद ने 26 नवम्बर 2008 को मुंबई के कई ठिकानों पर आत्मघाती हमले करवाए थे. उसी तारीख को हर साल कुछ न कुछ करने की पाकिस्तानी फौज की कोशिश को भारतीय सुरक्षा तंत्र अच्छी तरह जानता है. इस बार भी ऐसी कोशिश होने वाली थी. उसके लिए उसी तैयारी के साथ आत्मघाती दस्ता भेजा गया था लेकिन चौकन्ना सुरक्षा तंत्र ने उन आत्मघाती आतंकियों को नगरोटा में मार गिराया. हो सकता है कि इस तरह के और भी मोड्यूल कहीं और हों लेकिन यह सच है कि पाकिस्तान के फ़ौजी तंत्र को यह आभास देना होता है कि वह भारत को अपने दबाव में रख रहा है जिससे भारत में उसके सक्रिय लोगों का मनोबल बढ़ा रहे.

पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान के पास ऐसे बहुत सारे तरीके हैं जिससे वह भारत में अशांति का माहौल बनाने की कोशिश करता है. भारत के बेरोजगार, अशिक्षित और गरीब मुस्लिमों को कट्टर बनाने की कोशिश भी एक तरीका है. कई संगठन ग्रामीण क्षेत्रों में मुस्लिम युवाओं के घर जाकर उन्हें याद दिलाते हैं कि मुसलमानों ने साढ़े छह सौ साल इस देश में राज किया है. वे बरगलाते हैं कि 1947 में अंग्रेजों को सत्ता मुसलमानों को ही वापस देनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने मुस्लिम लीग और उसके नेता जिन्ना को केवल पाकिस्तान देकर टरका दिया.

इस बार की अपने गांव की यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश में लखनऊ के पूरब के तीन चार जिलों में जाने का अवसर मिला. वहां एक अजीब परिवर्तन देखने को मिला. वहां हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जो परंपरागत बोलचाल की संस्कृति थी, वह विलुप्त हो रही है. यह बात मामूली तौर पर गौर करने पर भी दिख जाती है. गांवों में मुस्लिम आइडेंटिटी को रेखांकित करने के बारे में बड़ा अभियान चल रहा है. गरीब से गरीब मुसलमान के घर पर भी एक झंडा लगा हुआ है जिसको वे लोग इस्लामी झंडा कहते हैं. साटन के कपडे पर बने ये झंडे खासे महंगे हैं.
जिन मुस्लिम परिवारों से मैंने बात की उनको उन झंडों की कीमत के बारे में कोई पता नहीं है. कुछ परिवारों में तो रोटी पानी का इंतजाम करने के लिए खासी जद्दोजहद करनी पड़ती है लेकिन महंगा झंडा उनकी झोपड़ी पर लगा हुआ है. पूछने पर पता लगता है कि जान पहचान के किसी आदमी के कहने पर वह झंडा लगा हुआ है, वह झंडा भी वही दे गया था. जब थोड़ा कुरेद कर बातचीत की जाए तो परतें खुलनी शुरू हो जाती हैं. उनके गिले शिकवे अजीब हैं. एक ने तो कहा कि इस देश में हमारी ही हुकूमत थी. अंग्रेजों को धोखा देकर गांधी जी ने हमारी हुकूमत को हिन्दुओं को दिलवा दी. हिन्दुओं ने हिन्दू गरीबों के लिए नौकरी में आरक्षण कर दिया और मुसलमानों को गरीबी में झोंक दिया. इन्हीं भावनाओं की बुनियाद पर बहुत बड़े पैमाने पर मुसलमानों के बीच भारत की सरकार और भारतीय नेताओं के प्रति नफरत के भाव पैदा किए जा रहे हैं.

सरकार को और समाज को समझना चाहिए कि पाकिस्तानी आईएसआई और वहां का कठमुल्ला तंत्र इन्हीं निराश, फटेहाल और गरीब नौजवानों में अपने बन्दे फिट कर रहा होता है. लेकिन सरकारें बिलकुल बेखबर हैं. लव जेहाद के नाम पर ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रहे आरएसएस के संगठन भी इस समस्या से अनजान दिखते हैं. अगर इस प्रवृत्ति को न रोका गया तो पाकिस्तानी आईएसआई और आतंक की खेती करने वाले गिरोहों के सरगना मसूद अज़हर और हाफ़िज़ सईद जैसे लोगों को हिन्दुस्तान में वारदात करने के लिए पाकिस्तान से आतंकी भेजने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.

भारत में जिन वर्गों को वे भारत के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं ,वे ही भारत के खिलाफ खड़े हो जाएंगे. यह स्थिति कश्मीर में धीरे धीरे विकसित हुई है. जिन कश्मीरियों ने भारत में विलय को कश्मीर की आजादी माना था, उन्हीं कश्मीरियों की तीसरी पीढ़ी के लोग आज भारत से अलग होने की बात कर रहे हैं. भारत के कश्मीरी नौजवान आज पाकिस्तानी आतंकियों मसूद अज़हर और हाफ़िज़ सईद के संगठनों के कमांडर बन रहे हैं. इसलिए सरकार को चाहिए कि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में भारतीय राष्ट्र और समाज से अलग थलग पड़े रहे मुस्लिम परिवारों की समस्याओं को समझें और पाकिस्तानी आतंकवादियों के मंसूबों को नाकाम करें. क्योंकि हमें एक देश के रूप में 26/11 के गुनहगारों को कभी नहीं भूलना चाहिए. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
शेष नारायण सिंह

शेष नारायण सिंहवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार और कॉलमिस्ट. देश और विदेश के राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है. कई अखबारों के लिए कॉलम लिखते रहे हैं.

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First published: November 26, 2020, 12:23 PM IST
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