एक सबक ने बदली जिंदगी; जो बच्चे घोसले तोड़ते थे, अब चिड़ियों को दाने डालते हैं

महाराष्ट्र के चिंचोली के स्कूली बच्चों पहले में बहुत अहं था. वे बड़ों की बातें सुनते नहीं थे. लड़ते रहते थे. उनके व्यवहार में आसपास की भाषा का प्रभाव दिखाई देता था. कुछ बच्चे स्कूल में सहपाठियों के साथ अपशब्दों का प्रयोग करते थे. वे अक्सर गाली-गलौच करते रहते थे. लेकिन एक शिक्षिका की पहल ने अब सबकुछ बदल दिया है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 28, 2020, 9:22 AM IST
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एक सबक ने बदली जिंदगी; जो बच्चे घोसले तोड़ते थे, अब चिड़ियों को दाने डालते हैं
बुलढ़ाणा जिला परिषद मराठी प्राथमिक स्कूल चिंचोली के बच्चे अपनी टीचर के साथ.
महाराष्ट्र में बुलढ़ाणा जिला परिषद मराठी प्राथमिक स्कूल चिंचोली में एक शिक्षिका द्वारा पिछले दो वर्षों से संवैधानिक मूल्यों पर आधारित गतिविधियों का परिणाम है कि ज्यादातर बच्चों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं. वे शिष्ट और विनम्र बन रहे हैं. साथ ही महान व्यक्तित्वों के बुनियादी गुण और कला व सौंदर्य के प्रति आकर्षित हो रहे हैं. इस सरकारी स्कूल की शिक्षिका पल्लवी बालसराफ बताती हैं कि संविधान के चार मूल्य स्वतंत्रता, समता, न्याय और बंधुत्व को मनोरंजन के साथ बच्चों के व्यक्तित्व में आत्मसात करने के कारण बच्चों का अहं कम हो रहा है. इससे उनमें धीरे-धीरे विनम्रता का गुण तो आ ही रहा है, वे पहले की तुलना में अब अधिक रचनात्मक हो रहे हैं.

पल्लवी बालसराफ को इस परिवर्तन के पीछे जो सबसे अच्छी बात दिखाई देती है वह यह है कि बच्चे न सिर्फ शिक्षक-शिक्षिकाओं से बल्कि उनके अपने स्कूल में पढ़ने वाले अन्य बच्चों, कर्मचारियों, परिजनों और गांव के लोगों के प्रति आदर का भाव प्रदर्शित कर रहे हैं. जिला मुख्यालय बुलढ़ाणा से लगभग 60 किलोमीटर दूर सेगाव तहसील के अंतर्गत चिंचोली गांव के इस स्कूल में कुल छह शिक्षक-शिक्षिकाएं हैं. यहां दिसंबर 2017 से संवैधानिक मूल्यों पर आधारित गतिविधियों के सत्र आयोजित हो रहे हैं. बता दें कि करीब पांच हजार की जनसंख्या वाले चिंचोली गांव में अधिकतर सोयाबीन और कपास उत्पादक बड़े व मध्यम श्रेणी के किसान परिवार हैं.

बच्चों के व्यवहार में आए प्रमुख परिवर्तन
पल्लवी बालसराफ के अनुसार दिसंबर 2017 से संवैधानिक मूल्यों को बच्चों में आत्मसात कराने के प्रयासों की वजह से बच्चों के व्यक्तित्व में कई तरह के बदलाव देखे जा सकते हैं. जैसे कि उनके स्कूल के बच्चे इस तरह की गतिविधियों में शामिल महान व्यक्तित्वों के चरित्र और गुणों पर विचार कर रहे हैं. इसी तरह, बच्चे पशु-पक्षियों के प्रति दया भाव प्रदर्शित कर रहे हैं. इसके अलावा, चित्रकला या रंगोली से जुड़ी गतिविधियां बच्चों को कला व सौंदर्य के प्रति आकर्षित कर रही हैं.
बच्चों की सबसे बड़ी बाधा कैसे टूटी
संवैधानिक मूल्यों को आधुनिक शिक्षण पद्धति से सिखाने के कारण वह कौन-सी बाधा टूटी जिससे स्कूल के बच्चों में सकारात्मक परिवर्तन आए? इस बारे में पल्लवी बालसराफ बताती हैं कि पहले बच्चों में बहुत अहं था. इसके कारण वे बड़ों की कई बातों को सुनते नहीं थे. बच्चों के व्यवहार में उनके आसपास के लोगों द्वारा उपयोग की जाने वाली भाषा का प्रभाव दिखाई देता था. कई बार तो कुछ बच्चे स्कूल में लड़ाई के दौरान अपने सहपाठियों के साथ अपशब्दों का प्रयोग करते थे. वे अक्सर गाली-गलौच करते रहते थे. बच्चों का व्यवहार चिंताजनक था.

कुछ बच्चे चिड़ियों को पत्थर मारते थे. पालतू जानवरों को भी परेशान करते थे. लेकिन, आज यही बच्चे चिड़ियों को दाना-पानी देते हैं. कुत्ते और बिल्लियों की देखभाल करते हैं. खास तौर से उनसे भी छोटे और विकलांग बच्चों की मदद कर रहे हैं.
आधुनिक शिक्षण पद्धति और संवैधानिक मूल्य
क्या संवैधानिक मूल्यों से ऐसी जुड़ी कुछ घटनाएं हैं जिससे स्पष्ट हो सके कि बच्चों के व्यवहार में किस तरह से परिवर्तन आ रहे हैं? इस बारे में पल्लवी जून 2019 से जुड़ी एक घटना बताती हैं. वे कहती हैं कि संवैधानिक मूल्यों से संबंधित कई गतिविधियों के बावजूद कुछ बच्चों का अहं नहीं टूट रहा था और वे अपने बर्ताव से परेशानियां पैदा करते रहते थे.

इन्हीं में तब कक्षा चौथी में पढ़ने वाला राम ढगे (परिवर्तित नाम) भी था, जो अपने शरारती दोस्तों के साथ स्कूल के बाहर पेड़ों पर पक्षियों द्वारा बनाए घोसले तोड़ता था. इससे उसे आनंद आता था. पल्ल्वी बालसराफ बताती हैं कि उन्हीं दिनों एक बार स्कूल परिसर में तोतों द्वारा बनाया गया घोसला जमीन पर गिर गया. इससे नवजात तोते बेहोश हो गए. तब उनके साथ अन्य बच्चों ने नवजात तोतों की देखभाल की और होश में आने पर उन्हें दाना-पानी दिया.

पल्ल्वी बालसराफ बताती हैं, ‘उस दिन मैं उन नवजात तोतों को घोसले में रखकर अपने घर ले आई. मैंने पड़ोस के एक घर में उन्हें अन्य नवजात तोतों के साथ रखा. इस दौरान बड़े तोतों ने सभी नवजात तोतों की अपना बच्चा समझकर अच्छी तरह से देखभाल की.’


इसके बाद, पल्लवी बालसराफ ने संवैधानिक मूल्यों पर आधारित गतिविधि का एक संयुक्त सत्र आयोजित किया. इसमें स्कूल के सभी कक्षाओं के बच्चों को एक साथ एक हॉल में एकत्रित किया. इस दौरान उन्होंने उस घटना से जुड़े उनके अनुभव को स्कूल के सभी बच्चों के साथ साझा किया. शिक्षिका के अनुभव के बाद बच्चों ने इस घटना पर अपनी-अपनी राय रखी. बच्चों को लगा कि यदि तोते नवजात तोते के प्रति इतने संवेदनशील हो सकते हैं तो हम क्यों नहीं. इस तरह की घटनाओं और इस बारे में परस्पर एक-दूसरे से लगातार संवाद करने से उनके भीतर दया-प्रेम जागने लगा. लिहाजा, उनके भीतर का अहं धीरे-धीरे टूटने लगा.

उपलब्धियों से जुड़े अन्य अनुभव
मूल्यवर्धन के कारण बच्चों की सोच और दिनचर्या में होने वाले प्रभावों के पीछे अनेक गतिविधियां शामिल हैं. उदाहरण के रूप में पल्लवी बालसराफ एक गतिविधि से जुड़े उनके अपने अनुभव बताना चाहती हैं. वे बताती हैं, ‘इसी तरह के एक अतिरिक्त सत्र में मैंने अब्राहम लिंकन की जिंदगी पर आधारित एक प्रेरक कहानी बच्चों को सुनाई. इस कहानी पर बात करते हुए बच्चों ने जब उनके अपने मत रखें तो उनकी समझ के स्तर को देखते हुए मुझे भी हैरत हुई. जैसे बच्चों ने बताया कि पहले प्रयास में असफल होने की बजाय यह जानना जरुरी है कि असफलता से जुड़ी कौन-सी बातें पहचाननी चाहिए. इसी कहानी से संबंधित संवाद में बच्चों ने धैर्य, संयम, परिश्रम और पशु-पक्षियों के प्रति करुणा जैसी बातें कीं.’

पल्लवी बालसराफ को संवैधानिक मूल्यों से जुड़ी गतिविधियों में एक और बात अच्छी लगती है. यह है बच्चों को ज्यादा से ज्यादा चित्र बनाने और चित्रों में रंग भरने का मौका देना. उन्हें लगता है कि इससे बच्चे रचनात्मक बन रहे हैं और परोक्ष रूप से विनम्र भी बन रहे हैं. सरकारी स्कूल की यह शिक्षिका कहती हैं, ‘यदि इन गतिविधियों को व्यापक रूप से देखें तो बच्चों में व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया सतत जारी है.’

अंत में, प्रधानाध्यापक अमृतराव बनारे कहते हैं, ‘बच्चों में आ रहे परिवर्तन के पीछे शिक्षिका की यह पहल एक महत्त्वपूर्ण कारक के रूप में उभरी है. हमारी कोशिश है कि हर कक्षा के बच्चों के लिए सप्ताह में संवैधानिक मूल्यों पर आधारित गतिविधियों के न्यूनतम दो से तीन सत्र आयोजित किए जाएं.’ (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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First published: September 28, 2020, 9:22 AM IST
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