Teacher's Day: एक टीचर ने बच्चों को TIME की कीमत समझाकर बदल दी स्कूल की सूरत

Teacher's Day: महाराष्ट्र के इस स्कूल में पढ़ने वाली प्रिया सोनवाने ने दो तरह की समय-सारणियां बनाई हैं. पहली समय-सारणी में उसके दिन भर की योजना होती है. दूसरी समय-सारणी में महीने भर की योजना होती है. इन समय-सारणियों में उसने स्कूल और स्कूल बाद के समय में किए जाने वाले कामों को लिखा है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 4, 2020, 4:20 pm IST
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Teacher's Day: एक टीचर ने बच्चों को TIME की कीमत समझाकर बदल दी स्कूल की सूरत
बच्चों में आत्मविश्वास तो बढ़ ही रहा है
एक सरकारी शिक्षक ने पढ़ाने की एक नई पद्धति के सहारे महज छह महीने में स्कूल की तस्वीर बदल दी है. अब यहां बच्चों की उपस्थिति एक तिहाई बढ़ गई है. यही वजह है कि महाराष्ट्र के दूरदराज के गांव का यह स्कूल इन दिनों 'समय के सदुपयोग' के मुद्दे पर चर्चा के केंद्र में है. बात हो रही है औरंगाबाद जिले से करीब 50 किलोमीटर दूर के शासकीय प्राथमिक शाला बनशेंद्रा की. वर्ष 1914 में स्थापित इस मराठी माध्यम की शाला में कुल 143 बच्चे और प्रधानाध्यापक सहित छह शिक्षक हैं.



इस बदलाव तक पहुंचने के लिए यहां के शिक्षक योगेश रिंदे ने लगातार छह महीने तक सप्ताह में दो से तीन बार अतिरिक्त सत्र आयोजित किए और कई ऐसी गतिविधियों को अंजाम दिया कि अधिकतर बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि जाग गई. आज स्थिति यह है कि 80 प्रतिशत से अधिक बच्चे अपना होमवर्क पूरा करके कक्षा में आते हैं, जबकि पिछले सत्र में 40 प्रतिशत बच्चे ही होमवर्क करते थे. इसी तरह, पिछले सत्र में 19 बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया था. पर, इस सत्र में अब तक किसी बच्चे ने स्कूल नहीं छोड़ा है.



इस परिवर्तन के पीछे की वजह यह है कि योगेश ने पढ़ाने के पारंपरिक तौर-तरीके से अलग कुछ विशेष तरह की गतिविधियां कराईं. इसमें उन्होंने बच्चों को उनकी सुविधा से खुद उनकी समय-सारणियां बनवाने में मदद की. इसलिए, ज्यादातर बच्चे अच्छी तरह से अपनी-अपनी समय-सारणियों का पालन कर पा रहे हैं. खास तौर से चौथी और पांचवीं के बड़े बच्चे अधिक अनुशासित हुए हैं.







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पहले बच्चे थे 'सिरदर्द'



बता दें कि करीब ढाई हजार की जनसंख्या के इस गांव में अधिकतर मजदूर और किसान परिवार हैं. लिहाजा, इन बच्चों के परिजन खेतों में मजदूरी करने जाते हैं. स्कूल में आयोजित इन सत्रों से पहले वे अपने कामों में हाथ बंटाने के लिए कई बार बच्चों की जरुरत से ज्यादा मदद लेते थे. इसके लिए वे बच्चों को अक्सर अपने साथ या तो खेत ले जाते थे या फिर उन्हें घर पर रखवाली के लिए छोड़ते थे.



कुछ लड़के गाय, भैंस और बकरियां चराने गांव से बाहर निकल जाते थे, जबकि कुछ लड़कियां घर पर या तो खाना बनाने में मां की मदद करतीं या फिर अपने छोटे भाइयों को संभालने जैसे कामों में पूरा समय बितातीं. ऐसे में ज्यादातर बच्चों का स्कूल से कोई विशेष लगाव नहीं था. ऐसे बच्चे कभी-कभी स्कूल आते भी थे तो देरी से और आमतौर पर होमवर्क नहीं करते थे, इसलिए शिक्षकों को कक्षा में दुबारा पढ़ाना पढ़ता था.



योगेश के मुताबिक इन गतिविधियों को कराने के करीब तीन महीने बाद तक सिर्फ एक चौथाई बच्चे ही समय पर स्कूल आते थे और अपना होमवर्क पूरा करते थे. दूसरी तरफ, ज्यादातर बच्चे पढ़ाई में पीछे रहने की वजह से हीनभावना का शिकार थे.



वे कहते हैं, ''हमारे बच्चे अव्यवस्थित रहती थी. वजह, हमारे बच्चों ने खेलकूद या घर, स्कूल और खेत के कामों को करने के लिए समय प्रबंधन की कोई योजना नहीं बनाई थी. इसलिए, वे कोई भी काम अच्छी तरह से नहीं कर पाते थे. कई बार बहुत सारे काम वे खुद नहीं कर पाते थे. इसलिए, हमें उन्हें अलग-अलग बताना पड़ता था. इससे हमारा काम और मुश्किल हो जाता था. फिर, हमारी कक्षा के बच्चे भावनात्मक रूप से एक नहीं थे.''



राजू की दिनचर्या से लिया सबक

योगेश के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन गई थी और वे बच्चों को अच्छी तरह से पढ़ाने के लिए इस तस्वीर को हर हालत में बदलना चाहते थे. उसके बाद, योगेश ने कक्षा चौथी की पुस्तिका में 'राजू की दिनचर्या' और 'मेरी दैनिक समय-सारणी' जैसे पाठ पढ़े तो विचार किया कि राजू की तरह यदि उनकी कक्षा के बच्चे भी खुद अपने समय का सही उपयोग करना सीख गए तो उनके स्कूल की स्थिति बदली जा सकती है.



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फिर, उन्होंने इन पाठों को पढ़ाने की बजाय बच्चों के साथ एक मनोरंजक गतिविधि कराई. पहले योगेश ने बच्चों को पुस्तिका से राजू नाम के बच्चे की समय-सारणी दिखाई. फिर उन्होंने बच्चों से राजू की दिनचर्या से जुड़े कुछ प्रश्न पूछें. फिर, बच्चों की जोड़ियां बनाकर इन प्रश्नों पर चर्चा करने के लिए कहा कि क्या राजू अपने समय का सही उपयोग करता है? क्या उसकी समय-सारणी में कुछ सुधार की जरुरत है?



उसके बाद, बच्चों ने खुद अपनी समय-सारणियां बनाईं और एक-दूसरे की समय-सारणियों को मूल्यांकन करके उनमें आवश्यक सुधार लाने के लिए सुझाव दिए. योगेश के अनुसार, ''करीब एक महीने बाद कुछ बच्चों में शुरुआती बदलाव दिखने लगे.'' जाहिर है बच्चों ने अपनी समय-सारणियां खुद अपने हाथों से तैयार की थीं. इसलिए, इसका पालन करना उनके लिए अधिक आसान था.



पूरे गांव के लिए डिजाइन किया 'टास्क'

प्रश्न है कि क्या बच्चों की समय-सारणियां बनने भर से स्थिति बदली जा सकती थी? उत्तर है- नहीं. यही वजह है कि इस शिक्षक ने इस बात को ध्यान रखने के लिए एक विशेष रणनीति पर काम करना शुरु किया. वे कुछ दिनों तक सुबह स्कूल लगने के पहले और शाम को स्कूल छूटने के बाद बच्चों के परिजनों से मिलते. उन्हें शिक्षा का महत्त्व बताते हुए उनके बच्चों की समय-सारणियों का पालन कराने के लिए समझाने का प्रयास करते.



उसके बाद, योगेश ने बच्चों और परिजनों से चर्चा करके मुख्य समस्याओं की एक सूची तैयार की. इसमें 'बच्चों की समस्याएं' और 'पालकों की समस्याएं' नाम से दो खाने बनाएं और उसे वर्गीकृत किया. इस दौरान कई तरह की बातें उभरकर आईं. जैसे कि कई बार बच्चे सुबह समय पर नहीं उठते हैं. इसलिए, न घर के काम ही कर पाते हैं और न ही समय पर स्कूल ही पहुंच पाते हैं. इसलिए, उन्हें घर और स्कूल दोनों जगह डांट झेलनी पड़ती है. योगेश बताते हैं कि कुछ दिनों बाद उन्होंने बच्चों और परिजनों के बीच एक बैठक आयोजित की. इसमें तय हुआ कि बच्चों से परिजनों की अपेक्षाएं क्या हैं और उसके लिए बच्चे किस हद तक मदद करने के लिए तैयार हैं.



इसके बावजूद, ज्यादातर बच्चों को शुरुआत में समय-सारणी का पूरी तरह से पालन करना मुश्किल हो रहा था. पर, करीब तीन महीने बाद ज्यादातर बच्चों ने अपनेआप को समय-सारणी के अनुरूप ढाल लिया. इसका नतीजा यह है कि उनके ज्यादातर काम समय पर पूरे होने लगे. कक्षा चौथी की समृद्धि मोलिंगे बताती हैं, ''मेरी कक्षा में बीस बच्चे हैं. इसमें अठारह बच्चे तो समय-सारणी का अच्छी तरह से पालन करते ही हैं.''



इस स्कूल में पढ़ने वाली प्रिया सोनवाने नाम की बच्ची के पिता राजेन्द्र सोनवाने चर्चा में बताते हैं कि उनकी बेटी ने दो तरह की समय-सारणियां बनाई हैं. पहली समय-सारणी में उसके दिन भर की योजना होती है. दूसरी समय-सारणी में महीने भर की योजना होती है. इन समय-सारणियों में उसने स्कूल और स्कूल बाद के समय में किए जाने वाले कामों को लिखा है.



आकाश घाडगे के पिता भारत घाडगे के मुताबिक, ''आकाश अब समय पर नहाने में आनाकानी नहीं करता. वह साफ कपड़े पहनता है. सफाई का बहुत ध्यान रखता है.'' वहीं, योगेश बताते हैं कि यह हमारी छह-आठ महीनों की मेहनत और उनसे लगातार संवाद करते रहने का नतीजा है कि ज्यादातर बच्चों के परिजन अब बच्चों से बहुत ज्यादा काम नहीं कराते हैं. अंत में आदित्य खैरनार नाम का बच्चा कहता है, ''अब हम परीक्षा में पास तो हो ही सकते हैं. इसके अलावा भी बहुत कुछ कर सकते हैं!'' (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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First published: September 4, 2020, 4:20 pm IST
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