एक सरकारी स्कूल बना बच्चों और परिजनों के संबंधों का सेतु, आदिवासियों की बस्ती में यूं आया बदलाव

इस स्कूल में इस तरह की गतिविधियों का क्रियान्वयन जून 2018 से शुरू है. यहां प्रधानाध्यापक सहित पांच शिक्षक-शिक्षिकाएं और 110 बच्चे हैं. लगभग डेढ़ हजार की जनसंख्या वाले आदिवासी बहुल मुरबाड में मजदूर और छोटे किसान परिवार हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: September 21, 2020, 10:13 AM IST
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एक सरकारी स्कूल बना बच्चों और परिजनों के संबंधों का सेतु, आदिवासियों की बस्ती में यूं आया बदलाव
कक्षा में बच्चे, परिजन और शिक्षक साथ-साथ
महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से सटा है ठाणे. ठाणे जिला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर तहसील मुरबाड के अंतर्गत जिला परिषद मराठी प्राथमिक स्कूल-टोकावडे के अनेक मजदूर परिवार के बच्चों की दिनचर्या धीरे-धीरे बदल रही है. अब बच्चे सुबह सोने से उठने के बाद उनके अपने परिजनों को 'नमस्ते' या 'गुड मॉर्निंग' बोल रहे हैं. बच्चे विशेषकर परिवार के वयस्क सदस्यों के जीवन के बारे में चर्चा कर रहे हैं. ऐसा संभव हो रहा है शिक्षक गणेश राऊत के विशेष प्रयासों के कारण.

इस स्कूल के शिक्षक गणेश राऊत बताते हैं कि उन्होंने आधुनिक शिक्षण पद्धति पर आधारित और मूल्यों को बढ़ावा देने वाली एक पहल के अंतर्गत कई तरह की गतिविधियां आयोजित कीं. इसके तहत खास तौर से 'मैं और मेरी क्षमता' तथा 'मैं और मेरी जिम्मेदारी' भागों से जुड़ी तरह-तरह की गतिविधियों का ज्यादातर बच्चों पर अच्छा प्रभाव पड़ता दिखाई दे रहा है. इसके अलावा, गृह-कार्य से जुड़ी अनेक गतिविधियों से बच्चे और परिजन परस्पर एक-दूसरे को अच्छी तरह समझने की कोशिश कर रहे हैं.

बता दें इस स्कूल में इस तरह की गतिविधियों का क्रियान्वयन जून 2018 से शुरू है. यहां प्रधानाध्यापक सहित पांच शिक्षक-शिक्षिकाएं और 110 बच्चे हैं. लगभग डेढ़ हजार की जनसंख्या वाले आदिवासी बहुल मुरबाड में मजदूर और छोटे किसान परिवार हैं.

पहले की तुलना में क्या बदला
गणेश राऊत अपना अनुभव साझा करते हुए कहते हैं कि पहले सुबह काम पर जाने के दौरान परिजन भी बच्चों पर कम ध्यान देते थे. सामान्यत: परिजन बच्चों से पढ़ाई के बारे में ज्यादा बात नहीं करते थे. कारण, आदिवासी मजदूर परिवारों के लिए रोजीरोटी पहली प्राथमिकता होती है. इसलिए, नियमित रूप से परिजन और बच्चों के बीच स्कूल से संबंधित बातचीत नहीं हो पाती थी.

गणेश राऊत बताते हैं, 'ज्यादातर घर वाले आज की तरह खुद बच्चों को स्कूल जाने के लिए तैयार नहीं करते थे. न वे खुद बच्चों के बस्ते में टिफिन रखते थे. फिर, बच्चों को स्कूल लेकर आने वाले परिजनों की संख्या न के बराबर थी.'

इस तरह पहली बाधा हुई पारइस स्कूल में अनेक बच्चों की पढ़ाई में रूचि न होने के कारण शिक्षक को किसी तरह का परिवर्तन लाना मुश्किल लग रहा था.

इसी स्कूल की शिक्षिका आरती राऊत कहती हैं कि बच्चों के व्यवहार को बदलने के लिए कई अतिरिक्त प्रयास किए गए, तो ऐसा भी नहीं है. उनके अनुसार, 'कुछ अतिरिक्त सत्रों को सप्ताह में दो से तीन बार व्यवस्थित आयोजित करने से स्वाभाविक तौर पर बच्चों के मन में कक्षा के प्रति रूचि जागी. इन सत्रों में गतिविधियों के माध्यम से मनोरंजनपूर्ण तरीके से बच्चों में मूल्यों को आत्मसात कराया जाता था. इस कारण बच्चों के साथ शिक्षकों के संबंध सहज हुए. फिर, बच्चे आपस में एक-दूसरे के अच्छे दोस्त बने. इसी तरह, कई बच्चे अपने विकलांग सहपाठियों के प्रति भी आदर जताने लगे.'

गृह-कार्यों से परिजनों में आई यह भावना
शिक्षक गणेश राऊत द्वारा ईजाद की कई गतिविधियों में बच्चों को उनके परिजनों के साथ गृह-कार्य करने होते हैं. इससे परिजनों के मन में यह जिज्ञासा जागी कि उनके बच्चे स्कूल में दिन-भर क्या-क्या करते हैं.

इस बारे में एक परिजन दिनेश कोयते कहते हैं, 'बच्चे हमसे हमारे काम के बारे में पूछते थे. बच्चे कहते थे कि हम कितना जरुरी काम करते हैं. वे समझने लगे कि हमारे काम से पूरा घर चलता है. ऐसे हमें भी पता चला कि स्कूल में बच्चों को ये सब बाते भी बताई जा रही हैं.'

स्कूल में आयोजित विभिन्न गतिविधियों में शामिल छात्र


नए शिक्षण से आया नया दृष्टिकोण
गणेश राऊत का अनुभव है कि विभिन्न गतिविधियों के जरिए मूल्यों पर आधारित शिक्षण की नई पद्धति के कारण बच्चे और उनके परिजन शिक्षा के प्रति लगातार जागरूक हो रहे हैं. अब परिजनों के लिए आयोजित बैठकों में पहले से अधिक संख्या और भागीदारिता देखी जा सकती है.

इस बारे में एक अन्य परिजन अनिल डेसले कहते हैं, 'पहले यदि बच्चों को स्कूल नहीं जाना होता था तो वे शिक्षक को बताते भी नहीं थे. पर, अब हम खुद शिक्षक के पास जाकर पहले ही बता देते हैं कि हमारा बच्चा किस कारण से किस दिन स्कूल नहीं आ सकेगा.'

परिवर्तन का प्रयास जारी है
दूसरी तरफ, गणेश राऊत द्वारा कई नई गतिविधियों के सत्रों के जरिए बच्चों को और अधिक जिम्मेदार बनाने का प्रयास कर रहे हैं.

वे स्पष्ट करते हुए कहते हैं, 'बच्चे उनकी अपनी कक्षा के स्तर के अनुरूप जिम्मेदारियों को समझ रहे हैं. उदाहरण के लिए, कक्षा दूसरी की तुलना में तीसरी का बच्चा उसके अपने परिवार और आसपास की दुनिया के बारे में ज्यादा जान और समझ रहा है.'

अंत में, कक्षा तीसरी की निधि घोलप कहती हैं, 'पहले मुझे लगता था कि मेरे परिवार का मतलब मम्मी-पापा ही हैं. अब पता चला कि चाचा-चाची मेरे परिवार के हैं. उनके घर रहने वाले बच्चे मेरे भाई-बहन हैं. और मेरे घर रहने वाली बिल्ली भी मेरा परिवार है.'
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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First published: September 21, 2020, 10:13 AM IST
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