100 से अधिक NGO 'फर्जीवाड़ा' करते पकड़े गए, हो सकते हैं ब्लैक लिस्ट

केंद्र सरकार प्रति वर्ष 25 लाख रुपए या उससे अधिक का सरकारी अनुदान लेकर हिसाब नहीं देने, सरकारी अनुदान की राशि का दुरुपयोग करने वाले 130 एनजीओ (गैर-सरकारी संस्थाओं) को काली-सूची में डालने का मन बना रही है. इस सूची में सबसे अधिक एनजीओ महाराष्ट्र से हैं. 

Source: News18Hindi Last updated on: October 26, 2020, 12:56 PM IST
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100 से अधिक NGO 'फर्जीवाड़ा' करते पकड़े गए, हो सकते हैं ब्लैक लिस्ट
देश में 32 लाख 97 हजार एनजीओ हैं.
केंद्र सरकार प्रति वर्ष 25 लाख रुपए या उससे अधिक का सरकारी अनुदान लेकर हिसाब नहीं देने, सरकारी अनुदान की राशि का दुरुपयोग करने और कर्मचारियों के शोषण से जुड़ी जैसी गतिविधियों में शामिल देश के 130 एनजीओ (गैर-सरकारी संस्थाओं) को काली-सूची में डालने का मन बना रही है. इस सूची में सबसे अधिक एनजीओ महाराष्ट्र से हैं.

जानकारी के अनुसार, महाराष्ट्र में सरकारी अनुदान से चलने वाली सबसे अधिक संस्थाएं नशा-मुक्ति, वरिष्ठ नागरिक और आश्रितों के लिए कल्याण आदि मुद्दों पर काम कर रही हैं. किंतु, आईआईटी, दिल्ली विश्वविद्यालय से संबंधित कुछ कॉलेज और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस, मुंबई के अध्यापक तथा विद्यार्थियों के दल द्वारा किए गए सर्वेक्षण के दौरान जब भारत में इस श्रेणी की करीब सात 100 संस्थाओं का मौका-मुआयना किया गया तो कई चौंकाने वाले निष्कर्ष सामने आए. गहन निरीक्षण में खुलासा हुआ कि प्रति वर्ष लाखों रुपए का सरकारी अनुदान पाने वाले कई एनजीओ फाइलों पर चल रहे हैं. वहीं, कई संस्थाओं के पास कार्य करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा और न्यूनतम कर्मचारी तक नहीं हैं.

देश भर की ऐसी 130 संस्थाओं की सूची में सबसे अधिक संख्या महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाली संस्थाओं की हैं. इसके अलावा, कर्नाटक और राजस्थान में करीब एक-एक दर्जन ऐसी संस्थाएं केंद्र सरकार के रडार पर हैं. इसके बाद सूची में उत्तर-प्रदेश, मध्य-प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा में कार्य करने वाली संस्थाएं शामिल हैं.


वहीं, 2017 में सीबीआई की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई रिपोर्ट के मुताबिक देश में 32 लाख 97 हजार एनजीओ हैं. इनमें महज तीन लाख सात हजार ने सरकार को अपने खर्च का लेखा-जोखा दिया है. 32 लाख से अधिक एनजीओ में अकेले महाराष्ट्र में पांच लाख से अधिक हैं. इनमें ज्यादातर एनजीओ ग्रामीण अंचल में पंजीकृत हैं.
इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों के बाद सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय ने ऐसे एनजीओ पर नकेल कसने का निर्णय लिया है. केंद्र का सामाजिक न्याय मंत्रालय ही सरकारी राशि पर अनियमितता के मामले में कई संस्थाओं को जल्दी ही काली-सूची में रखने पर भी विचार कर रहा है. हालांकि, मंत्रालय ने इन संस्थाओं पर कार्रवाई करने से पहले सूची में शामिल किसी भी एनजीओ का नाम सार्वजनिक करने से मना कर दिया है.

यदि इस पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि में जाएं तो यह मुख्य रुप से सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय का प्रभाव है जिसमें न्यायालय ने वर्ष 2017 में मोदी सरकार को सरकारी अनुदान पाने वाले एनजीओ के लिए संवैधानिक व्यवस्था बनाने पर विचार करने के बारे में कहा था. इसके पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सरकारी अनुदान से संचालित सभी एनजीओ के संदर्भ में केंद्र सरकार को निर्देश देते हुए कहा था कि इस श्रेणी में आने वाली यदि कोई गैर-सरकारी संस्था प्राप्त सरकारी अनुदान की अनियमितताओं में लिप्त पायी गईं तो न सिर्फ ऐसी संस्था का अनुदान रोक दिया जाए बल्कि उसके विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज करते हुए सख्त कार्रवाई भी की जाए. साथ ही, सर्वोच्च न्यायलय ने केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या देश भर में लाखों एनजीओ आमतौर पर सरकारी अनुदान का दुरुपयोग करते हैं और क्या इस बारे में सरकार को कोई चिंता नहीं है?

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय ऐसे समय आया था जब एनजीओ पर भी जनता के पैसों का हिसाब देने के लिए मांग जोर पकड़ रही थी. साथ ही, भ्रष्टाचार की शिकायतें आम होने से सामाजिक सेवा के क्षेत्र की साख और विश्वसनीयता भी लगातार घटती जा रही थी. इसलिए, सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश उन एनजीओ के मामले में था जिन्हें सरकार से अनुदान मिलता है, लेकिन उन पर निगरानी रखने के लिए कोई तंत्र विकसित नहीं है.
इसके बाद केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल डिफेंस की मार्गदर्शिका के अंतर्गत प्रति वर्ष 25 लाख रुपए या उससे अधिक का सरकारी अनुदान पाने वाले सभी राज्यों के सैकड़ों एनजीओ के कार्यों का मूल्यांकन कराने का निर्णय लिया. इसके तहत कुछ विश्वसनीय संस्थाओं के प्रतिनिधियों की देखरेख में प्रत्यक्ष सर्वेक्षण के लिए दल गठित किए गए. इन दलों द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि करीब 130 संस्थाएं नियमों का उल्लंघन कर रही हैं और उनमें से कई संस्थाओं के पास अपनी संस्था से जुड़े बुनियादी दस्तावेज नहीं हैं. वहीं, सर्वेक्षण के निष्कर्षों में कई एनजीओ ऐसे पाए गए जिनके नाम तक स्थानीय लोगों ने नहीं सुने.

केंद्र सरकार द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार नशा-मुक्ति पर कार्य करने वाली कुछ संस्थाओं से जब परामर्श देने वाले चिकित्सकों से जुड़ी सूची मांगी गई तो उनके पास ऐसा कोई डेटा उपलब्ध नहीं था. वहीं, हर साल सरकारी सहायता से चलने वाले कुछ एनजीओ अपने केंद्र का स्थायी पता भी नहीं बता सके. इसी तरह, कुछ एनजीओ ने सरकारी अनुदान की राशि प्राप्त करने के कई महीनों बाद तक कार्य शुरू नहीं किया था. जबकि, इसी श्रेणी के कुछ एनजीओ सरकार से वित्त-पोषित होने के बावजूद अपनी सेवाओं के लिए आम जनता से भारी शुल्क वसूल रहे थे.

सर्वेक्षण से प्राप्त निष्कर्षों के अनुसार इस प्रकार की संदेहास्पद संस्थाओं में सबसे अधिक 336 संस्थाओं ने नशा-मुक्ति पर कार्य करने के मुद्दे पर सरकारी अनुदान लिया था. इसी तरह, 253 संस्थाओं ने वरिष्ठ नागरिकों की सेवा और 100 संस्थाओं ने दलित आदि वंचित समुदाय के कल्याण के नाम पर सरकार से अनुदान लिया था.


सर्वोच्च न्यायालय सरकारी अनुदान प्राप्त करने वाले एनजीओ की कार्य-प्रणाली में पारदर्शिता को लेकर पिछले वर्ष सितंबर में भी एक महत्वपूर्ण आदेश दे चुका है. शीर्ष न्यायालय कई याचिकाओं की सुनवाई के दौरान यह कह चुका है कि सरकार से सीधे या रियायत के तौर पर परोक्ष वित्तीय मदद पाने वाले स्कूल, कॉलेज और अस्पताल जैसी संस्थाएं भी सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत सूचना देने के लिए बाध्य हैं. साथ ही, शीर्ष न्यायालय ने सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत स्कूल और कॉलेज संचालित करने वाली विभिन्न सोसाइटियों को सरकार से कई करोड़ रुपए प्राप्त करने के आधार पर उन्हें सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित किया है. न्यायालय ने अपने आदेश में यह बात भी जोड़ी कि कोई एनजीओ सरकारी स्वामित्व या नियंत्रण में नहीं होने और सरकारी अनुदान का एक बड़ा हिस्सा या 50 प्रतिशत से कम पाने के बावजूद सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आएगा. आधार यही है कि उसने सरकार से उल्लेखनीय अनुदान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से प्राप्त किया है.

अंततः इस पूरे प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने जिस तरह का रुख अपनाया है उससे एक बात साफ है कि सरकारी अनुदान से संचालित हर एनजीओ को खर्च का ब्यौरा देना पड़ेगा और इस मामले में वह अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकता है. (डिसक्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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First published: October 26, 2020, 12:56 PM IST
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