एक सरकारी शिक्षिका ने स्कूल की बच्चियों के साथ मिलकर असल जिंदगी पर बनाई फिल्म

एक सच्ची कहानी से प्रेरित होकर सरकारी शिक्षिका ने स्कूल की बच्चियों के साथ मिलकर बाल-विवाह के विरुद्ध 25 मिनट की मराठी भाषा में शॉर्ट फिल्म बनाई है. इससे पहले और इसी के साथ इस स्कूल की बच्चियों द्वारा बालिका-शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर लघु-नाटक भी तैयार किए जा रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: September 14, 2020, 12:26 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
एक सरकारी शिक्षिका ने स्कूल की बच्चियों के साथ मिलकर असल जिंदगी पर बनाई फिल्म
इस फिल्म की विशेषता है कि यह जीरो बजट फिल्म है.
एक आदिवासी बहुल गांव में स्कूल आने वाली कई लड़कियां कभी 'पहले घर के काम, फिर पढ़ाई' पर जोर देती थीं. वे अपने लिए खास महत्वाकांक्षाएं भी नहीं पालती थीं. लेकिन, धीरे-धीरे इन्हीं लड़कियों की मानसिकता बदल रही है. वे अब शिक्षिका से लेकर डॉक्टर, इंस्पेक्टर, कलक्टर और पायलट बनने के सपने देख रही हैं. इसका असर स्कूल में पढ़ रहीं बच्चियों के परिजनों पर भी होता दिख रहा है. इस बदलाव की प्रमुख सूत्रधार हैं स्कूल की शिक्षिका सुरेखा अहिरे.

शिक्षिका सुरेखा अहिरे इसे उनके स्कूल में जून 2016 से लैंगिक समानता और संवेदनशीलता पर आधारित लगातार किए जा रहे प्रयासों का परिणाम मानती हैं. वे कहती हैं कि पहले कई तरह की गतिविधियों में एक या दो लड़कियां ही सक्रिय रहती थीं. लेकिन, उनके द्वारा किए जा रहे प्रयासों और नवीन शिक्षण पद्धति के कारण अब अनेक लड़कियां समूह में सक्रिय नजर आ रही हैं. यही वजह है कि शिक्षिका के निर्देशन में लड़कियों के एक समूह ने 'गाठ पदराची' नामक शॉर्ट फिल्म भी बनाई है.

बात हो रही है नासिक से लगभग 30 किलोमीटर दूर दिंडोरी तहसील के अंतर्गत जिला परिषद मराठी प्राथमिक स्कूल चाचडगाव में कुल छह शिक्षक-शिक्षिकाओं सहित 154 बच्चे हैं, जिनमें 69 लड़कियां हैं. बता दें कि ढाई हजार की जनसंख्या वाले इस गांव में अधिकतर मजदूर परिवार हैं.

फिल्म निर्माण से पहले तैयार की सोच
सुरेखा अहिरे बताती हैं कि लकड़ियों की नई सोच तैयार करने के लिए उन्होंने लैंगिक समानता से संबंधित कई गतिविधियां कीं. यह गतिविधियों एक समय के बाद उपयोगी साबित हुईं. वे उदाहरण देती हुई कहती हैं, 'जैसे कि 'सहकार्याची गोष्ट' यानी सहयोग की कहानी नामक गतिविधि में उन्होंने महिलाओं के मत और विचारों को महत्त्व दिया है. इसमें एक कहानी के जरिए महिलाएं उनके अपने-अपने किसान पतियों को सुझाव देती हैं कि खेतों में सिंचाई के लिए दो कुंओं की बजाय मिलकर यदि एक कुंआ खोदें तो मेहनत और पैसा दोनों बचेगा.' इसके बाद बच्चे इस कहानी पर चर्चा करते हैं और चर्चा के आधार पर अपने-अपने मत तैयार करते हैं.

बाल-विवाह के विरुद्ध बनाई गई 25 मिनट की मराठी शॉर्ट फिल्म का दृश्य


लैंगिक-भेदभाव मिटाने की दृष्टि से देखें तो इस तरह की सभी गतिविधियों का उद्देश्य संवैधानिक मूल्य मतलब स्वतंत्रता, समता, न्याय और बंधुत्व को बढ़ावा देना है. फिर भी महिलाओं के मुद्दे पर सुरेखा अहिरे को कुछ गतिविधियों से काफी मदद मिली. जैसे 'काळजी घेणारी मुलगी' यानी ध्यान रखने वाली बच्ची नामक में उन्होंने स्कूल में बच्चों के साथ लड़कियों की संवेदनशीलता पर विशेष चर्चा आयोजित की. इसी तरह, 'प्रामाणिकपणाचे बीज' यानी ईमानदारी का फल नामक गतिविधि में उन्होंने बच्चों का ध्यान लड़कियों की ईमानदारी और समझदारी की तरफ खींचा.इस बारे में अन्य शिक्षिका अंकिता पेलमहाले कहती हैं, 'लैंगिक समानता से जुड़ी एक अन्य गतिविधि है, जिसमें बताया गया है कि महिलाएं क्या-क्या कर सकती हैं. इस तरह की गतिविधियों से लैंगिक दूरी कम होती दिख रही है. वहीं, महान व्यक्तित्वों के प्रेरक प्रसंगों से लड़कियों में भी महत्त्वाकांक्षा जाग रही है. इनमें नामी क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर से लेकर पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत अब्दुल कलाम तक के प्रेरक प्रसंगों को शामिल किया गया है.'

फिर कैसे आया फिल्म का आइडिया
सुरेखा अहिरे के मुताबिक वर्ष 2019 में एक दिन कक्षा दसवीं में पढ़ने वाली उनकी पुरानी छात्रा उसके अपने विवाह का निमंत्रण देने स्कूल आई. तब उन्हें कम उम्र में लड़कियों के विवाह की बात सोचकर बहुत बुरा लगा.

कक्षा चौथी की दीपाली कुमावत कहती हैं, 'फिर, एक बार मैम ने हमसे कहा कि नाटक करते ही रहते हैं, चलो एक फिल्म बनाते हैं. हमने पूछा कैसी! वे बोलीं लड़कियों की फिल्म, उसमें हम बताएंगे कि लड़कियों को क्यों पढ़ना चाहिए. क्यों जल्दी शादी नहीं करनी चाहिए.'


इसके बाद सुरेखा अहिरे ने विशेष सत्रों में बच्चों से चर्चा करके एक पटकथा तैयार की. साथ ही, कक्षा चौथी की लड़कियों को अभिनय का मौका दिया. शुरुआत में कुछ लड़कियां अभिनय करने से झिझक रही थीं. इसलिए, सुरेखा अहिरे ने कुछ अतिरिक्त सत्र आयोजित किए. इन सत्रों में उन्होंने सावित्री बाई फुले और कल्पना चावला जैसी महिलाओं के बारे में कहानियां सुनाकर उन्हें फिल्म में काम करने के लिए उत्साहित किया.

फिल्मी कथानक और समुदाय की प्रतिक्रिया
फिल्म में छोटी उम्र की लड़की के विवाह के बाद उसके पति की असमय मौत से उपजी समस्या और संघर्ष को दिखाया गया है. इस दौरान एक लड़की की एक सहेली उसे सुझाव देती है कि वह उसकी अपनी बेटी की जल्दी शादी करने की बजाय अच्छी तरह पढ़ाने पर ध्यान दे. अंत में, जब उसकी बेटी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर लेती है तो उसे एक शिक्षित सम्पन्न परिवार से विवाह का प्रस्ताव आता है.

इस फिल्म की विशेषता है कि यह जीरो बजट फिल्म है. सुरेखा अहिरे बताती हैं कि उन्होंने कैमरा, ऑडियो रिकॉर्डिंग, ग्राफिक्स से लेकर संपादन आदि का कार्य मोबाइल से किया. कलाकारों की वेशभूषा और मेकअप की जिम्मेदारी गांव वालों ने उठाई है. फिल्म की अधिकतर शूटिंग स्कूल परिसर या उसके आसपास हुई है. कुछ दृश्य शाला पोषण आहार बनाने की जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति के घर पर शूट किए गए. इसमें सभी कलाकार कक्षा चौथी की छात्राएं थीं. इनमें सामला चौधरी, अंकिता पेलमहाले, ऋतुजा पेलमहाले, मंगला पवार और कादंबरी पेलमहाले ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई हैं. यह फिल्म सावित्री बाई फुले और ज्योतिबा फुले को समर्पित की गई है.

फिल्म की अधिकतर शूटिंग स्कूल परिसर या उसके आसपास हुई है.


इसके बाद, शूटिंग के दौरान बच्चों के कुछ परिजनों ने मदद की. इस तरह फिल्म निर्माण के दौरान भी गांव वालों को फिल्म की अवधारणा समझने और अपनी परंपरागत मानसिकता पर गंभीरता से सोचने का मौका मिला. इस बारे में कक्षा चौथी का हर्षद गावडे बताता है, 'हम घर से मेकअप का सामान और ड्रेस ले जाते थे. हमसे हमारे घर वाले फिल्म की कहानी के बारे में पूछते थे. तब घर वालों से हमारी चर्चा होती थी और हम उन्हें बताते थे कि यह फिल्म क्यों बना रहे हैं.'

आखिर 26 जनवरी, 2020 को स्कूल परिसर में यह फिल्म पहली बार गांव वालों को दिखाई गई. इस बारे में सरपंच वसंत गावडे कहते हैं, 'फिल्म ज्यादा से ज्यादा लोगों को दिखाई जानी चाहिए. क्योंकि, इसे देखने के बाद हमारे गांव में कुछ परिवारों ने अपनी बच्चियों के विवाह रद्द कर दिए.'
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: September 14, 2020, 12:21 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर