एक शिक्षिका ने समझा बिगड़े नामों से चिढ़ाने का मनोविज्ञान, वंचित बच्चों को दिलाई उनकी असल पहचान

आमतौर पर स्कूल में बच्चों के इस नकारात्मक बर्ताव को मामूली बात जानकर अनदेखा कर दिया जाता है. यह अलग बात है कि कई बच्चे उन्हें बिगड़े या गलत नामों से बुलाये जाने पर हीनभावना के शिकार बन जाते हैं और इससे उनके व्यक्तित्व पर कई तरह से मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ते हैं. इसका असर उनकी पढ़ाई से लेकर खेलकूद से जुड़ी गतिविधियों पर पड़ता है और कई बार यह हीनभावना उनमें स्कूल का आकर्षण कम करती है और वे इससे दूर भागना चाहते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: October 19, 2020, 11:37 AM IST
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एक शिक्षिका ने समझा बिगड़े नामों से चिढ़ाने का मनोविज्ञान, वंचित बच्चों को दिलाई उनकी असल पहचान
यह शिक्षिका हैं सोनाली तरोले जो महाराष्ट्र में जिला मुख्यालय बुलढ़ाणा से लगभग ढेड़ सौ किलोमीटर दूर संग्रामपुर तहसील के अंतर्गत जिला परिषद मराठी प्राथमिक स्कूल बलोदा में पदस्थ हैं.
स्कूलों में कई बार कुछ बच्चे एक-दूसरे को उनके असली नामों से बुलाने की बजाय बिगड़े नामों से बुलाते हैं. कई बार कुछ बच्चे दूसरे बच्चों को गलत नामों से चिढ़ाते भी हैं. धीरे-धीरे बिगड़े या गलत नाम ही कुछ बच्चों की पहचान बन जाते हैं. फिर अक्सर लोग उन्हें उनके बिगड़े या गलत नामों से ही पहचानने लगते हैं.

आमतौर पर स्कूल में बच्चों के इस नकारात्मक बर्ताव को मामूली बात जानकर अनदेखा कर दिया जाता है. यह अलग बात है कि कई बच्चे उन्हें बिगड़े या गलत नामों से बुलाये जाने पर हीनभावना के शिकार बन जाते हैं और इससे उनके व्यक्तित्व पर कई तरह से मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ते हैं. इसका असर उनकी पढ़ाई से लेकर खेलकूद से जुड़ी गतिविधियों पर पड़ता है और कई बार यह हीनभावना उनमें स्कूल का आकर्षण कम करती है और वे इससे दूर भागना चाहते हैं.

लेकिन, महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचल में एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका ने इस मामूली समझे जाने वाले मुद्दे पर अपनी संवेदनशीलता दिखाई है. उन्होंने बच्चों में इस प्रकार के बर्ताव को बदलने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण उपक्रमों का सहारा लिया है. वे पिछले दो वर्षों से इन उपक्रमों को औजार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं. सुखद बात यह है कि इन दो वर्षों के अंतराल में यह शिक्षिका अपने उद्देश्य में सफल भी होती दिख रही हैं.

यह शिक्षिका हैं सोनाली तरोले जो महाराष्ट्र में जिला मुख्यालय बुलढ़ाणा से लगभग ढेड़ सौ किलोमीटर दूर संग्रामपुर तहसील के अंतर्गत जिला परिषद मराठी प्राथमिक स्कूल बलोदा में पदस्थ हैं.
लगभग ढाई हजार की जनसंख्या वाले बलोदा गांव में अधिकतर छोटे किसान और मजदूर परिवार हैं. जबकि, यहां के सरकारी प्राथमिक स्कूल में कुल पांच शिक्षक-शिक्षिकाओं सहित 145 बच्चे हैं. बता दें कि यहां शिक्षिका सोनाली तरोले के मार्गदर्शन में जुलाई 2018 से बच्चों को शिष्ट और विनम्र बनाने के लिए नियमित रूप से विशेष सत्र आयोजित किए जा रहे हैं.

शिक्षिका सोनाली तरोले ने सबसे पहले बच्चों को परस्पर एक-दूसरे की सहभागिता से उनकी अपनी कक्षा और स्कूल के लिए नियम बनाने के लिए प्रोत्साहित किया.


विशेष उपक्रम से क्या परिवर्तनशिक्षिका सोनाली तरोले इस बारे में अपने अनुभव साझा करती हुई बताती हैं कि बच्चों के व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए तैयार किए गए उपक्रमों को आयोजित करने से पहले उनके स्कूल के कुछ बच्चे मजे-मजे में एक-दूसरे को गलत नामों से चिढ़ाते थे. जैसे ओम को ओम्या तो प्रकाश को पदया वगैरह बुलाते थे. पर, कुछ गतिविधियों में कहानियों के माध्यम से आयोजित चर्चाओं में यह समझने का मौका दिया गया कि आपस में एक-दूसरों को चिढ़ाने कि किस तरह के बुरे नतीजे हासिल होते हैं. ऐसे ही नैतिक मूल्यों पर आधारित कुछ गतिविधियों को खेल-खेल में कराने के कारण बच्चे अब एक-दूसरे का आदर करना सीख रहे हैं. इसके अलावा, एक अच्छी बात यह भी है कि बच्चे स्कूल में अपने से छोटी उम्र के बच्चों को भी आदर दे रहे हैं.

बच्चों ने बनाया यह नियम
शिक्षिका सोनाली तरोले ने सबसे पहले बच्चों को परस्पर एक-दूसरे की सहभागिता से उनकी अपनी कक्षा और स्कूल के लिए नियम बनाने के लिए प्रोत्साहित किया. इसके पीछे वजह यह है कि आमतौर पर कोई नियम बच्चों को अनुशासित बनाने के लिए प्रेरित करता है. बच्चे यदि यही नियम आपसी सहगाभिता से बनाएं तो वे परस्पर एक-दूसरे के प्रति सम्मान जताना सीखते हैं.

सोनाली तरोले बताती हैं, 'जुलाई 2018 में बच्चों ने विशेष सत्रों के दौरान पहले अपनी-अपनी कक्षा के लिए यह नियम बनाया कि वे हर एक बच्चे को असली नाम से बुलाएंगे. इस नियम का परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे बच्चे आपस में एक-दूसरे के प्रति सम्मान जताने लगे. फिर, अगस्त 2018 में आयोजित एक संयुक्त सत्र में सभी कक्षाओं के बच्चों ने मिलकर स्कूल के लिए भी यही नियम बनाया.


नियम का पालन कराना बन गई चुनौती
सोनाली तरोले बताती हैं कि सिर्फ नियम बनाना ही काफी नहीं था. असली चुनौती थी कि सभी बच्चे उनके द्वारा बनाए गए नियम का अच्छी तरह पालन भी करें.

इस बारे में वे कहती हैं, 'कुछ बच्चे कहने भर से नहीं मान रहे थे. शायद उनके अपने सामाजिक परिवेश का प्रभाव उनके व्यवहार को बदलने में सबसे बड़ी बाधा बन रहा था. तब हमने विशेष और अतरिक्त सत्रों के दौरान आयोजित लगभग सभी गतिविधियों में बच्चों को इस बात के लिए बढ़ावा दिया कि वे एक-दूसरे को बार-बार उनके सही नाम से ही बुलाएं.'

इस उपक्रम पर आधारित विशेष सत्रों के नियमित संचालन के कारण बच्चे एक-दूसरे को अच्छी तरह समझने लगे हैं. सोनाली तरोले बताती हैं कि वे बच्चों के साथ इस तरह के सत्र सप्ताह में दो से तीन बार आयोजित करती रहीं. एक सत्र की अवधि 45 से 60 मिनिट की होती.


दूसरी तरफ, इसी दौरान शिक्षिका सोनाली तरोले ने एक और प्रयोग किया. उन्होंने बच्चों के व्यवहार बदलने और उनके नैतिक शिक्षा देने के लिए आयोजित विशेष सत्रों में कई सहयोगी खेल आयोजित कराए. शिक्षिका द्वारा इन सहयोगी खेलों के दौरान बच्चों से पांच-पांच मिनिट के कुछ खेल कराए. इनमें हर बच्चे के नाम का अर्थ बताने जैसी पहल शामिल थी. उदाहरण के लिए, बच्चों से पूछा जाता कि वे ओम और प्रकाश शब्दों के अर्थ और उनका महत्त्व समझाएं.

सोनाली तरोले के मुताबिक, असली चुनौती थी कि सभी बच्चे उनके द्वारा बनाए गए नियम का अच्छी तरह पालन भी करें.


इस स्कूल के बच्चे बताते हैं कि इन विशेष सत्रों के दौरान संचालित कुछ गतिविधियों में उन्होंने जाना कि कोई उन्हें गलत तरह से संबोधित करें तो उन्हें किस तरह से बुरा बुरा लगेगा और वह ऐसी स्थिति में किस प्रकार का व्यवहार करेंगी. इस बारे में कक्षा चौथी की वेदिका थिरोडकर बताती है, 'हमने जाना कि किसी को मोटू या लंबू नहीं बोलना चाहिए. क्योंकि, इससे किसी को बुरा लग सकता है. जैसे कोई मुझे ही मोटी कहे तो यह मुझे पसंद नहीं. कोई मुझे मेरे रंग से चिढ़ाए तो यह भी मुझे पसंद नहीं.'
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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First published: October 19, 2020, 11:37 AM IST
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